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Mallikarjuna Swami Srisailam, मल्लिकार्जुन स्वामी श्रीसैलम

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श्री मल्लिकार्जुन स्वामी, शिव जी के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। ये ज्योतिर्लिंग दक्षिणी भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के श्रीसैलम में स्थित है। ये मंदिर 275 Paadal Petra Sthalam में से एक है। श्रीसैलम वो मंदिर है शक्ति पीठ अर्थात देवी सती और ज्योतिर्लिंग यानि शिव जी एक साथ विराजमान है और अपने भक्तो का कल्याण करते है। मल्लिकार्जुन स्वामी श्रीसैलम के नल्लामलाई पहाड़ियों की सपाट चोटी पर स्थित है। श्रीसैलम को भारत के सबसे प्राचीन क्षेत्रों में से एक माना जाता है। ये आंध्र प्रदेश की कुर्नूल जिले के कृष्णा नदी के दाई ओर स्थित है। इस पर्वत को सिरिधान, श्रीगिरी, सृपर्वतः और श्रीनगम के नाम से भी जाना जाता है। ये स्थान सदियों से शैव तीर्थ यात्रियों के लिए लोकप्रिय केंद्र रहा है।

ज्योतिर्लिंग :

शिव महापुराण के मुताबिक, एक बार ब्रह्मा (सृष्टि के हिंदू देवता) और विष्णु (मुक्ति के हिन्दू देवता) के मध्य सृष्टि के वर्चस्व को लेकर एक विवाद हो गया। उनकी परीक्षा लेने के लिए, शिव जी ने एक विशाल अंतहीन प्रकाश स्तम्भ, ज्योतिर्लिंग को सृष्टि के तीनो लोको से पार कर दिया। ब्रह्मा और विष्णु दोनों अपने अपने मार्ग चुनकर इस प्रकाश के अंत को खोजने के लिए ऊपर और नीचे की ओर चल दिए। ब्रह्मा ने झूठ कहा की उन्हें प्रकाश का अंत मिल गया जबकि विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली। उसके पश्चात शिव जी एक दूसरे प्रकाश स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा को श्राप दिया की तुम्हे किसी भी समारोह में स्थान नहीं मिलेगा जबकि विष्णु अनंतकाल तक पूजे जायेंगे। ज्योतिर्लिंग एक महान वास्तविकता है जिसमे से शिव जी आंशिक रूप से प्रकट होते है। तब से ये माना जाता है की ज्योतिर्लिंग मंदिर वे स्थान है जहां से शिव जी प्रकाश के एक तेजस्वी स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। मूल रूप से शिव जी के 64 ज्योतिर्लिंग है जिनमे से 12 को बहुत शुभ और पवित्र माना जाता है। इन बारह ज्योतिर्लिंग में प्रत्येक का नाम इनके इष्ट देव पर रखा गया है जो शिव के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन करते है। इन सभी स्थलों पर, मुख्य छवि शिवलिंग की है जो अनादि और अनन्त के प्रकाश स्तंभ को दर्शाती है और शिव जी की अनंत प्रकृति का वर्णन करती है। इन बारह ज्योतिर्लिंगों में गुजरात के सोमनाथ, आंध्र प्रदेश के श्रीसैलम में स्थित मल्लिकार्जुन, मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर, मध्य प्रदेश के ओम्कारेश्वर, हिमालय के केदारनाथ, महारष्ट्र के भीमाशंकर, उत्तर प्रदेश की वाराणसी में स्थित विश्वनाथ, महाराष्ट्र के त्रयम्बकेश्वर, वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, देवघर में देवगढ़, झारखण्ड, गुजरात के द्वारका में स्थित नागेश्वर, तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित रामेश्वर और महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित गृष्णेश्वर शामिल है।

कथा :

जब शिव जी और पार्वती जी ने अपने पुत्रों के लिए उपयुक्त वधु ढूंढने का फैसला किया, तो गणेश और कार्तिके बहस करने लगे की कौन पहले विवाह करेगा। इस बहस को खत्म करने के लिए शिव जी ने कहा की जजों प्रदक्षिणम् ने पृथ्वी के सात चक्कर लगा लेगा वही पहले विवाह करेगा। पिता जी की बात सुनकर भगवान् कार्तिक अपने वाहन मोर की पीठ पर बैठकर पृथ्वी के चक्कर लगाने चले गए जबकि भगवान् गणेश ने अपने माता पिता के सात चक्कर लगाए। शास्त्रों के मुताबिक, प्रदक्षिणम् में लगाया गया अपने माता पिता का चक्कर ब्राह्माण के चक्कर (भुप्रदक्षिणम्) के समान होता है। उनके व्यवहार से प्रसन्न होकर शिव जी ने बुद्दि, सिद्धि और ऋद्धि नाम की कन्यायो का विवाह भगवान् गणेश से करवा दिया। जब कार्तिके ब्राह्माण के चक्कर लगाकर लौटे तो वह बहुत नाराज़ हो गए और क्रावुंजा नाम की पहाड़ी पर कुमारब्रह्मचारी के नाम से अकेले रहने चले गए। उनके जाने के पश्चात शिव जी और पार्वती जी उन्हें शांत करने के लिए उस पर्वत पर आये जहां कार्तिके रुके थे। अपने माता पिता को आते देख उन्होंने वहा से किसी अन्य स्थान पर भागने का प्रयास किया, परन्तु देवताओं की प्रार्थना पर वें वही रुके रहे। जिस स्थान पर शिव और पार्वती जी आकार रुके थे उसे श्रीसैलम के नाम से जाना जाने लगा। अमावस्या के दिन भगवान् शिव और पूर्णिमा के दिन देवी पार्वती भागवान कार्तिके के पास जाते है। ये मंदिर पूर्व की ओर स्थित है। मंदिर के केंद्रीय मंडप में विभिन्न स्तम्भ है, जिसमे नदिकेश्वरा की बड़ी प्रतिमाएं है। श्रीसैलम मल्लिकार्जुन मंदिर में मनाए जाने वाला सबसे मुख्य उत्सव महाशिवरात्रि का है।

श्रीसैलम मल्लिकार्जुन स्वामी एक शक्तिपीठ के रूप में :

श्रीसैलम मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर देवी सती के 18 महा शक्ति पीठों में से एक है। दक्ष के यज्ञ और सती जी के आत्मदाह की पौराणिक कथा के परिणामस्वरूप देवी सती ने देवी पार्वती के रूप में जन्म लिया और शिव जी की पत्नी बन गयी। इस पौराणिक कथा की उत्पत्ति शक्ति पीठ से जुडी हुई है। पौराणिक कथाओ के मुताबिक, इन शक्ति पीठों पर एक कहानी है जो भारतीय परंपरा में अपना महत्वपूर्ण महत्त्व रखती है। देवी सती भारत के महापुरुषों की देवी पुत्रियों में से एक है जिनका पिता “राजा दक्ष” थे। जब सती अपनी युवा अवस्था पर पहुंची उन्होंने शिव जी को अपने पति के रूप में पाने के लिए एक प्रचण्ड धार्मिक अनुष्ठान किया। परन्तु उनके पिता उनके इस निर्णय से सहमत नहीं थे और वो नहीं चाहते थे की सती जी शिव जी से विवाह करे। फिर भी अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध जाकर उन्होंने शिव जी से विवाह कर लिया।

एक दिन राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया, उसमे सभी देवताओ को आने के लिए कहा परन्तु सती और शिव जी को नहीं आमंत्रित नहीं किया। सती ने शिव जी से इस यज्ञ में जाने के लिए ज़िद की और शिव जी ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी परन्तु वे खुद नहीं गए। शिव जी की आज्ञा पाकर, देवी सती यज्ञ में शामिल होने चली गयी, परन्तु उनके पिता ने उनका और उनके पति का अपमान किया जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सकी।

देवी सती के पिता द्वारा भगवान् शिव का अपमान करने पर, वे खुद यज्ञ कुंड की पवित्र अग्नि में कूद गयी। जब भगवन शिव ने ये सुना तो वो बहुत क्रोधित हो उठे। शिव जी माँ सती के शव को अपने हाथो में लेकर पुरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। उन्होंने ब्रह्मांड का विनाश करने वाले तांडव नृत्य को करना प्रारम्भ कर दिया। सृष्टि को उनके क्रोध से बचाने के लिए सभी देवतागण भगवान विष्णु के पास जा पहुंचे और उनसे मदद मांगने लगे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को काट कर 52 भागो में विभाजित कर दिया। पृथ्वी पर जहां भी ये हिस्से गिरे थे, वे स्थान शक्ति पीठ बन गए। कहा जाता है दुनिया में कई शक्ति पीठ है जिनमे से केवल 51 ही पाये गए है। उन्ही शक्तिपीठों में से एक है श्रीसैलम मल्लिकार्जुन स्वामी जहां सती देवी की ऊपर का होंठ गिरा था।


Title : Mallikarjuna Swami Srisailam