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गर्भावस्था में शुरूआती तीन महीनों में कैसे रखे अपना ध्यान?

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प्रेगनेंसी का पूरा समय नो महीनो का होता है। नो महीनो बाद हम अपने शिशु को अपने हाथो में लेकर प्यार कर सकते है। पर इन नो महीनो के दौरान गर्भवती महिला को बहुत से शारीरिक और मानसिक बदलावों से गुजरना पड़ता है। इन पुरे नो महीनो को जानने के लिए हमने इन्हे तीन तीन महीनों के तीन भागों में बांटा है। पहला भाग गर्भधारण के पहले सप्ताह से शुरू हो कर गर्भवस्था के तीसरे महीने तक होता है। इस भाग में हम जानेंगे की एक गर्भवती महिला को शुरूआती तीन महीनो में किन किन बदलावों से गुजरना पड़ता है और इस दौरान किस प्रकार वह अपना और अपने शिशु का ध्यान रख सकती है और साथ ही जानते है के इन तीन महीनो में शिशु का कितना विकास होता है।

शारीरक बदलाव

गर्भावस्था के शुरूआती तीन महीनो में बहुत से बदलाव होते है। इस समय में शरीर में बहुत से हार्मोन्स का निर्माण होता है। यह हार्मोन्स हमारे शरीर के लगभग हर हिस्से पर अपना असर डालते है। सबसे पहला बदलाव होता है की गर्भवती महिला को पीरियड्स आने बंद हो जाते है। पीरियड्स बंद होने के कुछ सप्ताह के भीतर ही महिला को थकान, उलटी, पेट की पाचन क्रिया का धीमा होना, चिड़चिड़ापन, ब्रैस्ट में थोड़ी बहुत अकड़न, छाती में जलन, वेट का बढ़ना, सर दर्द, कुछ चीजों की क्रेविंग्स, कुछ चीजों की स्मेल से उलटी, कब्ज आदि होना शुरू हो जाता है। हर महिला की गर्भावस्था अलग होती है इसीलिए ऐसा भी हो सकता है के कुछ महिलाओं को इनमे से किसी भी लक्षण से ना गुजरना पड़े।

इस समय के दौरान गर्भवती महिला को हर थोड़ी देर में थोड़ा थोड़ा कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए। इस समय में तरल प्रदार्थ का ज्यादा सेवन करना चाहिए। पुरे दिन में कम से कम 8 से 10 गिलास तरल प्रदार्थ का सेवन जरूर करना चाहिए। इस समय में फल और हरी सब्जियों को अपने भोजन में लाना चाहिए। शुरूआती तीन महीनो में ज्यादा भागदौड़ और काम करने से बचना चाहिए। इस समय में अच्छा खानपान और पूरी नींद लेना माँ और भ्रूण के फायदेमंद होता है।

मानसिक बदलाव

इन तीन महीनो में शरीर में बहुत से हार्मोनल बदलाव हो रहे होते है जिस कारण कई महिलाओं का मूड़ बार बार बदलता है या फिर उनका व्यवहार बहुत चिड़चिड़ा हो जाता है। इस दौरान कुछ महिलाओं को स्ट्रेस भी बहुत ज्यादा होता है जैसे की खाना ना पचने का और थकान और दर्द आदि का। इन सभी बदलावों के कारण एक गर्भवती महिला स्वस्थ नींद भी नहीं ले पाती। जिसका सीधा असर उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ता है। पर इस समय में आपको घबराना नहीं चाहिए। अपने मुड़ को अच्छा रखने के लिए अच्छी अच्छी बातें सोचनी चाहिए हो सके तो अपने शिशु के बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचें। ऐसा करने से आपको ख़ुशी का अनुभव होगा और आपका मूड़ भी अच्छा होगा।

अपने आप को शांत और खुश रखने के सुबह के समय थोड़ी बहुत योग और मैडिटेशन का सहारा ले सकते है। मैडिटेशन यानी की ध्यान करने से आपका चिड़चिड़ापन खत्म होगा और आपक शान्ति का अनुभव होगा। योग करने से भी मानसिक और शारीरिक दोनों तरह के फायदे मिलते है। पर गर्भावस्था में हल्की फुलकी योग करना ही सही रहता है। योगा करने से पूर्व अपने डॉक्टर से जरूर सलाह लें। अगर इस समय में आपको बहुत ज्यादा स्ट्रेस हो या फिर किसी चीज को लेकर डाउट हो तो अपने डॉक्टर से बात जरूर करे। डॉक्टर से बात करने से आपकी मनोस्थिति में काफी सुधार रहेगा।

शिशु का विकास

गर्भावस्था के शुरू की तीन महीने बेबी के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण माने जाते है। इस समय में भ्रूण का दिमाग और रीढ़ की हड्डी का विकास होता है। एक महीना पूरा होते ही शिशु की दिल की धड़कन आ जाती है। अल्ट्रासाउंड के दौरान हम बेबी की हार्टबीट को सुन सकते है। इस दौरान कुछ और सप्ताह बीतते ही शिशु के हाथ और पैर बनते है। दूसरे माह का अंत होते होते बेबी के हाथो और पैरो की उँगलियाँ भी बन जाती है। गर्भावस्था के इस भाग के अंत तक शिशु के लगभग सभी पार्ट्स का निर्माण हो जाता है। डॉक्टरों के अनुसार इस भाग के अंत में बेबी 3 इंच लम्बा और 28 ग्राम तक के वजन का होता है।

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