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जॉन्डिस (पीलिया) से बचाव और उपाय

जॉन्डिस एक सामान्य बीमारी है जिसका सीधा संबंध लिवर से होता है। यह बिमारी हेपेटाइटिस के वायरस से होती है। इसके अलावा यह किसी अन्य छिपी बिमारी का भी संकेत हो सकता है।

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Jaundice ke karan aur bachav ke upay :- गर्मियां और बरसात का मौसम आते है पीलिया की समस्या बढ़ने लगती है। जप हेपेटाइटिस ए और ई के वायरस के इंफेक्शन से होता है। इस बिमारी में लिवर में सूजन आ जाती है। जिसका मुख्य कारण दूषित खान-पान होता है। मुख्य रूप से पानी!

पीलिया होने पर त्वचा, म्यूकस मेम्ब्रेन और आंखों का सफ़ेद हिस्सा पीला पड़ जाता है। युरिन गहरे रंग का हो जाता है। त्वचा और आँखों का रंग भी पीला हो जाता है लेकिन इसका पीलापन, बिलीरुबिन के स्तर पर निर्भर करता है। बिलीरुबिन खून में पाया जाने वाला पीले रंग का वेस्ट (बेकार तत्व) होता है। इसका लेवल मॉडरेट होने पर रंग पीला और बहुत ज्यादा ब्राउन हो जाता है।

इसके अलावा बुखार, कमजोरी, थकान, भूख की कमी, वजन में कमी, उल्टी होना, हलके रंग की पोटी आना, पेट दर्द करना, कब्ज होना, सिर दर्द, शरीर में जलन होना आदि पीलिया के मुख्य लक्षण है।जॉन्डिस पीलिया से बचाव

एक सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर के मुताबिक, लिवर में सूजन या बाइल डक्ट (पित्त वाहिनी) में कोई रुकावट आ जाने पर जब शरीर बिलीरुबिन को प्रोसेस कर शरीर से बाहर नहीं निकाल पाता, तो पीलिया हो जाता है। इसे ‘इक्ट्रस’ भी कहते है। लिवर खून में से बेकार चीजों को बाहर निकालने का काम करता है। जब बिलीरुबिन लिवर में पहुंचता है, तो उसके साथ दूसरे केमिकल भी जुड़ जाते है। जिसे conjugated बिलीरुबिन कहते है।

लिवर से Digestive जूस (बाइल) निकलता है और तब conjugated बिलीरुबिन बाइल में मिलकर शरीर से बाहर निकल जाता है। बिलीरुबिन की वजह से पोटी का रंग ब्राउन होता है।

पीलिया में जोखिम के क्या कारण होते है?

पीलिया शरीर में छिपी किसी बिमारी का संकेत भी हो सकता है। और यह किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। यह लिवर या बाइल डक्ट में सूजन आने, हीमोलिटिक एनीमिया, गिलबर्ट्स सिंड्रोम, कोलेस्टेटिक, क्रिगलर नज्जर सिंड्रोम आदि में से कोई भी इसका कारण हो सकता है।

इनके अलावा स्यूडो जॉन्डिस में भी त्वचा पीले रंग की हो जाती है। यह गाजर, सीताफल या खरबूजे की अधिक मात्रा खाने से बीटा केरोटिन की अधिकता से होता है, ना की बिलीरुबिन की अधिकता है।

पीलिया के प्रकार :-

प्री-हिपेटिक पीलिया या हेमोलिटिक पीलिया :

लाल रक्त कोशिकाओं के समय से पहले तेजी से टूटने से बिलीरुबिन की मात्रा के अत्यधिक बढ़ जाने से होता है। लम्बे समय तक मलेरिया के बने रहने, थैलेसीमिया, स्किल सेल एनीमिया, गिल्बर्ट सिंड्रोम आयर एनी कई अनुवांशिक कारणों से हो सकता है।

हेपटोसेलुलर जॉन्डिस :

लिवर की कोशिकाओं में यह पीलिया शराब ज्यादा पीने और कुछ दवाओं के लिवर को नुकसान पहुंचाने के कारण होता है।

पोस्ट हिपेटिक जॉन्डिस :

बाइल डक्ट (पित्त नली) में रुकावट के कारण बिलीरुबिन बढ़ जाता है जिसके यूरिन में फैलने से उसका रंग पीला हो जाता है। इसे पोस्ट हिपेटिक जॉन्डिस कहते है।

हेपेटाइटिस के वायरस :-

हेपेटाइटिस का वायरस 5 तरह का होता है – ए, बी, सी, डी और ई। हेपेटाइटिस ए और ई खाने पीने की दूषित चीजों से होता है। यह दूषित पानी पीने, दूषित पानी से जमी बर्फ मिला जूस पीने, दूषित चीजें खाने या संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहने से हो जाता है। हेपेटाइटिस बी और सी ब्लड ट्रांसफ्यूजन, संक्रमित सुई से इंजेक्शन लगाने और सेक्सुअल संबंधों से होता है। हेपेटाइटिस डी वायरस सिर्फ बी के साथ अटैक करता है लेकिन हमेशा नहीं।

छोटे बच्चों में ज्यादा पीलिया हेपेटाइटिस ए और बड़ों में हेपेटाइटिस ई की वजह से होता है। प्रेगनेंसी में हेपेटाइटिस ई हो जाए तो बहुत समस्याएं हो जाती है इसीलिए गर्भावस्था में खाने पीने पर बहुत खास ध्यान देना चाहिए।

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