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Mukteshvara Temple Bhubaneswar, मुक्तेश्वर मंदिर भुबनेश्वर

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मुक्तेश्वर मंदिर एक 10 वीं शताब्दी का हहिन्दु मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। ये मंदिर भारत के ओडिशा राज्य के भुबनेश्वर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 950–975 CE के दौरान किया गया था और ये ओडिसा के महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिरों में से एक है। मुक्तेश्वर मंदिर का शैलीगत विकास पूर्व के विकास के पराकाष्ठा को दर्शाता है और प्रयोग की अवधि जिसे आज भी पुरे देश में देखा जा सकता है, ये राजरानी मंदिर और लिंगराज मंदिर में देखने को मिलती है, जो भुबनेश्वर में स्थित है। ये मंदिर शहर के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है।

इतिहास :

मुक्तेश्वर मंदिर में सोमवंशी शासनकाल की अवधि की वास्तुकला पायी गयी है। अधिकांश विद्वानों का मानना है की ये मंदिर परशुरामेश्वर मंदिर का उत्तराधिकारी है और इसका निर्माण ब्रह्मेश्वर मंदिर (1060 CE) से भी पहले किया गया था। Percy Brown के मुताबिक इसका निर्माण 950 CE में किया गया था। तोरण की उपस्थिति, जो इस क्षेत्र के किसी भी मंदिर का हिस्सा नहीं है, इस मंदिर को अनोखा बनाती है और बिल्डर द्वारा निर्मित की गयी नई संस्कृति का संकेत इसमें पाये गए कुछ प्रतिरूप करते है। K.C. Panigrahi ने इस मंदिर के निर्माण के लिए सं 966 CE के दौरान स्थान का चयन किया और बाद में सोमवंशी राजा जजाति I ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। ऐसा कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण कीर्तिवस्सा के लिए भी करवाया जा रहा था परन्तु कीर्तिवास को लिंगराज के साथ स्थापित करने की अनुमति नहीं थी। जिसके कारण एक ही दिन एक ही भगवान्, शिव के लिए दोनों मंदिरों का निर्माण करवाया गया। ऐसा कोई भी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है जिससे ये निष्कर्ष निकाला जा सके की इस मंदिर का निर्माण जजाति I ने करवाया था।

वास्तुकला :

मुक्तेश्वर मंदिर की वास्तुकला इसे “ओडिशा वास्तुकला का रत्न” बनाने वाले बुनियादी कारणों में से एक है। इस मंदिर का मुख पश्चिम की ओर है जिसका निर्माण मंदिरों के समूह के बीच में एक छोटे तहखाने में किया गया है। जगमोहन की पिरामिड आकार की छत इस बात को दर्शाती है की ये पहले ऐसा मंदिर है जो पारंपरिक दो स्तरीय संरचना है। ये मंदिर भुबनेश्वर के अन्य विशाल मंदिरों के मुकाबले बहुत छोटा है। इस मंदिर को एक अष्टकोणीय परिसर दीवार ने घेरा हुआ है जिसपर विस्तृत नक्काशियां की गयी है। इस मंदिर में एक तोरण है, जो अष्टकोणीय परिसर में प्रवेश मार्ग के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस मंदिर में दो संरचनाएं है, पहली विमान (गर्भगृह की ऊपर की संरचना) और दूसरी एक मुकशला (प्रमुख कक्ष), दोनों ही संरचनाओं का निर्माण एक ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। इस मंदिर का निर्माण पिथादेउला शैली के अनुसार किया गया है।

तोरण :

मुक्तेश्वर मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका तोरण है जिसे मेहराबदार प्रवेश मार्ग भी कहा जाता है। इसका निर्माण 900 CE के दौरान किया गया था जो बौद्ध वास्तुकला के प्रभाव को दर्शाता है। इस प्रवेश द्वार में बहुत मोटे स्तंभ है जिसपर औरतो की प्रतिमाएं बनायीं गयी है जिन्होंने मोती और अन्य गहने के तार धारण किये हुए है। इस तोरण में एक दीवारों वाला कक्ष है जिसपर विशाल छत और भीतरी स्तंभ है। इस पर क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर लेने बनायीं गयी है जो इस ईमारत को इसकी मध्यम ऊँचाई प्रदान करती है। मंदिर के प्रवेश द्वार में उत्कृष्ट मूर्तिकला की गयी है जिसमे सुखद महिलाएं, बंदरों और मोरों की आकृति की नक्काशी की गयी है। इस मेहराब का सामना और पिछली तरफ़ का डिजाइन एक समान है।

विमान :

विमान एक वारगकार संरचना है जिसका निर्माण एक ऊंचे मंच पर किया गया है जिसके प्रत्येक कोने में एक आयातकार स्तंभ रखा गया है। इस मंदिर का शिखर अन्य मंदिरों के मुकाबले थोड़ा छोटा है। शिखर के चारो पक्षों में नटराज और कीर्तिमुख की प्रतिमाएं है। शिखर के ऊपरी भाग में एक कलश है। शिखर की ऊँचाई 10.5 metres (34 ft) है, जिसके प्रत्येक इंच पर सजावटी पैटर्न, वास्तुकला पैटर्न और मूर्तिकला पैटर्न बनाया गया है। इस मंदिर में सजावट के एक नए रूप, भो का विकास इस मंदिर में किया गया है जो बाद में बने ओडिसी मंदिरों की प्रमुख विशेषता है। इस मंदिर में बनत अलंकृत चैत्य खिड़की है जिसपर राक्षस का मुखौटा और बौना आकृतियों को बनाया गया है।

गर्भगृह :

मंदिर की गर्भगृह को खूबसूरत लड़कियां जिन्हे नाग और नागिनों के साथ जोड़ा गया है की मूर्तियों से अलंकृत किया गया है। गर्भगृह का भीतरी भाग एक घनीय संरचना है।

जगमोहन :

10 वीं शताब्दी का विशिष्ट मुक्तेश्वर मंदिर सबसे छोटे और सघन मंदिरों में से एक है। मंदिर में मौजूद जगमोहन 35 m (115 ft) ऊंचा है। इसे विश्वकर्मा महाराणा की मूर्तियों की महीन नक्काशियों के साथ सजाया गया है। इस मंदिर को कलिंग वास्तुकला के नगारा वास्तुकला शैली का रत्न कहा जाता है। जगमोहन की आयातकार आकृति को छोड़कर, ये ओडिसा के मंदिरों की वास्तु शैली का सबसे पुराना उदाहरण है जिसमे एक विमान जिसके ऊपर एक शिखर है और एक जगमोहन जिसकी पिरामिड आकार की छत तक जाने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है। मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है जिसे दुर्बल साधु और महिलाओं की कामुक तस्वीरो की उत्तम नक्काशियों के साथ सजाया गया है। चण्ड और प्रचण्ड की नकाशियो के पश्चात गंगा और जमुना की तस्वीरें मंदिर में देखने को मिलती है। मंदिर का तोरण जगमोहन के ठीक सामने स्थित है। जगमोहन की सरदल पर लकुलिसा की छवि है जो भूमिसपरा मुद्रा में बैठी है और लाकुटा को धारण किये हुए है। इस संरचना में गजलक्ष्मी, राहु और केतु की मूर्तियों का निर्माण किया गया है। जगमोहन की छत पर शेर की एक छवि है जो अपने पीछे के पैरो पर बैठा है। इस संरचना की बाहरी दीवारों को आयातकार स्तंभ के साथ नाग और नागिनों की मूर्तियों के साथ सजाया गया है।

अन्य विशेषता :

भीतरी गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर केतु की छवि है जिसमे तीन सांप है, जिसे सामान्य तौर पर हिन्दू पौराणिक कथाओ में नौवा गृह मन जाता है। मंदिर की पूर्वी दिशा की ओर एक टैंक है और दक्षिण-पश्चिमी कोने में एक कुआ है। ऐसा माना जाता है की कुए में डुबकी लगाने से महिलाओं का बाँझपन दूर हो जाता है। मंदिर के प्रवेश द्वार को पूरी तरह से अलंकृत किया गया है। मंदिर के भीतर और बाहर मूर्तिकला की गयी है।

धार्मिक महत्त्व :

मुक्तेश्वर का अर्थ है “स्वतंत्रता के भगवन”। ये मंदिर हिन्दू देव शिव को समर्पित है। मंदिर के कंकाल सन्यासियों की कई मुर्तिया है जो शिक्षण और ध्यान अवस्था में खड़ी है। कुछ विद्वानों का मानना है की इस स्थान का प्रयोग तांत्रिक दीक्षा के केंद्र के रूप में किया जाता था। परिसर दीवार के बाहरी मुख पर हिन्दू देवी-देवताओ जैसे सरस्वती, गणेश और लकुलिशा (पशुपति समुदाय के 5 वीं शताब्दी के संस्थापक) की कई मुर्तिया है। परम्परा के मुताबिक, यदि कोई बाँझ औरत अशोकाष्टमी कार त्यौहार से पूर्व रात्रि में मंदिर परिसर के मदिचा कुंड टैंक में स्नान करे तो उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो जाती है। संध्या के समय, टैंक के पानी को जनता को बेचा जाता है।


Title : Mukteshvara Temple Bhubaneswar