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गर्भवस्था में कमर दर्द दूर करेंगे यह 9 टिप्स

गर्भधारण करने के बाद से ही गर्भवती महिला को शारीरिक परेशानियां होनी शुरू हो जाती है। और इसका कारण बॉडी में तेजी से होने वाले हार्मोनल बदलाव हो सकते हैं। प्रेगनेंसी के दौरान उल्टी आना, मॉर्निंग सिकनेस, सिर दर्द, मुँह के स्वाद में बदलाव, पीठ व् कमर में दर्द आना जैसी समस्याएं गर्भवती महिला को हो सकती है। और यह समस्याएं प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही तक आते आते थोड़ी कम होने लगती है, लेकिन कमर में दर्द एक ऐसी समस्या है जो प्रेगनेंसी आगे बढ़ने के साथ और ज्यादा बढ़ सकती है। क्योंकि जैसे जैसे गर्भाशय का आकार बढ़ता है वैसे वैसे कमर की मांसपेशियों में खिंचाव होने के साथ कमर का दर्द भी बढ़ सकता है। कई बार तो यह दर्द इतना बढ़ जाता है की इसके कारण गर्भवती महिला को उठने, बैठने, लेटने आदि में भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। और यह दर्द तब और भी अधिक होता है यदि प्रेग्नेंसी के पहले से ही गर्भवती महिला को पीठ के दर्द की समस्या रहती है।

प्रेगनेंसी के दौरान कमर में दर्द होने के कारण

वजन: प्रेगनेंसी के दौरान लगातार वजन बढ़ता है, और बढे हुए वजन को रीढ़ की हड्डी सपोर्ट करती है, जिसके कारण कमर में दर्द की समस्या महिला को हो सकती है।

हार्मोनल बदलाव: प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला के शरीर में लगातार हार्मोनल बदलाव होते रहते हैं। और इन्ही हार्मोनल बदलाव के होने के कारण बॉडी में एक हॉर्मोन रिलीज़ होता है जिसे रिलैक्सिन हॉर्मोन कहते हैं। इस हॉर्मोन के बॉडी में रिलीज़ होने के कारण भी प्रेग्नेंट महिला को कमर में दर्द की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

तनाव: प्रेग्नेंट महिला के अधिक तनाव लेने के कारण भी कमर के साथ बॉडी में अन्य पार्ट्स में दर्द व् कमजोरी की समस्या हो सकती है।

मांसपेशियों में खिंचाव: गर्भाशय का आकार बढ़ने के कारण पेट व् कमर की मांसपेशियों में खिंचाव अधिक होने के कारण भी गर्भवती महिला को कमर में दर्द की समस्या हो सकती है।

पहले से हो परेशानी: जिन गर्भवती महिलाओं को प्रेगनेंसी के पहले से की कमर में दर्द की समस्या रहती है, उन महिलाओं को कमर में दर्द की परेशानी अधिक हो सकती है।

सही मुद्रा: गर्भवती महिला यदि सही पोजीशन में उठती, बैठी या लेटती नहीं है तो इसके कारण भी महिला को कमर में दर्द की परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

प्रेगनेंसी में कमर दर्द से बचने के उपाय

गर्भावस्था में कमर दर्द का होना आम बात है, लेकिन कई बार दर्द बहुत अधिक बढ़ जाता है जिसे सहन करना गर्भवती महिला के लिए मुश्किल हो सकता है। ऐसे में इस समस्या के समाधान के लिए गर्भवती महिला कुछ आसान तरीको का इस्तेमाल कर सकती है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी में कमर दर्द की समस्या से बचने के लिए महिला को क्या करना चाहिए।

प्रेगनेंसी पिलो

मार्किट में प्रेगनेंसी पिलो आसानी से मिल जाता है यदि आप प्रेगनेंसी के दौरान कमर दर्द की समस्या से परेशान हैं, तो इस पिलो का इस्तेमाल करके आसानी से इस परेशानी से निजात पा सकते हैं। सोते समय, बैठते समय इस पिलो का इस्तेमाल करें यह आपको कमर दर्द की समस्या से बचाव करने में मदद करेगा। साथ ही वजन बढ़ने के कारण गर्भवती महिला को सोने में होने वाली परेशानी से निजात दिलाने में भी यह आपकी मदद करता है।

मेटरनिटी बेल्ट

प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली कमर दर्द की समस्या से बचने के लिए आप मेटरनिटी बेल्ट का इस्तेमाल भी कर सकती है। इस बेल्ट को लगाने से मांसपेशियों में हो रहे खिंचाव से आराम मिलने के साथ बढे हुए वजन को सपोर्ट देने में भी मदद मिलता है जिससे प्रेग्नेंट महिला को कमर दर्द की समस्या से राहत पाने में मदद के साथ महिला को उठने बैठने में भी आसानी हो जाती है।

स्विमिंग

प्रेगनेंसी में कमर दर्द की समस्या से राहत पाने के लिए स्विमिंग एक बेहतरीन उपाय है, हफ्ते में एक या दो बार भी यदि आप स्विमिंग करती है तो प्रेगनेंसी के दौरान कमर दर्द के साथ अन्य बॉडी पार्ट्स में होने वाली दर्द की समस्या से भी आपको निजात पाने में मदद मिलती है।

मालिश

कमर दर्द से आराम के लिए मालिश एक आसान और असरदार विकल्प है। आप घर के किसी सदस्य से कमर की हल्के हाथों से मालिश करवा सकती है, और इसके लिए आप किसी भी तेल का इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन ध्यान रखें की मालिश करवाने के लिए आप पेट के बल न लेटें, बल्कि करवट लेकर लेटें और आराम से मालिश करवाएं आपको जरूर आराम मिलेगा, और मालिश करवाने के बाद आराम जरूर करें।

योगासन

प्रेगनेंसी के दौरान योगासन करने से भी कमर के दर्द से महिला को राहत पाने में मदद मिलती है। इसके लिए आप डॉक्टर या योगा की जानकारी वाले व्यक्ति से पूछ सकती है की कौन से योगा प्रेगनेंसी के दौरान बिल्कुल सेफ होते हैं। और जिनसे प्रेग्नेंट महिला को कमर में दर्द की परेशानी से राहत पाने में मदद मिलती है।

मैग्नीशियम

मैग्नीशियम का सेवन करने से गर्भवती महिला की मांसपेशियों को रिलैक्स रहने में मदद मिलती है, और मांसपेशियों का रिलैक्स होना प्रेग्नेंट महिला को कमर दर्द जैसी परेशानी से निजात दिलाने में मदद करता है। इसीलिए यदि आप गर्भवती हैं, और आपको कमर दर्द की अधिक परेशानी होती है तो ऐसे में आपको मैग्नीशियम युक्त आहार का भरपूर सेवन करना चाहिए। और इसके लिए आप हरी सब्जियां, केला, साबुत अनाज, कुछ किस्म की मछली, ब्राउन राइस आदि का सेवन कर सकती है। इसके अलावा मैग्नीशियम युक्त कौन से आहार प्रेगनेंसी के दौरान खाना सेफ होता है इसके लिए भी आप डॉक्टर से राय ले सकती है।

सही पोजीशन में रहें

प्रेग्नेंट महिला यदि चाहती है की प्रेगनेंसी के दौरान कमर दर्द की समस्या से महिला को आराम रहें और इसके कारण महिला को किसी भी तरह की परेशानी न हो। तो इसके लिए महिला को बहुत सी छोटी छोटी बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी होता है जैसे की महिला अपने उठने और बैठने का ध्यान रखें, कैसे और किस पोजीशन में बैठना है इस बात का ध्यान रखें, लेटने के लिए सही पोजीशन का ध्यान रखें, उठने बैठने लेटने में जल्दी न करें, ज्यादा देर एक ही पोजीशन में न बैठी रहे, बैठने के बाद कमर को तकिये से सहारा दें, ज्यादा देर एक ही जगह खड़ी न रहें, आदि। तो ऐसी कुछ छोटी छोटी बातों का ध्यान रखने से गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान कमर दर्द की समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।

तंग कपडे

आरामदायक कपड़ो का चुनाव ही गर्भवती महिला को करना चाहिए जिससे प्रेगनेंसी के दौरान महिला को रिलैक्स रहने में मदद मिल सके। क्योंकि यदि महिला बहुत टाइट या चुभने वाले कपडे पहनती है तो इसके कारण भी महिला को कमर दर्द की परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

एक्यूपंक्चर

प्रेगनेंसी के दौरान आप एक्यूपंक्चर थैरेपी करा सकती हैं लेकिन इसके लिए सही एक्यूपंक्चर के टीचर का चुनाव करना जरुरी होता है। इस उपाय को करने से भी प्रेग्नेंट महिला को कमर दर्द से राहत पाने में मदद मिलती है।

तो यह है कुछ आसान उपाय जिनका इस्तेमाल करने से प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली कमर में दर्द की समस्या से आसानी से निजात पाने में मदद मिलती है। तो यदि आप भी कमर में दर्द से प्रेगनेंसी के दौरान परेशान हैं तो आप भी ऊपर दिए गए टिप्स का इस्तेमाल करके इस समस्या से निजात पा सकती है।

कब महिलाओं को नोर्मल डिलीवरी नहीं होती है?

नोर्मल डिलीवरी कब नहीं होती है, प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने महिला उस पल का इंतज़ार करती है की कब उसकी नन्ही जान उसकी गोद में खेलेगी। और जैसे जैसे डिलीवरी का समय पास आता है वैसे वैसे महिला के मन में सवाल आता है की महिला की डिलीवरी नोर्मल होगी या ऑपरेशन करवाना पड़ेगा। लेकिन इस बारे में सोचने का कोई फायदा नहीं होता है क्योंकि डिलीवरी का समय पास आने पर ही यह पूरी तरह से कन्फर्म होता है। की महिला की डिलीवरी नोर्मल होगी या सिजेरियन।

प्रेगनेंसी के दौरान यदि महिला अपनी सेहत का अच्छे से ध्यान रखती है। तो इससे नोर्मल डिलीवरी के चांस बढ़ जाते हैं। लेकिन ऐसा करने पर भी कुछ केस ऐसे हो जाते हैं जिसमे महिला की सिजेरियन डिलीवरी ही करनी पड़ती है। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम कब महिलाओं को नोर्मल डिलीवरी नहीं होती है उस बारे में बताने जा रहे हैं।

बच्चेदानी का मुँह न खुलने पर

  • यदि डिलीवरी डेट आने पर या डिलीवरी डेट के बीत जाने पर भी महिला की बच्चेदानी का मुँह नहीं खुलता है।
  • तो ऐसे में केस में डॉक्टर को सिजेरियन डिलीवरी करके महिला का प्रसव करवाना पड़ता है।

नोर्मल डिलीवरी कब नहीं होती है ब्लड प्रैशर बढ़ने पर

  • यदि प्रेग्नेंट महिला का ब्लड प्रैशर बढ़ रहा है और डिलीवरी का समय पास आ गया है।
  • तो ऐसे में में भी डॉक्टर ऑपरेशन करके बच्चे का जन्म करवाते हैं।
  • क्योंकि महिला का ब्लड प्रैशर बढ़ने पर नोर्मल डिलीवरी करवाने से महिला की किडनी, लिवर के फेल होने के साथ दिमाग की नसों के फटने का खतरा भी बढ़ जाता है।

ब्लीडिंग

  • यदि महिला को बहुत ज्यादा ब्लीडिंग की समस्या हो जाती है।
  • तो ऐसे में भी डॉक्टर महिला को सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।
  • इसके अलावा यदि एमनियोटिक फ्लूड भी महिला के गर्भाशय में से पूरी तरह से निकल जाता है लेकिन महिला की डिलीवरी नहीं होती है।
  • तो ऐसे में केस में माँ के पेट में बच्चे को गर्भ में रिस्क हो सकता है इसीलिए डॉक्टर ऐसे में नोर्मल की जगह सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

नोर्मल डिलीवरी कब नहीं होती है महिला का कद छोटा होने पर

  • बहुत बार महिला का छोटा कद होने के कारण नोर्मल डिलीवरी की जगह डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दे सकते हैं।
  • क्योंकि महिला का कद छोटा होने के कारण कूल्हे की हड्डी भी छोटी होती है।
  • जिसके कारण नोर्मल डिलीवरी के दौरान दिक्कतें बढ़ सकती है।

शिशु से जुडी समस्या होने पर

कई बार गर्भ में शिशु से जुडी ऐसी बहुत सी दिक्कतें हो जाती है जिसके कारण ऑपरेशन की मदद से शिशु का जन्म करवाना पड़ता है। तो आइये जानते हैं की शिशु में कौन से दिक्कतें होने पर ओप्रशन करवाना पड़ता है।

बच्चे की दिल की धड़कन:

यदि गर्भ में शिशु के दिल की धड़कन कम होने लगती है। तो ऐसे केस में महिला की सिजेरियन डिलीवरी करवानी पड़ती है।

गर्भनाल:

शिशु गर्भ में मूव करता रहता है। ऐसे में कई बार शिशु घूमते घूमते गर्भनाल को गले में लपेट लेता है। और इसके कारण नोर्मल डिलीवरी करवाने से शिशु को रिस्क हो सकता है। इसीलिए डॉक्टर द्वारा महिला को सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दी जाती है।

बच्चे की पोजीशन:

यदि डिलीवरी का समय पास आने पर भी शिशु अपनी सही पोजीशन में नहीं आता है। यानी की शिशु का सिर नीचे और पैर ऊपर नहीं होते हैं। बल्कि शिशु के पैर नीचे और सिर ऊपर होते हैं या अन्य ऐसी किसी पोजीशन में होता है जिसमे नोर्मल डिलीवरी नहीं हो पाती है। तो ऐसे में भी डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दे सकते हैं।

शिशु की मूवमेंट:

यदि किसी कारण शिशु तक ब्लड या ऑक्सीजन का प्रवाह अच्छे से नहीं हो पाता है, और शिशु की मूवमेंट में कमी आने लगती है। तो ऐसे में भी शिशु को गर्भ में किसी तरह का रिस्क न हो इससे बचने के लिए डॉक्टर जल्द से जल्द ऑपरेशन की सलाह देते हैं।

शिशु का मल मूत्र:

यदि शिशु गर्भ में ही मल मूत्र कर देता हैं, तो ऐसे केस में शिशु को गर्भ में रिस्क हो सकता है। जिसके कारण डॉक्टर महिला की सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से महिला की सिजेरियन डिलीवरी ही होती है। तो ऐसे में डिलीवरी को लेकर तनाव बढ़ाने की बजाय प्रेगनेंसी के दौरान महिला को अपने स्वास्थ्य और अपने पेट में पल रहे बच्चे के विकास को लेकर ध्यान रखना चाहिए। ताकि महिला की प्रेगनेंसी व् डिलीवरी के दौरान आने वाली परेशानियों को कम करने में मदद मिल सके।

प्रेगनेंसी में पेट जरुरत से ज्यादा छोटा हो तो क्या करें

यदि कोई गर्भवती महिला किसी को नहीं बताती है की वो माँ बनने वाली है और उसका पेट निकला हुआ होता है तो लोग उससे अपने आप ही पूछने लगते हैं और बधाइयां देने लगते हैं। साथ ही प्रेगनेंसी के दौरान महिला के पेट को देखकर बहुत सी बातों का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। जैसे की गर्भ में बच्चा बेटा है या बेटी, बच्चे का विकास आदि।

लेकिन कुछ केस में महिला के पेट का आकार ज्यादा नहीं बढ़ता है तो महिला इसे लेकर परेशान हो सकती है। ऐसे में महिला के पेट का कम बढ़ना परेशानी का विषय हो भी सकता है और नहीं भी, तो आइये अब जानते हैं की प्रेग्नेंट महिला के पेट के छोटे होने के क्या कारण होते हैं।

शिशु के वजन में कमी

प्रेगनेंसी के दौरान महिला का अल्ट्रासॉउन्ड होता है और उस अल्ट्रासॉउन्ड में यदि शिशु के वजन में कमी आई है। तो इस कारण महिला को परेशान होने की जरुरत होती है। क्योंकि शिशु का विकास अच्छे से न होने के कारण महिला के पेट का आकार कम होता है। और ऐसे में महिला को अपने खान पान का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए और बुरी आदतों को छोड़ देना चाहिए ताकि गर्भ में शिशु का विकास अच्छे से हो।

एमनियोटिक द्रव की मात्रा

गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड में ही बच्चा नौ महीने तक होता है। इसीलिए गर्भ में शिशु को कोई दिक्कत न हो इसके लिए महिला को तरल पदार्थों का सेवन भरपूर मात्रा में करने की सलाह दी जाती है ताकि गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी न हो। लेकिन यदि गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी होती है तो इस कारण भी महिला के पेट का आकार कम हो सकता है।

लम्बाई

जिन महिलाओं की लम्बाई ज्यादा होती है उन महिलाओं का पेट भी कम दिखाई देता है, ऐसे में आप भी लम्बी है और आपका ज्यादा पेट नज़र नहीं आ रहा है तो घबराएं नहीं। क्योंकि लम्बाई ज्यादा होने के कारण शिशु को गर्भ में ज्यादा जगह मिल जाती है जिस वजह से महिला का पेट कम दिखाई देता है।

उम्र

ऐसा भी माना जाता है है की अठारह की उम्र से पहले और पेंतीस की उम्र के बाद जो महिलाएं गर्भधारण करती हैं उन्हें भी यह परेशानी हो सकती है। ऐसे में घबराने की बजाय आपको प्रेगनेंसी के दौरान आपने अच्छे से ध्यान रखना चाहिए।

प्रेग्नेंट महिला का बेबी बम्प छोटा होने पर क्या करें

शिशु के वजन की कमी के कारण यदि आपके पेट का आकार छोटा है तो आपको अपने खान पान का ध्यान रखना चाहिए, और प्रेगनेंसी में हर वो काम करना चाहिए जिससे गर्भ में बच्चे का वजन बढ़ें, साथ ही यदि एमनियोटिक फ्लूड की कमी है तो तरल पदार्थों का भरपूर सेवन करना चाहिए। लेकिन यदि इसका कारण आपकी लम्बाई, उम्र आदि है तो आपको इसके लेकर घबराने की बिल्कुल भी जरुरत नहीं है।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से महिला का पेट प्रेगनेंसी के दौरान छोटा दिखाई दे सकता है। ऐसे में यदि पेट छोटा दिखने का कारण शिशु के विकास में कमी है तो आपको इसका समाधान करना चाहिए।

प्रेग्नेंट महिला को होली खेलने से यह नुकसान हो सकते हैं

प्रेगनेंसी में होली खेलने से हो सकते हैं यह नुकसान, गर्भावस्था किसी भी महिला के लिए बहुत नाजुक समय होता है। इसीलिए माँ और उसके बच्चे को किसी भी तरह की दिक्कत न हो इसके लिए हर कोई प्रेगनेंसी में आपको बहुत ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दे सकता है। खासकर त्यौहारों के मौसम में महिला को ज्यादा सावधानी बरतने की जरुरत होती है।

जैसे की अब होली आने ही वाली है, और प्रेग्नेंट महिला को हर कोई होली न खेलने की सलाह दे सकता है। क्योंकि होली खेलने से गर्भवती महिला को बहुत सी परेशानियां हो सकती है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की होली खेलने के कारण गर्भवती महिला को क्या-क्या परेशानियां हो सकती है।

प्रेगनेंसी में होली खेलने से रंगों के कारण हो सकती है परेशानी

  • आज कल होली के रंगों को बनाने के लिए तरह तरह के केमिकल्स कस इस्तेमाल किया जाता है।
  • और केमिकल्स के साथ कई बार इनमे कांच के छोटे छोटे टुकड़े भी मौजूद होते हैं।
  • ऐसे में यदि प्रेग्नेंट महिला केमिकल्स के रंगो के संपर्क में आती है।
  • तो यह केमिकल्स गर्भवती महिला के साथ शिशु के लिए भी नुकसानदायक हो सकते हैं।
  • क्योंकि इनके कारण महिला को इन्फेक्शन का खतरा बढ़ सकता है और इन्फेक्शन का प्रभाव शिशु पर भी पड़ सकता है।
  • जिसके कारण शिशु के वजन में कमी, समय पूर्व प्रसव, गर्भपात जैसी दिक्कतें हो सकती है।

फिसलने का रहता है डर

  • होली के दिन लोग पानी का भी बहुत इस्तेमाल करते हैं।
  • क्योंकि पानी से होली खेलने का एक अलग ही मज़ा होता है।
  • लेकिन यदि आप प्रेग्नेंट हैं तो आपको जहां पानी का इस्तेमाल हो रहा हो वहां से दूर रहना चाहिए।
  • क्योंकि इसके कारण आपके फिसलने या गिरने के चांस हो सकते हैं।
  • और अचानक से गर्भवती महिला का फिसल जाना गर्भवती महिला के साथ शिशु के भी नुकसानदायक हो सकता है।

होली के खान पान के कारण हो सकता है नुकसान

  • होली के दिन भांग का सेवन करने के साथ तले भुने खाने का भी आयोजन किया जाता है।
  • लेकिन गर्भवती महिला को न तो भांग का सेवन करना चाहिए और न ही ज्यादा तले भुने आहार का सेवन करना चाहिए।
  • क्योंकि भांग नशीली होती है और गर्भवती महिला यदि इसका सेवन करती है तो इससे ब्लड प्रैशर व् हदय की गति बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है।
  • जिसके कारण गर्भवती महिला को दिक्कत हो सकती है।
  • साथ ही तले भुने आहार का सेवन अधिक करने पर महिला को पेट सम्बन्धी परेशानी होने का खतरा होता है।
  • ऐसे में होली के दिन महिला को अपने खान पान का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए ताकि महिला को कोई दिक्कत न हो।

प्रेगनेंसी में होली खेलने से हो भीड़भाड़ में हो सकती है दिक्कत

  • अब होली कोई अकेले तो नहीं नहीं खेलता है बल्कि हर कोई अपने दोस्त, फैमिली सबके साथ मिलकर खेलता है।
  • ऐसे में जहां भीड़ अधिक हो गर्भवती महिला को वहां भी नहीं जाना चाहिए।
  • क्योंकि भीड़भाड़ में जाने के कारण धक्का आदि लगने का डर लगा रहता है।
  • जिसके कारण प्रेग्नेंट महिला को दिक्कत हो सकती है।

तो यह हैं कुछ नुकसान जो प्रेग्नेंट महिला को होली के दौरान हो सकते हैं। ऐसे में हम तो यही कहेंगे की एक साल होली नहीं खेलने से कुछ नहीं होता है। बल्कि आपको इस दौरान अपना और भी ज्यादा ध्यान देना चाहिए ताकि आपको और आपके बच्चे को किसी भी तरह की दिक्कत न हो।

प्रेगनेंसी के तीसरे, छठे व् नौवें महीने में यह सावधानियां जरूर बरतें

प्रेगनेंसी में सावधानियां, प्रेगनेंसी महिलाओं के लिए एक ऐसी शारीरिक अवस्था हैं। जहां महिला को अपनी दुगुनी केयर करने की सलाह दी जाती है। ताकि प्रेगनेंसी के दौरान महिला स्वस्थ रहें और एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे सके। गर्भवती महिला को अपनी बेहतर देखभाल करने की सलाह इसीलिए दी जाती है। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान महिला के शरीर में बहुत से बदलाव होते हैं। साथ ही बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण महिला को शारीरिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ सकता है।

और इन सभी दिक्कतों के कारण महिला की सेहत और शिशु के विकास पर कोई बुरा असर न पड़े। इसीलिए महिला को अपनी दुगुनी केयर की सलाह दी जाती है। वैसे तो प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने ही महिला के लिए नाजुक समय होता है। लेकिन प्रेगनेंसी के तीसरे, छठे व् नौवें महीने में महिला को ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेग्नेंट महिला को इन महीनों में किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए।

प्रेगनेंसी का तीसरा महीना

गर्भावस्था का तीसरा महीना महिला के लिए बहुत अहम होता है। क्योंकि इस दौरान महिला के शरीर में तेजी से हार्मोनल बदलाव हो रहें होते हैं। जिसके कारण महिला को बहुत से शारीरिक बदलाव व् शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन साथ ही इस समय शिशु का विकास भी शुरू हो चूका होता है। ऐसे में महिला द्वारा बरती गई थोड़ी सी लापरवाही शिशु व् महिला दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकती है। साथ ही इस दौरान गर्भपात होने का खतरा भी अधिक होता है। ऐसे में महिला को सावधानी बरतने के साथ अपना ख्याल अच्छे से रखना जरुरी होता है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में कौन कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए।

गर्भावस्था के तीसरे महीने में बरतें यह सावधानियां

  • डॉक्टर से जांच जरूर करवाएं।
  • जंक फ़ूड, डिब्बाबंद आहार, कच्चे अंडे, नॉन वेज, सी फ़ूड, पपीता, अनानास, कटहल, आदि का सेवन करने से बचना चाहिए।
  • ज्यादा गर्म तासीर की चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • पोषक तत्वों से भरपूर आहार का सेवन करना चाहिए, गलती से भी डाइट नहीं करनी चाहिए।
  • भरपूर आराम करें।
  • व्यायाम नहीं करना चाहिए।
  • यात्रा करने से बचें।
  • भागादौड़ी, भारी सामान उठाना व् सरकाना, पैरों के बाल बैठकर काम करना, झुककर काम करना, आदि से बचना चाहिए।
  • तनाव नहीं लेना चाहिए खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।
  • कैफीन व् अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए व् उस जगह पर भी नहीं जाना चाहिए जहां कोई नशा कर रहा हो।
  • किसी तरह की दवाई का डॉक्टर से बिना पूछे सेवन नहीं करना चाहिए।
  • यदि कोई शारीरिक समस्या है तो तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।
  • सम्बन्ध बनाने से बचना चाहिए।

गर्भावस्था का छठा महीना

प्रेगनेंसी के तीसरे, छठे व् नौवें महीने में बरतें  यह सावधानियां
प्रेगनेंसी के तीसरे, छठे व् नौवें महीने में बरतें यह सावधानियां

प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही का आखिरी महीना भी बहुत अहम होता है। क्योंकि इस समय महिला का वजन भी तेजी से बढ़ रहा होता है। और पेट के बाहर निकलने के कारण महिला को थोड़ी बहुत परेशानी का अनुभव भी हो सकता है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें की इस महीने शिशु के अंगों की आकृतियां बन चुकी होती है। बस अब उनका विकास तेजी से हो रहा होता है। ऐसे में शिशु के विकास में किसी भी तरह की दिक्कत न हो और आपको समय पूर्व प्रसव जैसे खतरे से बचें रहने में मदद मिल सके। इसके लिए अपना बेहतर तरीके से ध्यान रखें व् कुछ सावधानियां जरूर बरतें।

गर्भवती महिला प्रेगनेंसी के छठे महीने में बरतें यह सावधानियां

  • तनाव न लें।
  • उठने, बैठने, लेटने की मुद्रा का ध्यान रखें।
  • हल्का फुल्का व्यायाम जरूर करें।
  • तरल पदार्थों को भरपूर मात्रा में लें।
  • आहार में अधिक से अधिक पोषक तत्वों को शामिल करें जैसे की हरी सब्ज़ी, अंडे, नॉन वेज, साबुत अनाज, फलों आदि का भरपूर सेवन करें।
  • पेट के बल किसी भी काम को न करें, झुककर कोई काम न करें।
  • सीढ़ियां न चढ़े।
  • भीड़भाड़, शोर व् प्रदूषण वाली जगह पर न जाएँ।
  • किसी भी शारीरिक दिक्कत को अनदेखा न करते हुए तुरंत डॉक्टर से राय लें।
  • अकेले न रहें।
  • केमिकल व् अन्य नशीले पदार्थों के संपर्क में आने बचें।
  • घर में पालतू जानवर का काम न करें।

प्रेगनेंसी का नौवां महीना

यह गर्भावस्था का वो महीना होता है जब गर्भवती महिला का इंतज़ार लगभग खत्म होने वाला होता है। क्योंकि अब तक जिस शिशु के आने के महिला सपने देख रही होती है। अब वो बहुत जल्दी महिला की गोद में आने वाला होता है। लेकिन ख़ुशी के साथ इस दौरान अपनी सेहत को भी महिला को अनदेखा नहीं करना चाहिए। क्योंकि वजन बढ़ने के कारण व् डिलीवरी का समय पास आने पर भी महिला की शारीरिक परेशानियां बढ़ सकती है। और महिला द्वारा बरती गई लापरवाही महिला के साथ शिशु को भी रिस्क में डाल सकती है। ऐसे में महिला व् शिशु दोनों को किसी भी तरह की दिक्कत न हो। इससे बचने के लिए नौवें महीने में महिला को बहुत सी सावधानियां बरतनी चाहिए।

प्रेगनेंसी के नौवें महीने में बरतें यह सावधानियां

  • गर्भावस्था के नौवें महीने में तनाव बिल्कुल नहीं लेना चाहिए क्यों यह आपकी मुश्किलों को बहुत अधिक बढ़ा सकता है।
  • महिला को अपने उठने, बैठने, लेटने, खड़े होने, अपने खान पान सभी चीजों का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए।
  • गर्भ में शिशु की हलचल का ध्यान रखना चाहिए, और कभी आपको ऐसा महसूस हो की शिशु की हलचल नहीं हो रही है। तो डॉक्टर से तुरंत मिलना चाहिए।
  • डिलीवरी को लेकर ज्यादा सोचना नहीं चाहिए, क्योंकि डिलीवरी आपके अनुसार नहीं होगी।
  • नोर्मल प्रसव के लिए शरीर पर ज्यादा जोर नहीं डालना चाहिए।
  • प्रसव का कोई भी लक्षण बॉडी में महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
  • पेट के बल किसी भी काम को नहीं करना चाहिए।
  • नशे, केमिकल, भीड़भाड़, शोर, प्रदूषण, जानवरों के काम आदि से बचाव रखना चाहिए।
  • डिलीवरी बैग तैयार कर लें, ताकि हॉस्पिटल जाने का समय आने पर आपको किसी तरह की दिक़्कत न हो।
  • इस दौरान बिल्कुल भी अकेली न रहें, किसी का किसी को अपने साथ हमेशा रखें।
  • डॉक्टर के संपर्क में रहें।
  • यदि डिलीवरी के लिए दी गई तिथि के बाद भी आपको लेबर पेन नहीं शुरू होता है तो डॉक्टर से बात करें।

तो यह है कुछ सावधानियां जो गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के तीसरे, छठे व् नौवें महीने में बरतनी चाहिए। ताकि गर्भवती महिला और शिशु दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

प्रेगनेंसी में पेट दर्द की समस्या

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गर्भावस्था के दौरान महिला को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव, वजन बढ़ने के कारण आदि के कारण महिला को परेशानी का अनुभव होता है। इसीलिए महिला को अपने स्वास्थ्य का बेहतर तरीके से ध्यान रखने की सलाह दी जाती है ताकि कोई परेशानी न हो, और पूरी ;प्रेगनेंसी में गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके। ऐसे में प्रेगनेंसी के दौरान पेट दर्द होना, पेट में ऐंठन होना आम बात होती है। और इसका कोई एक कारण नहीं होता है बल्कि प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले पेट दर्द के कई कारण हो सकते हैं। तो आइये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी में पेट दर्द के क्या कारण होते हैं।

कब्ज़ या गैस

गर्भवती महिला प्रेगनेंसी के दौरान कब्ज़ व् गैस की समस्या से परेशान हो सकती है। और यह काफी सामान्य भी होता है, क्योंकि यूटेरस के आस पास आंत पर दबाव पड़ता है। इस परेशानी से निजात पाने के लिए महिला को भरपूर मात्रा में पानी पीना चाहिए और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चाहिए।

इम्प्लांटेशन

प्रेगनेंसी के पहले शुरुआत में जब एम्ब्रयो यूटेरस की दीवार से सट जाता है। तो इसे इम्प्लांटेशन कहा जाता है, इसी से गर्भावस्था की शुरुआत होती है। इस दौरान भी महिला को पेट में दर्द की समस्या हो सकती है साथ ही कई महिलाओं को इस दौरान स्पॉटिंग यानी खून के हल्के दाग भी लग जाते हैं।

गर्भपात के कारण

गर्भावस्था के शुरूआती समय में महिला द्वारा की गई थोड़ी सी लापरवाही गर्भपात का कारण बन सकती है, ऐसे में शुरुआत में तेजी से पेट में दर्द होना गर्भपात का लक्षण हो सकता है यदि आपको ऐसा महसूस हो और ब्लीडिंग भी होने लगे तो डॉक्टर से मिलें।

शिशु का आकार बढ़ने के कारण

गर्भ में शिशु का आकार भी बढ़ता है, और जैसे जैसे आकार बढ़ता है वैसे वैसे उसके आस पास की मांपेशियों में खिंचाव भी होता है जिसके कारण भी महिला को पेट में दर्द की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

लेबर पेन

जब शिशु गर्भ से बाहर आने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है। तो ऐसे में आपको लेबर पेन के कारण भी पेट में दर्द हो सकता है, यह दर्द असहनीय हो सकता है साथ ही इस दौरान प्राइवेट पार्ट से पानी निकलना भी आम बात होती है। इस तरह दर्द होने पर आपको इसे बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। और जल्द से जल्द डॉक्टर से मिलना चाहिए।

एक्टोपिक प्रेगनेंसी के कारण

कुछ महिलाओं में यह देखने को मिलता है की निषेचन होने के बाद अंडा गर्भाशय तक नहीं पहुँचता है और फैलोपियन ट्यूब या गर्भाशय के बाहर ही शिशु का विकास होना शुरू हो जाता है। जिसके कारण महिला को पेट में तेजी से दर्द उठता है इसके लिए आपको एक बार डॉक्टर से राय लेनी चाहिए।

यूरिन इन्फेक्शन होने के कारण

यदि प्रेगनेंसी के दौरान महिला को कभी यूरिन इन्फेक्शन हो जाता है, तो इसके कारण भी महिला को पेशाब में जलन महसूस होने के साथ पेट में दर्द भी हो सकता है। यूरिन से जुडी ऐसी समस्या का इलाज जल्दी से जल्दी करना चाहिए।

पेट दर्द होने पर डॉक्टर से कब मिलना चाहिए

प्रेगनेंसी के समय पेट में हल्का दर्द रहना सामान्य बात होती है। लेकिन यदि आपको बहुत ज्यादा दर्द हो रहा हो, बुखार हो, कमजोरी अधिक लग रही हो, ब्लीडिंग आने लग जाए, तो इन लक्षणों को बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ न करते हुए जल्दी से जल्दी डॉक्टर से मिलना चाहिए।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से आपको प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द की समस्या का सामना करना पड़ सकता है, शुरुआत के हल्का फुल्का दर्द गैस आदि के कारण हो सकता है इसीलिए घबराना नहीं चाहिए।

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गर्भावस्था में पेट दर्द के क्या कारण होते हैं?

अगर गर्भवस्था में इन चीजों को खाएंगे तो गैस बनेगी

प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला कब्ज़, एसिडिटी जैसी समस्या से अधिक परेशान रह सकती है। इनका कारण बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव, महिला का बढ़ता वजन होने के साथ प्रेग्नेंट महिला का खान पान भी हो सकता है। क्योंकि यदि महिला खाने को अच्छे से चबा कर नहीं खाती है, ठंडा व् बासी भोजन खाती है, सही समय पर आहार नहीं लेती है, या उन चीजों का सेवन अधिक मात्रा में करती है जिनके सेवन से पेट में गैस बनती हैं उन चीजों के सेवन से दूरी रखनी चाहिए। क्योंकि यदि महिला को गैस की समस्या अधिक रहती है तो इसके कारण सीने में जलन, पेट में दर्द, खट्टी डकार जैसी परेशानी का सामना भी महिला को करना पड़ सकता है।

प्रेगनेंसी में किन चीजों को खाने से गैस बनती है

प्रेगनेंसी के दौरान कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका सेवन यदि गर्भवती महिला करती है तो उसके कारण प्रेग्नेंट महिला को गैस बनने की समस्या हो सकती है। क्योंकि बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण पाचन क्रिया धीमी पड़ जाती है जिसके कारण खाने को हज़म करने में परेशानी हो सकती है और ऐसे में महिला को गैस बनने की समस्या हो सकती है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी में किन चीजों को खाने से गैस बनती है।

जंक फ़ूड

यदि गर्भवती महिला बाहर का खाना, ज्यादा मसाले व् तेलीय आहार का सेवन, पिज़्ज़ा, बर्गर आदि का सेवन अधिक मात्रा में करती है। तो ऐसे आहार को गर्भवती महिला को पचाने में दिक्कत हो सकती है, जिसके कारण पाचन क्रिया धीमी पड़ सकती है। और इसके कारण महिला को गैस, सीने में जलन जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

ओट्स

गर्भावस्था के दौरान ओट्स का सेवन गर्भवती महिला कर सकती है लेकिन यदि ज्यादा मात्रा में गर्भवती महिला ओट्स का सेवन करती है। तो इसके कारण भी गर्भवती महिला को पेट में गैस जैसी परेशानी हो सकती है।

पास्ता, ब्रेड व् अन्य चीजें

गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान मैदे से बनी चीजें जैसे की पास्ता, ब्रेड, आदि का सेवन करने से भी पेट में गैस जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि हार्मोनल बदलाव बॉडी में होने के कारण महिला की पाचन क्रिया धीमी पड़ सकती है। और मैदे को पचाने में महिला को परेशानी हो सकती है जिसके कारण पेट में गैस जैसी परेशानी हो सकती है।

दालें

दालों का सेवन प्रेगनेंसी के दौरान करने से गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों को भरपूर मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं। लेकिन कुछ दालें ऐसी भी है जिनका सेवन गर्भवती महिला को अधिक नहीं करना चाहिए जैसे की राजमा, छोले, सुखी मटर, चने की दाल, काली दाल, आदि। क्योंकि इनमे रेफिनोज़ नामक तत्व होता है जो की एक काम्प्लेक्स शुगर होता है जिसे पचाने में महिला को दिक्कत हो सकती है, और अच्छे से न पचने के कारण महिला को पेट में गैस की परेशानी हो सकती है।

सब्जियां

कच्चा लहसुन, आलू, फूल गोभी, बंदगोभी, मूली, कच्चा प्याज, आदि यह कुछ सब्जियां हैं जिनका सेवन गर्भवती महिला अधिक मात्रा में करती है। तो इसके कारण भी पेट में गैस जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। खासकर रात के आहार में इन्हे लेने के कारण अधिक परेशानी हो सकती है।

सोडा व् कोल्ड ड्रिंक

सोडा व् कोल्ड ड्रिंक के स्वाद को मीठा बनाने के लिए फ्रुक्टोज़ का इस्तेमाल किया जाता है। जिसे पचाने में प्रेग्नेंट महिला को दिक्कत हो सकती है। और अच्छे से न पचने के कारण महिला को गैस की परेशानी हो सकती है।

फल

फलों का सेवन गर्भवती महिला को भरपूर मात्रा में करने की सलाह दी जाती है क्योंकि इनमे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे फल भी हैं जिनका सेवन गर्भवती महिला को नहीं करना चाहिए जैसे सेब, तरबूज, आदि इनका सेवन गर्भवती महिला को अधिक नहीं करना चाहिए क्योंकि इनके अधिक सेवन से भी गर्भवती महिला को गैस जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

बासी व् ठंडा आहार

बासी व् ठंडा खाना खाने के कारण भी गर्भवती महिला को खाने को पचाने में दिक्कत हो सकती है, जिसके कारण पेट में एसिडिटी, जलन जैसी परेशानी हो सकती है। इसीलिए प्रेगनेंसी के दौरान पेट में गैस की समस्या से बचने के लिए महिला को ताजे व् संतुलित आहार का सेवन करना चाहिए।

प्रेगनेंसी में गैस होने के अन्य कारण

  • खाने में लापरवाही करना।
  • समय से अपने आहार का सेवन न करना।
  • खाने को अच्छे से चबाकर न खाना।
  • खाना खाने के बाद तुरंत सो जाना।

तो यह हैं कुछ खाद्य पदार्थ जिनका सेवन करने से गर्भवती महिला को गैस की समस्या हो सकती है। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को इन चीजों का सेवन करते समय ध्यान रखना चाहिए। साथ ही पेट में गैस बनने वाली समस्या से बचने के लिए महिला को संतुलित व् पौष्टिक आहार खाने के साथ समय पर अपने आहार का सेवन करना चाहिए।

आम के पत्ते द्वार पर लगाने से ये फायदे होते है

Mango Leaves Benefits

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भारतीय संस्कृति और हिन्दू समाज में आम के वृक्ष को पूजनीय माना जाता है क्योंकि इसके फल के साथ-साथ इसकी लकड़ियां तब सभी बेहद लाभकारी एवं गुणकारी होती है। पूजा पाठ में अनुष्ठान आदि में जब कलश स्थापना की जाती है तब जल से भरे कलश के ऊपर आम की पत्तियां भी रही जाती है। घर में किसी भी मंगल कार्य के होने पर आम की पत्तियों को पतले धागों में लटककर घर के मुख्य द्वार पर बांधा जाता है।

इसके अतिरिक्त मंडप सजाने के लिए भी आम की पत्तियों का प्रयोग किया जाता है। तोरण, बांस के खम्बे आदि में भी आम की पत्तियां लगाने की परम्परा बहुत पुरानी है। हिन्दू धर्म में आम के पेड़ की लकड़ियां का प्रयोग समिधा के रूप में भी किया जाता है।

माना जाता है इस लकड़ी को घी के साथ जलाने पर घर में सकात्मक ऊर्जा का वास होता है जिससे घर में सुख और समृद्धि बढ़ती है। इन्हे लटकने से सभी मंगल कार्यों को पूर्ण करने में कोई मुश्किल नहीं आती। सभी कार्य निर्विघ्न पुरे हो जाते है। इसलिए आज हम आपको आम के पत्तों को दरवाजें पर लगाने के फायदे और उनका प्रयोग करने के बारे में बता रहे है। जिसकी मदद से आप भी इस दैविक पेड़ की देविक शक्तियों को जान पाएंगे।

क्यों लगाएं जाते है मुख्य द्वार पर आम के पत्ते ?

वृक्षों का महत्व :

केवल हमारे देश में ही अपितु बाहर भी वृक्षों को बहुत अधिक महत्ता दी जाती है, धर्म चाहे कोई भी हों लेकिन विभिन्न रिवाजों में प्रकृति को एक खूबसूरत स्वरुप देने वाले वृक्षों की सभी जगह अहम् भूमिका होती है। वैसे भी हिन्दू धर्म में वृक्षों का काफी सम्मान किया जाता है उन्हें पूजा जाता है। और उन्हें अन्न देवता भी माना जाता है।

हिन्दू मान्यताएं :आम के पत्ते द्वार पर लगाने से

हिन्दू धर्म में बहुत से विशेष वृक्षों के फलों और पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इस बात से भी आप सभी अच्छी तरफ वाकिफ है की हिन्दू मान्यता में तुलसी के पौदे को बहुत अधिक पवित्र माना जाता है और इसे पौधा न कहकर माँ तुलसी के नाम से पुकारा जाता है। इसी प्रकार पीपल, बरगद, आम के वृक्ष अपना खास महत्व रखते है।

आम का वृक्ष :

इसके अतिरिक्त आम के वृक्ष को हिन्दू मान्यता में बहुत खास माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पूर्व घर के मुख्य द्वार पर आम के पेड़ के पत्तों को बंदनवार के रूप में लगाया जाता है।

कारण :

क्योंकि भारत में आम के पेड़ काफी लोकप्रिय होते है, और इनसे मिलने वाला फल हर भारतीय का पसंदीदा फल है। इसके अतिरिक्त भारत में आम को फलों का राजा भी माना गया है शायद इसीलिए इसका प्रयोग प्रत्येक शुभ कार्य में किया जाता है।

इस्तेमाल का कारण :

केवल घर का द्वार ही नहीं अपितु कलश पूजन में भी कलश पर आम के वृक्ष की पत्तियों को लगाया जाता है। हिन्दू मान्यतानुसार, शादी के दौरान मंडप को भी आम की पत्तियों से सजाया जाता है।

मांगलिक कार्य :आम के पत्ते द्वार पर लगाने से

नवजात बच्चे के पलने को भी आम के पेड़ के पत्तों से सजाया जाता है, इसके अतिरिक्त प्रत्येकधार्मिक कर्म कंध और मांगलिक कार्यों में आम के पत्तो का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रवेश द्वार पर महत्व :

माना जाता है मुख्य द्वार पर आम के पत्तों को लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है साथ ही घर में आने वाली वायु भी पवित्र हो जाती है। ऐसी वायु घर में सुख और समृद्धि लाती है और ऐसे घर में कलश कभी नहीं होती।

आम के पत्तो के लाभ :-

=> हिन्दू धर्म में पिछली कई सदियों से आम के वृक्ष को पूजनीय माना जाता आ रहा है। इसीलिए कोई भी मंगलकार्य हो उनमे आम के पत्ते का प्रयोग सर्वप्रथम किया जाता है।

=> हिन्दू धर्म की संस्कृति में आम के पेड़ की लकड़ियों का प्रयोग समिधा के रूप में किया जाता आ रहा है। माना जाता है आम की लकड़ी, घी, हवन सामग्री, आदि को साथ मिलाकर हवन करने से वातावरण में सकारात्मकता बढ़ती है और नकारत्मक ऊर्जा दूर होती है।

=> घर के मुख्य द्वार पर आम की पत्तियां लगाने से घर में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के साथ सकारात्मक ऊर्जा भी घर में आती है। जिससे घर में कलेश नहीं होता और सुख समृद्धि बढ़ती है।

=> आम के पत्तों का तोरण मुख्य द्वार या द्वार पर लगाने से सभी मांगलिक व् शुभ कार्य निर्विघ्न पुरे हो जाते है। बुरी शक्तियां एवं नकारात्मक ऊर्जा भी शुभ कार्य में बाधा नहीं डाल पाती। शास्त्रों में भी दरवाजें पर आम के पत्तों को लटकाना अत्यंत शुभ माना गया है।

=> धार्मिक मान्यतानुसार आम हनुमान जी का प्रिय फल है इसीलिए जहां आम और आम के पत्ते होते है वहां हनुमान जी की विशेष कृपा बनी रहती है।

प्रेग्नेंट महिला दिवाली पर ऐसे रखें अपना ध्यान

दिवाली का त्यौहार बस अब आने ही वाला है, ऐसे में यदि आप गर्भवती हैं तो दिवाली आने की ख़ुशी के जश्न मनाने के चक्कर में अपनी सेहत के प्रति बिल्कुल भी लापरवाही न करें। क्योंकि यदि प्रेग्नेंट महिला किसी तरह की लापरवाही करती है तो इसका असर केवल महिला पर नहीं बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु पर भी पड़ता है। और कई बार यह ज्यादा नुकसानदायक भी हो सकता है। ऐसे में दिवाली का पर्व आपके लिए केवल खुशियां लाएं और गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहा शिशु दोनों स्वस्थ रहे इसके लिए गर्भवती महिला को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की दिवाली पर गर्भवती महिला को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

साफ़ सफाई

दिवाली के आने से बहुत दिन पहले ही घर में साफ़ सफाई का सिलसिला शुरू हो जाता है, लेकिन प्रेग्नेंट महिला को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। की थोड़ा बहुत काम जिसे महिला को कोई परेशानी न हो महिला को केवल वही करना चाहिए और भारी सामान उठाना व् सरकाना, पंखे साफ़ करना, झुककर या पैरों के भार बैठकर काम करना, बहुत ज्यादा मेहनत वाले कामों को महिला को नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसके कारण महिला को परेशानी का अनुभव हो सकता है।

ज्यादा भागदौड़

घर के साज सजावट के लिए, पूजा के लिए, दिवाली के त्यौहार पर घर के बाहर आना जाना लगा रहता है। लेकिन इस दौरान कोई परेशानी न हो इससे बचने के लिए प्रेग्नेंट महिला को ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी चाहिए, बल्कि बाहर आने जाने के काम घर के किसी और सदस्य के ऊपर सौंप देने चाहिए ताकि महिला को ज्यादा भागदौड़ के कारण होने वाली परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सके।

आराम व् खाना पीना

त्यौहारों के आने पर अक्सर देखने को मिलता है की सांस लेने की भी फुरसत नहीं मिलती है। लेकिन प्रेग्नेंट महिला को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए की महिला काम के चक्कर में आराम करना न भूलें, क्योंकि ज्यादा थकान होने के कारण महिला को सेहत सम्बन्धी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही महिला को अपने खान पान का भी अच्छे से ध्यान रखना चाहिए, ताकि महिला और शिशु के शरीर में पोषक तत्वों की कमी के कारण कोई समस्या न हो।

मोमबत्ती व् दिएँ

घर की सजावट के लिए और रौशनी के लिए इस दिन सभी लोग अपने घरों में दिएँ व् मोमबत्तियां जलाते हैं। लेकिन प्रेग्नेंट महिला को इनसे दूरी रखनी चाहिए क्योंकि मोमबत्ती को बनाने के लिए जिस केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है वह शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि मोमबत्ती के जलने पर जो धुंआ निकलता है यदि महिला उसमे सांस लेती है तो महिला के जरिये वह केमिकल शिशु तक पहुँच सकता है। साथ ही दिएँ के जलने पर भी धुंआ निकलता है जो महिला और शिशु के लिए नुकसानदायक हो सकता है, ऐसे में आप घर के किसी और सदस्य से यह काम करवा सकते हैं।

पटाखें

पटाखों के धुंए में कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी और भी जहरीली गैस मौजूद होती है, जो न केवल महिला के लिए नुकसानदायक होती है बल्कि यदि यह शिशु तक पहुँच जाती है तो इससे शिशु को भी नुकसान पहुँच सकता है। ऐसे में इससे बचने के लिए न तो गर्भवती महिला को अपने आप पटाखें बजाने चाहिए और न ही उस जगह पर रहना चाहिए जहां पर पटाखे बज रहे हो।

शोर

दिवाली एक ऐसा त्यौहार हैं जहां लोगो का कम और पूरी रात पटाखों का अधिक शोर होता है, और तेज आवाज़ होने के कारण प्रेग्नेंट महिला के घबराहट महसूस करने के साथ गर्भ में शिशु भी शोर सुनकर चौक सकता है जिसके कारण शिशु असहज महसूस कर सकता है। ऐसे में महिला को अपने कानों में रुई डाल लेनी चाहिए और साथ ही शिशु को शोर से दूर रखने के साथ अपने घर की खिड़कियों दरवाज़ों को बंद करना चाहिए। जिससे पटाखों की आवाज़ घर के अंदर न आए, और शिशु और महिला दोनों को शोर के कारण होने वाली परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सके।

घर से बाहर निकलना

प्रेग्नेंट महिला को जितना हो सके दिवाली के पूरा दिन घर में ही रहना चाहिए क्योंकि दिवाली से पहले ही पटाखों का धुंआ हवाओं में होता है क्योंकि पटाखे बजाना लोग छोटी दिवाली से ही शुरू कर देते हैं। जिससे प्रदूषण में बाहर जाने के कारण प्रेग्नेंट महिला को परेशानी हो सकती है। साथ ही इस दिन कुछ लोग टोने टोटके भी करते हैं जिससे गर्भवती महिला और शिशु पर बुरा असर पड़ सकता है ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को दिवाली के दिन बाहर जाने से बचना चाहिए।

डाइट पर कण्ट्रोल

दिवाली एक ऐसा त्यौहार है जिस पर हम खुद तो घर में पकवान बनाते हैं, मिठाइयां लाते हैं साथ इस दिन आपके करीबी भी आपके लिए मिठाइयां व् शुभकामनाएं भेजते हैं। ऐसे में इसका मतलब यह नहीं है की गर्भवती महिला सारा दिन पकवानों का सेवन करती रहें, और मिठाइयां खाती रहे। क्योंकि अधिक तला भुना व् मीठा खाने से प्रेग्नेंट महिला को सेहत सम्बन्धी समस्या हो सकती है। खासकर बाहर की बनी मिठाइयों में इस दिन मीठे के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया जा सकता है जो महिला को ज्यादा परेशान कर सकता है, और इससे महिला को सेहत सम्बन्धी समस्या होने का खतरा रहता है। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को जरुरत के अनुसार खाने के साथ बाहर की चीजों का कम सेवन करना चाहिए।

तो यह हैं कुछ खास टिप्स जिनका ध्यान इस दीवाली गर्भवती महिला को रखना है, ताकि गर्भवती महिला और शिशु दोनों को किसी भी तरह की परेशानी न हो। और महिला को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

दूध कम उतर रहा है तो यह करें

डिलीवरी के बाद ब्रेस्ट मिल्क

शिशु के जन्म के बाद ब्रेस्ट मिल्क ही उसके लिए सबसे सर्वोत्तम आहार होता है, क्योंकि जन्म के बाद शिशु के बेहतर विकास के लिए जिन पोषक तत्वों की जरुरत होती है वो सभी माँ के दूध में मौजूद होते हैं। और डॉक्टर्स भी शिशु के जन्म के बाद कम से कम छह महीने से एक साल तक शिशु के लिए ब्रेस्ट मिल्क को ही शिशु के खान पान के लिए बेहतरीन समझते हैं। यहां तक की छह महीने तक तो माँ के दूध के अलावा पानी तक भी शिशु को न पिलाने की सलाह देते हैं। और डिलीवरी के बाद जब महिला शिशु को स्तनपान करवाना शुरू करती है तो उसके लिए सबसे बड़ी चिंता का यही कारण होता है की स्तनपान से शिशु संतुष्ट है या नहीं। और यह केवल एक नहीं बल्कि सभी माँ बनने वाली महिलाएं सोचती हैं।

शिशु को पर्याप्त दूध मिल रहा है या नहीं इसे जानने के तरीके

शिशु को भरपूर मात्रा में दूध मिल रहा है या नहीं इसका पता आप शिशु को देखकर ही लगा सकते हैं। क्योंकि कुछ महिलाओं का दूध अच्छे से नहीं उतर पाता है जिसके कारण शिशु भूखा रह सकता है। तो आइये अब हम आपको बताते हैं की शिशु को पर्याप्त मात्रा में दूध मिल रहा है या नहीं इसे जानने के तरीके क्या हैं।

शिशु का वजन: यदि आप शिशु को स्तनपान करवाती है और पहले हफ्ते में आपको उसका वजन सामान्य से कम लग सकता है। लेकिन उसके बाद शिशु का वजन कम नहीं होता है बल्कि बढ़ता है। ऐसे में यदि स्तनपान करने के बाद भी शिशु का वजन सही तरीके से नहीं बढ़ता है, तो यह शिशु को पर्याप्त मात्रा में दूध न मिलने के कारण हो सकता है।

दर्द: स्तनपान करवाने के दौरान यदि महिला को ब्रेस्ट में दर्द जैसी समस्या नहीं होती है तो यह भी शिशु को भरपूर पोषण मिलने की निशानी होती है। लेकिन यदि महिला को दर्द की अनुभूति होती है तो यह अच्छे से दूध न उतर पाने के कारण हो सकता है।

स्तनपान: यदि आपका शिशु एक बार दूध पीने के बाद डेढ़ या दो घंटे से पहले भूखा नहीं होता है, और दिन में आठ से नौ बार तक स्तनपान करता है तो यह बहुत अच्छी बात होती है। लेकिन यदि शिशु थोडी थोडी देर बाद भूखा हो जाता है और भूखा होकर हर चीज को मुँह में लेने की कोशिश करता है, तो यह भी इस बात का संकेत होता है की शिशु के लिए ब्रेस्ट में पर्याप्त मात्रा में दूध का उत्पादन नहीं हो रहा है।

शिशु द्वारा दूध पीने की कोशिश: शिशु यदि आसानी से दूध पी रहा है और अपने आप स्तन को छोड़ देता है, उसके बाद महिला को अपने स्तन खाली व् मुलायम महसूस होते हैं तो यह भी शिशु को पर्याप्त मात्रा में पोषण मिलने की निशानी होती है। लेकिन यदि शिशु को दूध पीने के लिए बहुत जोर लगा रहा है, और आपको ऐसा महसूस हो रहा है की दूध नहीं निकल रहा है तो यह भी ब्रेस्ट मिल्क की कमी के कारण हो सकता है।

ब्रेस्ट मिल्क बढ़ाने के तरीके

बहुत सी महिलाएं डिलीवरी के बाद इस परेशानी से जूझ सकती है, लेकिन यह कोई ऐसी परेशानी भी नहीं है की जिसका कोई इलाज न हो बल्कि ऐसे कई तरीके है जिनका इस्तेमाल करने से डिलीवरी के बाद महिला को इस परेशानी से निजात पाने में मदद मिलती है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं ब्रेस्ट मिल्क बढ़ाने के कुछ आसान तरीके कौन से हैं।

स्तनपान

जी हाँ, ब्रेस्ट मिल्क बढ़ाने का सबसे आसान और असरदार उपाय है की जितना आप शिशु को स्तनपान करवा सकती हैं उतना करवाएं। क्योंकि जैसे जैसे शिशु दूध पीने के लिए ब्रेस्ट पर जोर लगाता है वैसे वैसे स्तन के उत्तकों और मांसपेशियों में फैलाव बढ़ता है जिससे ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने में मदद मिलती है।

मेथी के बीज

पुराने समय से ही मेथी के बीजों का इस्तेमाल माँ के दूध को बढ़ाने के लिए किया जाता है, साथ ही इन बीजों को अपनी डाइट में शामिल करने से महिला को स्वस्थ रहने और शिशु के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास में मदद मिलती है। क्योंकि इसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड, कैल्शियम, विटामिन व् अन्य पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। मेथी के बीज की चाय, पराठे, सब्ज़ी में इस्तेमाल करके इसका सेवन महिला को करवा सकते हैं, इसके अलावा मेथी के साग का सेवन भी महिला को करना चाहिए, मेथी के बीजों को अपनी डाइट में शामिल करने से डिलीवरी के बाद महिला ब्रेस्ट मिल्क से जुडी परेशानी से निजात पाने में मदद मिलती है।

जीरा

ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने के लिए जीरा का इस्तेमाल करना भी एक बेहतरीन विकल्प होता है। खासकर भुने हुए जीरे का सेवन ज्यादा फायदेमंद होता है। जीरे को तवे या कढ़ाई में डाल कर आप अच्छे से भून लें, और फिर इसका पाउडर तैयार कर लें अब इसे, सब्ज़ी, रायता, सलाद, फ्रूट आदि पर छिड़ककर इसका सेवन जितना हो सकता है उतना करें। ब्रेस्ट मिल्क बढ़ाने के साथ यह डिलीवरी के बाद महिला की पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में भी मदद करता है।

दालें

मसूर दाल, मूंग दाल, यह ऐसी दालें हैं जिनका सेवन यदि डिलीवरी के बाद महिला करती है तो न केवल यह ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने में मदद करती है। बल्कि इनमे मौजूद पोषक तत्व महिला को स्वस्थ रखने में भी फायदेमंद होते है।

सूखे मेवे

प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, विटामिन जैसे पोषक तत्वों से भरपूर सूखे मेवे जैसे की काजू, बादाम, पिस्ता आदि का सेवन यदि महिला करती है। तो इससे ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने के साथ पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाने में भी मदद मिलती है।

सौंफ

माँ के दूध को बढ़ाने के लिए सौफ का इस्तेमाल करना भी एक असरदार उपाय है, यदि महिला सौंफ की चाय, सौंफ का पानी, या वैसे ही सौंफ का किसी अन्य तरीके से सेवन करती है तो इससे भी ब्रेस्ट में दूध की आपूर्ति को बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके अलावा सौंफ का सेवन करने से महिला और शिशु दोनों को पेट सम्बन्धी समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।

तुलसी

बहुत ही कम लोग जानते हैं की तुलसी भी स्तन में दूध की आपूर्ति को बढ़ाने का एक असरदार उपाय है। औषधीय गुणों से भरपूर तुलसी का रस शहद के साथ, तुलसी की चाय आदि का सेवन करने से महिला को जरूर इस समस्या से राहत पाने में मदद मिलती है।

हरी सब्जियां

हरी सब्जियों में भी बीटा कैरोटीन और राइबोफ्लेविन जैसे विटामिन होने के साथ अन्य पोषक तत्व भी भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। जो ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने में बहुत मदद करते हैं, इसीलिए गर्भवती महिला को अपनी डाइट में हरी सब्जियां जैसे की पालक आदि को जरूर शामिल करना चाहिए।

लहुसन

लहसुन भी ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन इसका अधिक सेवन करने से बचना चाहिए। क्योंकि इसका अधिक सेवन करने से ब्रेस्ट मिल्क के टेस्ट में बदलाव आ सकता है, जिससे शिशु दूध को छोड़ सकता है, ऐसे में इसे अपनी सब्जियों में अच्छे से पीसने के बाद इस्तेमाल करना चाहिए।

पौष्टिक आहार

स्तन में दूध की आपूर्ति को बढ़ाने के लिए सबसे जरुरी है की महिला ऐसे आहार का सेवन करें जिसमे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद हो साथ ही समय पर भोजन का सेवन करें। फल व् फलों का रस, सभी सब्जियां, दूध व् दूध से बने पदार्थ आदि का सेवन भरपूर मात्रा में करें। इसके अलावा जब भी शिशु को स्तनपान करवाना हो उससे पहले कुछ न कुछ तरल जरूर पीएं, ऐसा करने से शिशु के लिए दूध की मात्रा को बढ़ाने में मदद मिलती है।

तो यह हैं कुछ आसान टिप्स जिनका इस्तेमाल करने से ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाने में मदद मिलती है। साथ ही यदि फिर भी महिला को ब्रेस्ट मिल्क न आए तो इसके लिए एक बार डॉक्टर से बात करनी चाहिए। ताकि ऊपर के दूध के बारे में या किसी अन्य विकल्प के बारे में डॉक्टर आपको बेहतर राय दे सके जिससे शिशु के बेहतर विकास में आपको मदद मिल सके।