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क्रोध! क्यों, कब, और कैसे आता है ? क्या है मूल कारण

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क्रोध एक भावना है जो हमारे मस्तिष्क में उठने वाले अन्य भावनाओं जैसे ही है। प्यार, ईर्ष्या, भक्ति, आदर, गुस्सा इत्यादि मनुष्य के मन की वो स्वाभाविक उत्पत्ति है जो मनुष्य के समक्ष आने वाली उद्दीपनों पर निर्भर करता है जैसे हमारे समक्ष एक वृद्ध व्यक्ति किसी सड़क को पार करने की कोशिस कर रहा हो परन्तु काफी ट्रैफिक के वजह से उन्हें दिक्कत हो रही हो तब एक सामान्य सा युवक जो सक्षम है उन्हें सड़क पार करा देगा। अब सवाल उठता है की वो युवक वृद्ध को सड़क पार कराने के पीछे कौन सी भावना काम किया। निःसंदेह मदत की भावना जो आदर और प्यार से सिंचित था। अब एक दूसरा उद्दीपन; वही नवयुवक जाकर बस पर चढ़ता है जिसमे भीड़ भरी है वह एक सीट के पास जाकर खड़ा हो जाता है उससे लम्बी दुरी का रास्ता तय करना है तो उससे सीट मिलने की प्रबल इच्छा है परन्तु वह जिस सीट के पास जाकर खड़ा हुआ पीछे वाले एक इंसान उस सीट के खाली होने वक्त इस नवयुवक को धक्का देकर साइड कर देता है और सीट पर बैठ जाता है। अब इस नवयुवक को काफी गुस्सा आता है । ऐसा क्यों होता है एक व्यक्ति जो कभी प्यार और आदर के भावना से सिंचित था अब गुस्सा का प्रतिरूप क्यों बन गया।
इस घटना से पता चलता है कि इंसान परिस्थितियों के अनुरूप ही कार्य करता और परिस्थितियों के अनुरूप ही भावनाओं को उत्पन्न करता है। हर इंसान में देव के साथ दानव का रूप भी सामान रूप से सम्मलित रहता है । बस अंतर इतना होता है कि आपका अहंकार कितना बड़ा या छोटा है। एक अरबी कहावत है कि जब भगवान इंसान को धरती पर भेजते है तो उसके कान में सिर्फ इतना कहते हैं कि आज तक मैंने तुम्हारे जैसा इंसान इस धरती पर नहीं भेजा और धक्के लगा देते हैं । और तभी से अहंकार कि बीज अंकुरित होनी शुरू हो जाती है और मरते दम तक भगवान का ये कथन ढोते रहता है। यही अहंकार क्रोध का बीज है। जबतक यह अहंकार तिरोहित न हो जाय तबतक अहंकार पुनः पुनः जन्म लेते रहेगा।
क्रोध एक स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है जिसमे अहंकार पोषित होता है। अहंकार को खाना मिलते रहे तो वह जीवित रहता है। खाना मिलना बंद हो जाय तो अहंकार मर जाता है। इधर अहंकार मारा उधर आपका गुस्सा छूमंतर हो जायेगा। उदाहरणार्थ उस नवयुवक को जिसे बस में सीट न मिलने के वजह से गुस्सा आया था अब उसे ये सोचना होगा कि जिस इंसान से उसका झगड़ा हुआ था उसे भी उससे भी दूर जाना हो। या फिर वो काफी देर से खड़े-खड़े आ रहा हो। या फिर वह रोगी होगा। कुछ भी हुआ होगा । केवल एक विकल्प ही क्यों हो सकता है कि वो इंसान स्वार्थी है;मेरी जरुरत से उसकी जरुरत कम है । जब हम अक्सर अपने आप को सही ठहराएंगे और दूसरे को गलत तो क्रोध तो आएगा ही कोई उपाय नहीं है क्रोध न करने का । अपने आप को सही ठहरना ही अहंकार को पोषण देना है। और अहंकार को पोषण देना ही गुस्से को पालना है ।

***गुस्सा क्यों आता है ***
१. अहंकार के पोषण से
२. माता पिता के लालन-पालन के गलत तरीके से
३. सामाजिक वातावरण में व्याप्त बुराईयों से
४. दोस्तों के गलत संगत से
५. अति महत्वाकांक्षी बनने की प्रवृति से
६. “मैं सही हूँ ” की भावना मन में घर कर लेने से
७. सामने वाले व्यक्ति के बुरे वर्ताव से

१. अहंकार के पोषण से :- अहंकार के प्रभाव को कम करने का एक सामान्य परन्तु सर्वमान्य उपाय ये है कि जब भी लगे की मैं थोड़ा सा कहीं न कहीं गलत हूँ तो उस गलती को बस देखो और सोचो कि ये क्यों आया है? क्या सच में इस विषय पर हमें संजीदा होना चाहिए? क्या सच में ये हमारे काम का है? क्या मैं इस विषय को मन में जगह बनाने दूँ?
जब ये सरे प्रश्न अपने आप से पूछेंगे तो पाएंगे कि अहंकार धीरे-धीरे गायब होने लगता है। और आप अपने आप को चिंता मुक्त भी पाते हैं। इसकी हमें बार बार अभ्यास करने से ये हमारे आदत बन जाते हैं और एक समय आएगा जब हम पाएंगे कि हमें अब गुस्सा आना बहुत कम हो गया हैं। और फिर गुस्सा आता ही नहीं हैं।
२. माता पिता के लालन-पालन के गलत तरीके से :- हर माँ बाप अपने बच्चे को बहुत प्यार करते हैं ; इसी प्यार के दौरान उनसे कुछ जाने अनजाने गलतियां हो जाती हैं जो वो करना नहीं चाहते हैं । पर हो जाती हैं।
बच्चे की हर जिद के आगे माँ बाप झुक जाते हैं। बच्चे कि ख़ुशी के लिए माँ बाप हमेशा गलत डिमांड को भी मान लेते हैं सोचते हैं चलो बच्चे हैं बड़े होकर ठीक हो जायेंगे पर होता इसका उलट हैं। बच्चे को लगने लगता हैं कि कुछ भी मांगो माँ बाप पुरे जरूर करेंगे। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी बच्चे का विकाश जिंदिगी पहले पांच साल में अस्सी प्रतिशत पूरा हो जाता हैं बाकि बीस प्रतिशत पांच साल के बाद सीखते हैं। इसलिए बच्चे जब कुछ समझने लगते हैं तभी से हमें उनकी आदतों को सही करने का प्रयास करनी चाहिए। नहीं तो बाद में आप ही पछताते हुए ये कहावत गाते नजर आएंगे कि ‘ अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत. ऐसे बच्चे बाद में अपने इच्छा पुरे न होने पर गुस्से करते नजर आएंगे।
३. सामाजिक वातावरण में व्याप्त बुराईयां :- कई बार हमें ये देखने को मिलता हैं कि कोई समाज बहुत ज्यादा लड़ाकू हैं। ऐसे समाज में हर व्यक्ति का व्यवहार लड़ाकू किस्म का होता हैं; चाहे वो सामान्य ही क्यों न दिखता हो। ऐसे लोगों कि आदत हो जाती हैं गुस्सा करने की। और ये नियम व्यक्ति विशेष पर भी लागु होती हैं। कुछ लोगों अपनी भौहें हमेशा तान के रखते हैं; एक्टिंग कर रहे होते हैं गुस्से करने का और गुस्सा उनकी आदत में सुमार हो जाती है। ऐसे लोग समाज में व्याप्त बुराईयों से बहुत जल्दी क्रोधित हो जाते हैं कि अरे उसने ऐसे किया और हो गए गुस्सा। टेंशन का एक माहौल क्रिएट हो जाता है और बुराईयां फलने फूलने लगता है। समाज कि स्तिथि बद से बदतर होने लगता है।समाज में फैले बुराईयों और क्रोध एक दूसरे का अनुपूरक हैं। जब क्रोध तेज होगा तो समाज में बुराईयां फैलेगी; और जब बुराईयाँ बढ़ेगी तो भी क्रोध बढ़ेगा।
४. दोस्तों के गलत संगत से :- कहते हैं न संगत से गुण होत है संगत से गुण जात! संस्कार इंसान घर में सीखता है और उसका विस्तार दोस्तों के मध्य होता है । जिस तरह के आपके दोस्त होंगे वैसी ही आपकी आदत बनते जायेंगे। दूसरी तरफ ये भी सच है कि जैसी आपकी आदत है वैसे ही आपके दोस्त बनेंगे। दोनों बातों का एक दूसरे से अन्योनाश्रय सम्बन्ध है। अब ऐसे सोचो जैसे कि आपके परिवार ने आपको सच बोलने का संस्कार दिया और आप सच बोलने में विश्वास करते हैं तो आप सच बोलने वाले दोस्त खोजेंगे। जो भी आपके दोस्त झूठ बोलेंगे आप उनसे या फिर किनारा कर लेंगे या फिर आप उसके साथ-साथ रहते हुए भी उसपर हमेशा गुस्सा करते रहेंगे। अब आती है एक नयी बात जो डिपेंड करता है आपके और आपके दोस्त के इच्छाशक्ति पर; जिसकी इच्छाशक्ति ज्यादा होगी उसका प्रभाव दूसरे पर पड़ेगा। और जिसका प्रभाव दूसरे पर नहीं पड़ेगा वह गुस्से से भर जायेगा। जिसका निदान ये हैं कि आप हमेशा अपने जैसा ही दोस्त बनायें वही चिरस्थायी दोस्ती होगी।
५. अति महत्वाकांक्षी बनने की प्रवृति से :- अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति की चाहत हमेशा और और और पाने की होती है और अगर ना मिले तो बस क्रोध से भर जायेंगे। अपनी चाहत पर कुछ लगाम लगानी चाहिए। सफलता की चाहत रखना बुरी बात नहीं है पर ऐसा नहीं होनी चाहिए की सबकुछ मुझे मिले। बहुत सरे लोग प्रयास कर रहे हैं सबका हक़ है सफलता पर। अगर ना मिले तो फिर से प्रयास करो। महत्वाकांक्षी बनो पर इतना नहीं की तुम पागल ही हो जाओ। योग्यता के अनुसार ही अपनी महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ने दो नहीं तो क्रोध बढ़ना लाज़मी है ।
६ .” मैं सही हूँ ” की भावना मन में घर कर लेने से :- आप अक्सर देखते होंगे की किसी का किसी से हॉट टॉक होनी लगती है। क्या कारण है? मैं सही हूँ इस भावना को लेकर हर इंसान हमेशा चलता है। मैं कैसे गलत हो सकता हूँ । मैं इस विषय को आपसे बढ़िया जानता हूँ ये हमारे मन के अवचेतन तल पर हमेशा चलते रहता है। जाने अनजाने ये हमारी आदत बन सी गयी है इसलिए इन आदतों को हमें केवल शांत होकर देखनी चाहिए। जब आप अपने अंदर के विचार को देखने में माहिर हो जायेंगे तो पाएंगे कि आपकी ये आदतें धीरे-धीरे विदा होने लगी है।
७. सामने वाले व्यक्ति के बुरे वर्ताव से :- कई बार आप दोषी नहीं होते हैं पर सामने वाला इंसान आपसे गलत व्यवहार कर रहा हो जो उचित नहीं है तो आप क्या करेंगे आप भी उससे ज्यादा गुस्सा हो जायेंगे ताकि सामने वाला आदमी शांत हो जाय। आप जाने अनजाने अपने ऊर्जा को गलत दिशा दे दिया। आप कहेंगे कि मैं ना गुस्सा होता तो ना जाने वो और क्या क्या करता इसलिए आप उससे भी ज्यादा गुस्सा करके उसको शांत कर दिया। पर ये तो एक बहाना है अपने को जस्टिफाई करने का इससे ज्यादा कुछ नहीं। यहाँ पर एक कहानी याद आ गयी जो बताना मैं जरुरी समझता हूँ । एक बार कि बात भगवान बुद्ध किसी गांव से गुजर रहे थे उस गाँव में एक आदमी था जो मूर्ति पूजा का समर्थक था और भगवान बुद्ध विरोधी इसलिए उस आदमी ने भगवान बुद्ध को बहुत भला बुरा कहने लगा। बुद्ध बिना एक भी शब्द बोले वह से निकल गए पर उनके साथ उनका शिष्य आनंद था जो कहने लगा आपने उस व्यक्ति को कुछ कहा क्यों नहीं वो आपको गाली दे रहा था और आप सर झुकाये निकल गए. तब भगवान बुद्ध ने कहे- आनंद जिसके पास जो होता है वो वही दे पता है न उससे कम न उससे ज्यादा। उसके पास क्रोध था वो दिया मेरे पास प्रेम था सो मैंने वो दिया। और हाँ उसने जो गाली दिया वो मैंने लिया ही नहीं।

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