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Srikalahasti Temple Andhra Pradesh, श्रीकालहस्ती मंदिर

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श्रीकालहस्ती मंदिर, भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के श्रीकालहस्ती शहर में स्थित है। ये दक्षिण भारत में स्थित शिव जी के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। कहा जाता है यहां कन्नप्पा ने भगवान् शिव जी के शिवलिंग से बहने वाले खून को रोकने के लिए उस स्थान पर अपनी आँखे निकलकर लगा दी थी। उसकी इस दयालुता को देखकर शिव उस पर प्रसन्न हुए और उसे मोक्ष प्रदान कर दिया।

श्रीकालहस्ती मंदिर, तिरुपति से 36 km की दुरी पर स्थित है। तिरुपति आपने वायु लिंग के लिए प्रसिद्ध माना जाता है जो पंचभूत स्थलों में से एक है, ये हवा को प्रदर्शित करते है। इस मंदिर को राहु-केतु क्षेत्र और दक्षिण कैलाश के रूप में भी जाना जाता है। भीतरी मंदिर का निर्माण 5 वीं शताब्दी में जबकि बाहरी मंदिर का निर्माण 12 वीं शताब्दी के दौरान हुआ था। इनका निर्माण विजयनगर के राजाओ और चोला राजाओ ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान् शिव अपने वायु के स्वरुप में कालहसतीस्वर के रूप में पूजे जाते है।

दंतकथा :

देवी पार्वती का श्राप :

इस मंदिर की महिमा से जुडी कई पौराणिक कथाएं है। इनमे सबसे प्रसिद्ध देवी पार्वती का श्राप था जी उन्हें भगवान् शिव ने दिया था। श्राप के मुताबिक उन्हें अपना स्वर्गीय देह त्यागनी थी और मनुष्य रूप ग्रहण करना था। अपने अभिशाप से छुटकारा पाने के लिए पार्वती जी ने यहाँ घोर तपस्या की थी। उनके गहरे टप से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उनकी देह का दोबारा निर्माण किया जो पुरानी स्वर्गीय देह से सौ गुना बेहतर थी और पंचाक्षरी के साथ साथ अन्य मंत्रो को पड़ना आरम्भ कर दिया। इसके फलस्वरूप, पार्वती ने अपनी देह पुनः प्राप्त की और उन्हें शिवा-गणानां गनना प्रसुनाम्बा और गनना प्रसुनम्बिका देवी के नाम से जाना जाने लगा।

घनाकाल :

श्राप के कारण घनाकाल एक भुत बन गया था। श्रीकालहस्ती में 15 वर्ष तक तपस्या और भैरव मन्त्र का कई बार जाप करने के पश्चात भगवान् ने उसे उसके असली रूप प्रदान कर दिया।

देव :

स्वर्णमुखी नदी में स्नान और श्रीकालहस्ती में प्रार्थना करने के पश्चात मयूर, चन्द्र और देवेन्द्र को अपने अपने श्रापो से भी मुक्ति मिली थी।

मार्कण्डेय :

भक्त मार्कण्डेय को दर्शन देने के लिए भगवान् शिव यहाँ श्रीकालहस्ती के रूप में प्रकट हुए थे और उन्हें बताया की गुरु अकेला ही गूढ़ उपदेशों का निर्माण करता है।

इतिहास :

ये मंदिर भारत में मौजूद शिव जी के सबसे आकर्षित मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के मुख्य द्वार पर एक विशाल, प्राचीन गोपुरम (प्रवेश टावर) है। ये टावर 36.5 m (120 ft) ऊँचा है। पूरा मंदिर एक विशाल पत्थर की पहाड़ी की बाहरी तरफ से खुद हुआ है।

मंदिर की प्रारंभिक संरचना का निर्माण 5 वीं शताब्दी में पल्लवा साम्राज्य के शासकों ने करवाया था। चोला राजाओ और विजयनगर के राजाओ का इस मंदिर के विकास में महत्वपूर्ण सहयोग रहा। अन्य महान मंदिरों की ही तरह श्रीकालहस्ती का निर्माण कार्य भी सदियों से चला आ रहा है। लगभग 10 वीं शताब्दी के दौरान चोला राजाओ ने इस मंदिर का विनिर्माण करवाया और मंदिर की मुख्य संरचना का निर्माण किया। मंदिर के 120 feet (37 m) ऊंचे मुख्य गोपुरम और 100 स्तंभ मंडपों का निर्माण सब 1516 में विजयनगर राजाओ के कृष्णदेवराय ने करवाया था।

Srikalahasthi Mandir 7मंदिर में देवता :

मंदिर परिसर में दो मुख्य मंदिर है जो भगवान् शिव और देवी पार्वती को समर्पित है। मंदिर में भगवान् शिव शिवलिंग के रूप में विराजमान है जिसका मुख पश्चिम की ओर है। इस शिवलिंग को श्रीकालहस्तीश्वर के नाम से भी जाना जाता है। देवी पार्वती को समर्पित मंदिर में वे खड़ी अवस्था में खड़ी है जिसका मुख पूर्व की ओर है जिन्हे गणना प्रसुनाम्बा के नाम से जाना जाता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक छोटा सा मंदिर है जो दक्षिणमूर्ति को समर्पित है। दक्षिणमूर्ति को भगवान् शिव का एक स्वरुप माना जाता है। इसके अलावा मंदिर में और भी कई देवी देवताओ की प्रतिमाएं है जो वेंकटेश्वर, विनायक, नटराज, सुभ्रमणय, सूर्य, नारायण और भारत में मौजूद शिव जी के प्रसिद्ध मंदिरों में स्थित लिंगो की प्रतिकृतिया भी है।

उत्सव और सेवा :

महाशिवरात्रि मंदिर में मनाये जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है जब लाखो भक्त भगवान् शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने इस मंदिर में आते है। महाशिवरात्रि ब्रह्मोत्सव हर वर्ष महा शिवरात्रि के दौरान 13 दिनों के लिए मनाया जाता है। इस उत्सव के दौरान शिव और ब्रह्मा जी की मूर्ति को वाहनों पर रखर मंदिर की गलियों में भ्रमण कराया जाता है। नित्य कल्याण सेवा एक भुगतान सेवा है जो श्री शिव-पार्वती के लिए आयोजित की जाती है जिसमे उनका अभिषेक और आराधना सेवा सम्मिलित होते है।

धार्मिक महत्त्व :

इस मंदिर को दक्षिण का कैलाश और दक्षिण कैलाश के नाम से भी जाना जाता है। पहली सदी के शैव संत इस मंदिर के बार में गया करते थे।

राहु-केतु क्षेत्र :

देश के कई हिस्सों से हज़ारो भक्त इस मंदिर में राहु-केतु सर्प दोष निवारण पूजा करने आते है।

नित्य अन्नदानं :

Sri Gnana Prasunambika Devi Nithya Annadana योजना का मुख्य उद्देश्य श्रीकालहस्ती के पवित्र मंदिर में आने वाले भक्तो को निःशुल्क भोजन उपलब्ध करवाना है। इस योजना के तहत कम से कम 2000 भक्तो को दैनिक भोजन उपलब्ध कराया जाता है। अन्नदानं पूरी तरह दानकर्ताओं द्वारा दिए गए दान पर आधारित है।

26 मई 2010 को श्रीकालहस्ती मंदिर का राजागोपुरम ढह गया था। सूत्रों के मुताबिक, आस पास के क्षेत्रों में की गयी बोरवेल की खुदाई के दौरान होने वाल कंपन इसकी नष्टता का मुख्य कारण था। जब पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों ने इस ईमारत के ढहने के कारण की जाँच की तो उन्होंने पाया की ये ईमारत केवल एक से डेढ़ फीट गहरी नीव पर खड़ी है।


Title : Srikalahasti Temple Andhra Pradesh