देवघर का सावन मेला, कावड़ यात्रा

हमारी भारतीय परंपराओं में हर महीने (month) का एक विशेष महत्त्व माना जाता है. जैसे कार्तिक में आने वाली दीपावली का महत्त्व हर हिन्दू परिवार में एक समान है. ऐसे ही जुलाई-अगस्त में आने वाले सावन महीने का हिन्दू संस्कृति में अपना महत्त्व है. इस महीने को देवों के देव महादेव का माना जाता है. कहा जाता है की इस महीने में महादेव सभी की इच्छाओं की पूर्ति करते है बस आवश्यकता है तो पूर्ण निष्ठा और सच्ची भक्ति की. इस महीने में महादेव के धामों में विशेष मेले का आयोजन किया जाता है जिसे सावन मेला कहा जाता है. इस दौरान मेले की चमक देखने योग्य होती है. इस मेले में सभी महिलाय व् पुरुष अपना योगदान देते नज़र आते है. इन्ही में से एक है झारखण्ड के देवघर में आयोजित किया जाने वाला सावन मेला. झारखंड के देवघर के सावन मेले का आयोजन प्रतिवर्ष जुलाई-अगस्त के मध्य किया जाता है. महादेव के इस स्थान को बाबा वैद्यनाथ धाम के नाम से जाना जाता है. लोगो का मानना है की यहाँ मौजूद शिवलिंग को दानव राजा रावण द्वारा स्थापित किया गया था जिस कारण इसे “रावणेश्वर महादेव मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है.

इस वर्ष सावन मेला 20 जुलाई से शुरू होकर 18 अगस्त तक चलेगा. इस दौरान कावड़िया अपनी अपनी कांवड़ियों में जल लेकर महादेव का जलाभिषेक करते है. ये मेला सावन और भादो महीने के दौरान आयोजित किया जाता है. जो भक्त सावन के दौरान नहीं आ पाते वे भादो के दौरान यहाँ आकर भगवान् शिव की पूजा अर्चना करते है और अपना इच्छित वर प्राप्त करते है.

देश के अलग अलग क्षेत्रों से आने वाले भक्तगण महादेव को जल अर्पित करने के लिए कावड़ यात्रा करते है. इस कावड़ में वे गंगा जल भरकर उसे अपने कंधो पर उठाकर पैदल यात्रा कर के महादेव का जलाभिषेक करते है. इस जल को वे सुल्तानगंज से लाते है जो बिहार के भागलपुर जिले में स्थित एक धार्मिक स्थल है. ये स्थान गंगा नदी के तट पर स्थित है. सुल्तानगंज की गंगा नदी का बहाव उत्तर की ओर रहता है. ये एकमात्र ऐसा स्थान है जहां गंगा नदी का बहाव उत्तरी दिशा में होता है. इस मेले के दौरान भक्तगण यहाँ आकर गंगा नदी में स्नान करते है और इस नदी के पवित्र जल को भरकर अपनी यात्रा प्रारंभ करते है. उनकी ये यात्रा देवघर के बाबा वैद्यनाथ मंदिर के शिवलिंग पर जल चढ़ाकर समाप्त होती है.

ऐसी मान्यता है की सुल्तानगंज से लाये गए गंगाजल को देवघर में स्थित शिवलिंग पर चढ़ाने से भक्तो की सम्पूर्ण इच्छाओं की पूर्ति होती है. इस दौरान मंदिर में बहुत भीड़ रहती है, मंदिर में चढ़ाये जाने वाले जल के लिए भक्तो को 5 से 6 घंटे के लिए इंतजार करना पड़ता है. ये भी कहा जाता है की ये भक्तो के लिये परीक्षा की घडी होती है. सावन मेले में भक्तो की दैनिक सुविधाओं का प्रबंध राज्य प्रशासन और मंदिर प्रशासन द्वारा किया जाता है.

Baidyanath Mandir 5गंगा से जल भरकर लाने वाले भक्तो को कावड़िया कहा जाता है. हफ्ते के सभी दिन मंदिर में सामान्य भीड़ रहती है जबकि सोमवार को इससे दुगने लोग भगवान् को जल अर्पित करने यहाँ आते है. सावन के महीने की एक मान्यता और है जिसे शायद आप भी मानते होंगे. वो है सावन के सोमवार का व्रत. लोगो की मान्यता है की जो लोग पुरे वर्ष भर सोमवार का व्रत नहीं रख पाते सावन के चार सोमवार का व्रत रखते है और अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते है. ये भी कहा जाता है की वर्ष भर सोमवार का व्रत रखने का फल और सावन के सोमवार के व्रत रखने का फल एक समान होता है. इन्हे सावन सोमवार व्रत भी कहा जाता है.

सुल्तानगंज से बाबा वैद्यनाथ की दुरी 109km है, जिसे कावड़िया पैदल चलकर तय करते है. इस दौरान वे अपनी कावड़ को जमीन पर नहीं रखते क्योकि ऐसा माना जाता है की यदि कावड़ जमीन को छूती है तो वो अशुद्ध हो जाती है और उसका महत्त्व समाप्त हो जाता है. इसलिए कावड़िया इस बात का विशेष ध्यान रखते है की उनकी कावड़ जमीन से न छुए. इनमे से कुछ भक्तगण बाबाधाम जाकर अपनी यात्रा सम्पूर्ण करते है जो सुल्तानगंज से 105km की दुरी पर स्थित है. यात्रा के दौरान वे बोल बम और बम बम बोले का उच्चारण करते है. इस यात्रा के दौरान वे पूरी शुद्धता का ध्यान रखते है और बाबा वैद्यनाथ जाकर अपनी यात्रा समाप्त करते है.

यात्रा के दौरान कावड़ियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है जैसे पैरो में चोट लग्न, पैरो में छाले आ जाने और आदि. लेकिन फिर भी बाबा का नाम लेते हुए और अपने दुखो को भूलते हुए वे ख़ुशी ख़ुशी अपनी यात्रा सम्पूर्ण करते है. कावड़िया केसरिया रंग के कपडे पहनते है जिससे वे सभी में अलग दिखाई दे सके. न केवल पुरुष अपितु महिलाएं भी इस यात्रा में हिस्सा लेती है और अपनी भक्ति से महादेव को प्रसन्न करती है. तो आप भी बोलिए “बम बम बोले, सबकी किस्मत खोलें !”

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