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रमज़ान क्या है? रमज़ान का इतिहास, रोज़ा क्यों करते है?

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रमज़ान जिसे रमदान भी कहा जाता है इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। इस्लाम धर्म में इस महीने को बहुत पाक माना जाता है। जिसमें रोज़े रखने का खास महत्व होता है। रमज़ान के दिन चाँद के हिसाब से गिने जाते है। जो 29 या 30 दिन का होता है।

रमदान के महीने की परंपराएं :

रमज़ान के पुरे महीने में रोज़े रखें जाते है, रात में तरावीह की नमाज़ पढ़ी जाती है, क़ुरान तिलावत (पारायण) किया जाता है, एतेफ़ाक बैठना (गाँव और लोगों के कल्याण के लिए अल्लाह से दुआ (प्रार्थना) करते हुए मौन व्रत रखना), ज़कात देना, दान धर्म करना, अल्लाह के लिए इबादत करना, अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए इस महीने के गुजरने के बाद शव्वाल की पहली तारीख को ईद-उल-फितर मनाई जाती है।

ये सभी इस महीने की मुख्य विशेषताएं होती है। सब बातों को मिलाकर इस महीने में पुण्य कार्यों को प्रधानता दी जाती है। इसलिए रमज़ान के महीने को नेकियों और इबादतों का महीना यानी पुण्य का महीना माना जाता है।

रमज़ान का महीना क्यों मनाया जाता है? Ramzan Historyramzan Zakat

मुसलमानों के विश्वास के मुताबिक़, रमज़ान के महीने की 27वीं रात शब-ए-क़द्र को क़ुरान का नुज़ूल हुआ था। तभी से इस महीने को इस्लाम का सबसे पाक महीना कहा जाने लगा। इस महीने में अल्लाह की इबादत में रोज़े रखना बहुत अच्छा माना जाता है।

रमज़ान में क़ुरान के अवतरित होने के कारण ही इस महीने में क़ुरान पढ़ना सबसे ज्यादा पाक माना जाता है। तरावीह की नमाज़ में महीना भर क़ुरान पढ़ी जाती है। जिससे क़ुरान पढ़नी नहीं आने वालों को क़ुरान सुनने का अवकाश जरुर मिलता है।

रमदान-रमज़ान का इतिहास : Ramzan Roze Ka Mahatv

इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक सन् 2 हिजरी में अल्लाह के हुक्म से मुसलमानों पर रोज़े फ़र्ज किये गए। इसी महीने में शब्-ए-कदर में अल्लाह ने क़ुरान जैसी नेमत दी। तभी से मुसलमान इस महीने में रोजे रखते आ रहे है।

सहरी, इफ्तार और तरावीह : Sehri, Iftar in Ramzan

रमज़ान के दिनों में लोग सूरज उगने से पहले ही उठकर सहरी करते है, सहरी खाने का वक्त सूरज निकलने से करीब डेढ़ घंटे पहले का होता है। सहरी खाने के बाद रोज़ा शुरू हो जाता है। रोजेदार पुरे दिन कुछ भी खाता पीता नहीं है। इस समय में हमबिस्तर होने की भी मनाही है। शाम के समय तय वक्त पर इफ्तार कर रोज़ा खोला जाता है।

सामान्यतौर पर सूरज डूबने के 3 से 4 मिनट बाद ही रोजा खोल लेना चाहिए। फिर रत की इशा की नमाज करीब 9 बजे पढ़ी जाती है और उसके बाद तरावीह की नमाज अदा की जाती है। इस समय मस्जिदों में क़ुरान पढ़ी जाती है। ये सिलसिला पुरे महीने चलता रहता है। महीने के आखिर में 29 का चाँद होने पर ईद मनाई जाती है। 29 का चाँद नहीं दिखने पर 30 रोजे पुरे कर अगले दिन ईद का जश्न मनाया जाता है।

इन्हें है रोजे से छूट :

  • अगर कोई बीमार हो या उसके बीमार पड़ने का डर हो तो उन्हें रोज़े से छूट मिलती है। हालांकि, ऐसा केवल डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए।
  • मुसाफिर, गर्भवती औरत और बच्चे को दूध पिलाने वाली माँ को भी रोजे से छूट रहती है।
  • मासिक धर्म ससे ग्रसित होने पर रोजे नहीं करने चाहिए। इन दिनों के बदले के रोज़े बाद में किये जा सकते है।
  • बहुत ज्यादा बुजुर्ग शक्स को भी रोज़े से छूट रहती है।

रमज़ान में जकात (दान कार्य) : Ramzan Zakat DonationZakat

सन् 2 हिजरी में ही जकात को भी जरुरी बताया गया है। इसके तहत, अगर किसी के पास साल भर उसकी जरूरत से अधिक साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर कैश या कीमती सामान है तो उसका ढाई फीसदी जकात (दान) के रूप में गरीब और जरुरतमंद मुस्लिम को दे देना चाहिए। इस के दिन ही फितरा (दान) हर मुस्लिम को अदा करना होता है। इसमें 2 किलो 45 ग्राम गेहूं की कीमत तक की रकम गरीबों में दान की जाती है।


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