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एक कप चाय से आपके शिशु को कितना नुकसान पहुँच सकता है?

प्रेगनेंसी के दौरान सबसे ज्यादा मुश्किल महिला को यह समझने में आती है की महिला को क्या खाना चाहिए और क्या पीना चाहिए। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान महिला जो भी खाती है या पीती है उसका असर केवल गर्भवती महिला की सेहत पर ही नहीं पड़ता है बल्कि उससे गर्भ में पल रहा शिशु भी प्रभावित होता है।

ऐसे में यदि महिला कुछ ऐसी चीज खा लेती है या पी लेती है जो महिला को नहीं खानी चाहिए या पीनी चाहिए, साथ ही महिला किसी चीज का सेवन जरुरत से ज्यादा कर लेती है तो उसका असर बुरा गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। आज इस आर्टिकल में हम प्रेगनेंसी के दौरान चाय के सेवन के बारे में बात करने जा रहे हैं।

गर्भावस्था में चाय का सेवन करें या नहीं?

प्रेगनेंसी एक ऐसा समय होता है जब महिला को कई बार अपनी पसंदीदा चीजों के सेवन को छोड़ना पड़ता है। क्योंकि गर्भावस्था में सही खान पान माँ और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। ऐसे ही प्रेगनेंसी के दौरान यदि महिला चाय का सेवन करना चाहती है तो महिला कर सकती है। लेकिन महिला को चाय का सेवन बहुत ही कम मात्रा में करना चाहिए।

जैसे की महिला यदि पहले दिन में तीन चार बार चाय पी लेती थी तो अब महिला को एक या दो बार ही चाय पीनी चाहिए और वो भी कम मात्रा में पीनी चाहिए। क्योंकि चाय में कैफीन की मात्रा अधिक होती है और कैफीन गर्भ में पल रहे शिशु के विकास को नुकसान पहुंचा सकता है। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम आपको एक कप चाय से आपके गर्भ में पल रहे शिशु को कितना नुकसान पहुँच सकता है उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

प्रेगनेंसी में चाय पीने से शिशु को होने वाले नुकसान

गर्भवती महिला प्रेगनेंसी के दौरान यदि चाय का ज्यादा सेवन करती है तो इससे गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है। जैसे की:

पेट सम्बंधित समस्या हो सकती है

चाय का सेवन अधिक करने के कारण गर्भवती महिला को कब्ज़, दस्त, पेट में गैस, डायरिया की समस्या होने का खतरा रहता है। और प्रेगनेंसी के दौरान यदि डायरिया यानी उल्टी दस्त की समस्या अधिक हो जाये तो इसके कारण न तो गर्भ में शिशु को अच्छे से पोषण मिलता है जिससे शिशु के विकास में कमी आती है, साथ ही दस्त की समस्या अधिक होने के कारण गर्भपात का खतरा भी बढ़ जाता है।

भूख में कमी

चाय का सेवन ज्यादा करने के कारण गर्भवती महिला की भूख में कमी आती है। और भूख कम लगने के कारण महिला अच्छे से अपनी डाइट नहीं लेती है जिसके कारण शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। और शरीर में पोषक तत्वों की कमी होने के कारण महिला की शारीरिक परेशानियां बढ़ने के साथ शिशु के विकास में कमी आने का भी खतरा होता है। जिसकी वजह से जन्म के समय शिशु के वजन में कमी जैसी समस्या देखने को मिल सकती है।

कैफीन का प्रभाव

चाय में कैफीन की अधिकता होती है और कैफीन का शरीर में जरुरत से ज्यादा होना महिला की दिक्कतों को बढ़ा सकता है। साथ ही जरुरत से ज्यादा कैफीन का सेवन करने के कारण गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी बुरा असर डालता है। जिसके कारण शिशु के शारीरिक व् मानसिक विकास में कमी आने का खतरा रहता है।

तो यह है प्रेगनेंसी के दौरान चाय पीने के कारण गर्भ में पल रहे शिशु हो होने वाली दिक्कतें, ऐसे में प्रेग्नेंट महिला चाय का सेवन करते समय ध्यान रखना चाहिए की महिला ज्यादा चाय नहीं पीएं, खाली पेट चाय नहीं पीएं, काली या तेज अदरक डालकर चाय नहीं पीएं, आदि। क्योंकि इन सभी कारणों की वजह से महिला और शिशु दोनों को दिक्कत होने का खतरा रहता है।

प्रेगनेंसी के 4 से 6 महीने तक क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

प्रेगनेंसी महिला के लिए बहुत ही नाजुक समय होता है साथ ही यह समय महिला के लिए उसकी जिंदगी का सबसे खास अनुभव भी होता है। साथ ही प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने महिला को अपना अच्छे से ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। क्योंकि इस दौरान महिला अकेली नहीं होती है बल्कि गर्भ में पल रही नन्ही जान का शुरुआत से लेकर आखिर तक का विकास अपनी माँ पर ही निर्भर करता है। साथ ही इस दौरान महिला को इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए की महिला किसी भी तरह की लापरवाही नहीं करें जिससे महिला या शिशु दोनों को किसी भी तरह की दिक्कत हो। तो आज इस आर्टिकल में हम प्रेगनेंसी के 4 से 6 महीने यानी की प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में महिला को क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए उस बारे में बताने जा रहे हैं।

गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में शिशु का विकास

प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में गर्भ मे शिशु के अंग लगभग बन चुके होते हैं अब वो अंग धीरे धीरे काम करना शुरू करना शुरू करते हैं। साथ ही चौथे महीने के आखिर या फिर पांचवें महीने की शुरुआत तक गर्भ में शिशु हलचल करना भी शुरू कर देता हैं।

गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

प्रेग्नेंट महिला को वैसे तो प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने में सावधानियां बरतनी चाहिए। लेकिन इस आर्टिकल में हम आपको प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में महिला को कौन कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

समय से करवाएं जांच

प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाना होता है ऐसे में महिला को अल्ट्रासॉउन्ड समय से करवाना चाहिए ताकि किसी भी तरह की दिक्कत हो या शिशु पूरी तरह स्वस्थ हो उसकी जानकारी आपको मिल सके। इसके अलावा जो भी मल्टीविटामिन लेने की सलाह आपको डॉक्टर देते हैं आपको उनका सेवन समय से करना चाहिए।

डाइट नहीं करें

दूसरी तिमाही में गर्भ में शिशु का विकास बढ़ने लगता है जिसके कारण महिला के वजन में बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में महिला को बढ़ते वजन की चिंता को लेकर डाइट नहीं करनी चाहिए यानी की महिला को खाना पीना नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि इसके कारण माँ और बच्चे दोनों को ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

घर में उन कामों को नहीं करें जिसे करने से आपको दिक्कत हो

गर्भवती महिला को घर के उन कामों को करने से बचना चाहिए जिनकी वजह से महिला को दिक्कत हो सकती है। जैसे की महिला को गैस के पास ज्यादा देर खड़े रहककर काम नहीं करना चाहिए, टॉयलेट या टाइल साफ़ करने वाले कामों को करने से बचना चाहिए, शेल्फ से ज्यादा सटकर काम नहीं करना चाहिए, ज्यादा देर एक ही जगह पर खड़े रहकर काम करने से बचना चाहिए, आदि।

नींद में लापरवाही नहीं करें

प्रेग्नेंट महिला को दूसरी तिमाही में अपनी नींद भरपूर लेनी चाहिए रात भर में आठ घंटे सोने के साथ दिनभर में भी थोड़ा आराम करना चाहिए। क्योंकि यदि महिला भरपूर आराम नहीं करती है तो इसकी वजह से महिला की शारीरिक परेशानियां बढ़ने के साथ तनाव होने का खतरा भी रहता है।

बाहर के खाने से परहेज रखें

गर्भवती महिला को ज्यादा तेलीय मसालेदार आहार, जंक फ़ूड आदि का सेवन करने से बचना चाहिए। क्योंकि इस दौरान गर्भ में शिशु का विकास बढ़ रहा होता है ऐसे में यदि महिला जंक फ़ूड का सेवन करती है तो इससे महिला को पोषक तत्व नहीं मिलते हैं। और जब महिला को पोषक तत्व नहीं मिलते हैं तो गर्भ में पल रहे शिशु को पोषक तत्व नहीं मिलते हैं। ऐसे में जब शिशु को पोषक तत्व नहीं मिलते हैं तो इसकी वजह से शिशु के विकास में कमी आने का खतरा रहता है।

नशे से दूर रहें

प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में महिला को किसी भी तरह के नशे जैसे की धूम्रपान, अल्कोहल आदि का सेवन नहीं करना चाहिए साथ ही ऐसी किसी जगह पर जाने से भी बचना चाहिए जहां पर कोई इसका सेवन कर रहा होता है।

प्रदूषण वाली जगह पर नहीं जाएँ

गर्भवती महिला को किसी ऐसी जगह पर जाने से बचना चाहिए जहां पर ज्यादा भीड़भाड़ हो या फिर प्रदूषण हो क्योंकि इसके कारण महिला और शिशु दोनों के संक्रमित होने का खतरा रहता है।

साफ़ सफाई का ध्यान रखें

गर्भवती महिला को साफ़ सफाई का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए क्योंकि साफ़ सफाई का ध्यान नहीं रखने के कारण महिला को संक्रमण होने का खतरा रहता है। और महिला को संक्रमण होने के कारण शिशु को संक्रमण होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

शोर शराबे से बचें

गर्भवती महिला को ज्यादा तेज आवाज़ वाली जगह पर भी नहीं जाना चाहिए। क्योंकि गर्भ में ही शिशु की सुनने की क्षमता का विकास होने लगता है। ऐसे में यदि महिला ज्यादा तेज आवाज़ वाली जगह पर जाती है तो इसके कारण शिशु के सुनने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

आरामदायक कपडे पहनें

गर्भवती महिला को आरामदायक कपडे पहनने चाहिए जिससे महिला के पेट पर दबाव नहीं पड़े, महिला को किसी तरह की दिक्कत नहीं हो, ज्यादा चुभने वाले और भारी कपडे नहीं पहनें, आदि।

ज्यादा ऊँचें जूते चप्पल पहनने से बचें

गर्भवती महिला को ज्यादा ऊँचें जूते चप्पल पहनने से बचना चाहिए क्योंकि इनके कारण महिला के गिरने का खतरा होता है। और यदि महिला कभी गिर जाती है तो इसके कारण महिला को चोट लग सकती है जिसका असर गर्भ में पल रहे शिशु पर भी पड़ सकता है।

तो यह हैं कुछ सावधानियां जो प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही में महिला को बरतनी चाहिए। यदि महिला इन छोटे छोटे टिप्स का ध्यान प्रेगनेंसी के दौरान रखती है तो इससे महिला को स्वस्थ रहने और गर्भ में शिशु के बेहतर विकास होने में मदद मिलती है।

Precautions during second trimester of pregnancy

बेबी बॉय के लिए कब सम्बन्ध बनाना चाहिए?

माँ बनना हर महिला के लिए बहुत ही सौभाग्य की बात होती है साथ ही जैसे ही घर वालों को यह खुशखबरी मिलती है की उनके घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है तो उनकी ख़ुशी में चार चाँद लग जाते हैं। लेकिन कई बार लोगो की चाह होती है की उनके घर में एक नन्हा राजकुमार ही जन्म लें तो कुछ की चाह यह भी हो सकती है की उनके घर में एक नन्ही परी आये।

अब कौन आएगा यह तो आपकी मर्ज़ी से नहीं होता है लेकिन फिर भी पुराने समय से ही कुछ टोटके बताये जाते हैं। और ऐसा माना जाता है की वह टोटके काफी असरदार भी होते हैं यह टोटके पुत्र या पुत्री प्राप्ति के लिए बताये जाते हैं। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसे ही टोटके बताने जा रहे हैं जिन्हे ट्राई करने से आपके घर में एक नन्हे राजकुमार के होने के चांस बढ़ जाते हैं।

इस दिन बनाएं सम्बन्ध

ऐसा माना जाता है की यदि महिला पीरियड्स आने के पहले दिन को गिनते हुए आठवें, दसवें, बाहरवें, चौहदवें, सोहलवें, अठारवें व् अन्य सम दिनों में सम्बन्ध बनाती है। तो ऐसा करने पर इन दिनों में महिला का गर्भ ठहर जाता है तो महिला को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

सम्बन्ध बनाते समय पक्ष का रखें ध्यान

ऐसा भी माना जाता है की सम दिनों के साथ महिला और पुरुष यदि कृष्ण पक्ष के समय सम्बन्ध बनाते हैं और ऐसे में महिला का गर्भ ठहर जाता है। तो महिला को पुत्र प्राप्ति होने के चांस अधिक होते हैं।

सम्बन्ध बनाने के बाद इस बात का ध्यान रखें

जब महिला और पुरुष सम्बन्ध बनाकर फ्री हो जाते हैं और उसके बाद यदि महिला सीधे हाथ की तरफ करवट लेकर सोती है या थोड़ी देर लेट जाती है। तो ऐसा करने से महिला के गर्भ में लड़का होने के चांस बढ़ जाते हैं।

सम्बन्ध बनाते समय रखें एक दूसरे से करीबी

ऐसा माना जाता है की महिला और पुरुष जब सम्बन्ध बनाते हैं और वो फ्री होने वाले होते हैं तो पुरुष को बिल्कुल करीब आकर महिला के प्राइवेट पार्ट के अंदर स्पर्म को छोड़ना चाहिए। क्योंकि जितना तेजी से और जितना ज्यादा नजदीकी होने से शुक्राणु अंदर जाते हैं उतना ही जल्दी निषेचन होने के चांस बढ़ने के साथ लड़का होने के चांस भी बढ़ते हैं।

पोजीशन का रखें ध्यान

पुत्र प्राप्ति के लिए महिला और पुरुष को ऐसी पोजीशन ट्राई करनी चाहिए जिसमे शुक्राणु के सबसे करीब or अंदर प्रवेश करने के चांस हो। क्योंकि जितना करीबी से शुक्राणु अंदर जाते हैं उतना ही गर्भधारण के चांस बढ़ाने में मदद मिलती है। और ऐसा करने से लड़का होने के चांस में भी बढ़ोतरी होती है।

नारियल का बीज

नारियल को जब तोडा जाता है तो उसके ऊपरी हिस्से में से एक बीज निकलता है यदि महिला बिना चबाये उस बीज को निगल जाती है। तो ऐसा करने पर भी महिला को लड़का होने के चांस अधिक होते हैं। महिला चाहे तो इस बीज को गाय के दूध के साथ निगल ले इसके अलावा महिला को ऐसा प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में ही करना चाहिए।

तो यह हैं कुछ उपाय जिन्हे ट्राई करने से पुत्र प्राप्ति के चांस को बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके अलावा ऐसा भी माना जाता है की कुछ मन्त्र भी होते हैं जिनका जप करने से पुत्र प्राप्ति में मदद मिलती है।

When should a relationship be made for a baby boy

क्या नोर्मल डिलीवरी के लिए सम्बन्ध बनाना जरुरी होता है?

प्रेगनेंसी के दौरान सम्बन्ध बनाने को लेकर महिला के मन में बहुत से सवाल चल रहे होते हैं। जैसे की प्रेग्नेंट महिला को सम्बन्ध बनाना चाहिए या नहीं, सम्बन्ध बनाने से शिशु पर कोई असर तो नहीं होगा, आदि। ऐसे में इसका जवाब यह होता है की यदि प्रेगनेंसी के दौरान महिला अपने पार्टनर के साथ सम्बन्ध बनाना चाहती है तो महिला सम्बन्ध बना सकती है।

लेकिन इस बात का ध्यान रखें की आपको किसी तरह की कम्प्लीकेशन नहीं हो साथ ही आपको डॉक्टर ने सम्बन्ध बनाने के लिए मनाही नहीं की हो। इसके अलावा आपको यह जानकार भी हैरानी होगी की प्रेगनेंसी के दौरान यदि पूरी सावधानी के साथ सम्बन्ध बनाएं जाते हैं तो इसके बेहतरीन फायदे गर्भवती महिला को मिलते हैं।

गर्भावस्था में सम्बन्ध बनाने के फायदे

प्रेग्नेंट महिला यदि अपने पार्टनर के साथ सम्बन्ध बनाती है तो इसके बहुत से सेहत सम्बन्धी फायदे मिलते हैं जो माँ के साथ बच्चे को भी फायदा पहुंचाते हैं। तो आइये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी में सम्बन्ध बनाने से गर्भवती महिला और बच्चे को कौन से फायदे मिलते हैं।

  • गर्भवती महिला को तनाव से राहत पाने में मदद मिलती है जो माँ और बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद होता है।
  • सम्बन्ध बनाने के बाद महिला को अच्छी और गहरी नींद लेने में मदद मिलती है।
  • गर्भावस्था के दौरान सम्बन्ध बनाने से गर्भवती महिला को हाई ब्लड प्रैशर की समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।
  • प्रेगनेंसी में सम्बन्ध बनाने से महिला के शरीर में ब्लड फ्लो अच्छे से होता है जिससे महिला की शारीरिक परेशानियों को कम करने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के विकास को बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • प्रेग्नेंट महिला के सम्बन्ध बनाने से पेल्विक एरिया की मांसपेशियों को मजबूत रहने में मदद मिलती है।

क्या नोर्मल डिलीवरी के लिए सम्बन्ध बनाना जरुरी होता है?

अधिकतर गर्भवती महिलाएं यही चाहती है की वो सामान्य प्रसव के माध्यम से बच्चे को जन्म दें क्योंकि सामान्य प्रसव के बाद शिशु को होने वाली मुश्किलों के चांस कम होते हैं। साथ ही नोर्मल डिलीवरी के बाद महिला को जल्दी फिट होने में मदद मिलती है। ऐसे में नोर्मल डिलीवरी के लिए प्रेगनेंसी के दौरान महिला अलग अलग तरीके के टिप्स को ट्राई कर सकती है। और इन टिप्स में कई बार ऐसा भी कहा जाता है की सम्बन्ध बनाने से नोर्मल डिलीवरी होती है।

तो ऐसा मानना बिल्कुल गलत है की सम्बन्ध बनाने से नोर्मल डिलीवरी होती है या नोर्मल डिलीवरी के लिए सम्बन्ध बनाना जरुरी होता है, क्योंकि सम्बन्ध बनाने से पेल्विक एरिया को मजबूती मिलती है जिससे यदि महिला को प्रसव पीड़ा होती है तो महिला को प्रसव पीड़ा को कम करने में मदद मिलती है। जिससे जल्द से जल्द महिला की डिलीवरी हो जाती है। और डॉक्टर्स के अनुसार डिलीवरी का समय पास आने पर प्रेग्नेंट महिला को सम्बन्ध न बनाने की सलाह भी दी जाती है।

गर्भावस्था में सम्बन्ध बनाने से शिशु पर कोई बुरा असर पड़ता है?

गर्भवती महिला के पेट में पल रहा शिशु गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड में होता है जो शिशु को स्वस्थ रखने में मदद करता है। ऐसे में सम्बन्ध बनाने पर शिशु पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है। लेकिन सम्बन्ध बनाते समय शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचें इसके लिए महिला को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की महिला सम्बन्ध बनाते समय पेट पर दबाव नहीं पड़ने दें, साथ ही सम्बन्ध बनाने में कोई तेजी नहीं करें और कोई नया एक्सपेरिमेंट नहीं करें।

तो यह हैं प्रेगनेंसी में सम्बन्ध बनाने से नोर्मल डिलीवरी होती है या नहीं होती है उससे जुड़े टिप्स, साथ ही प्रेगनेंसी में सम्बन्ध बनाने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं उसके बारे में भी बताया गया है। तो आप भी यदि प्रेग्नेंट हैं और सम्बन्ध बनाना चाहती है तो आपको भी इसमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। लेकिन एक बार डॉक्टर से अपने स्वास्थ्य के बारे में विचार करने के बाद ही सम्बन्ध बनाएं।

Is it necessary to have a relationship for a normal delivery?

जब Delivery Due Date निकल जाये तो क्या करें

गर्भावस्था का समय महिला के लिए बहुत ही खूबसूरत व् प्यारा समय होता है। क्योंकि इस दौरान महिला एक नन्ही जान को अपने अंदर पाल रही होती है और इस दौरान महिला ऐसे बहुत से खूबसूरत अहसास को महसूस करती है जो कि केवल एक महिला को ही महसूस हो सकते है। साथ ही पूरी प्रेगनेंसी के दौरान महिला उस पल का बेसब्री से इंतज़ार भी करती है जब शिशु इस दुनिया में आने के लिए पूरी तरह से तैयार होता है।

वैसे गर्भावस्था की शुरुआत में ही महिला को एक अनुमानित डिलीवरी डेट बता दी जाती है। और उसी डेट से एक डेढ़ हफ्ता पहले या बाद में बच्चे का जन्म हो जाता है। और डिलीवरी पहले होगी या बाद में यह पूरी तरह से गर्भ में पल रहे शिशु की स्थिति और महिला के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आज इस आर्टिकल में हम आपसे डिलीवरी से जुडी कुछ बातें करने जा रहे हैं जिसमे हम आपको डिलीवरी डेट निकल जाने पर भी यदि महिला को पेन नहीं होता है तो महिला को क्या करना चाहिए उसके बारे में बताएंगे। लेकिन उससे पहले जानते हैं की डिलीवरी लेट होने के क्या कारण होते हैं।

लेट डिलीवरी होने के कारण

  • यदि आपकी पहली डिलीवरी भी ऐसे ही हुई हो की डेट निकल गई हो और उसके बाद आपको प्रसव पीड़ा या डिलीवरी हुई हो।
  • कुछ कारणों में ऐसा होना जेनेटिक भी होता है यानी की यदि आपकी माँ या बहन के साथ ऐसा हुआ हो तो आपसे साथ भी ऐसा हो सकता है।
  • जरुरत से ज्यादा वजन होने के कारण भी ऐसा हो सकता है।
  • अधिक उम्र में माँ बन रही हैं तो भी इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
  • गर्भ में शिशु का विकास सही न होने के कारण शिशु अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में नहीं आ पाता है यदि ऐसा होता है तो भी कुछ केस में महिला की डिलीवरी लेट हो सकती है।
  • कई बार आपकी लास्ट पीरियड की डेट सही न पता होने के कारण भी ड्यू डेट की गिनती गलत हो सकती है जिसकी वजह से आपको इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

लेट लेबर यानी डिलीवरी होने का क्या मतलब होता है?

लेट लेबर होने का मतलब यह होता है की ज्यादातर केस में महिला की डिलीवरी छत्तीस से चालीसवें हफ्ते के बीच में हो जाती है। लेकिन यदि डिलीवरी इस समय से पहले हो जाये तो उसे समय पूर्व प्रसव कहा जाता है जिसमे बच्चे प्रीमैच्योर होते हैं। और यदि चालीसवें या इकतालीसवें हफ्ते के बाद भी महिला को शरीर में प्रसव का कोई लक्षण महसूस नहीं होता है। तो इसका मतलब यह होता है की महिला को लेट लेबर की समस्या है।

ड्यू डेट निकल जाने के बाद महिला को क्या करना चाहिए?

यदि महिला की डिलीवरी डेट निकल जाती है तो सबसे पहले महिला को बिना देरी किये हुए डॉक्टर से मिलना चाहिए। ताकि डॉक्टर आपकी सही से जांच कर सके की आपके और आपके बच्चे के लिए अभी आगे और समय निकालना ठीक है या नहीं। यदि डॉक्टर को ऐसा लगेगा की आपका बच्चा अभी ठीक है और आपको दो चार दिन और इंतज़ार करना चाहिए तो आप कर सकती है। लेकिन यदि आपको डॉक्टर मना कर देता है तो उसके बाद आपको डॉक्टर द्वारा आर्टिफिशल पेन देकर या फिर सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दी जा सकती है। ताकि माँ और बच्चे दोनों को ही गर्भ में किसी भी तरह का रिस्क नहीं हो। और आपको भी बच्चे को रिस्क से बचाने के लिए जल्द से जल्द फैसला करना चाहिए।

प्रसव पीड़ा बढ़ाने के तरीके

यदि आपको डॉक्टर द्वारा अभी दो चार दिन का समय दिया जाता है या फिर नौवें महीने में आप प्रसव पीड़ा को बढ़ाने के लिए कुछ तरीके अपनाना चाहती है तो आइये हम आपको कुछ आसान घरेलू नुस्खों के बारे में बताते हैं।

स्ट्रैस नहीं लें

डिलीवरी का समय पास आने पर कुछ महिलाएं तनाव में आ जाती है और तनाव के कारण कई बार महिला को लेबर पेन न होने की परेशानी हो सकती है। ऐसे में यदि आप चाहती है की आपको लेबर पेन हो तो इसके लिए आप दिमागी रूप से रिलैक्स रहें।

एक्टिव रहें

नौवें महीने में वजन बढ़ने के कारण महिला को काम करने, उठने बैठने में थोड़ी दिक्कत हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है की हमेशा आराम ही करते रहना चाहिए। बल्कि महिला को एक्टिव रहना चाहिए क्योंकि एक्टिव रहने से प्रसव पीड़ा को बढ़ाने में मदद मिलती है। साथ ही ध्यान रखें की एक्टिव रहने का यह मतलब नहीं है की आप उछल कूद करना शुरू कर दें।

वॉक करें

प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने के लिए वॉक करना एक बेहतरीन विकल्प है क्योंकि वाक करने से गर्भ में पल रहे शिशु को अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आने में मदद मिलती है। जिससे डिलीवरी जल्दी होने में मदद मिलती है।

प्रसव को बढ़ाने वाली डाइट लें

ऐसा मन जाता है की कुछ आहार ऐसे होते हैं जिन्हे खाने से आपकी प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में मदद मिलती सकती है जैसे की जिन खाद्य पदार्थों की तासीर गर्म होती है, स्पाइसी फ़ूड, आदि। ऐसे में गर्भवती महिला चाहे तो इन आहार का सेवन कर सकती है ताकिप्रसव को उत्तेजित करने में मदद मिल सके।

क्या गर्भ में शिशु के ज्यादा समय तक रहने से कोई दिक्कत होती है?

वैसे तो आपको डॉक्टर द्वारा सही सलाह दी जाती है की आपको कब डिलीवरी करवा लेनी चाहिए। लेकिन यदि आप उसके बाद भी डिलीवरी नहीं करवाती हैं। तो डिलीवरी डेट आने तक गर्भ में शिशु का विकास और वजन बढ़ चूका होता है। ऐसे में हो सकता है की इस दौरान गर्भनाल अपना काम उतनी अच्छी तरह से न कर पाए जैसे की पहले कर रही थी।

और गर्भनाल के सही से काम न करने के कारण शिशु तक पहुँचने वाले पोषक तत्वों व् ऑक्सीजन के प्रवाह में समस्या आ सकती है। जिसके कारण शिशु की हलचल में कमी, सांस लेने में दिक्कत, और शिशु की जान को रिस्क आदि हो सकता है। ऐसे में डिलीवरी डेट निकल जाने पर आपको जल्द से जल्द डॉक्टर से बात करनी चाहिए। ताकि बच्चे को किसी भी तरह की दिक्कत न हो और आप एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकें।

डिलीवरी डेट निकल जाने के बाद महिला को होने वाली दिक्कत

बच्चे के जन्म की तिथि निकल जाने का बाद गर्भ में केवल शिशु को हो नहीं बल्कि महिला को भी दिक्कत हो सकती है जैसे की महिला को तनाव अधिक हो सकता है जिसकी वजह से महिला की दिक्कतें बढ़ सकती है, इसके अलावा महिला को पेल्विक एरिया, पीठ, आदि की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ सकता है जिसके कारण महिला का कमर दर्द, पेट के निचले हिस्से में दर्द जैसी परेशानी अधिक हो सकती है।

तो यह हैं डिलीवरी की ड्यू डेट निकल जाने पर महिला को क्या करना चाहिए उससे जुडी जानकारी, यदि आप भी माँ बनने वाली हैं तो आपको भी यह सब जानकारी अपने पास जरूर रखनी चाहिए ताकि माँ या बच्चे को होने वाली हर दिक्कत से बचे रहने में मदद मिल सके।

What to do when the delivery date is over

प्रेगनेंसी में भुट्टा खाने के फायदे और नुकसान क्या होते हैं?

गर्भावस्था के दौरान महिला द्वारा लिए गया आहार माँ और बच्चे दोनों की सेहत पर असर डालता है। ऐसे में प्रेगनेंसी के दौरान महिला को केवल उन्ही चीजों का सेवन करना चाहिए जो पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ माँ और बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद भी हो। साथ ही प्रेगनेंसी के दौरान महिला को अलग अलग चीजों को खाने की क्रेविंग होती है।

जैसे की कुछ महिलाओं को मीठा खाने की इच्छा अधिक होती है तो कुछ महिलाओं को खट्टा खाने की इच्छा होती है। इसके अलावा और भी ऐसी बहुत सी चीजें होती है जिन्हे खाने की क्रेविंग गर्भवती महिला को हो सकती है। आज इस आर्टिकल में हम प्रेगनेंसी के दौरान भुट्टा यानी कॉर्न, मकई या छल्ली जिसे कहते हैं उसके बारे में बात करने जा रहे हैं। क्योंकि भुट्टा का मौसम आने पर महिला को भुट्टा खाने की क्रेविंग भी हो सकती है।

क्या गर्भवती महिला भुट्टा का सेवन कर सकती है?

फोलिक एसिड, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, फॉस्‍फोरस जैसे पोषक तत्व भुट्टे में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। और यह सभी पोषक तत्व गर्भवती महिला और शिशु दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। ऐसे में गर्भवती महिला का यदि भुट्टा खाने का मन होता है तो महिला सिमित मात्रा में भुट्टा का सेवन कर सकती है।

गर्भावस्था में भुट्टा खाने के फायदे

गर्भवती महिला यदि भुट्टा का सेवन करती है तो इससे गर्भवती महिला को जरुरी पोषक तत्व मिलते हैं जो महिला और शिशु दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। तो आइये अब जानते हैं की भुट्टे को खाने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं।

फोलिक एसिड

भुट्टे में फोलिक एसिड भरपूर मात्रा में मौजूद होता है। और फोलिक एसिड गर्भ में पल रहे शिशु के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। फोलिक एसिड गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक विकास को बेहतर करने के साथ मानसिक विकास को बेहतर करने में भी मदद करता है। साथ ही फोलिक एसिड शिशु को पर्याप्त मात्रा में मिलने पर शिशु को जन्म दोष के खतरे से बचे रहने में भी मदद मिलती है। ऐसे में भुट्टे का सेवन करने से शिशु का विकास अच्छे से होने में मदद मिलती है।

आयरन

कॉर्न आयरन का बेहतरीन स्त्रोत होता है खासकर भुट्टे को उबालकर खाने से आयरन पर्याप्त मात्रा में मिलता है। यदि आप भूनकर खाना चाहती है या अन्य किसी रूप में भुट्टे का सेवन करना चाहती है तो भी कर सकती है उससे भी आपको आयरन मिलता है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला भुट्टे का सेवन करती है तो इससे गर्भवती महिला के शरीर में खून की कमी नहीं होती है। महिला महिला को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने के साथ शिशु के बेहतर विकास में मदद मिलती है।

फाइबर

भुट्टा आयरन का भी बेहतरीन स्त्रोत होता है ऐसे में प्रेग्नेंट महिला यदि भुट्टे का सेवन करती है तो इससे गर्भवती महिला की पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है। जिससे महिला को कब्ज़ व् पेट सम्बन्धी अन्य परेशानियों से बचे रहने में मदद मिलती है।

एनर्जी

भुट्टे का सेवन करने से गर्भवती महिला को ऊर्जा से भरपूर रहने में मदद मिलती है। क्योंकि भुट्टे का सेवन करने से महिला के शरीर में जरुरी कैलोरीज़ की कमी को पूरा करने में मदद मिलती है।

कोलेस्ट्रॉल कण्ट्रोल

प्रेगनेंसी के दौरान भुट्टे का सेवन करने से गर्भवती महिला के कोलेस्ट्रॉल को कण्ट्रोल रहने में मदद मिलती है। जिससे गर्भवती महिला को ब्लड प्रैशर, हदय सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने में मदद मिलती है। साथ ही भुट्टा बैड कोलेस्ट्रॉल को खत्म करने और गुड़ कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को सही रखने में मदद करता है।

विटामिन ए

भुट्टा विटामिन ए का भी बेहतरीन स्त्रोत होता है जो माँ और बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद होता है। खासकर शिशु की आँखों और फेफड़ों के विकास के लिए विटामिन ए बहुत जरुरी होता है। ऐसे में शरीर में विटामिन ए की मात्रा सही रहे इसके लिए महिला चाहे तो भुट्टे का सेवन कर सकती है।

स्किन और बालों के लिए होता है फायदेमंद

प्रेगनेंसी के दौरान भुट्टे का सेवन करने से गर्भवती महिला की स्किन और बालों को फायदा मिलता है। क्योंकि भुट्टे में मौजूद विटामिन्स व् अन्य न्यूट्रिएंट्स बालों व् स्किन को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।

इम्युनिटी बढ़ती है

भुट्टे में एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। जो गर्भवती महिला की इम्युनिटी को बूस्ट करने में मदद करते हैं। जिससे कैंसर, ट्यूमर जैसी बिमारियों से महिला को सुरक्षित रहने में मदद मिलती है।

हड्डियां होती है मजबूत

भुट्टे में मैग्नीशियम मौजूद होता है जो हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है जिससे प्रेग्नेंट महिला की थकान, कमजोरी, शरीर में दर्द जैसी समस्या कम होती है। साथ ही गर्भ में पल रहे शिशु की हड्डियों का विकास अच्छे से होने में मदद मिलती है।

ब्लड फ्लो होता है बेहतर

मकई खाने से शरीर में ब्लड फ्लो अच्छे से होता है जिससे गर्भवती महिला को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। साथ ही सूजन जैसी दिक्कत से भी बचाव होता है।

प्रेगनेंसी में भुट्टा खाने के नुकसान

सिमित मात्रा में भुट्टे का सेवन करने से गर्भवती महिला और शिशु को फायदे मिलते हैं लेकिन यदि गर्भवती महिला सिमित मात्रा से ज्यादा करती है तो इससे गर्भवती महिला और शिशु की सेहत को नुकसान पहुँचता है। जैसे की:

जेस्टेशनल शुगर: भुट्टे में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। ऐसे में जरुरत से ज्यादा भुट्टे का सेवन करने के कारण ब्लड में शुगर लेवल बढ़ सकता है जिसकी वजह से महिला को शुगर की समस्या हो सकती है।

पेट में दर्द: जरुरत से ज्यादा भुट्टा खाने के कारण या अच्छे से पका या न उबला हुआ भुट्टा खाने के कारण महिला को पेट दर्द जैसी परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है।

पोटैशियम: भुट्टे में पोटैशियम की अधिकता होती है ऐसे में यदि महिला ज्यादा भुट्टा खाती है तो इसकी वजह से शरीर में पोटैशियम की मात्रा की अधिकता हो सकती है जिसकी वजह से महिला को हाई ब्लड प्रैशर जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

अपच: जरुरत से ज्यादा भुट्टा खाने के कारण महिला को अपच की परेशानी भी हो सकती है।

वजन: भुट्टे में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता होती है ऐसे में भुट्टे का अधिक सेवन करने के कारण गर्भवती महिला को वजन बढ़ने जैसी समस्या हो सकती है।

तो यह हैं कुछ फायदे और नुकसान जो भुट्टे का सेवन करने से गर्भवती महिला को हो सकते हैं। ऐसे में गर्भवती महिला को सिमित मात्रा में भुट्टे का सेवन करना चाहिए ताकि माँ व् बच्चे को कोई सेहत सम्बन्धी समस्या नहीं हो। इसके अलावा यदि भुट्टा खाने से प्रेग्नेंट महिला को किसी भी तरह की दिक्कत होती है तो गर्भवती महिला को भुट्टे का सेवन नहीं करना चाहिए।

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प्रेगनेंसी में आइस क्रीम खानी चाहिए या नहीं?

जब सामने आइस क्रीम रखी हो तो किसी को भूख हो या नहीं हो वो कभी मना नहीं करता है क्योंकि आइस क्रीम सभी को पसंद होती है। साथ ही चाहे सर्दियों का मौसम भी हो तो भी आइस क्रीम खाना सभी का पसंदीदा होता है। और उसके बाद जब आइस क्रीम के अलग अलग फ्लेवर की बात आती है तो मुँह में पानी आ जाना भी स्वाभाविक होता है।

वैसे ही गर्भावस्था के दौरान भी महिला को अलग अलग चीजें खाने की क्रेविंग हो सकती है। लेकिन कई बार प्रेगनेंसी में अपनी पसंद की चीज को भी न कहना पड़ता है क्योंकि वो चीज माँ और बच्चे दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकती है। तो आज इस आर्टिकल में हम आपसे प्रेगनेंसी के दौरान आइस क्रीम के सेवन की बात करने जा रहे हैं की गर्भवती महिला को आइस क्रीम खानी चाहिए या नहीं।

गर्भावस्था में आइस क्रीम खाने की इच्छा क्यों होती है?

प्रेगनेंसी के दौरान बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण जीभ के स्वाद में भी बदलाव महसूस होता है। जिसकी वजह से महिला की अलग अलग चीजें खाने की इच्छा हो सकती है। ऐसे ही उन चीजों में महिला को आइस क्रीम खाने की क्रेविंग भी हो सकती है।

प्रेग्नेंट महिला आइस क्रीम खा सकती है या नहीं?

गर्भावस्था के दौरान बाहर से मिलने वाली यानी की जो चीजें बाहर बनाई जाती हैं जैसे की जंक फ़ूड, डिब्बाबंद आहार, आदि उन चीजों को न खाने की सलाह दी जाती है। क्योंकि बाहर की चीजों को बनाने में किन किन चीजों का इस्तेमाल किया गया है, वो कितने दिनों से बनी रखी है, आदि के बारे में आपको सही जानकारी नहीं होती है। ऐसे में इन चीजों को खाने के कारण महिला व् शिशु की सेहत को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है।

वैसे ही बाहर से मिलने वाली आइस क्रीम का सेवन भी गर्भवती महिला को नहीं करना चाहिए। क्योंकि उसमे मौजूद शुगर माँ व् बच्चे की दिक्कत को बढ़ा सकता है साथ ही यदि आइस क्रीम को बनाने में कच्चे दूध या क्रीम का इस्तेमाल किया गया है तो इसकी वजह से महिला को इन्फेक्शन का खतरा भी होता है। और उसका असर गर्भ में पल रहे शिशु पर भी देखने को मिल सकता है।

लेकिन यदि महिला का कभी आइस क्रीम खाने का मन करता है तो महिला घर में ही आइस क्रीम बना सकती है लेकिन उसमे महिला को उन चीजों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना है जिससे माँ बच्चे को कोई नुकसान हो। जैसे की कच्चा अंडा, कच्चा दूध, जरुरत से ज्यादा मीठा, बाहर से मिलने वाला आर्टिफिशल शुगर आदि। इसके अलावा महिला को घर में बनी आइस क्रीम का भी कभी कभी सेवन करना चाहिए।

प्रेगनेंसी में आइस क्रीम खाने के नुकसान

गर्भवती महिला यदि आइस क्रीम का सेवन करती है तो महिला को इसकी वजह से महिला को कुछ दिक्कतें हो सकती है। जैसे की:

संक्रमण

यदि आइस कच्चे दूध से बनी हो तो उसमे मौजूद बैक्टेरिया के कारण महिला और शिशु दोनों को संक्रमण होने का खतरा होता है। क्योंकि कच्चे दूध में हानिकारक बैक्टेरिया मौजूद होता है जो माँ व् बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है।

जेस्टेशनल डाइबिटीज़

आइस क्रीम को बनाने को आर्टिफिशल शुगर का इस्तेमाल किया जाता है ऐसे में महिला यदि आइस क्रीम का सेवन करती है। तो इसकी वजह से महिला के ब्लड में शुगर लेवल बढ़ सकता है जिसकी वजह से महिला को जेस्टेशनल शुगर होने का खतरा होता है।

वजन

आइस क्रीम का सेवन करने के कारण महिला का वजन भी ज्यादा बढ़ सकता है और प्रेगनेंसी के दौरान वजन का जरुरत से ज्यादा बढ़ना माँ व् बच्चे दोनों के लिए दिक्कत खड़ी कर सकता है।

खांसी व् जुखाम

मौसम का बदलाव होने पर यदि प्रेग्नेंट महिला आइस क्रीम का सेवन करती है तो इसकी वजह से महिला को खांसी व् जुखाम फ्लू आदि होने का खतरा रहता है।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के दौरान आइस क्रीम खाने के नुकसान, ऐसे में गर्भवती महिला को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। ताकि गर्भवती महिला यदि आइस क्रीम खाये भी तो घर में बनी हुई वो भी सिमित मात्रा में जिससे माँ व् बच्चे दोनों की सेहत को किसी भी तरह का नुकसान नहीं हो।

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प्रेगनेंसी के दौरान पेट साफ़ रखना क्यों जरुरी होता है?

गर्भावस्था के दौरान बहुत जरुरी होता है की महिला अपनी सेहत का अच्छे से ध्यान रखें ताकि महिला को शारीरिक परेशानियों से बचे रहने में मदद मिल सकें। क्योंकि जितना अच्छे से गर्भवती महिला अपना ध्यान रखती है उतना ही प्रेग्नेंट महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

साथ ही गर्भ में पल रहे शिशु का विकास भी अच्छे तरीके से होने में मदद मिलती है। आज इस आर्टिकल में हम आपसे प्रेग्नेंट महिला को अपना पेट साफ़ क्यों रखना चाहिए उसके बारे में बात करने जा रहे हैं। लेकिन उससे पहले जानते हैं की महिला का पेट साफ़ क्यों नहीं हो पाता है।

प्रेगनेंसी के दौरान महिला का पेट साफ़ क्यों नहीं हो पाता है?

गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलाव के कारण महिला की पाचन क्रिया प्रभावित हो सकती है साथ ही गर्भाशय का आकार बढ़ने के कारण भी पाचन क्रिया थोड़ा धीमे काम कर सकती है। ऐसे में यदि महिला एक ही बार में जरुरत से ज्यादा खाती है, खाने को अच्छे से चबाकर नहीं खाती है, खाने के बीच में पानी पीती है, मसालेदार व् तेलीय आहार ज्यादा खाती है, जंक फ़ूड खाती है, आदि। तो इन कारणों की वजह से भोजन को पचा पाना मुश्किल हो जाता है। और महिला को अपच, कब्ज़, एसिडिटी जैसी परेशानी हो सकती है और इन कारणों की वजह से महिला का पेट अच्छे से साफ़ नहीं हो पाता है।

गर्भवती महिला का पेट साफ़ नहीं होने के कारण होती है यह दिक्कत?

गर्भावस्था के दौरान यदि महिला का पेट साफ़ नहीं होता है तो इसकी वजह से महिला को अन्य सेहत सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। जिसका असर गर्भ में पल रहे शिशु पर भी पड़ने का खतरा रहता है। जैसे की:

शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है

गर्भवती महिला का पेट साफ़ नहीं होने के कारण महिला की भूख में कमी आ सकती है जिसकी वजह से महिला का खाने पीने का मन नहीं करता है। और जब महिला अच्छे से खान पान नहीं लेती है तो इसकी वजह से महिला के शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शिशु के विकास के पर असर पड़ने का खतरा होता है। साथ ही शरीर में पोषक तत्वों की कमी होने के कारण महिला को भी सेहत सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

महिला को उल्टी, खट्टी डकार जैसी दिक्कतें हो सकती है

पेट अच्छे से साफ़ होने के कारण महिला को खट्टी डकार, सीने में जलन, हमेशा उल्टी आने आने का मन होना जैसी दिक्कतें हो सकती है। जिसकी वजह से महिला को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

पेट में दर्द

गर्भवती महिला का पेट साफ़ नहीं होने के कारण कब्ज़ हो जाती है जिसकी वजह से आप बाथरूम में जाकर पेट साफ़ करने के लिए जोर लगाती है साथ ही पेट साफ़ नहीं होने के कारण पेट में गैस भी हो जाती है। और इन दोनों ही परेशानियों के कारण महिला को पेट में दर्द की समस्या हो सकती है।

इन्फेक्शन का खतरा

गर्भवती महिला का पेट साफ़ नहीं होने के कारण पेट में हानिकारक बैक्टेरिया इक्कठा हो सकता है जिसकी वजह से महिला को पेट में इन्फेक्शन होने का खतरा भी हो सकता है। जिसकी वजह से माँ व् बच्चे को दिक्कत होने का खतरा होता है।

प्रेगनेंसी के दौरान पेट साफ़ होना क्यों जरुरी है?

ऐसा जरुरी नहीं होता है की हर गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान पेट सम्बन्धी परेशानियां हो लेकिन अधिकतर महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान इस परेशानी का सामना कर सकती है। ऐसे में यदि महिला का पेट साफ़ नहीं होता है तो महिला को और शिशु को ऊपर बताई गई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसीलिए गर्भवती महिला को इन परेशानियों से बचे रहने के लिए अपने पेट को साफ़ रखना जरुरी होता है। साथ ही पेट साफ़ रहने से महिला को और भी पेट सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने में मदद मिलती है।

गर्भवती महिला पेट साफ़ रखने के लिए अपनाएँ यह टिप्स

  • महिला को थोड़ा थोड़ा करके खाना चाहिए ताकि खाने को अच्छे से और आसानी से हज़म करने में मदद मिल सके।
  • खाने को अच्छे से चबाकर खाएं इससे खाना आसानी से हज़म होता है और पेट सम्बन्धी समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।
  • फाइबर युक्त डाइट लें इससे इससे पाचन क्रिया को सही तरीके से काम करने में मदद मिलती है और पेट भी साफ़ रहता है।
  • पानी का भरपूर सेवन करें इससे भी आपकी पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है और पेट साफा रहने में मदद मिलती है।
  • थोड़ा व्यायाम जरूर करें इससे भी आपके शरीर में चल रही क्रियाओं को बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है। जिससे आपको पाचन क्रिया से सम्बंधित समस्या से भी बचे रहने में मदद मिलती है।

क्या प्रेग्नेंट महिला पेट साफ़ रखने के लिए कोई दवाई ले सकती है?

जी नहीं, प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को बिना किसी डॉक्टरी सलाह के दवाई का सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी दवाई का सेवन करना गर्भवती महिला और शिशु के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के दौरान पेट साफ़ रहना क्यों जरुरी है उससे जुड़े टिप्स, यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी इन टिप्स को फॉलो करना चाहिए ताकि आपके पेट को साफ़ रहने और पेट सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने में मदद मिल सके।

प्रेगनेंसी में सरसों तेल खाने के फायदे

खाना पकाने के लिए घर में तरह तरह के तेलों का इस्तेमाल किया जाता है जैसे की रिफाइंड आयल, ओलिव आयल, सरसों का तेल, देसी घी, आदि। लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान महिला को इनमे से किसका इस्तेमाल करना चाहिए उसके बारे में जानकारी रखना जरुरी होता है। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान महिला जितना खान पान के प्रति सावधानी बरतती है उतना ही ज्यादा माँ व् बच्चे को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। गर्भावस्था के दौरान महिला देसी घी, ओलिव ऑयल, सरसों के तेल आदि का इस्तेमाल कर सकती है क्योंकि यह सभी माँ और बच्चे के लिए फायदेमंद होते हैं। आज इस आर्टिकल में हम आपको प्रेगनेंसी के दौरान सरसों के तेल का सेवन करने से कौन से कौन से फायदे मिल सकते हैं।

इम्युनिटी होती है बूस्ट

गर्भावस्था के दौरान महिला की इम्युनिटी कमजोर हो जाती है ऐसे में महिला को संक्रमण व् बिमारियों के होने का खतरा अधिक होता है और यदि महिला को कोई दिक्कत होती है तो इसका असर गर्भ में पल रहे शिशु पर भी पड़ता है। ऐसे में महिला को उन खाद्य पदार्थों का भरपूर सेवन करना चाहिए जिससे महिला की इम्युनिटी को बढ़ाने में मदद मिल सके। ऐसे में इसके लिए महिला अपने खाने में सरसों तेल का इस्तेमाल कर सकती है क्योंकि सरसों का तेल खाने से इम्युनिटी को बढ़ाने में मदद मिलती है जिससे माँ व् बच्चे को संक्रमण से बचे रहने में मदद मिलती है। इसके अलावा सरसों तेल शरीर की अंदरूनी कमजोरी को भी दूर करने में मदद करता है।

भूख बढ़ाने में मदद करता है

बहुत सी गर्भवती महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान भूख न लगने की समस्या हो जाती है। जिसकी वजह से महिला अपनी डाइट अच्छे से नहीं लेती है और इसका असर माँ और बच्चे दोनों की सेहत पर पड़ता है। ऐसे में सरसों तेल का इस्तेमाल अपने खाने में करने से महिला को इस समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है क्योंकि सरसों के तेल में मौजूद गुण भूख को बढ़ाने में मदद करते हैं।

वजन रहता है कण्ट्रोल

गर्भावस्था के दौरान महिला का वजन बढ़ना आम बात होती है लेकिन यदि महिला का वजन जरुरत से ज्यादा बढ़ जाता है तो इसके कारण माँ और बच्चे दोनों को दिक्कत हो सकती है। इसीलिए प्रेगनेंसी के दौरान महिला को अपने वजन का भी खास ध्यान रखना चाहिए। ऐसे में महिला इस समस्या से बचे रहने के लिए अपने खाने में सरसों तेल का इस्तेमाल कर सकती है क्योंकि सरसों का तेल खाने से मेटाबोलिज्म सही रहता है जिससे महिला के वजन को नियंत्रित रहने में मदद मिलती है।

कोलेस्ट्रॉल कण्ट्रोल

सरसों का तेल खाने से शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कण्ट्रोल रहने में मदद मिलती है जिससे आपको स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। साथ ही इससे हदय को स्वस्थ रहने में भी मदद मिलती है। ऐसे में गर्भवती महिला को कोलेस्ट्रॉल सम्बन्धी समस्या से बचे रहने और हदय को स्वस्थ रखने के लिए सरसों के तेल का सेवन जरूर करना चाहिए।

ब्रेन के लिए है फायदेमंद

सरसों के तेल में मौजूद फैटी एसिड ब्रेन के विकास के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। ऐसे में गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर दिमागी विकास के लिए महिला को सरसों के तेल को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।

तो यह हैं कुछ बेहतरीन फायदे जो गर्भवती महिला को सरसों का तेल खाने से मिलते हैं। खाने के अलावा महिला सरसों तेल का इस्तेमाल बालों, स्किन, मालिश आदि के लिए भी कर सकती है। क्योंकि सरसों का तेल बालों और स्किन के लिए बहुत फायदेमंद होता है साथ ही सरसों के तेल से मालिश करने से शरीर को भी आराम मिलता है।

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स्पर्म की कमी होने के कारण

स्पर्म काउंट की समस्या एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में अधिकतर लोग नहीं जानते हैं इसीलिए तो यदि कभी कोई महिला कंसीव नहीं कर पाती है तो वो महिला का ही टेस्ट करवाते रहते हैं। जबकि महिला के गर्भधारण में पुरुष के शुक्राणु भी अहम होते हैं क्योंकि स्पर्म ही निषेचन की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। साथ ही आज जब लोग इससे धीरे धीरे परिचित होते जा रहे हैं तो बहुत से पुरुषों में यह समस्या देखने को मिल रही है। इस समस्या के होने का कोई एक कारण नहीं होता है बल्कि ऐसे बहुत से कारण होते हैं जिसकी वजह से पुरुषों में यह दिक्कत आ सकती है। तो आइये अब इस आर्टिकल में जानते हैं की पुरुषों में स्पर्म की कमी होने के क्या कारण होते हैं।

शुक्राणु की कमी के लक्षण

  • सम्बन्ध बनाने की इच्छा में कमी आना भी शुक्राणु की कमी का लक्षण होता है।
  • प्राइवेट पार्ट में सूजन या गाँठ महसूस होना।
  • चेहरे या शरीर पर बालों का कम महसूस होना।

स्पर्म काउंट की कमी के कारण

यदि कोई पुरुष स्पर्म की कमी से जूझ रहा होता है तो उसके कई कारण हो सकते हैं। और यह हर पुरुष में अलग अलग हो सकते हैं। तोआइये अब जानते हैं की स्पर्म काउंट में कमी के क्या कारण हो सकते हैं।

गलत लाइफस्टाइल

समय से खाना नहीं, समय से सोना नहीं, फिटनेस का ध्यान नहीं रखना, संतुलित आहार की जगह जंक फ़ूड खाना, आदि। यह सभी गलत लाइफस्टाइल का हिस्सा है, और जिन पुरुषों का लाइफस्टाइल ऐसा होता है उन्हें स्पर्म की कमी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

हार्मोनल असंतुलन

स्पर्म का उत्पादन सही हो इसके लिए भी शरीर में हॉर्मोन बनते हैं लेकिन यदि शरीर में हार्मोनल संतुलन सही नहीं होता है तो इसकी वजह से भी स्पर्म काउंट में कमी आ जाती है।

इन्फेक्शन

यदि पुरुष को एड्स, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज अन्य कोई समस्या हो जाती है तो इसकी वजह से भी स्पर्म काउंट पर बुरा असर पड़ता है।

शारीरिक समस्या

किसी आदमी की यदि कोई सर्जरी हुई है, कोई शारीरिक बीमारी जैसे की ट्यूमर, कैंसर आदि से पीड़ित है तो उसे भी स्पर्म काउंट जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

स्ट्रेस

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति परेशान है लेकिन कुछ लोग इस समस्या का शिकार भी हो जाते है जिसका बुरा असर उनके शारीरिक व् मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। ऐसे में जो पुरुष तनाव का शिकार हो जाते हैं तो उन्हें स्ट्रेस की वजह से भी स्पर्म काउंट में कमी जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

बुरी आदतें

जो पुरुष अल्कोहल, धूम्रपान, बीड़ी, तम्बाकू, गुटखा आदि का सेवन अधिक करते हैं तो इन चीजों का बुरा असर भी उनकी सेहत पर पड़ता है।। ऐसे में उन्हें शारीरिक बिमारियों के साथ शुक्राणु में कमी जैसी समस्या का सामना भी करना पड़ सकता है।

दवाइयों का अधिक सेवन

जो लोग नशीली दवाइयों या अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी दवाइयों का सेवन जरुरत से ज्यादा करते हैं उन्हें भी इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

साइकिल ज्यादा चलाना

जो पुरुष साइकिल अधिक चलाते हैं उनमे भी प्रजनन क्षमता से जुडी समस्या अधिक देखने को मिलती है।

गर्मी में काम करना

जो पुरुष ऐसी जगह पर कमा करते हैं जहां गर्मी अधिक होती है जैसे की भारी धातुएं बनने की जगह पर काम करना, सारा दिन लैपटॉप गोद में लेकर काम करना, आदि, तो ज्यादा गर्मी भरे माहौल में अधिक रहने के कारण भी शुक्राणु के उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है।

हॉट बाथ

सोना बाथ, गरम पानी में ज्यादा देर तक रहना आदि से स्नान नियमित रूप से करने पर भी पुरुषों को इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

वजन

जिन पुरुषों का वजन जरुरत से ज्यादा होता हैं उन्हें हार्मोनल असंतुलन की समस्या हो सकती है। और शरीर में हार्मोनल असंतुलन होने के कारण शुक्राणु में कमी की समस्या अधिक हो सकती है।

पुरुष स्पर्म काउंट की समस्या को दूर करने के लिए अपनाएँ यह टिप्स

  • लहसुन का सेवन करने से स्पर्म काउंट बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • अश्वगंधा एक आयुर्वेदिक औषधि होती है जिसका सेवन करने से शरीर से जुडी बहुत सी समस्याओं से निजात पाने में मदद मिलती है। वैसे ही अश्वगंधा का सेवन करने से शुक्राणु को बढ़ाने में भी मदद मिलती है।
  • मसूर दाल का सेवन करना इस समस्या को दूर करने का सबसे बेहतरीन उपाय है क्योंकि इसमें फोलिक एसिड भरपूर मात्रा में मौजूद होता है।
  • अंडा खाने से भी शुक्राणु की गुणवत्ता व् संख्या को बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • पुरुष यदि केला, स्ट्राबेरी, जामुन, क्रैनबेरी जैसे फल खाता है तो इन फलों का सेवन करने से भी बहुत फायदा मिलता है।
  • शतावरी का सेवन करने से भी इस समस्या को दूर करने में फायदा मिलता है।
  • पालक, ब्रोकली, मेथी व् अन्य हरी सब्जियां फोलिक एसिड, आयरन का बेहतरीन स्त्रोत होती है ऐसे में इनका सेवन करने से भी स्पर्म काउंट को बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • कद्दू के बीजों का सेवन करना भी फायदेमंद होता है।
  • बेहतर लाइफस्टाइल, संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम, भरपूर नींद, तनाव से बचे रहना, आदि का अच्छे से ध्यान रखने से भी इस समस्या को दूर करने में मदद मिलती है।
  • अखरोट का सेवन करना भी इस समस्या को दूर करने का सबसे बेहतरीन विकल्प है।
  • नशीली चीजें, कैफीन युक्त पदार्थों के सेवन से बचें।
  • ज्यादा टाइट इनर वियर नहीं पहनें।
  • जेब में मोबाइल नहीं रखें, जाघों पर लैपटॉप रखकर काम नहीं करें, आदि।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से पुरुषों में स्पर्म की कमी देखने को मिलती है। इसके अलावा इस समस्या से बचने के लिए पुरुष को किन किन टिप्स का ध्यान रखना चाहिए यह भी आपको बताया गया है यदि आप इन बातों का ध्यान रखते हैं तो आपको इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिलती है।

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