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जानिए नवजात शिशु को कितना सोना जरुरी है

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जानिए नवजात शिशु को कितना सोना जरुरी है, नवजात शिशु के लिए कितना सोना जरुरी है, जन्म के बाद शिशु को कितनी देर सोना चाहिए, नवजात शिशु के लिए कितना सोना जरुरी है, नवजात शिशु को सोने से कौन से फायदे मिलते हैं

नवजात शिशु के बेहतर शारीरिक और मानसिक विकास के लिए शिशु का पर्याप्त नींद लेना बहुत जरुरी होता है। बड़ो के लिए जहां एक दिन में आठ घंटे की नींद करुरी होती है, वही नवजात शिशु के लिए दिन में तेरह से सत्रह घंटे तक सोना बहुत जरुरी होता है। भरपूर नींद जन्म के बाद शिशु के बॉडी के अंगो के बेहतर विकास और दिमागी रूप से शिशु को स्ट्रांग बनाने में मदद करती है। और यदि शिशु को पर्याप्त नींद नहीं मिलती है तो इससे शिशु को अधिक रोने, स्वाभाव में चिड़चिड़े होने, विकास में कमी, सेहत सम्बन्धी समस्या आदि का सामना करना पड़ सकता है। तो आइये अब जानते हैं की नवजात शिशु को दिन में कितनी देर सोना चाहिए, और शिशु के भरपूर नींद लेने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं।

जन्म के बाद

जन्म के बाद शिशु दिन में आठ से नौ घंटे तक सोता है, और रात में भी आठ से नौ घंटे तक सो सकता है। और इस बीच उसे भूख लगने पर वह उठ भी जाता है। ऐसे में जन्म के बाद शिशु पूरे दिन में सत्रह से अठारह घंटे तक सो सकता है।

एक महीने का शिशु

एक महीने के होने के बाद शिशु दिन में एक या दो घंटे सोना कम कर सकता है लेकिन रात को वो भरपूर नींद यानी की आठ से नौ घंटे तक सोता है। ऐसे में एक महीने तक का शिशु भी दिन में सोलह से सत्रह घंटे तक सो सकता है।

तीन महीने का शिशु

तीन महीने के बाद शिशु दिन में सोना कम कर देता है और उठकर खेलने की कोशिश करता है, और पांच घंटे तक की नींद ले सकता है, लेकिन रात के समय की उसकी नींद नौ से दस घंटे की हो जाती है। ऐसे में तीन महीने का शिशु भी दिन में पंद्रह से सोलह घंटे तक सो सकता है।

छह महीने का शिशु

छह महीने के बाद शिशु बैठने लग जाता है, हाथ में खिलौने पकड़ने की कोशिश करता है, ऐसे में दिन में चार से पांच घंटे ही शिशु सोता है। लेकिन रात के समस्य कम से कम दस घंटे की नींद शिशु के लिए जरुरी होती है। और शिशु पूरे दिन में कम से कम पंद्रह घंटे तक सो सकता है।

नौ महीने का शिशु

नौ महीने का होने तक ज्यादातर पैरों के भार रिडना या क्रोल करना शुरू कर देते हैं, ऐसे में दिन में केवल तीन से चार घंटे ही शिशु सोता है लेकिन उसकी रात की नींद थोड़ी और ज्यादा बढ़ जाती है। अब पूरे दिन में शिशु तेरह से चौदह या पंद्रह घंटे भी सो सकता है।

एक साल का शिशु

एक साल का होने पर शिशु चलना भी शुरू कर देता हैं ऐसे में दिन का समय ज्यादातर उनका खेलने में ही बीतता है और दिन में केवल ढाई से तीन घंटे की नींद ही वो लेते हैं, लेकिन रात के समय दस से ग्यारह घंटे तक आपका शिशु सो सकता है।

डेढ़ साल का शिशु

एक साल से ज्यादा का होने पर शिशु दिन में दो या तीन घंटे ही सोते हैं और रात को नींद भी उनकी थोड़ी कम हो जाती है, और इस दौरान पूरे दिन में बच्चे केवल बारह से तेरह घण्टे तक ही सोते हैं।

शिशु के सोने के फायदे

जन्म के बाद शिशु का बहुत ज्यादा सोना इसमें किसी तरह की घबराने की बात नहीं होती है। बल्कि शिशु का ज्यादा देर तक सोना और भरपूर नींद लेना शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत जरुरी होता है। जितनी देर शिशु सोता है उतना ही उसकी सोचने समझने की शक्ति का भी विकास होता है, इसके अलावा शिशु को सोने से कौन से फायदे मिलते हैं आइये जानते हैं।

नर्वस सिस्टम का विकास

शिशु के नर्वस सिस्टम का बेहतर विकास तभी हो पाता है जब शिशु जन्म के बाद भरपूर नींद लेता है। और बेहतर विकास के लिए जन्म के दो साल तक शिशु को पर्याप्त नींद लेना बहुत जरुरी होता है।

शारीरिक विकास बेहतर होता है

स्टडीस के अनुसार जो बच्चे जन्म के बाद भरपूर नींद लेते हैं उनका शारीरिक विकास बहुत ही बेहतर तरीके से होता है। भरपूर नींद लेने से शिशु का वजन, हाइट, ग्रोथ सब बेहतर तरीके से होती है।

दिमागी विकास

हर माँ चाहती है की उसके शिशु का दिमाग तेज हो, ऐसे में जन्म के बाद शिशु के भरपूर नींद लेने उसके मस्तिष्क की कोशिकाओं के बेहतर विकास में मदद मिलती है। जिससे शिशु का दिमाग तेज होता है।

यादाश्त तेज

भरपूर नींद लेने के कारण शिशु के दिमाग को आराम मिलता है जिसके कारण शिशु की यादाश्त भी तेज हो जाती है, और ऐसे बच्चों में आलस कम होता है और बच्चे बहुत एक्टिव होते हैं।

बोलने में तेज

ऐसा भी माना जाता है की जो शिशु भरपूर नींद लेते हैं जन्म के एक साल बाद ही वो बोलने लग जाते हैं, और उनका विकास भी तेजी से होता है।

तो यह हैं शिशु के जन्म के बाद भरपूर नींद लेने से जुडी कुछ बातें और आपको इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए की शिशु भरपूर नींद लें। और उसकी नींद खराब न हो, क्योंकि शिशु को भरपूर नींद न मिलने पर शिशु का स्वाभाव चिड़चिड़ा हो सकता है साथ ही इससे शिशु के विकास में भी कमी आ सकती है।