अग्रसेन की बावड़ी दिल्ली

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राजाओं की बावड़ी

दिल्ली का इतिहास काफी समृद्ध हैं। दिल्ली ने कई शासनों को आते और जाते देखा है। और जितने भी राजा आए उन्होंने यहां की वास्तुकला में बहुत कुछ जोड़ा ही है। यहां बनी एतिहासिक इमारतों में भी उनकी छाप भी नजर आती है। 1516 में सिकंदर लोदी के जमाने में भी दिल्ली में कई एतिहासिक इमारतों का निर्माण हुआ। ऐसी ही एक जगह है राजाओं की बावड़ी। महरौली में16 सदी में बनी की राजाओं की यह बावड़ी दिल्ली की अन्य बावडि़यों की तुलना में काफी बड़ी है। उस समय दौलत खान ने इस बावड़ी को बनवाया था। बावड़ी तीन मंजिला नीचे तक है। उस काल में यमुना नदी से काफी दूर बसे शहर महरौली में पानी की कमी न हो इसके लिए यह बावडि़यां बनवाई गई थी।

कैसी है बावड़ी

अन्य बावडि़यों की तरह इस बावड़ी के पीछे की तरफ भी एक कुंआ और आगे की तरफ कुंड है। बावड़ी परिसर तीन तरफ से कमरों नुमा स्ट्रक्चर से घिरा है। ताकि धूप आदि से बचा जा सके और यहां की ठंडक में कुछ समय आराम किया जा सके।

नाम से फर्क नहीं पड़ता

राजाओं की बावड़ी से ऐसा लगता है कि यह सिर्फ राजाओं के लिए ही काम में ली जाती होगी, पर ऐसा है नहीं। यह आम लोगों के लिए भी खुली हुई थी।

दूर तक फैली हरियाली

बावड़ी की छत पर चढ़ कर दूर तक का नजारा लिया जा सकता है। काफी खुली जगह होने की वजह से दूर तक का दृश्य दिखाई देता है। यहां का वातावरण शुद्ध और खुला हुआ है। यहां आकर लगता ही नहीं कि दिल्ली के किसी इलाके में खड़े हैं। दूर-दूर तक फैली हरियाली गर्मी का अहसास नहीं होने देती। कुतुब मीनार का नजारा भी यहां से लिया जा सकता है।

टूरिस्टों को तरसती यह बावड़ी

इस बावड़ी का इतिहास भले ही कितना ही भव्य हो पर वर्तमान में इसकी हालत काफी खराब है। दिन में ही लोग नजर नहीं आते और रात में यहां नशेडि़यों का अडडा बन जाता है। सिक्यूरिटी गार्ड और पुलिस वाले हैं पर खुद की हिफाजत । दिल्ली की अन्य

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