शिरडी का प्रसिद्ध साईं बाबा मंदिर

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शिरडी मुंबई से 270 kms की दुरी पर स्थित है. जहां साईं बाबा का प्रसिद्ध मंदिर है. शिरडी को साईं की भूमि भी कहा जाता है. शिरडी अहमदनगर जिले के कोपरगांव तालुका में है. गोदावरी नदी पार करने के पश्चात ये मार्ग सीधा शिरडी की ओर जाता है. आठ मील चलने पर जब आप नीमगांव पहुंचेंगे तो वहां से शिरडी दिखने लगती है। श्री सांईनाथ ने शिरडी में अवतीर्ण होकर उसे पावन बनाया था।

बाबा के जीवन की शुरुआत :

बहुत समय पहले, 18 वी शताब्दी के शुरुआत में एक जवान दाढ़ी वाले आदमी जिसकी आँखे तारो सी चमक रही थी ने शिरडी गांव की एक मस्जिद में आश्रय लिया था. कोई नहीं जानता था की ये व्यक्ति कहां से आये है, जिसने एक भी शब्द अपने मुख्य से नहीं निकाला था और यहाँ रुक गए थे.
धीरे धीरे इनके बारे में लोगो की उत्सुकताएं बढ़ने लगी जिस कारण गांवासियों ने उन्हें भोजन देना प्रारभ कर दिया. पर उन्होंने किसी से भी कुछ नहीं कहां.
कभी कभी वे अपना भोजन जानवरों के साथ भी बांटा करते थे. जल्द ही इस युवा को, फ़क़ीर कह कर सम्भोधित किया जाने लगा और उन्होंने अपने विचार अन्य गांव वासियो के साथ प्रकट करना प्रारम्भ कर दिया. उनके विचारों की सरल भाषा और जरूरतमंद और बेसहारा की समस्याओं को अपनी विशेष शक्ति से समाप्त कर देना एक चमत्कार से कम न था जिस कारण उन्हें फ़क़ीर भी कहां जाता है. परन्तु वर्तमान में उन्हें श्री साईं बाबा के नाम से जाना जाता है.

बाबा का पहनावा बिलकुल समान्य था. साईं बाबा का वास्तविक नाम, उनका जन्मस्थान और जन्मतिथि किसी को भी ज्ञात नहीं है. जब भी उनसे उनके भूतकाल के बारे में पूछा जाता था तो वो दैवीय प्रतिक्रियाए देने लगते थे. उनका नाम “साईं” महाराष्ट्र के शिरडी नगर के सामान्य मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने रखा था. उन्होंने बाबा को एक मुस्लिम संत समझा और उन्हें ‘या साईं’ कहकर सम्भोधित किया जिसका अर्थ है स्वागत है साईं. साईं और साई एक फ़ारसी शब्द है जिसका प्रयोग सूफी संतो के लिए किया जाता है जिसका अर्थ है “गरीब”. बंजारा भाषा में साई का अर्थ है अच्छा. भारत के मध्य पूर्वी क्षेत्रों की भाषाओं में दादाजी को “बाबा” कहकर बुलाया जाता है.

जैसे जैसे समय बीतता गया, भक्तो की भारी संख्या ने शिरडी में आना प्रारम्भ कर दिया. जल्द ही ये गांव धार्मिक केंद्र बन गया. कई उपहार, वस्तुएं और मिठाई बाबा को प्रस्तुत की जाने लगी. बाबा के समक्ष प्रस्तुत होने वाली भेटों को वे प्रतिदिन गरीब और जरूरतमंदों के मध्य वितरित कर दिया करते थे. परन्तु साईं बाबा का फ़क़ीर वाला जीवन शांत, अबाधित, अनछुए और संतो की आध्यात्मिक महिमा वाला रहा.

भक्तो का बाबा पर विश्वास :

अब लोगो को विश्वास हो गया था की “बाबा” कोई साधारण मनुष्य नहीं है अपितु ईश्वरीय शक्ति वाले मनुष्य है. उनमे इस तरह की कुछ शक्तियां थी जो किसी भी साधारण मनुस्य में नहीं पायी जाती. बाबा ने अपने सभी शिष्यों के मध्य मानवता में प्यार और विश्वास के सिद्धांत का प्रचार किया.

साईं बाबा मुख्य रूप से धर्म की एकरूपता में विश्वास रखते थे और कभी भी किसी की तुलना उसकी जाति, पंथ या धर्म के आधार नहीं करते थे. उन्होंने कई बार गरीब लोगो की समस्यायों को चमत्कार द्वारा दूर किया था. एक बार उन्होंने एक अंधे बुजुर्ग की आँखो को ठीक किया था और एक बार पानी से लालटेन जलाई थी क्योकि वहां उसे जलने के लिए तेल उपलब्ध नहीं था.

आज ‘साई बाबा की शिरडी’ को दुनिया भर में जाना जाता है। साई बाबा पर यह विश्वास जाति-धर्म व राज्यों से परे देशों की सीमा लांघ चुका है। यही वजह है कि ‘बाबा की शिरडी’ में भक्तों का ताँता हमेशा लगा रहता है, जिसकी तादाद प्रतिदिन जहां 30 हजार के करीब होती है, वहीं गुरुवार व रविवार को यह संख्या दोगुनी हो जाती है। इसी तरह साई बाबा के प्रति आस्था और विश्वास के चलते रामनवमी, गुरुपूर्णिमा और विजयादशमी के पर्व पर यहाँ 2-3 लाख लोग दर्शन को आते हैं, और सालभर में लगभग 1 करोड़ से अधिक भक्त यहां हाजिरी लगा जाते हैं।

बाबा की समाधि :

जैसे सभी अच्छी वस्तुओं का अंत होता है वैसे ही “बाबा” ने भी अपनी इच्छा से 15 अक्टूबर 1918 को अपना शरीर त्याग दिया. उनके समाधी लेने के पश्चात उनके लाखो भक्तो और शिष्यों को बहुत दुःख पंहुचा था. उनके शरीर को समाधि मंदिर में दफ़न किया गया है जिसे “बूटी” कहां जाता है. समाधी लेने से पूर्व उन्होंने अपने शिष्यों को कहां था की उन्हें धरती में दफ़न किया जाये.

साई बाबा ने अपनी जिंदगी में समाज को दो अहम संदेश दिए हैं- ‘सबका मालिक एक’ और ‘श्रद्धा और सबूरी’। साई बाबा के इर्द-गिर्द के तमाम चमत्कारों से परे केवल उनके संदेशों पर ही गौर करें तो पाएंगे कि बाबा के कार्य और संदेश जनकल्याणकारी साबित हुए हैं।

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