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गोवर्धन पूजा क्यों करते है? और कब है?

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गोवर्धन हिन्दुओं के पवित्र महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है जिसे देश भर में बे हर्षौल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को दीपावली की अगली सुबह यानी दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा को लोग अन्नकूट के नाम से भी जानते है। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा संबंध दिखाई देता है।

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाने वाला यह त्यौहार सर्वप्रथम गोकुल में मनाया गया था। इंद्र देव का घमंड चूर करने के लिए इस पूजा का आयोजन श्री कृष्ण में करवाया था। इस दिन मंदिरों में अन्नकूट पूजन किया जाता है। ब्रज के त्योहारों में इस त्यौहार का विशेष महत्व है। इसकी शुरुवात द्वापर युग से मानी जाती है।

जैसा की आप जानते है की इस पर्व को अन्नकूट पूजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गेहूं, चावल, बेसन से बनी कढ़ी और पत्तेदार सब्जियों का भोजन बनाया जाता है और उसे भगवान् श्री कृष्ण को अर्पित किया जाता है।

महाराष्ट्र में इसी दिन बलि प्रतिपदा / बलि पडवा मनाई जाती है। इस दिन का सन्दर्भ भगवान विष्णु के एक अवतार, वामन की जीत से है। जिसमे वे राजा बलि को हराकर उन्हें पाताल लोक भेज देते है। माना जाता है, भगवान वामन से मिले वरदान के कारण इस दिन असुर राजा बलि पाताल लोक से पृथ्वी लोक आते है।

सामान्य तौर पर गोवर्धन पूजा गुजराती न्यू इयर यानी गुजराती नववर्ष के दिन ही आती है। क्योंकि गुजराती नववर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। परन्तु इसकी गणना प्रतिपदा तिथि के प्रारंभ समय के अनुसार ही की जाती है। जिसके अनुसार गोवर्धन पूजा गुजराती नववर्ष के एक दिन पहले मनाई जाती है।

2017 गोवर्धन पूजा :-

वर्ष 2017 में गोवर्धन पूजा 20 अक्टूबर 2017, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी।

गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त कुछ इस प्रकार है :

गोवर्धन पूजा का प्रातःकाल मुहूर्त = 07:30 से 09:37 तक है।
मुहूर्त की अवधि = 2 घंटा 6 मिनट की है।

वर्ष 2017 में कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 19 अक्टूबर 2017, वीरवार 15:11 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 20 अक्टूबर 2017, शुक्रवार 16:07 बजे समाप्त होगी।

गोवर्धन पूजा कैसे की जाती है?govardhan puja 2017

इस दिन प्रातःकाल शुभ मुहूर्त के हिसाब से गाय के गोबर से गोवर्धन बाबा (लेटे हुए पुरुष) की आकृति धरती पर बनाई जाती है। संध्या के समय इनका पूजन किया जाता है। पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल, खील, बताशे आदि का प्रयोग किया जाता है। गोवर्धन में अपामार्ग (ओंगा) अनिवार्य रूप से रखा जाता है। पूजन के बाद गोवर्धन जी की सात परिक्रमा लगाई जाती है और “गोवर्धन की परिक्रमा दे मानसी गंगा श्री हर दें” के जयकारे लगायें जाते है। इनकी नाभी के स्थान पर एक कटोरी में या मिट्टी का दीपक रखा जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे आदि पूजा करते समय डाले जाते है। बाद में इसे प्रसाद के रूप में बाँट दिया जाता है।

इस दिन प्रात: तेल मलकर स्नान करना चाहिए. सन्ध्या के समय दैत्यराज बलि का पूजन भी करते हैं। मान्यता है की गोवर्धन पूजा में स्त्रियों को वर्जित माना जाता है। वे न तो इनके पूजन में भाग लेती है और न ही इनका प्रसाद ग्रहण करती है। मान्यता ये भी है की ऐसा करने से स्त्रियों को दाढ़ी मुछ उग आती है। अब इसमें कितनी सच्चाई है यह कह पाना थोडा मुश्किल है।

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