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ओशो का जीवन परिचय और उनके उपदेश

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ओशो ने अपनी पूरी  जीवन जिस प्रकार जिया है वही  खुद में  एक परिचय बन गया था. उनकी आत्मकथा और जीवन पर ना जाने कितनी बार चर्चा हुयी और कितनी बार कही गयी  पर वास्तव में जो उनका व्यक्तित्व था अपने आप में एक सरल और स्पष्ट प्रतिध्वनि है जीवन का. ओशो को भगवान रजनीश के नाम से भी जाना जाता है उनका जन्म मध्यप्रदेश राज्य के रायसेन शहर के कुच्वाडा गाँव में एक जैन दम्पति श्री बाबूलाल जैन और श्रीमति सरस्वती जैन के घर में ११ दिसंबर १९३१ को हुआ था. उनका बचपन का नाम चन्द्र मोहन जैन था. वे बचपन से  बहुत वाकपटु और उपद्रवी किस्म के बच्चे मने जाते थे और साहस तो उनमे कूट_कूट कर भरी हुयी थी. और उनकी आगे की जिन्दगी भी इन्ही रहष्यों और कृत्यों का प्रतिबिम्ब बनकर प्रकट हुआ था.

उनकी शुरूआती जीवन ननिहाल में गुजरा था जहाँ पर उनके नाना और नानी ने उन्हें सामाजिक रूढ़िवादिता और विकृत परम्पराओं से चन्द्र मोहन जैन को दूर रखा था उनकी देखभाल एक नवाब कि तरह कि गयी थी. उन्हें किसी भी विषय पर बोलने और कुछ भी करने मनाही नहीं थी. परन्तु वो अपने इस स्वतंत्रता का कभी भी दुरपयोग नहीं किया था. उनके नाना को खुद से ज्यादा चन्द्र मोहन पर विश्वाश था शायद उनकी विलक्षण प्रतिभा से वो वाकिफ थे यही कारण है कि ओशो अपने बाद कि जिन्दगी में स्वतंत्र विचारधारा और वेवाकी से बात कहने वाले रहश्य्दर्शी बने. ओशो ये स्वीकारते हैं कि उनके नाना ने उनकी जिन्दगी कि एक आधार स्तम्भ हैं .

उनकी स्कूली शिक्षा उनके ननिहाल में हुया था . उनके नाना उनके अभिभावक और दोस्त भी थे. बचपन के उनके बहुत से किस्से मशहूर है- एक बार कि बात है नन्हा चन्द्र मोहन का  जन्मदिन आने वाला था और उनके नाना और उनका परिवार उनकी जन्मदिन कि तैयारी में लगे हुए थे. पर नटखट चन्द्र को ये विचार आया कि इस बार अपने जन्मदिन पर कुछ अलग करेंगे. हालाँकि उनके नाना पुरे गाँव को चन्द्र के जन्मदिन पर भोज का आयोजन करते थे और गरीबों में कपड़े बांटते थे. लेकिन नटखट बालक ने कुछ अलग ही सोच रखा था कि मैं हाथी पर चढ़ कर पुरे गाँव घूमूँगा और अपने हाथों से सबको कपडे और मिठाईयाँ बाटूंगा. इस बालक के आगे किसी का एक नहीं चलता था और हुआ भी वही. और स्कूल भी हाथी पर चढ़ कर जायेंगे बच्चों के सामने अपने रौब दिखने के लिए; हालाँकि रौब अपने शिक्षकों को दिखानी थी ताकि उनकी शैतानी  क्रियाकलाप अबाध रूप से चलते रहते . इस तरह की बहुत सी कहानियां उनकी बायोग्राफी में वर्णित है. बाद में उनके द्वारा दिए गए प्रवचनों को संकलित कर के लगभग ६०० पुस्तकों का रूप दिया गया.

बाल्यकाल से प्रखर रूढ़िवादी विचारधारा के विरोधी बालक ने जब अपने किशोरावस्था में कदम रखा तब उनके कॉलेज के दिन भी शुरू हो गए थे और वहां पर भी दोस्तों और प्रोफेसरों के समक्ष यक्ष प्रश्न खड़ा कर परेशान करते रहे; उद्देश्य सिर्फ सामाजिक तानेबाने में माकूल परिवर्तन था. एक बार कि बात है जब वो कॉलेज में अपने बढ़े हुए दाढ़ी लिए पहुंचे थे तब एक प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा था कि दाढ़ी क्यूँ बढ़ा रहे हो रजनीश ? सवाल ख़तम होते ही झट से बोल पड़े कि ” मैं दाढ़ी बढ़ा नहीं रहा ये अपने आप बढ़ रहा है महोदय! हालाँकि मेरा एक सवाल बनता है कि आप दाढ़ी क्यूँ कटा रहे हैं. गलती हुई माफ़ करो अबसे तुमसे कोई सवाल नहीं करूँगा प्रोफ़ेसर ने झेंपते हुए कहा.

ओशो एक रहश्यमयी गुरु थे और विवाद से उनका चोली-दमन का साथ था. अपने बेबाकी के कारण ही वो हमेशा विवादों में घिरे रहते थे. मौजूदा धर्मो में व्याप्त कुरीतियों और विसंगतियों पर हमेशा सार्वजानिक रूप से बोलना उनकी आदत थी. हालाँकि वो भारत के एक ऐसे विचारक विद्वान थे जो  विश्व के हर विषय पर अपनी राय रखी वो भी तर्क के साथ. उनके तर्क को काटना वो भी उनके सामने असंभव था. जब भी वो सर्वधर्म सम्मलेन में अपनी राय रखते थे तो सामने वाला ना मानते हुए भी मान लेता था.

जब वो कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर बने तो कॉलेज में छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ती थी. दर्शनशास्त्र के वो महान ज्ञाता थे. २१ साल के उम्र में उन्होंने अध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त हुए जो उनके जीवन पर्यंत उनकी जीने का उद्देश्य रहा. उनके शिष्यों कि तादात बढती गयी. एक समय ऐसा आया जब भारत में उनके खिलाप विरोध के स्वर बढ़ते चले गए. उसी समय विदेशों में उनकी काफी लोकप्रियता बढती गयी. विरोधियों और समर्थकों ने एक मुकाम पर पहुंचा दिया था.कहा जाता है कि उनके पास भारत के कई बड़े नेता गुप्त रूप से मिलने आते थे और उनसे आपनी समस्या का समाधान पूछते थे.

उन्होंने पुणे में एक अध्यात्मिक सेंटर खोला जो आज भी पुणे इंटरनेशनल के नाम से विद्यमान है . यह वही संस्था जहाँ पर वो अपने जीवन के ज्यादातर उपदेश दिए. जो आज पुस्तकों में संकलित कर प्रकाशित किया गया है. बाद में विश्व के कई देशों में अपने इसी तरह के सेंटर मौजूद हैं . पुणे के बाद जो सबसे ज्यादा सफल सेंटर रहा था वो अमेरिका में था उस आश्रम का नाम उनके भक्तों ने रजनीशपुरम रखा और काफी बड़ी मरुभूमि को हरियाली के चादर से लपेट दिया. वहां पर भक्तों और शिष्यों कि संख्या दिनोदिन बढती जा रही थी. एक समय ऐसा आया कि सर्कार को लगा कि ये भारतवंशी संत कहीं इसाई धर्म के लिए खतरा न पैदा कर दे. और वहां से उन्हें निकल दिया गया. विवाद से उनका रिश्ता उनके मौत के बाद भी नहीं गया.

ओशो को अध्ययन करने वाले ओशो के जीवन एवं कर्मों के महत्व को अलग तरह से व्याख्या करते हैं. उनका कहना है कि वो शुरू से अंत तक बस एक ही चीज थे और वो कुछ और नहीं बस अध्यात्म था . उन्होंने इहलौकिक और परलौकिक  अंतर्द्वान्द्ता के मध्य खायी को पाटने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसलिए सही मायने में वो केवल एक अध्यात्मिक गुरु थे. उन्होंने जीवन के हरएक पहलु कि जिस तरह व्याख्या की वो सिर्फ एक अध्यात्मिक गुरु ही कर सकता है. उन्होंने कहा ध्यान ही जीवन है. हमेशा होश में रहो वही जिन्दगी में बदलाव ला सकता है और वही बदलाव हमें परमात्मा के समीप पहुंचा सकता है. ध्यान के अलावा कोई और रास्ता नहीं है जो हमारी जीवन को उद्धार कर सके. बाकि सभी विधियों को जो तथाकथित महात्माओं और मौलवियों ने बना राखी है वो हमें भटका सकती है. इसलिए ध्यान, प्रेम, त्याग ही अपने आप और परमात्मा से साक्षात्कार करने का अकेला मार्ग है. उनके द्वारा बताये गए ध्यान विधियाँ सांसारिक तथा संत दोनों के लीये सामान रूप से मूल्यवान है.उन्होंने नद्ब्रम्हा, कुंडलिनी जागरण, सक्रीय ध्यान विधि जैसे अनेकों विधियों को ओशो मैडिटेशन सेंटर में प्रयोग कर काफी प्रसिद्ध हुए.

कुल मिलाकर इतना ही कहा जा सकता है एक विवेकशील अध्यात्मिक गुरु जो समय से पूर्व पैदा लेकर समाज में परिवर्तन कि इच्छा रखते थे परन्तु वैचारिकता में भेद के कारण उन्हें विवादों से रूबरू होना पड़ा

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