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स्टीव जॉब्स की प्रेरक कहानी जो आपकी जिंदगी बदल सकती है!

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ऐपल के को-फाउंडर स्टीव जॉब्स 2005 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक फंक्शन में दिए गए उनके भाषण का एक अंश :
मेरी पहली कहानी बिन्दुओं को जोड़ने के बारे में है।

खुद पर हमेशा भरोसा रखें छह महीने पढ़ने के बाद मैंने कॉलेज ड्रॉप कर दिया। फिर भी 18 महीने तक मैं कॉलेज में ही भटकता रहा। मैंने पढ़ाई क्यों छोड़ी थी/ यह सबकुछ मेरे पैदा होने से पहले ही घटित होने लगा था। जब मैं पैदा हुआ, तब मेरी जन्मदाता मां अनब्याही छात्रा थी। वह चाहती थी कि जन्मने के बाद कोई मुझे गोद ले ले। उसकी दिली इच्छा थी कि मुझे वही लोग गोद लें, जो खुद स्नातक हों।

एक वकील और उसकी पत्नी ने मुझे गोद लेने की इच्छा जताई, लेकिन मेरे पैदा होने के बाद उन दोनों ने कहा कि उन्हें बेटी चाहिए थी, इसलिए मेरा गोद लेना कैंसल हो गया। एक और दंपति ने गोद लेने के लिए मेरी मां से संपर्क किया था। मां ने उनसे बात चलाई। वे मुझे गोद लेने के लिए तुरंत राज़ी हो गए। उस दंपति ने वादा किया कि वे इस बच्चे को कॉलेज की पढ़ाई ज़रूर कराएंगे। मुझे मेरे नए मां-पिता मिल गए।

जब मैं 17 का हुआ, तो मुझे कॉलेज भेजा गया, लेकिन नासमझी में मैंने एक बेहद महंगा कॉलेज चुन लिया था। मेरे मध्यवर्गीय मेहनतकश मां-पिता अपनी सारी जमापूंजी मेरी पढ़ाई पर झोंक रहे थे। छह महीने बाद मेरी समझ में आया कि इतने सारे पैसे देने के बावजूद इस पढ़ाई का कोई मूल्य नहीं। मुझे नहीं पता था कि जीवन में मुझे क्या बनना है और इसे पता कर सकने में कॉलेज मेरी कोई मदद भी नहीं कर पा रहा था, जबकि मां-पिता के सारे पैसे यूं ही उड़ रहे थे।

मैंने तय किया कि मैं आगे नहीं पढ़ूंगा। उस समय मेरे इस फ़ैसले से घर में हड़कंप मच गया था, लेकिन आज इतने बरसों बाद जब मैं मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि पढ़ाई छोड़ने का फैसला मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था। जब मैंने पढ़ाई छोड़ने का फ़ैसला कर लिया, तो मैं किसी भी क्लास में घुस जाता था। जो भी विषय मेरी दिलचस्पी का लगता, मैं उसमें चला जाता। अपने रेगुलर विषय छोड़ देता।

यह सब कुछ इतना आसान नहीं था। मेरे पास हॉस्टल का कमरा भी नहीं था। मैं एक दोस्त के कमरे में फर्श पर सोता था। कोक की बोतलें बेच या लौटाकर खाना खरीदता था। हर रविवार की रात मैं 12 किमी पैदल चलकर हरे कृष्णा मंदिर जाता था, ताकि सप्ताह में एक दिन तो अच्छा खाना खा सकूं। उस दौरान अपनी जिज्ञासाओं के कारण मैंने कई नई चीजें सीखीं, जानीं, जो आगे चलकर मेरे लिए अनमोल साबित हुईं। एक उदाहरण देता हूं।

उन दिनों देश में सबसे अच्छी कैलीग्राफी शायद हमारा कॉलेज ही सिखाता था। उस समय कैंपस में हर पोस्टर, हर लेबल हाथ से लिखा होता, बेहद सुंदर अक्षरों में। मैं अपनी क्लासेस छोड़ कैलीग्राफी की क्लास में घुस जाता था। मैंने उसकी कई बारीकियां सीखीं। इन बातों का जीवन में कोई इस्तेमाल नहीं था, लेकिन दस साल बाद, जब हम पहला मैकिनटोश कंप्यूटर बना रहे थे, मुझे वह सबकुछ याद आ गया।

मैक डिजाइन करते समय मैंने उन सब स्मृतियों का प्रयोग किया। वह पहला कंप्यूटर था जिसकी टाइपोग्राफी इतनी सुंदर थी। अगर मैं अपनी पढ़ाई छोड़ उन क्लासेस में न घुसता, तो मैकिनटोश में इतने सुंदर फॉन्ट, टाइप कहां से आते/ दुनिया के किसी कंप्यूटर में न आते, क्योंकि विंडोज ने तो मैक की नकल करके ही सारे फॉन्ट बनाए थे। इसे मैं बिंदुओं को जोड़कर रेखा बनाने की तरह देखता हूं। अतीत में हम कई बिंदु जमा करते हैं। समय के साथ उन्हें जोड़ते चलते हैं, रेखा बनती जाती है। दस साल पहले कॉलेज में मुझे नहीं पता था कि कैलीग्राफी की वह क्लास मेरी इस तरह मदद करेगी, लेकिन जिज्ञासा के कारण मैंने उसे सीखा। आज दस साल बाद मैं पलटकर देखता हूं, तो यह रेखा जुड़ती हुई दिखती है।

आप भविष्य में देखते हुए बिंदुओं को नहीं जोड़ सकते, सिर्फ अतीत में देखते हुए जोड़ सकते हैं। बिंदु इकट्ठा करते समय भरोसा रखना होगा कि भविष्य में कभी ये रेखाएं बन जाएंगे। आपको भरोसा रखना होता है, खुद पर, जीवन पर, प्रारब्ध पर, अपने कर्मों पर। मैंने यही रवैया अपनाया, और मुझे इससे कभी निराशा नहीं मिली। मेरी जिंदगी अगर सबसे अलग है, तो सिर्फ इसी दृष्टिकोण के कारण।

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