होलिका दहन की क्या मान्यता है और क्यों किया जाता है होलिका दहन?

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होलिका दहन कब क्यों और कैसे मनाया जाता है?

होली हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले पवित्र पर्वों में से एक है जिसे फाल्गुन माह के पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस पर्व को पुरे देश में बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी रंगों की चादर में लिपटे हुए दिखाई पड़ते है। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह को हिन्दू कैलेंडर का अंतिम दिन माना जाता है जिसे नई ऋतू के स्वागत के रूप में भी देखा जाता है। होली का पर्व केवल भारत में ही नहीं अपितु नेपाल व् उससे सटे कई क्षेत्रों और विश्व के अन्य देशों में भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए भगवान के पूजन के रूप में भी मनाया जाता है।

होली क्यों मनाई जाती है?

हिन्दू धर्मानुसार फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है जिसे छोटी होली भी कहा जाता है। इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। होली पर्व में जितना अधिक महत्व होली के रंगों का होता है उससे कई अधिक महत्व होलिका दहन का होता है। माना जाता है इस दिन होलिका का पूजन करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यह दहन खेलने वाली होली से एक दिन पूर्व किया जाता है जिसे छोटी होली या होली दहन भी कहा जाता है। जिसके पीछे एक कथा है। बहुत से क्षेत्रों में इस दिन प्रकृति और देवताओं का विशेष पूजन किया जाता है जिससे उनकी आगामी फसल अच्छी हो।

होलिका दहन की कथा :-होलिका दहन 2017 शुभ मुहूर्त

माना जाता है वर्षों पूर्व धरती पर एक अत्याचारी राजा हुआ करता था जिसका नाम हिरण्यकश्यपु था। उसने अपनी प्रजा को यह आदेश दिया की कोई भी मनुष्य इश्वर की पूजा नहीं करेगा। वह खुद को उनका अन्नदाता मानता था इसीलिए सबसे कहा सभी उसे ही अपना आराध्य माने और उसका पूजन करें। परन्तु उसका स्वयं का पुत्र भक्त प्रह्लाद नारायण का परम भक्त था। उसने अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी और नारायण की भक्ति करता था।

अपने पुत्र के इस हठ को देखकर राजा ने यह निर्णय ले लिया की वह अपने पुत्र को दंड देगा। जिसके लिए उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया और कहा की वह प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ जाए। क्योंकि होलिका को यह वरदान की कभी भी अग्नि उसे जला नहीं पाएगी। जिसके वो प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी। लेकिन नारायण की माया के चलते और गलत का साथ देने की वजह से कुछ ही देर में होलिका भस्म हो गई जबकि प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। तभी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।

होलिका दहन की परंपरा :-

शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन खेलने वाली होली से एक दिन पूर्व किया जाता है। जिसमे कंडों में अग्नि जलाकर उसकी पूजा की जाती है। और उसकी परिक्रमा की जाती है इस अग्नि को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस पूजन में गेहूं और जौ की बालियों का इस्तेमाल किया जाता है। बहुत से लोग होली की अग्नि की राख (भूमि हरि) को अपने माथे पर भी लगाते है ताकि बुरा साया उनपर न पड़े।


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