Simhachalam Temple Visakhapatnam, सिंहाचलम मंदिर विशाखापट्नम

सिम्हाद्रि और सिंहाचलम एक हिन्दू मंदिर है जो भारत के आंध्र प्रदेश के सिंहाचलम के उपनगर विशाखापट्नम शहर में स्थित है। ये मंदिर भगवान् विष्णु के अवतार भगवान् नरसिंह को समर्पित है। इस मंदिर का मुख पश्चिम की ओर है। मंदिर की केंद्रीय भाग को कलिंग वास्तुकला शैली के अनुसार बनाया गया है।

विवरण :

“सिंह” का संस्कृत में अर्थ होता है “शेर” और “अद्रि” व् “अचल” का अर्थ है पहाड़ी। ये मंदिर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है जिसके कारन इसे सिंहाचलम कहा जाता है। श्री वाराहलक्ष्मी नरसिंह स्वामी, भगवान् विष्णु का नरसिंह अवतार है, जो इस मंदिर के इष्ट देव है। ये मंदिर भगवान् नरसिंह के भारत में स्थित 18 “नरसिंह क्षेत्रों” में से एक है। मंदिर में मौजूद मूर्ति को पुरे साल ज्यादातर चन्दन के पेस्ट से ढका जाता है परन्तु एक साल में केवल बारह घंटे के लिए इनके चन्दन को हटा दिया जाता है (“निजरूप दर्शन” – वास्तविक रूप के पवित्र दर्शन) जिस दौरान भगवान् के वास्तविक रूप के दर्शन किये जा सकते है। अक्षय तृतीय के दिन, मूर्ति पर चन्दन के पेस्ट को दोबारा से लगाया जाता है। साल के वैसाख (मई) के माह के दौरान “चन्दन यात्रा” और “चन्दनोत्सवम” का त्यौहार मनाया जाता है।

मंदिर में स्थित मूर्ति तिभङ्गी मुद्रा में है, जिसके दो हाथ और मानव धड़ पर शेर का सर है। सं 1098 AD में चोला राजा कुलोथथुंगा द्वारा की गयी शिलालेख इस मंदिर की प्राचीनता को दर्शाती है। मंदिर में एक और शिलालेख पायी गयी है जिसमे कलिंग (प्राचीन ओडिसा) की पूर्वी गंगा की रानी (1137–1156) की व्याख्या की गयी है, जबकि तीसरी शिलालेख ओडिसा के पूर्वी गंगा राजा, नरसिंहदेव II (1279–1306) के बारे में बताती है। इतिहास के मुताबिक इस मंदिर के केंद्रीय भाग का निर्माण सं 1267 में किया गया था। मंदिर की दीवारों पर तेलगु और ओड़िआ भाषा की 252 शिलालेख है जो मंदिर के पूर्ववृत्त का वर्णन करती है।

सन्न 1516 से 1519 के बीच श्री कृष्णा देवा राय इस मंदिर का दौरा करने आये थे। उन्होंने मंदिर में कई मूल्यवान आभूषण अर्पित किये थे, जिसमे से एक पन्ना जड़ित हार आज भी मंदिर में मौजूद है। पिछली तीन शताब्दियों से विजयनगरम के शाही परिवार पुसापति गजपति इस मंदिर के ट्रस्टी है। विजयनगर के अंतिम राजा, डॉ. PVG राजू गारू ने सिंहाचलम देववस्थान के लिए लाखो एकड़ जमीं दान की थी।

पौराणिक कथा :

हिरण्यकश्यपु एक राक्षस राजा था जी बैकुंठ में भगवान विष्णु के द्वारपालकों में से एक का पुनर्जन्म था। उनमे से दूसरा उसका भाई हिरण्यकश्यप था। सनाका, सनन्दन, सन्तकुमार और सनंतसुजाता ने जय और विजय द्वारपालकों को श्राप दिया था क्योकि इन दोनों ने इस चारो संत कुमार भाइयो को महाविष्णु के दर्शन करने की आज्ञा नहीं दी थी। जिसके परिणामस्वरूप उन द्वारपालकों को तीन बार पुनर्जन्म लेना पड़ा। हिरण्यकश्यपु ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए एक तपस्या करने का फैसला किया, ताकि वो संसार में अमर बन सके। परन्तु भगवान् ब्रह्मा ने उससे कहा की जो तुम चाहते हो वो मुमकिन नहीं है इसलिए भगवान् ने हिरण्यकश्यपु को एक आशीर्वाद दिया की कोई भी व्यक्ति तुम्हारी हत्या नहीं कर पाएगा। जल, आकाश और धरती कही भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी। वरदान के पश्चात उसकी मृत्यु एक रहस्य बन गयी थी क्योकि कोई भी मनुष्य उसकी हत्या नहीं कर सकता था। वरदान पाकर वो एकदम निडर हो गया और प्रजा को सताने लगा।

हिरण्यकश्यपु का एक पुत्र थे जिसका नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद भगवान् नारायण का भक्त था और हमेशा उनकी भक्ति में लीं रहता था। उसका पिता प्रह्लाद की भक्ति को बर्दाश्त नहीं कर पाता था जिसके कारण वो क्रोधित हो उठा। उसने कई बार प्रह्लाद को मारने की कोशिश की, जिसमे एक बार पहाड़ की चोटी से उसे निचे फिकवा दिया था, दूसरी बार उसे सांप के कक्ष में दाल दिया था और तीसरी बार एक भूखे शेर की गुफा में फेंक दिया था सम्मिलित थे। परन्तु हर बार भगवन विष्णु उसकी सहायता कर उसे बचा लिया करते थे जैसे पहाड़ी से गिरते वक्त विष्णु जी ने पहाड़ को खिसका दिया था और एक छोटे से मार्ग का निर्माण कर दिया था, कक्ष के सभी सांपो को जला दिया था और शेर गायब कर दिया था। भगवान् नारायण के अवतार के रूप में विष्णु जी हमेशा प्रह्लाद की रक्षा करते थे। जब भगवान् नारायण प्रह्लाद की रक्षा करने कूदे थे तो उनका पैर पृथ्वी में गढ़ गया था। हालाँकि मंदिर में कही भी भगवान् के पदचिन्न के निशान नहीं है, परन्तु ऐसा कहा जाता है की उनका पैर पृथ्वी के नीचे दबा है। दिव्य पुरुषों का कहना है की सिंहाचलम मंदिर का निर्माण ठीक उसी स्थान पर किया गया है जहां भगवान् विष्णु प्रह्लाद की रक्षा करने आये थे।

दूसरी कथा के मुताबिक, जब मुसलमानो ने आक्रमण के दौरान इस मंदिर को नष्ट कर दिया था और लूट लिया था, तो कुरमनथा नाम के एक कवि ने इस मंदिर और हिन्दुओ की रक्षा करने के लिए भगवान् नरसिंह से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना के फलस्वरूप, अचानक मधुमक्खियों के एक तांबे के झुण्ड ने आक्रमणकारियों पर हमला कार दिया और उन्हें शहर की सीमा से बाहर निकाल दिया। उसके पश्चात वो झुण्ड अचानक एक पहाड़ी चट्टान के पीछे गायब हो गया जिसे तुममेडाला मेत्ता (तुममेडाला का अर्थ है “मक्किया” और मेत्ता का अर्थ है “पहाड़ी’) के नाम से जाना जाता है।

यातायात :

पैदल मार्ग :- मंदिर तक आप पैदल चलकर भी जा सकते है इसकी दुरी लगभग 1.1 kilometers है।

रोड मार्ग :-
सिंहाचलम तक सिंहाचलम बस डिपो से आसानी से APSRTC की शहरी बसों द्वारा पंहुचा जा सकता है जो यहाँ से 4.4 kilometers की दुरी पर स्थित है। मंदिर तक सिंहचलन मंदिर बस सेवा द्वारा भी पंहुचा जा सकता है। APSRTC ने कुछ समय पूर्व ही विशाखापट्नम शहर के द्वारका RTC परिसर से बस सेवा शुरू की थी जो सिंहाचलम से 19.9 kilometers की दुरी पर स्थित है।

रेल मार्ग :- इस मंदिर के सबसे नजदीक सिंहाचलम रेलवे स्टेशन है जो मंदिर से 11.1 kilometres की दुरी पर स्थित है। विशाखापट्नम रेलवे स्टेशन यहाँ का मुख्य रेलवे स्टेशन है जो सिंहाचलम मंदिर से 18.5 kilometers की दुरी पर स्थित है।

हवाई मार्ग :-
यहाँ का सबसे एयरपोर्ट विशाखापट्नम एयरपोर्ट है जो सिंहाचलम से 13.2 kilometres की दुरी पर स्थित है। इस एयरपोर्ट से हैदराबाद, नई दिल्ली, चेन्नई, बैंगलोर, मुंबई, कलकत्ता, भुवनेश्वर, तिरुपति और ब्लेयर बंदरगाह जाने वाली दैनिक उड़ाने उपलब्ध है। इस बंदरगाह में अंतर्राष्ट्रीय हवाई उड़ानों की सुविधा भी उपलब्ध है जिनमे हैदराबाद से होकर दुबई, सिंगापुर और कोला लामपुर शामिल है।


Title : Simhachalam Temple Visakhapatnam

[Total: 1    Average: 1/5]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *