आंवले के पेड़ की पूजा का क्या महत्व है और कब की जाती है?

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Anvle Ke Ped Ki Puja

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हिन्दू धर्म में बहुत से पर्व मनाये जाते है जिनमे से कुछ बड़ी धूम धाम से मनाये जाते है तो कुछ बहुत ही शांति के साथ। इसके अलावा कुछ पर्व ऐसे भी है जिन्हें हम सभी भली भांति जानते है जबकि कुछ ऐसे है जिन्हें केवल देश के कुछ क्षेत्रों में ही मनाया जाता है। दिवाली, होली, छठ, तीज और नवरात्री पर्वों के बारे में तो सभी जानते है लेकिन क्या अक्षय नवमी का नाम सुना है शायद नहीं।

जानकारी के लिए बता दें, अक्षय नवमी भी उन्ही कुछ पर्वों में से एक है जिनके बारे में सभी लोग पूरी तरह नहीं जानते। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षय नवमी या आंवला नवमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं आंवले के पेड़ की पूजा करती है। माना जाता है, ऐसा करने से अखंड सौभाग्य और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

आंवले के पेड़ की पूजा का क्या महत्व है

इस दिन सूर्योदय के बाद से ही महिलाएं मंदिरों और अन्य स्थानों पर जाकर आंवले के पेड़ का पूजन करती है। कार्तिक स्नान करने के बाद महिलाएं आंवले के तने की कपूर और घी का दीपक जलाकर पूजा करती है। साथ ही आंवला नवमी की काहनी सुनती है। परिक्रमा करने के बाद पति और पुत्र की लम्बी आयु की प्रार्थना की जाती है।

इस नवमी पर स्नान, पूजन, तर्पण और दान आदि का विशेष महत्व होता है। इसीलिए इस दिन प्रातः काल स्नान करके महिलाएं पूजन करती है और दान आदि करके इच्छित फल के प्राप्ति की कामना करती है।

क्या है आंवला नवमी?आंवले के पेड़ की पूजा का क्या महत्व है

कातिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को आंवला (अक्षय) नवमी कहते है। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। इस पर्व को प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठने और भोजन करने से रोगों का नाश होता है।

ग्रंथ क्या कहते है?

जैसा की हमने आपको बताया की इस पर्व में आंवले की वृक्ष की पूजा की जाती है। लेकिन क्या आप जानते है की इस पर्व की शुरुवात किसने की थी? वास्तव में इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करने की प्रथा की शुरुवात माँ लक्ष्मी ने की थी।

मान्यताओं के अनुसार, एक बार माँ लक्ष्मी जी भ्रमण करने पृथ्वी पर आईं। रास्ते में उन्हें एक साथ भगवान विष्णु और शिव जी की पूजा करने की इच्छा हुई। फिर मां लक्ष्मी ने विचार किया की एक साथ भगवान विष्णु और शिव जी की पूजा कैसे हो सकती है।amla

तभी उन्हें ध्यान आया की तुलसी और बेल का गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव जी को। आंवले के वृक्ष को इन दोनों का प्रतीक मानकर उन्होंने दोनों देवों की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर नारायण और शिव जी प्रकट हुए। लक्ष्मी जी ने आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु और भगवान शिव जी को भोजन कराया। और उसके बाद स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई थी, उस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी थी।

आंवले के पेड़ की पूजा

तभी से इस दिन यह परंपरा चली आ रही है। अक्षय नवमी पर अगर आंवले की पूजा करना और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना संभव नहीं हो तो इस दिन आंवला जरूर खाना चाहिए। एक अन्य मान्यताके अनुसार, अक्षय नवमी को आंवला खाने से महर्षि च्यवन को फिर से जवानी का वरदान प्राप्त हुआ था।

इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर ब्राह्मणों को खिलाना चाहिए इसके बाद स्वयं भोजन करना चाहिए। भोजन के समय पूर्व दिशा की ओर मुंह रखें। शास्त्रों में बताया गया है कि भोजन के समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो यह बहुत ही शुभ होता है। थाली में आंवले का पत्ता गिरने से यह माना जाता है कि आने वाले साल में व्यक्ति की सेहत अच्छी रहेगी।