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Bhoramdeo Temple Chhattisgarh, भोरामदेव मंदिर छत्तीसगढ़

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भोरामदेव मंदिर, हिन्दू मंदिरों का एक परिसर है जो भगवान् शिव को समर्पित है। ये मंदिर भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के भोरामदेव में स्थित है। इस परिसर में चार मंदिर है जिनमे से सबसे पुराना ईंटो वाला मंदिर है।

इस परिसर का मुख्य मंदिर भोरामदेव मंदिर है जिसका निर्माण पत्थरो से किया गया है। इस की वास्तुकला में कामुक मूर्तियों को सम्मिलित किया गया है जो खजुराहों मंदिर और ओडिसा के कोनारक सूर्य मंदिर के समान है। भोरामदेव परिसर को “छत्तीसगढ़ के खजुराहों” के उपनाम के नाम से जाना जाता है।

भोरामदेव मंदिर से 1 kilometre (0.62 mi) की दुरी पर एक अन्य मंदिर है, जिसे भोरामदेव परिसर के साथ वर्णित किया जाता है, इस का नाम है माड़वा महल, स्थानीय भाषा में इसे विवाह हाल कहा जाता है इसे “दूल्हादेव” के नाम से भी जाना जाता है। इसका निर्माण सं 1349 में, नागवंशी साम्राज्य के रामचन्द्र देव के शासनकाल के दौरान किया गया था। इस मंदिर में एक अनोखा शिवलिंग है जो 16 स्तम्भों पर खड़ा है।

स्थान:

भोरामदेव मंदिर परिसर का निर्माण दक्षिण कोसला क्षेत्र की पहाड़ियों की माइकल श्रृंखला के घने जंगलों की तलहटी पर किया गया है, जिसे वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य के नाम से जाना जाता है। ये कबीरधाम जिले के कवर्धा शहर के उत्तर-पश्चिम से 18 km की दुरी पर स्थित है।

भोरामदेव परिसर के सबसे निकट रायपुर एयरपोर्ट है जो यहाँ से 134 km की दुरी पर स्थित है, रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी है। देश के बड़े बड़े शहरों से रायपुर आसानी से किसी भी वहां द्वारा पंहुचा जा सकता है। रायपुर के सबसे निकट रेलवे मार्ग बॉम्बे-हावड़ा की मुख्य लाइन है। कवर्धा, जो मंदिर परिसर का सबसे निकटतम शहर है की रायपुर से दुरी 116 km, राजनंदगांव से 133 km और जबलपुर से 220 km है। रायपुर से मध्य प्रदेश जाने के लिए एक बाइपास रोड है जिसे कान्हा राष्ट्रिय उद्यान के किनारे पर बनाया गया है।

इतिहास :

इस मंदिर का इतिहास और पुरातत्विक विवरण बहुत संपन्न है। इस मंदिर का निर्माण कालाचुरी अवधि (10 वीं से 12 वीं शतब्दी) के दौरान हुआ था क्योकि इस मंदिर में पाये जाने वाली मुर्तिया पास के पुरातत्विक स्थल जैसे जांजगीर, कालाचुरी, नारायण पुर और रतनापुर की मूर्तियों के समान है। ईंटो से बने मंदिरों का निर्माण पांडूयो के शासनकाल के दौरान किया गया था जो खारोड, पालारी, राजिम और सिरपुर राज्य में निर्मित मंदिरों की भांति है। इस मंदिर का निर्माण कार्य 7 वीं से 12 वीं शताब्दी के दौरान प्रारम्भ हुआ था। इस क्षेत्र के गोंड आदिवासी भगवान् शिव की पूजा आदि करते है जिन्हे भोरामदेव कहा जाता है, इस मंदिर में शिवलिंग स्थापित होने के कारण इसे भोरामदेव के नाम से भी जाना जाता है।

भोरामदेव मंदिर :

भोरामदेव मंदिर का निर्माण पत्थरो से किया गया है जिसे 1100 AD के दौरान बनाया गया था। ये मंदिर मंदिरों के खजुराहों समूह से भी पुराना है जिसे “अनूठी संरचना” भी कहा जाता है। इसकी बहरी दीवारों पर नक्काशीदार मुर्तिया है। इसकी वास्तुकला शैली को गुरुर प्रकार के नाम से जाना जाता है, जो उत्तर भारत के नगारा वास्तुकला शैली से भिन्न है।

मंदिर में सबसे पहला चरण एक विशाल चबूतरा है जिसे 5 feet (1.5 m) की ऊँचाई पर बनाया गया है। इस चबूतर पर कई हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों की नक्काशी की गयी है।

मंदिर का निर्माण इस चबूतरे पर किया गया है जिसका माप 60 feet (18 m) x 40 feet (12 m) है। इसमें मंडप के जैसी एक पारंपरिक हिन्दू संरचना है जो गर्भगृह की ओर जाने वाल मार्ग प्रदान करती है। गर्भ गृह वह स्थान है जहां मंदिर के मुख्य देवता अर्थात शिव जी शिवलिंग के रूप में विराजमान है। इस मंडप का आकार वर्ग है जिसे चार मुख्य केंद्रीय स्तम्भों ने सहारा प्रदान किया हुआ है। गर्भ गृह का माप 9 feet (2.7 m)x9 feet (2.7 m) है।

मंदिर का मुख्य पूर्व दिशा की ओर है, जहां एक प्रवेश द्वार है। इसके अलावा मंदिर की दक्षिण और उत्तर दिशा में भी दो प्रवेश द्वार है परन्तु मंदिर के पश्चिम में कोई द्वार नहीं है। इस तीनो द्वारा में खुले हुए “half shelter” है।

गर्भ गृह में प्रवेश करने के पश्चात दाई ओर एक बबहद खूबसूरती से बनी भगवान् विष्णु के दस अवतारों की तस्वीरें है, इसके अलावा शिव और गणेश जी की भी तस्वीरें इस गर्भ गृह में मौजूद है। इस मंदिर की ऊंची छत के शिखर पर एक कलश है जो वृत्ताकार का है। यहाँ कई छोटे स्तम्भ है जिन्होंने बड़े टावर को घेर रखा है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार की चौखट पर गंगा और जमुना जी की नक्काशीदार मुर्तिया है।

मंदिर में की गयी विशिष्ट वास्तुकला खजुराहों वास्तुकला शैली को दर्शाती है जो इस मंदिर का टावर है। जो माइकल पहाड़ी श्रृंखला के दृश्य को संकलित करती है। इस मंदिर के तेज घुमावदार वास्तु ओडिसा के मंदिरों की वास्तुकला शैली को प्रदर्शित करती है।

इस्तालिक मंदिर :

इस्तालिक मंदिर व् सूखे या जला मिट्टी की ईंटों से बना मंदिर मुख्य भोरामदेव मंदिर के समीप स्थित है। ये ऐसा पहला मंदिर है जिसका निर्माण 2nd से 3rd शताब्दी के दौरान हुआ था। वर्तमान में ये मंदिर बहुत जीर्ण शीर्ण अवस्था में है जिसमे बिना किसी प्रवेश कक्ष के केवल गर्भ गृह ही शेष है। गर्भ गृह के उपार बना टावर अपनी वास्तविक ऊँचाई से केवल आधी ऊँचाई का ही मौजूद है। मंदिर के आस पास एक संरक्षित दीवार है जिसे “अल्लिन्दा” के नाम से जाना जाता है। इस गर्भ गृह में पायी जाने वाली अन्य विशेषताओं में कुछ मूर्ति स्तम्भ ही शेष है। यहाँ शिवलिंग की मूर्ति के साथ उमा शंकर और एक राजा और रानी जो पूजा करने की अवस्ता में खड़े है की भी मुर्तिया है।

खुली हवा में संग्रहालय :

इस मंदिर पारिसर में एक खुली-हवा संग्रहालय है जिसमे इस क्षेत्र की पुरातत्विक वस्तुओं का संग्रह किया गया है। कहा जाता है इस संग्रहालय में पायी जाने वाली वस्तुएं 2nd से 3rd शताब्दी के आस पास की है। प्रदर्शन पर पायी जाने वाली एक विशेष वस्तु सती स्तंभ है जिसपर “आलिंगन-मुद्रा” अदि की नक्काशी की गयी है। यहाँ कई सारे स्लैब्स है जिनमे से एक को विशेष रूप से तलवार से नक्काशा गया है। इसके अलावा उमा महेश्वर की तस्वीर भी इस संग्रहालय में देहने को मिलती है। आँगन में लगायी गयी प्रदर्शनी पर रखी गई अन्य वस्तुओं में :- नंदी और शिवलिंग की कई जीर्ण छवियां समिल्लित है। मंदिर के आँगन के उतरी भाग का निर्माण ईंटो से किया गया है जो वर्तमान में खण्डार बन चूका है। वर्तमान में बने मंदिर को लाल रंग से रंगा गया है जिसमे हनुमान जी की मूर्ति है, ये मूर्ति आँगन की एक ओर देखने को मिलती है। इस परिसर के निकासी छोर पर काल भैरव की एक सजी धजी प्रतिमा है।

चेरकी महल :

चेरकी महल इस मंदिर का आखिरी मंदिर है, जिसका स्थान अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया है क्योकि ये एक घने जंगल वाले क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर में भगवान् शिव की मूर्ति नहीं है। इस मंदिर की गर्भ गृह की छत पर कमल आकार की सजावट की गयी है।

मड़वा महल :

मड़वा महल मुख्य मंदिर से 1 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है, जिसका मुख पश्चिम दिशा की ओर है। इस मंदिर में शिवलिंग को मुख्य देवता के रूप में स्थापित किया गया है। मंदिर होने के नाते इसका निर्माण एक विवाह कक्ष और पंडाल की भांति किया गया है, जिसे यहाँ की स्थानीय भाषा में “मड़वा” के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण नागवंशी राजा रामचन्द्र देव और हैहयवंशी रानी राज कुमारी अम्बिका देवी के विवाह उत्सव की याद में बनवाया गया था जो सं 1349 में हुई थी।

मंदिर के प्रवेश द्वार पर पारंपरिक वास्तुकला को अलंकृत किया गया है। प्रवेश कक्ष और मंडप की छत पर एक पुराना शिख़र है जिसे कुदरती तौर पर फिर से तैयार किया गया था। हालाँकि इस टावर के निचले भाग में कई छोटी कामुक मुर्तिया है जिनका निर्माण स्थानीय कलाकारों द्वारा किया गया था। इसके प्रवेश कक्ष में नंदी बैल की एक प्रतिमा है जो शिव लिंग की पूजा कर रहे है। ये मूर्ति गर्भ गृह के भीतर स्थित है। मुख्य कक्ष से गर्भ गृह तक जाने के लिए सीढ़िया बनायीं गयी है। इस मंदिर की बाहरी दीवार पर 54 कामुक अवस्थाएं है जो काम सूत्र का वर्णन करती है।


Title : Bhoramdeo Temple Chhattisgarh