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अष्टमी को कंजक (कन्या पूजन) ऐसे करें!

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नवरात्री के पावन पर्व में नौ दिनों तक भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। जिसके अंत में यानी अष्टमी और नवमी तिथि को कौमारी पूजन या कन्या पूजन किया जाता है। आम भाषा में इसे कंजक बैठना भी कहते है। इस पूजन में 10 वर्ष से छोटी आयु की लड़कियों को घर बुलाकर उनके पैरों को धोया जाता है, आदर सत्कार के साथ भोजन कराया जाता है और दक्षिणा आदि दी जाती है। अष्टमी और नवमी के दिन घर बुलाई जाने वाली इन कन्यायों को देवी का स्वरुप मानकर पूजा जाता है।

देवीभागवत पुराण के अनुसार नवरात्री के अंतिम दिन कन्या पूजन करना आवश्यक होता है। माना जाता है बिना कंजक जिमायें नवरात्र व्रत अधूरे होते है। कन्या पूजन के लिए सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि को उपयुक्त माना जाता है। आप इनमे से किसी भी एक दिन कौमारी पूजन कर सकते है। इसके लिए दस वर्ष की आयु से छोटी कन्यायें उपयुक्त रहती है।

इस दिन जरुरी होता है कौमारी पूजन या कन्या पूजन :-Navmi Kanya Pujan

नवरात्री की सप्तमी तिथि से कन्या पूजन का महत्व प्रारंभ हो जाता है। क्योंकि सप्तमी तिथि के अलावा आप अष्टमी और नवमी तिथि तक कन्याएं जिमा सकते है।परन्तु जो भक्त देवी के नौ व्रत रखते है उन्हें केवल नवमी या दशमी तिथि को कन्या पूजन के बाद ही प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। और अपने उपवास का पारण करना चाहिए। शास्त्रों में दुर्गाष्टमी को कन्या पूजन के लिए सबसे अहम् और शुभ माना गया है।

कैसे करें कन्या पूजन?

1. कन्या पूजन के लिए एक दिन पहले सभी कन्यायों को सदर आमंत्रित करें। क्योंकि कन्या पूजन के दिन उन्हें और जगह भी जाना होता है ऐसे में कंजीके मिलना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।

2. घर में प्रवेश करते समय पुरे परिवार को कन्यायों पर पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत करना चाहिए। और साथ ही नवदुर्गा के नामों के जयकारें लगाने चाहिए।

3. कन्यायों को आसान पर बैठने से पूर्व सभी के पैरों को स्वच्छ पानी से धोने चाहिए। अगर आपकी क्षमता हो तो धुप से भरे थाल में भी उनके पैरों को धोना चाहिए।

4. इसके बाद सभी के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। और कन्यायों के पैर धुलाने वाले जल और दूध को अपने मस्तक पर लगाना चाहिए।

5. इसके पश्चात् कन्यायों की किसी साफ़ और कोमल आसान पर बैठाना चाहिए।

6. उसके बाद कन्यायों के माथे पर कुमकुम लगाना चाहिए। साथ ही उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए।

7. देवी के सभी नौ स्वरूपों का ध्यान करने के बाद इन देवी स्वरुप कन्यायों को भोजन कराएं। इस भोजन में किसी तरह के लहसुन और प्याज का प्रयोग नहीं किया होना चाहिए। भोजन में हलवा, पूरी और चना अवश्य बनायें।

8. इसके बाद सभी को पेट भरकर भोजन कराएं।

9. भोजन समाप्त होने के बाद सभी को अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा और उपहार दें। और अंत में एक बार फिर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें।

10. इस बात का विशेष ध्यान रखें नौ दिन का उपवास रखने वाले व्यक्ति का कौमारी पूजन में होना आवश्यक है। तभी उनके व्रत को सम्पूर्ण माना जाएगा।

कन्यायों की उम्र :-Kumari pujan

कंजक जिमाने के लिए जिन कन्यायों को बुलाना है उनकी उम्र 10 वर्ष के भीतर ही होनी चाहिए। कंजक बैठने के लिए 9 कन्यायों का होना आवश्यक है साथ ही एक बालक का होना भी जरुरी है। जिसे लंगुरा बलबीर यानी हनुमान जी के रूप में पूजा जाता है। जिस प्रकार माँ वैष्णो की पूजा भैरव के बिना पूरी नहीं होती उसी प्रकार कन्या पूजन भी बिना बालक के पूर्ण नहीं होता। यदि एक समय पर 9 से अधिक कन्याएं आ जाती है तो कोई समस्या नहीं है। आप उनका भी आदर सत्कार के साथ स्वागत करें।

हर उम्र की कन्या का होता है अलग रूप :-

1. नवरात्र के दौरान सभी दिन एक कन्या का पूजन होता है, जबकि अष्टमी और नवमी पर नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है।

2. दो वर्ष की कन्या का पूजन करने से घर में दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है।

3. तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति का रूप मानी गई हैं। त्रिमूर्ति के पूजन से घर में धन-धान्‍य की भरमार रहती है, वहीं परिवार में सुख और समृद्धि जरूर रहती है।

4. चार साल की कन्या को कल्याणी माना गया है। इनकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है, वहीं पांच वर्ष की कन्या रोहिणी होती हैं। रोहिणी का पूजन करने से व्यक्ति रोगमुक्त रहता है।

5. छह साल की कन्या को कालिका रूप माना गया है। कालिका रूप से विजय, विद्या और राजयोग मिलता है। 7 साल की कन्या चंडिका होती है। चंडिका रूप को पूजने से घर में ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

6. 8 वर्ष की कन्याएं शाम्‍भवी कहलाती हैं। इनको पूजने से सारे विवाद में विजयी मिलती है। 9 साल की कन्याएं दुर्गा का रूप होती हैं। इनका पूजन करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है और असाध्य कार्य भी पूरे हो जाते हैं।

7. दस साल की कन्या सुभद्रा कहलाती हैं। सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूरा करती हैं।

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