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Veerabhadra Temple Lepakshi, वीरभद्र मंदिर लेपाक्षी

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वीरभद्र मंदिर भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के अनंतपुर जिले के लेपाक्षी में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 16 वीं शताब्दी के दौरान हुआ था। इस मंदिर की वास्तुकला विजयनगर शैली के अनुसार की गयी है जो मंदिर की दीवारों पर की गयी नक्काशी और चित्रों की प्रचुरता में दिखाई देती है। मंदिर की ज्यादातर दीवारों पर रामायण, महाभारत और अन्य पुराणों के राम और कृष्णा द्वारा किये गए विभिन्न दृश्यों को दर्शाया गया है जिन्हे आज भी मंदिर मे संरक्षित रखा गया है। मंदिर सें 200 meter (660 ft) की दूरी पर नन्दी बैल (शिव के वाहन) की एक विशाल प्रतिमा है जिसे पत्थर के एक बड़े टुकडे़ में खोदा गया है, कहा जाता है ये पुरे विश्व में सबसे बड़ी प्रतिमाओं में से एक है।

स्थान :

ये मंदिर लेपाक्षी शहर के दक्षिणी दिशा में, जो एक कम ऊँचाई वाली पहाड़ी की विशाल ग्रेनाइट चट्टान जिसका आकार कछुए की भांति है (इसे कूर्म सैला के नाम से जाना जाता है) पर स्थित है। ये बैंगलोर से 140 kilometres (87 mi) की दुरी पर स्थित है। मंदिर जाने के लिये हैदराबाद जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग : 7 के कर्नाटक-आंध्रप्रदेश बॉर्डर से लेपाक्षी की ओर जाने वाली रोड़ का चयन करना होता है। जो वहां से 12 kilometres (7.5 mi) की दूरी पर स्थित है। मंदिर तक पहुँचने का एक और मार्ग है जो हिंदुपुर से होकर गुजरता है। ये पेनुकोंडा से 35 kilometres (22 mi) की दूरी पर स्थित है।

इतिहास :

इस मंदिर का निर्माण सन 1530 मे विरुपन्ना नायक और विरान्ना द्वारा किया गया था। ये दोनो भाई पेनुकोंडा के राजा अचुतार्य के शासनकाल के दौरान विजयनगर साम्राज्य के अधीन गवर्नर थे। मंदिर के निर्माण की कुल लगत का भुगतान सरकार द्वारा किया गया था। स्कन्द पुराण के अनुसार, ये मंदिर दिव्यक्षेत्र में से एक माना जाता है। दिव्यक्षेत्र को भगवान् शिव का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है।

वास्तुकला :

इस मंदिर का निर्माण विजयनगर वास्तुकला शैली के अनुसार किया गया है। मुख्य मंदिर को तीन भागो में विभाजित किया गया है ये है : जिसमे पहला है सभा कक्ष जिसे नाट्य और रंग मंडप कहा जाता है, दूसरा है अर्ध मंडप और अंतराल मंडप (पूर्व कक्ष) और तीसरा है गर्भगृह। ये मंदिर के भवन के रूप में दिखाई देता है जिसे दो बाड़ों ने घेर रखा है। सबसे बाहरी दीवारों बड़े में तीन द्वार है जिसमे से उत्तरी द्वार का ज्यादातर प्रयोग किया जाता है। भीतरी द्वार सभा कक्ष का प्रवेश द्वार है जो एक विशाल खुला कक्ष है जिसके मध्य भाग में विशाल स्थान रिक्त है। इसके द्वारा गर्भहगृह में प्रवेश किया जाता है जिसकी छतों और स्तम्भों के हर स्थान पर मूर्तियों और पेंटिंग्स की की प्रवहति देखने को मिलती है। मंदिर की दीवारों और स्तम्भों पर दिव्य प्राणी, संतों, अभिभावकों, संगीतकारों, नर्तकों और शिव जी के 12 अवतारों के चित्र है। गर्भ गृह के प्रवेश द्वार के पार्श्व-भाग में गंगा और यमुना देवी की मुर्तिया है। इस कक्ष के बाहरी स्तंभों को एक सजावटी चबूतरे पर बनाया गया है, चबूतरे पर की गयी सजावट ब्लॉक्स के रूप में है जिनपर घोड़ो और सैनिकों की छवियों को खोदा गया है। ये स्तंभ थोड़े पतले आकार के है जिनपर नक्काशीदार छज्जे बने हुए है इन छज्जो को घुमावदार आकार में बनाया गया है। कक्ष के मध्य भाग के खुले स्थान में बड़े स्तंभ है जिनपर ट्रिपल आंकड़े की नक्काशी की गयी है। कक्ष के उत्तरी पूर्वी भाग के स्तंभों में नतेशा की छवि है जिसको ब्रह्मा और नगाड़ा बजानेवाला व्यक्ति ने घेरा हुआ है। इनके आस पास के स्तंभों में नृत्य मुद्राओं की देवी की मूर्तियां है जिनको नगाड़ा बजानेवाला व्यक्ति और करताल बजने वाले व्यक्तियों ने घेरा हुआ है। कक्ष के दक्षिण पश्चिन में स्थित स्तंभ में शिव जी की पत्नी पार्वती, की तस्वीर है जिनकी महिला दासियों में घेरा हुआ है। मंदिर के कक्ष के उत्तरपश्चिमी भाग में अन्य देवताओ की मूर्तियों की भी नक्काशी की गयी है जिसमे तीन पैर वाले भृंगी, और नृत्य अवस्था में खड़े भिक्षान्तना समिल्लित है। कक्ष की पूरी छत को भित्ति चित्रों से ढका गया है जो महाभारत, रामायण और पुरानो के साथ साथ मंदिर के संरक्षक के जीवन रेखाचित्र के दृश्यों को दर्शाता है। मुख्य मंडप की छत की प्रत्येक खाड़ी पर की गयी पेंटिंग (अंतराल और अन्य मंदिर) विजयनगर सचित्र कला की भव्यता को दर्शाती है। इन पेंटिंग्स को चुना मोर्टार की प्रारंभिक प्लास्टर परत पर बनाया गया है। इसकी रंग योजना में सब्जियों और पीले, गेरू, काले, नीले और हरे खनिज रंगो जिनमे निंबु के पानी को मिलाया गया है का प्रयोग किया गया है, इनकी पृष्ठ्भूमि को मुख्य तौर लाल रंग से रंगा जाता है। देवी देवताओ की प्रतिमाओं के अलावा यहाँ मौजूद भित्तिचित्र भगवान् विष्णु के अवतारों को दर्शाते है।

मंदिर के अर्ध मंडप (पूर्व कक्ष), जिसे एशिया का सबसे बड़ा कक्ष कहा जाता है, की छत का माप 23 x 13 feet (7.0 m × 4.0 m) है। इसमें भगवान शिव के 14 अवतारों के भित्तिचित्र है अथार्त :- योगदक्षिणमूर्ति, चंदे, अनुग्रह मूर्ति, भिक्षान्ता, हरिहरा, अर्धनारीश्वर, कल्याणसुंदरा, त्रिपुरांतक, नटराज, गौरीप्रसादका, लिंगोधबवा, अंधकासुरसमाहरा आदि।

मंदिर की गर्भ गृह में इष्ट देव की प्रतिमा है जिसके निकट वीरभद्र की एक आदमकद छवि स्थित है, जो पूरी तरह सशक्त है और जिसे खोपड़ियों से सजाया गया है। गर्भ गृह में एक गुफा कक्ष है जहां अगस्थ्य ऋषि ने निवास किया था जब उन्होंने यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी। गर्भगृह की प्रतिमा के ऊपर बनी छत में इस मंदिर के निर्माता, विरुपन्ना और वीरन्ना की तस्वीरें है, जिन्हे राजा के प्रकार के कपडे और तिरुपति में कृष्णदेवराय की कांस्य प्रतिमा पर सजे मुकुट की भांति मुकुट पहनाया गया है। इन्हे इनके दाल के साथ चित्रित किया गया है जो अपने राज्य की एक श्रद्धामय प्रार्थना के लिए अपने परिवार के इष्ट देव की राख को अर्पित कर रहे है।

मंदिर परिसर के पूर्वी विंग में, शिव जी और उनकी पत्नी देवी पार्वती का पृथक कक्ष है जिसे शिलाखण्ड पर खोद गया है। एक अन्य पवित्र कक्ष में भगवान् विष्णु की प्रतिमा है। मंदिर परिसर की पूर्वी ओर, ग्रेनाइट चट्टान के एक बड़े शिलाखण्ड पर एक कुंडलित बहु टोपीदार नागिन की आकृति की नक्काशी की गयी है जिसने शिवलिंग को एक छतरी के रूप में ढका हुआ है।

मंदिर से 200 metres (660 ft) की दुरी पर एक विशाल ग्रेनाइट नंदी बैल की आकृति है जो 20 feet (6.1 m) ऊंचा और 30 feet (9.1 m) लम्बा है जिसके गले में फूल मल और घण्टी है। इस प्रतिमा को काले पत्थर पर खोद गया है जिसका मुख मंदिर परिसर में स्थित सर्प की आकृति की ओर है।


Title : Veerabhadra Temple Lepakshi