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गर्भ में शिशु की पोजीशन कब चेंज होती है?

गर्भ में शिशु की हलचल

प्रेगनेंसी के दौरान महिला बहुत से नए अनुभव का अहसास करती है, और इस दौरान प्रेग्नेंट महिला के मन में हमेशा शिशु को लेकर ही विचार घूमते रहते हैं। जैसे की गर्भ में शिशु क्या कर रहा होगा, शिशु कितना विकसित हो गया है, शिशु की हलचल कब महसूस होगी आदि। शिशु का गर्भ में हलचल करना गर्भवती महिला के लिए प्रेगनेंसी के सबसे बेहतरीन लम्हो में से एक होता है। गर्भ में शिशु प्रेगनेंसी के लगभग पांचवें महीने में हलचल करना शुरू कर देता है। शुरुआत में शिशु का आकार छोटा होता है, जिसके कारण शिशु की गर्भ में हलचल कम महसूस होती है। लेकिन जससे जैसे शिशु का आकार बढ़ता है, वैसे की शिशु की मूवमेंट भी बढ़ने लगती है।

शिशु का विकास बढ़ने के साथ गर्भ में शिशु की घूमने की जगह भी कम होने लगती है, लेकिन घूमते हुए शिशु अपनी पोजीशन को लगातार बदलता रहता है। और जैसे जैसे डिलीवरी का समय पास आने वाला होता है, वैसे वैसे डिलीवरी के लिए अपने आप ही शिशु अपनी सही पोजीशन में आने लगता है। लेकिन सभी महिलाओं के साथ एक ही समय पर ऐसा हो यह कोई जरुरी नहीं होता है। क्योंकि हर गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे शिशु का विकास और उसकी पोजीशन बदलने का समय अलग अलग हो सकता है। साथ ही कई बार ऐसा भी अल्ट्रासॉउन्ड के माध्यम से देखने को मिलता है की शिशु उल्टा है, या शिशु अपनी सही पोजीशन में नहीं आ रहा है तो डिलीवरी के दौरान कॉम्प्लीकेशन्स होने के चांस भी होते हैं।

शिशु की पोजीशन गर्भ में कब चेंज होती है

गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहा शिशु जब हलचल करनी शुरू करता है तो हमेशा वो एक ही पोजीशन में नहीं रहता है, बल्कि गर्भ में घूमता हुआ वह लगातार अपनी पोजीशन को बदलता रहता है। और लगातार अपनी पोजीशन को बदलते हुए वह घूमता रहता है और जैसे जैसे डिलीवरी का समय पास आता है वैसे वैसे शिशु अपना सिर नीचे की तरफ करने लगता है, जिससे गर्भाशय की ग्रीवा पर जोर पड़ता है, और प्रसव के लिए जरुरी हॉर्मोन बॉडी में उत्सर्जित होने लगते हैं। लेकिन सभी गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे शिशु एक ही समय पर अपनी पोजीशन नहीं बदलते हैं। जैसे की कुछ गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रहा शिशु तीसवें हफ्ते (आठवें महीने) के बाद से ही अपनी सही पोजीशन में आने लगता है।

तो कुछ महिलाओं के गर्भ में पल रहा शिशु पैंतीसवें हफ्ते (नौवें महीने) के बाद अपनी सही पोजीशन में आ सकता है। और कई बार तो शिशु प्रसव के दौरान ही अपनी सही पोजीशन में आता है। ऐसे में हर महिला के केस में एक ही जैसे बदलाव या शिशु की पोजीशन में बदलाव देखने को ऐसा कोई जरुरी नहीं होता है। लेकिन हर एक शिशु गर्भ में घूमता है यह बात सभी शिशुओं में होती है। और जब शिशु गर्भ में घूमना शुरू कर देता है, और उसके बाद यदि गर्भवती महिला को कभी ऐसा महसूस हो की गर्भ में शिशु घूम नहीं रहा है तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। क्योंकि गर्भ में शिशु की हलचल शिशु के स्वस्थ होने की निशानी होती है वहीँ शिशु की हलचल महसूस न होना परेशानी का कारण होता है।

और यदि गर्भवती महिला को ऐसा महसूस हो तो जितना जल्दी हो सके गर्भवती महिला को डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। तो यह है शिशु की गर्भ में मूवमेंट करने से जुडी कुछ बातें, साथ ही गर्भ में शिशु के बेहतर विकास की जिम्मेवारी गर्भवती महिला की होती है। क्योंकि महिला जितना अपनी सेहत का ध्यान रखती है, पोषक तत्वों का भरपूर मात्रा में सेवन करती है, खुश रहती है उतना ही ज्यादा शिशु का विकास बेहतर तरीके से होने में मदद मिलती है।

पीरियड के दिन बाल धोने से क्या होता है

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पीरियड्स हर माह लड़कियों व् महिलाओं को होने वाली एक आम प्रक्रिया है। इस दौरान महिला के प्राइवेट पार्ट से रक्त का प्रवाह होता है, जो की शरीर में मौजूद विषैले पदार्थो को बाहर निकालने में मदद करता है। ऐसे में इस दौरान लड़कियों और महिलाओं को अपनी अच्छे से केयर करने के लिए कहा जाता है। पहली बार पीरियड्स आने के दौरान आपकी मम्मी, दादी, नानी, बड़ी बहन, आपको कोई न कोई सलाह भी देती हैं, इस दौरान अपना ध्यान कैसे रखना चाहिए, और इस दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

ऐसे ही पुराने समय से ही पीरियड्स के दौरान बाल न धोने की सलाह दी जाती है, और इसे लेकर अलग अलग तरह की बातें भी बोली जाती है। लेकिन इसके पीछे की असली वजह के बारे में कह पाना थोड़ा मुश्किल होता है। जैसे की पुराने समय में महिलाएं तालाब, नदी अदि में नहाने के लिए जाती है, और लोग उसी पानी का इस्तेमाल कपडे, बर्तन धोने के लिए करते थे। और यदि पीरियड्स के दौरान महिला उस पानी सिर धोती थी या नहाती थी तो लोग मानते थे इसके कारण पानी दूषित हो जाता है। ऐसे में इस दौरान पानी से दूर रहने की सलाह दी जाती थी। लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं की पीरियड्स में बाल धोने चाहिए या नहीं आइये जानते हैं।

पीरियड्स में बाल धोने चाहिए या नहीं

पीरियड्स के दौरान बाल धोना सही भी सकता और गलत भी, जैसे की कुछ लोग मानते हैं की यदि पीरियड्स के दौरान नहाने व् सिर धोने के लिए गर्म पानी का इस्तेमाल किया जाए। तो ऐसा करने से पीरियड्स के दौरान होने वाली परेशानी कम होती है, क्योंकि इससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है, साथ ही दर्द से निजात मिलता है, और पीरियड्स में शरीर को आराम भी मिलता है, आदि। लेकिन ऐसा भी माना जाता है की यह आपके लिए नुकसानदायक भी हो सकता है, ऐसे में यह सही है या गलत ऐसा कह पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, आइये जानते हैं पीरियड्स में सिर धोने से क्या नुकसान हो सकते हैं।

ब्लीडिंग खुलकर नहीं होती है

प्रेगनेंसी के दौरान ब्लीडिंग का अच्छे से होना बहुत जरुरी होता है, क्योंकि यदि ब्लीडिंग अच्छे से नहीं होती है। तो यह गर्भाशय में थक्को का रूप ले लेती है जो बाद में आपके लिए परेशानी का कारण बन सकती है। और ब्लीडिंग के बेहतर होने के लिए बॉडी का गर्म रहना बहुत जरुरी होता है, लेकिन सिर धोने से शरीर तापमान कम हो जाता है, जिसके कारण ब्लीडिंग खुलकर नहीं हो पाती है, जिसके कारण पेट में दर्द की समस्या भी हो सकती है। इसीलिए पीरियड्स में खासकर पहले तीन दिन बाल न धोने की सलाह दी जाती है।

शारीरिक समस्या हो सकती है

यदि आपके शरीर से पीरियड्स के दौरान विषैले पदार्थ पूरी तरह से बाहर नहीं निकलते हैं, तो इसके कारण आपको शरीर में विकार उत्पन्न होने के चांस बढ़ जाते हैं। जिसके कारण आपको किसी न किसी शारीरिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है, जैसे की इन्फेक्शन, पेट में दर्द रहना, आदि। ऐसे में यदि आप इन परेशानियों से बचना चाहते हैं तो आपको पीरियड्स के दौरान बालों को नहीं धोना चाहिए।

तो यह हैं वो कारण जिनकी वजह से आपको पीरियड्स के दौरान बाल नहीं धोने चाहिए। साथ ही इसे अन्धविश्वास से नहीं जोड़ना चाहिए, पुराने समय से जो नियम बनाएं गए है कई लोग आज तक उनका पालन करते हैं। ऐसे में आप भी हो सके तो ऐसा न करें ताकि आपको शारीरिक समस्या से बचने में मदद मिल सके।

एबॉर्शन के बाद ब्लीडिंग कब तक होती है ?

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एबॉर्शन यानी की गर्भपात किसी भी महिला के लिए शारीरिक और मानसिक पीड़ा लाता है। गर्भपात एक विशेषज्ञ की देखरेख में ही किया जाना चाहिए। एबॉर्शन को दो तरीको से किया जाता एक सर्जिकल यानी की ऑपरेशन के द्वारा और दूसरा मेडिकल एबॉर्शन मतलब दवाइयों के द्वारा। दोनों तरह के गर्भपात डॉक्टर की सलाह से और उनकी देखरेख में ही किये जाने चाहिए ताकि अगर कोई समस्या आये तो डॉक्टर उसे देख सके। गर्भपात किसी भी तरीके से किया जाए पर महिला की मानसिक स्तिथि और शरीर पर असर तो पड़ता ही है।

गर्भपात की प्रक्रिया शुरू होते ही महिला को ब्लीडिंग भी होने लगती है इसके अतिरिक्त पेट में दर्द और कमजोरी भी होती है। पेट में दर्द, ब्लीडिंग या कमजोरी कितनी लम्बी होगी यह बात इस बात पर निर्भर करती है के कितने माह का गर्भ था। जितना ज्यादा समय का गर्भ होता है उतना ज्यादा समय ही उस गर्भपात से निकलने में लगता है और जितने कम समय का गर्भपात होता उतनी ही जल्दी महिला इस पीड़ा से उभर पाती है।

हर महिला का स्वास्थ्य अलग होता है उसी प्रकार हर महिला की गर्भपात की स्थिति भी अलग हो सकती है। सामन्यतः यह देखने में आया है के एबॉर्शन के बाद 10 से 15 दिन तक ब्लीडिंग होती है। दवाइयों से किये गए गर्भपात के 10 से 15 दिन तक ज्यादा ब्लीडिंग होती है और सर्जिकल गर्भपात में हल्की ब्लीडिंग 7 से 9 दिन तक ही होती है। पर फिर भी जैसा हमने बताया के हर महिला का स्वास्थय अलग होता इसीलिए कुछ महिलाओं को एबॉर्शन के बाद 1 महीने से लेकर 40 दिन तक भी ब्लीडिंग रहती है।

समान्यतः गर्भपात के शुरूआती दिनों में यानी के 3 से 4 दिनों तक बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होती है और उसके बाद हल्की पड़ती जाती है। पर अगर किसी महिला को एबॉर्शन के एक हफ्ते के बाद तक भी हैवी मतलब ज्यादा ब्लीडिंग हो रही है तो अपने डॉक्टरों से जरूर सलाह लें। रक्तस्राव या ब्लीडिंग के कारण हल्का पेट दर्द और कमजोरी महसूस होती ही है। अगर किसी महिला को असहनीय पेट दर्द और कमजोरी बहुत ज्यादा जिसमे वह खुद चल भी ना पा रही हो तो डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए क्योंकि ऐसे में खून की कमी भी हो सकती है।

गर्भपात और एबॉर्शन का समय हर महिला के लिए दुखदायी समय होता है। इस समय में महिला मानसिक और शारीरक रूप से कमजोर हो जाती है। इसीलिए महिला की सही देखभाल बहुत जरुरी है। इस समय में महिला को पूर्ण संतुलित आहार के साथ दूध और सूखे मेवों का प्रयोग करना चाहिए जिससे शरीर का कुछ दर्द और कमजोरी कम हो सके।

लीची खाने के 10 फायदे गर्भवती महिलाओं के लिए

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लीची गर्मियों में आने वाला फल है, और यह थोड़े समय के लिए ही आपको मार्किट में दिखाई देता है। मीठा व् रस से भरा यह फल पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होता है, इसमें विटामिन्स, फोलेट, कॉपर, मिनरल्स आदि भरपूर मात्रा में होते हैं जो गर्भवती महिला के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के लिए फायदेमंद होते हैं। लेकिन इसका अधिक सेवन भी नहीं करना चाहिए, तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की गर्भवती महिला को लीची का सेवन करने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं।

विटामिन सी मिलता है

लीची का सेवन करने से इम्यून सिस्टम को मजबूत होने में मदद मिलती है, क्योंकि इसमें विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता है जो की इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए एक बेहतरीन एंटी ऑक्सीडेंट है। और इम्यून सिस्टम के मजबूत होने से प्रेगनेंसी के दौरान शरीर को संक्रमण से बचाव करने में मदद मिलती है और यह बीमारियों को होने से रोकता है। लीची में फ्लेवोनोइड्स भी होते हैं जो की पुरानी बीमारियों और कैंसर को रोकने में भूमिका निभाते हैं।

ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है

लीची ब्लड में हीमोग्लोबिन के स्तर को कण्ट्रोल करने में मदद करती है साथ ही लीची में मैग्नीशियम, आयरन, मैंगनीज, विटामिन सी और फोलेट भी भरपूर मात्रा में मौजूद होते है, जिससे यह सभी बॉडी में ब्लड फ्लो को बेहतर तरीके से होने में मदद करते हैं। साथ ही ब्लड प्रैशर को भी कम करते हैं और स्ट्रोक की संभावना कम करते हैं।

स्किन की ख़ूबसूरती को बरकरार रखता है

गर्भवती महिला के बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण स्किन का डल पड़ना, दाने की समस्या होना ,झुर्रिया दिखाई देना, आदि आम बात होती है। ऐसे में लीची का सेवन करने से प्रेगनेंसी के दौरान भी आपकी स्किन को पोषण देता है जिससे चेहरे की चमक को बरकरार रहने में मदद मिलती है। क्योंकि लीची एंटीऑक्सिडेंट मौजूद होते हैं जो त्वचा को पोषण देने और त्वचा की कोमलता को बढ़ने के साथ त्वचा की टोन को निखारने में मदद करते है।

कब्ज़ से राहत

कुछ गर्भवती महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान कब्ज़ की समस्या से बहुत अधिक परेशान रहती है। ऐसे में लीची का सेवन करने से पाचन क्रिया को बेहतर होने में सहायता मिलती है जिससे आपको कब्ज़ की समस्या से राहत मिलती है। और साथ ही लीची में पानी और फाइबर की मात्रा अधिक होने के कारण यह बवासीर और पेट के कैंसर के जोखिम को कम करते हैं।

पोटैशियम मिलता है

गर्भवती महिला को थकान की समस्या होना, कमजोरी महसूस होना, मांसपेशियों में ऐंठन आदि की समस्या प्रेगनेंसी के दौरान हो सकती है। ऐसे में लीची जो की पोटैशियम से भरपूर होती है उसका सेवन करने से प्रेग्नेंट महिला को इन सभी परेशानियों से बचाव करने में मदद मिलती है, साथ ही बॉडी में एनर्जी को भरपूर बनाये रखने में मदद मिलती है।

एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं

कुछ महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान पैरों में होने वाली सूजन की समस्या से भी परेशान रहते हैं। ऐसे में लीची में मौजूद एंटी इंफ्लेमेटरी गुण गर्भवती महिला को सूजन की समस्या से राहत दिलाने में मदद करते हैं।

कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखता है

ब्लड में यदि बेड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ जाती है तो इसके कारण गर्भवती महिला को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में लीची का सेवन करने से बेड कोलेस्ट्रॉल को कम करके रक्त में गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद मिलती है।

इलेक्ट्रोलाइट संतुलन को नियंत्रित करता है

कई बार प्रेगनेंसी के दौरान डिहाइड्रेशन का होना एक आम समस्या है और ऐसे में यदि महिला लीची का सेवन करती है तो इससे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट के असंतुलन को खत्म करती है। जिससे बॉडी में पानी की कमी को पूरा करने में मदद मिलती है और डिहाइड्रेशन की समस्या से आपको आराम मिलता है।

फोलेट लीची में होता है भरपूर

फोलिक एसिड और फोलेट से भरपूर लीची का सेवन करने से केवल गर्भवती महिला को ही नहीं बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु को भी फायदा मिलता है। क्योंकि यह शिशु के शारीरिक विकास को बेहतर करने के साथ, तंत्रिका तंत्र और दिमाग के बेहतर विकास में भी मदद करती है।

मीठेपन का अहसास दिलाता है

कुछ महिलाएं प्रेगनेंसी में मीठा खाना पसंद करती है, लेकिन अधिक मात्रा में मिठाईया व् चॉकलेट आदि का सेवन करने से वजन बढ़ने जैसी समस्या हो सकती है, जिसके कारण गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान बहुत सी परेशनियों का का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में लीची का सेवन करने से महिला की मीठा खाने की इच्छा भी पूरी हो जाती है और वजन भी नियंत्रित रहता है।

तो यह हैं कुछ फायदे जो लीची का सेवन प्रेगनेंसी के दौरान करने से होते हैं और प्रेगनेंसी के आलावा भी इसका सेवन किया जाएँ तो यह आपको फिट रखने के साथ उम्र बढ़ने के लक्षणों को कम करने के साथ आपकी ख़ूबसूरती को भी बरकरार रखने में मदद करते हैं। इसीलिए गर्मियों में जब भी लीची आये तो इसका सेवन जरूर करना चाहिए। लेकिन पर्याप्त मात्रा में ही सिका सेवन करें क्योंकि अधिक मात्रा में इसका सेवन करने से गेस्टेशनल डाइबिटीज़, बॉडी का तापमान बढ़ना जैसी परेशानी प्रेगनेंसी के दौरान हो सकती है।

प्रसव को आसान बनाने के उपाय

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प्रेगनेंसी के नौवां महिला लगते ही महिला के मन में तरह तरह के सवाल आने लगते हैं की उसकी डिलीवरी नोर्मल होगी या सिजेरियन। यदि नोर्मल होगी तो क्या महिला उस दर्द को सहन कर पाएगी या नहीं, इससे जुड़े कई सवाल महिला के मन के मन में घूम रहे होते हैं। लेकिन इस दौरान महिला को इन बातों से अपने दिमाग को परेशान करने, तनाव लेने की बजाय रिलैक्स रहना चाहिए। क्योंकि इस दौरान आप अपने आप को जितना शांत रखती है, जितना फिट रखती है, उतना ही ज्यादा आपको प्रसव के दौरान होने वाली परेशानी से बचाव करने में मदद मिलती है। तो आइये अब जानते हैं की प्रसव को आसान बनाने के लिए आप क्या कर सकते है, और इस दौरान आपको किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

प्रसव के बारे में इक्कठा करें जानकारी

डिलीवरी के दौरान आपको किस तरह की परेशानी आ सकती है, और आप किस तरह उस परेशानी से बचाव कर सकते हैं। इसके लिए आपको जानकारी इक्कठा करनी चाहिए, ताकि आपको यदि कोई परेशानी हो तो आप उसका समाधान कर सकें, इसके लिए आप किताबे पढ़कर, अपने घर में बुजुर्गो से, डॉक्टर से सलाह ले सकती है। ऐसा करने से आपको प्रसव के दौरान होने वाली परेशानी से बचाव करने में मदद मिलती है।

तनाव न लें

कुछ महिलाएं इस दौरान डिलीवरी कैसे होगी इस बात को लेकर तनाव में आ जाती है, लेकिन इस दैरान आपका तनाव लेना आपकी मुश्किलों को कम नहीं करता है बल्कि बढ़ा देता है। इसीलिए तनाव नहीं लेना चाहिए, और उन बातों के बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए जो आपके तनाव को बढ़ाती हैं।

खान पान का रखें ध्यान

प्रसव के दौरान आपको कोई परेशानी न हो इसके लिए आपका फिट रहना बहुत जरुरी होता है, और आपके फिट रहने के लिए सबसे जरुरी होता है की आपका खान पान बेहतर हो। जितना आपका खान पान बेहतर होगा, उतना आपका शरीर तंदरुस्त होगा, और आपको प्रसव के दौरान आने वाली परेशानी से बचाव करने के मदद मिलेगी। साथ ही बॉडी को हाइड्रेट रखने के लिए भरपूर मात्रा में पानी का सेवन भी जरूर करना चाहिए।

सही सांस लेने की तकनीक सीखें

यदि आपका प्रसव सामान्य होता है तो उस दौरान दर्द के कारण और जोर लगाने पर आपको बार बार सांस रोकना पड़ता है। ऐसे में गर्भ में शिशु तक पर्याप्त ऑक्सीजन का पहुंचना भी बहुत जरुरी होता है। ऐसे में आपको लम्बे सांस लेने का व्यायाम करना चाहिए ताकि डिलीवरी के दौरान होने वाली दिक्कतों से आपको बचाने में मदद मिल सके।

व्यायाम करें

प्रेगनेंसी के दौरान आराम करना अच्छी बात होती है लेकिन अधिक आराम डिलीवरी के दौरान होने वाली दिक्कतों को बढ़ा सकता है। और यदि आप आराम के साथ थोड़ा बहुत व्यायाम भी करती हैं, तो ऐसा करने से पेट के निचले हिस्से की मांसपेशियों को मजबूत होने में मदद मिलती हैं, जांघो की मांसपेशियों को मजबूत होने में मदद मिलती है, जिससे डिलीवरी के दौरान होने वाली परेशानियों को कम करने में मदद मिलती है। और इस दौरान व्यायाम के साथ योगासन करना भी बेहतर उपाय होता है।

बातें करें

कई बार महिला को डिलीवरी के दौरान हिम्मत और सहयोग की जरुरत भी होती है, ऐसे में उनके पार्टनर को उनके साथ रहना चाहिए। उनके साथ बातें करनी चाहिए ताकि उनकी इन सभी परेशानियों को उनके दिमाग से निकालने में मदद मिल सके जिससे प्रसव के दौरान गर्भवती महिला को होने वाली परेशानी को कम करने में मदद मिल सके।

सही मुद्रा का ध्यान रखें

यदि आपको हल्का फुल्का दर्द हो रहा है और ऐसे में आप एक ही जगह बैठे रहते हैं तो ऐसे में आपकी डिलीवरी का समय बढ़ सकता है, साथ ही आपको दिक्कत भी हो सकती है। ऐसे में हल्का दर्द होने पर महिला को वॉक करते रहना चाहिए इससे डिलीवरी के दौरान आने वाली परेशानी को कम करने के साथ डिलीवरी को जल्दी करवाने में भी मदद मिलती है।

डॉक्टर से जांच

प्रसव का समय पास आने पर आपको डॉक्टर से संपर्क रखना चाहिए, और अपना चेकअप करवाते रहना चाहिए। यदि नौवा महिला पूरा होने पर, या डॉक्टर की देय तिथि तक भी आपको बॉडी में किसी तरह का दर्द या कुछ महसूस नहीं होता है तो इसके लिए आपको एक बार डॉक्टर से जरूर बात करनी चाहिए।

तो यह हैं कुछ खास टिप्स जिनका इस्तेमाल यदि आप डिलीवरी का समय पास आने पर करते हैं तो ऐसा करने से आपको डिलीवरी के दौरान आने वाली परेशानियों से बचाव करने में मदद मिलती है।

गर्भवस्था में खजूर खाना क्यों जरुरी होता है?

प्रेगनेंसी में खजूर

प्रेगनेंसी का समय किसी भी महिला के लिए बहुत ही ज्यादा अहम होता है, इस दौरान महिला को अपने लिए किए गए हर काम के प्रति सतर्क रहना पड़ता है। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान महिला अकेली नहीं होती है बल्कि उसमे भीतर एक नन्ही जान होती है। इसीलिए डॉक्टर हो चाहे घर के सदस्य हर कोई गर्भवती महिला को अपना अच्छे से ध्यान रखने की सलाह देता है। महिला को अपनी शारीरिक गतिविधियों के साथ अपने खान पान का भी अच्छे से ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि शिशु भी अपने विकास के लिए जरुरी पोषक तत्वों के लिए महिला पर ही पूरी तरह से निर्भर करता है। ऐसे में कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ है जिनका सेवन करने की गर्भवती महिला को सलाह दी जाती है। जैसे की खजूर, प्रेगनेंसी के दौरान खजूर का सेवन करने से न केवल गर्भवती महिला बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु को भी फायदा मिलता है।

प्रेगनेंसी में खजूर खाना क्यों जरुरी होता है

पोषक तत्वों से भरपूर खजूर का सेवन करने से प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को फिट रहने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में भी फायदा मिलता है। साथ ही खजूर का सेवन करने से और भी बहुत से फायदे हैं जो प्रेगनेंसी के दौरान मिलते हैं। इसीलिए गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान खजूर का सेवन करने की सलाह दी जाती है, तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी में खजूर का सेवन करने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं।

फाइबर

बहुत सी गर्भवती महिला प्रेगनेंसी के दौरान कब्ज़ की समस्या से परेशान रहती है। ऐसे में खजूर का सेवन करने से महिला को भरपूर मात्रा में फाइबर मिलता है, जो खाने की आसानी से हज़म करने, पेट साफ़ करने, गैस आदि की समस्या से निजात दिलाने में मदद करता है। साथ ही इससे पाचन क्रिया को बेहतर तरीके से काम करने में भी मदद मिलती है। ऐसे में गर्भवती महिला चाहे तो खजूर को अपनी डाइट में शामिल कर सकती है।

फोलेट

खजूर में फोलेट की मात्रा भी भरपूर होती है जो की गर्भ में पल रहे शिशु के विकास के लिए बहुत जरुरी होती है। ऐसे में खजूर का सेवन करने से गर्भ में पल रहे शिशु को जन्म दोष की समस्या से बचाव करने, बेहतर मानसिक व् शारीरिक विकास होने में मदद मिलती है। ऐसे में बॉडी में फोलेट की मात्रा को भरपूर रखने के लिए गर्भवती महिला अपने खाद्य पदार्थो में खजूर को भी शामिल कर सकती है।

आयरन

गर्भवती महिला के शरीर में आयरन की कमी न केवल गर्भवती महिला के लिए शारीरिक समस्या जैसे की एनीमिया, डिलीवरी के दौरान परेशानी का कारण बनती है, बल्कि इसके कारण शिशु के विकास में भी कमी आ सकती है। और खजूर में आयरन भरपूर मात्रा में होता है ऐसे में गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान खजूर का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए ताकि शरीर में आयरन की मात्रा को पर्याप्त होने के साथ गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

मैग्नीशियम

प्रेग्नेंट महिला को खजूर का सेवन करने से भरपूर मात्रा में मैग्नीशियम भी मिलता है जो गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु की हड्डियों की मजबूती को बनाएं रखने के साथ दांतों की सुरक्षा करने में भी मदद करता है।

कोलेस्ट्रॉल कण्ट्रोल

कुछ गर्भवती महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की समस्या से भी परेशान हो सकती है। ऐसे में खजूर में मौजूद सेलेनियम, विटामिन्स, कैल्शियम जैसे पोषक तत्व कोलेस्ट्रॉल को कण्ट्रोल करने में मदद करते है, ऐसे में यदि कोई भी गर्भवती महिला यदि इस समस्या से परेशानी होती है तो उसे खजूर का सेवन जरूर करना चाहिए।

ऊर्जा

फ्रक्टोज़, ग्लूकोज़, सुक्रोज़ से भरपूर खजूर का सेवन यदि गर्भवती महिला करती है तो इससे सुस्ती, आलस, कमजोरी जैसी समस्या से राहत मिलने के साथ गर्भवती महिला को ऊर्जा से भरपूर रहने में मदद मिलती है। और इसके लिए प्रेग्नेंट महिला दो से तीन खजूर को अपनी डाइट में शामिल कर सकती है।

प्रोटीन

गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर विकास के लिए प्रोटीन बहुत जरुरी होता है, और खजूर में प्रोटीन भरपूर मात्रा में मौजूद होता है। साथ ही इसमें मौजूद एमिनो एसिड गर्भवती महिला को स्वस्थ रखने में भी मदद करता है।

मूड स्विंग्स

गर्भवती महिला के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण मूड स्विंग्स होना आम बात होती है, ऐसे में कई बार महिला तनाव में भी आ सकती है। और खजूर का सेवन करने से महिला की इस परेशानी को दूर करके मूड को फ्रैश करने में मदद मिलती है।

तो यह हैं कुछ खास फायदे जो गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान खजूर का सेवन करने से मिलते हैं। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को इन फायदों के लिए खजूर को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए। प्रेगनेंसी की शुरुआत में कम लेकिन प्रेगनेंसी के आखिरी महीने में इसका सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए। साथ ही गर्भवती महिला को किस महीने में कितने खजूर का सेवन करना चाहिए इसके लिए आप चाहे तो एक बार अपने डॉक्टर से भी राय ले सकती है।

जन्म के बाद बेबी कब उलटना पलटना शुरू करता है?

गर्भ में बच्चे का विकास महिला केवल महसूस करती है लेकिन जन्म के बाद महिला बच्चे के विकास का अनुभव अपने सामने करती है। इसीलिए बच्चे के जन्म के बाद बच्चे द्वारा कोई भी पहली हरकत करना, माँ बाप के लिए बहुत ही रोमांचक पल होता है। ऐसे में बच्चे का पहली बार हंसना हो, बैठना हो, लुढ़कना पलटना हो, चलना हो, पहले शब्द का मुँह से निकलना हो, आदि सभी बहुत बेहतरीन पल होते हैं।

साथ ही माँ बाप इस में इन चीजों को लेकर बहुत उत्सुकता भी होती है की कब हमारा बच्चा बैठेगा, चलेगा, मम्मा बोलेगा, पापा बोलेगा, कब उलटना पलटना शुरू करेगा, आदि। तो आज इस आर्टिकल में हम आपको जन्म के बाद आपका बच्चा कब तक उलटना पलटना शुरू कर देता है इस बारे में बताने जा रहे हैं।

जन्म के बाद कब करता है उलटना पलटना शुरू?

बच्चे के उलटने पलटने के लिए बच्चे की गर्दन में स्पोर्ट, हाथ की मांसपशियों की मजबूती आदि का होना जरुरी होता है। ऐसे में बच्चे एक दम से उलटना पलटना शुरू नहीं कर देते हैं। बल्कि पहले बच्चे पेट व् पीठ की तरफ से जोर लगाना शुरू करता है और थोड़ा रोल होना शुरू करता है। जब बच्चा ऐसा रोजाना करता है तो धीरे धीरे उसके हाथों, सिर, गर्दन की मांसपशियों में मजबूती आनी शुरू हो जाती है। जिससे वो कोशिश करते करते धीरे धीरे उलटना पलटना शुरू कर देता हैं।

ज्यादातर बच्चे दो से तीन महीने में उलटना पलटना शुरू करने की कोशिश करते हैं और लगभग चार से पांच महीने में उलटना पलटना शुरू कर देते हैं। और छठे सातवें महीने में बच्चा अपने आप पूरी तरह से उलट भी जाता है पलट भी जाता है और कुछ बच्चे अच्छे से बैठना भी शुरू कर देते हैं। और यह वो समय होता है जब आपको अपने बच्चे के ज्यादा पास रहने की जरुरत होती है।

क्योंकि आपको पता नहीं चलता है की कब बच्चे खेलते खेलते उलटी पलटी मारकर नीचे गिर जाते हैं। लेकिन ऐसा जरुरी नहीं होता है की सभी बच्चे एक ही समय पर ऐसा करना शुरू कर देते हैं कुछ बच्चे समय से पहले तो कुछ थोड़े समय के बाद ऐसा करना शुरू करते हैं।

महीने दर महीने बच्चे में कैसे करते हैं उलटने पलटने की कोशिश

  • पहले महीने में बच्चा अपने सिर को थोड़ा उठाने और मोड़ने की कोशिश करता है।
  • दूसरे महीने में शिशु सिर को उठाने के साथ अपने हाथों पैरों पर जोर लगाते हुए पेट की तरफ से उल्टा होने की कोशिश कर सकता है।
  • तीसरे में महीने बच्चे की गर्दन में भी थोड़ा नियंत्रण आने लगता है और बच्चा अब और ज्यादा कोशिश करता है और कुछ बच्चे तो पेट की तरफ से जोर लगाकर उलटना शुरू कर देते हैं।
  • चौथे महीने में बच्चे के सिर पर नियंत्रण हो जाता है, गर्दन साथ देने लगती है, जिससे बच्चा अच्छे से मूव करने लग जाता है। कुछ बच्चे इस दौरान उल्टे तो हो जाते हैं लेकिन पलट कर सीधे नहीं हो पाते हैं।
  • पांचवें महीने में कुछ बच्चे पेट से उलटना शुरू करते हैं तो कुछ बच्चे पलटना भी शुरू कर देते हैं।
  • छठे महीने में ज्यादातर बच्चे उलटना भी शुरू कर देते हैं और आसानी से उलटना भी शुरू कर देता है।

कैसे करें बच्चे को उलटने पलटने के लिए प्रेरित

  • बच्चे की अच्छे से मालिश करें ताकि बच्चे की मांसपशियाँ मजबूत हो और बच्चा उलटने पलटने की कोशिश कर सके।
  • तासरे महीने में आप बच्चे को कुछ बिछाकर नीचे लिटाएं और उसके आस पास खिलौने रखें बच्चा रंगों की तरफ आकर्षित होता है जिससे वो उन्हें पकड़ने के लिए उलटने पलटने के लिए कोशिश करता है।
  • बच्चा जब लेता हुआ हो तो उसके सिर से ऊपर खिलौना दिखाएं बच्चा जब उसे पकड़ने की कोशिश करेगा तो अपने सिर को ऊपर उठाने की कोशिश करेगा जिससे उसकी मांसपेशियों को मजबूती मिलेगी।
  • आप दिन में थोड़ी देर बच्चे को उल्टा लिटाएं और फिर उसे सीधा करें।
  • आप बच्चे के साथ लेटकर उल्टे पलटे ऐसा करने से भी आपका बच्चा थोड़ा सीखने लगता है।

तो यदि आपने भी अभी अभी बच्चे को जन्म दिया है तो बच्चे के बेहतर विकास के लिए आपको उसकी मालिश करनी चाहिए, स्तनपान अच्छे से करवाना चाहिए, बच्चे को भरपूर आराम करवाना चाहिए। यदि आप इन सभी बातों का ध्यान रखती है तो आपका बच्चा बहुत जल्दी ग्रो करता है।

ठंड में मूंगफली खाने के स्वास्थ्य के लिए फायदों को नहीं जानते आप!

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मूंगफली खाने के क्या-क्या फ़ायदे है :- सर्दियों को वर्ष का सबसे स्वस्थ मौसम (Healthy Season) भी कहा जाता है क्योंकि इसी मौसम में तरह-तरह की चीजें खाने को मिलती है. पालक और स्वास्थ्यवर्धक हरी सब्जियां भी तो इसी मौसम में खाने को मिलती हैं. लेकिन इनके अलावा और भी कुछ है जिनका स्वाद केवल सर्दियों में ही लेने को मिलता हैं. जैसी की मुंगफली जिन्हें खाने का मजा सबसे इसी मौसम में ही आता है.

स्वाद के अलावा मूंगफली को प्रोटीन का भी अच्छा स्रोत्र माना जाता है. अंडे, मांस और फलों की तुलना में इसमें प्रोटीन की सबसे अधिक मात्रा पाई जाती है. जो हमारे शरीर के लिए बेहद जरुरी है. इसके अलावा इसमें और भी कई पोषक तत्व पाए जाते है. सर्दियों में अधिकतर लोग मूंगफली को इसके स्वाद के कारण पसंद करते है लेकिन इसके वास्तविक गुणों को कोई नहीं जानता.

जमीन के भीतर उगने वाली मूंगफली का प्रयोग अधिकतर नमकीन के रूप में किया जाता है. लेकिन इससे बना मक्खन भी बेहद स्वादिष्ट होता है. शायद आपको जानकर हैरानी हो लेकिन वास्तव में जितना ये मक्खन खाने में स्वादिष्ट लगता है उतना ही स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता हैं.

ठंड में दोस्तों के साथ ग्रुप में बैठकर मूंगफली खाने का भी एक अलग मजा होता है. आम भाषा में इसे सस्ता बादाम भी कहा जाता हैं. इस बात से ही अनुमान लगाया जा सकता है की इसमें लगभग वे सभी गुण पाए जाते है जो बादाम में पाए जाते है.

मूंगफली की मिठास के बारे में तो सभी जानते है लेकिन इसके गुणों को शायद ही कोई पहचानता होगा. लेकिन किसी चीज के फायदों को जाने बिना उसे खाना आपको सही लगता है?

शायद नहीं, इसीलिए आज हम आपको मूंगफली के उन फायदों के बारे में बताने जा रहे है जिन्हें जानकर आपको आश्चर्य तो होगा ही साथ-साथ प्रसन्नता भी होगी. तो आईये जानते है मूंगफली के फ़ायदे!!

स्वास्थ्य के लिए मूंगफली के फ़ायदेpeanut-ka-makkhan

जैसा की हमने आपको बताया की स्वाद से भरपूर इस नमकीन में अंडा, मांस और फलों से भी कहीं अधिक मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. जो बेहतर स्वास्थ्य के लिए बेहद जरुरी होता है. आगे हम आपको मूंगफली खाने के स्वास्थ्य के लिए फ़ायदों के बारे में बताने जा रहे है.

 

1. एनर्जी से भरपूर :

मूंगफली में कई तरह के विटामिन्स, मिनरल्स, न्यूट्रिएंट्स और एंटी ऑक्सीडेंट्स पाए जाते है इसीलिए इन्हें एनर्जी का भी अच्छा स्रोत्र माना जाता है.

2. कोलेस्ट्रॉल :

मूंगफली शरीर में bad कोलेस्ट्रॉल को कम करके good कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है. इसमें mono-unsaturated fatty acid भी पाए जाते है मुख्य तौर oleic acid जो coronary diseases को ठीक करने में मदद करता है.

3. विकास :

मूंगफली में प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है. इसमें मौजूद amino acid शरीर के पूर्ण विकास और वृद्धि के लिए लाभदायक होता है.

4. पेट के कैंसर से लड़े :

इसमें मौजूद Poly-phenolic एंटी-ऑक्सीडेंट्स उच्च मात्रा में पाए जाते है. P-Coumaric acid में पेट के कैंसर के खतरे को कम करने की क्षमता होती है. क्योकि ये carcinogenic nitrous-amines के उत्पादन को घटाता है.

5. Heart Diseases, Nerves Diseases, Alzheimer और इन्फेक्शन से लड़े :peanut

मूंगफली में मौजूद poly-phenolic एंटी-ऑक्सीडेंट और Resveratrol heart diseases, nervous diseases और वायरल व् फंगल इन्फेक्शन्स को ठीक करने में मदद करे.

6. स्ट्रोक के ख़तरे को कम करें :

मूंगफली में मौजूद Resveratrol नाम का एंटी ऑक्सीडेंट nitric oxide के उत्पादन बढ़ा कर स्ट्रोक के ख़तरे को कम करता है.

7. एंटी-ऑक्सीडेंटन्स :

मूंगफली में कई तरह के एंटी ऑक्सीडेंटन्स पाए जाते है. मूंगफली को उबालने के बाद ये एंटी ऑक्सीडेंट्स एक्टिव हो जाते है. ये हमारे शरीर में उत्पन्न हुए free radicals से होने वाले नुकसान से बचाते है.

8. त्वचा को सुरक्षित करें :

मूंगफली में मौजूद vitamin E श्लेष्मा झिल्ली और त्वचा की कोशिकाओं की एकाग्रता को बनाए रखता है. ये कोशिकाओं को free radicals से बचाता है जो बहुत बड़ी क्षति का कारण होते है.

9. विटामिन्स :

इसमें कई तरह के पोषक तत्व भी पाए जाते है जिनमे B complex, vitamins जैसे niacin, riboflavin, thiamin, vitamin B6, vitamin B9, pantothenic acid आदि सम्मिलित है.

10. मिनरल्स :

पोटैशियम, manganese, कॉपर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन, selenium और zinc जैसे कई आवश्यक मिनरल्स भी मूंगफली में पाए जाते है. और ये सभी शरीर के विभिन्न कार्यो में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है.

11. पित्त की पथरी में आराम :peanut-butter

मूंगफली के कुछ दाने और पीनट बटर के दो चम्मच का हर सप्ताह सेवन करने से पित्त की पथरी और पित्त संबंधी बिमारियों का खतरा 25 % तक घट जाता है. मूंगफली का ये फायदा आपको सभी तरह से बिमारियों से बचाये रखता है.

12. वजन न बढ़ने दे :

जो महिला मूँगफी अउ पीनट बटर का हफ्ते में कम से कम दो बार सेवन करती है उन पर मोटापा उन महिलाओ की तुलना में कम चढ़ता है जो सेवन नहीं करती. यदि आप रोजाना सुबह पीनट बटर को ब्रेड पर लगाकर इसका सेवन करती है तो ये आपका वजन बढ़ने की संभावना को कम कर देता है.

13. Colon Cancer :

मूंगफली colon cancer को कम करता है मुख्य तौर पर महिलाओ में. हफ्ते में दो बार रोजाना कम से कम 2 चम्मच पीनट बटर का सेवन करने से colon cancer के ख़तरे को महिलाओ में 58% और पुरुषो में 27% तक कम करता है. ये महिलाओ के लिए मूंगफली के सभी फायदों में से सबसे अच्छा फ़ायदा है.

14. प्रजनन में मदद करे :

गर्भावस्था से पूर्व और उसके दौरान यदि मूंगफली का सेवन किया जाये तो इसमें मौजूद फोलिक एसिड महिला और बच्चे के लिए फायदेमंद होता है.

15. ब्लड शुगर को नियंत्रित करे :

Mungfali में मौजूद Manganese कैल्शियम के absorbtion, फैट और carbohydrates metabolism और खून में शुगर लेवल को नियंत्रित करता है.

16. डिप्रेशन से लड़े :

Serotonin का low level डिप्रेशन और तनाव का मुख्य कारण होता है. मूंगफली में मौजूद Tryptophan उस केमिकल के उत्पादन को बढ़ाता है जो डिप्रेशन से लड़ने में मदद करता है.

मूंगफली का सेवन करने के कई अनगिनत फ़ायदे है. इसीलिए रोजाना कम से कम 2 चम्मच पीनट बटर का सेवन करना चाहिए. ये आपको कई तरह की खतरनाक बिमारियों से लड़ने में मदद करता है.

17. दिमागी शक्ति को बढ़ाए :

मूंगफली में vitamin B3 पाया जाता है जो दिमाग के लिए बेहद जरुरी होता है. Peanut को ब्रेन फ़ूड के रूप में भी जाना जाता है. इसमें मौजूद नियासिन तत्व स्मरण शक्ति और दिमाग के काम करने की क्षमता को बढ़ाता है. जिससे भूलने की बीमारी, डिप्रेशन, टेंशन आदि की समस्या दूर होती है.

गर्भवती महिला के लिए अदरक का पानी कितना फायदेमंद है जानिए

अदरक का पानी प्रेगनेंसी में पीना कितना फायदेमंद हैं, अदरक एंटी बैक्टेरियल, एंटी फंगल, एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों के साथ विटामिन्स व् अन्य मिनरल्स से भी भरपूर होता है। लेकिन जब बात गर्भवती महिला की आती है तो हर कोई गर्भवती महिला को अदरक का सेवन न करने की सलाह दे सकता है। क्योंकि अदरक की तासीर गर्म होती है, जो की प्रेग्नेंट महिला व् शिशु की सेहत पर गलत प्रभाव डाल सकती है।

लेकिन ऐसा नहीं है यदि प्रेग्नेंट महिला अदरक का सेवन सिमित मात्रा में करती है तो इससे प्रेग्नेंट महिला या शिशु को कोई नुकसान नहीं होता है। बल्कि इससे प्रेग्नेंट महिला को सेहत सम्बन्धी फायदे मिलते हैं। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको प्रेगनेंसी के दौरान अदरक का पानी पीने से गर्भवती महिला के लिए अदरक का पानी पीना कितना फायदेमंद होता है इस बारे में बताने जा रहे हैं।

मॉर्निंग सिकनेस से आराम

  • यदि आप प्रेगनेंसी के दौरान सुबह उठकर जूस, गुनगुना पानी, चाय आदि जो भी लेते हैं और उसमे एक चम्मच अदरक का पानी मिला लेते हैं।
  • तो ऐसा करने से गर्भवती महिला को उल्टी, जी मिचलाना, जैसी परेशानियों से आराम मिलता है।

अदरक का पानी प्रेगनेंसी में पीने से मिलता है संक्रमण से बचाव

  • प्रेग्नेंट महिला को मौसम में होने वाले बदलाव या किसी अन्य कारण भी खांसी, जुखाम, जैसी परेशानियां होने का खतरा बना रहता है।
  • क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला की इम्युनिटी कमजोर हो जाती है।
  • ऐसे में यदि नियमित गर्भवती महिला सुबह गुनगुने पानी में एक चम्मच अदरक का पानी मिलाकर पीती है।
  • तो ऐसा करने से गर्भवती महिला को संक्रमण से बचे रहने में मदद मिलती है।

रिफ्रैश करने में करता है मदद

  • यदि प्रेग्नेंट महिला जूस या चाय में एक चम्मच अदरक का पानी डालकर पीती है।
  • तो ऐसा करने से न केवल गर्भवती महिला की थकान व् कमजोरी को दूर करने में मदद मिलती है।
  • बल्कि इसके कारण महिला के मूड को रिफ्रैश करने में भी मदद मिलती है।

तो यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आप भी ज्यादा नहीं पर सिमित मात्रा में अदरक के पानी को सब्ज़ी, चाय, जूस आदि में मिलाकर ले सकती हैं। ऐसा करने से आपको प्रेगनेंसी के दौरान स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

स्ट्रेच मार्क्स (stretch marks ) हटाने के घरेलू तरीक़े

शरीर की त्वचा पर पड़ने वाली लम्बी, पतली धारियाँ या लकीरें, जिनका रंग आपकी त्वचा से अलग हो, स्ट्रेच मार्क्स कहलाती हैं। ये बहुत ही सामान्य समस्या है, जो की त्वचा के अत्यधिक खिंचाव की वजह से अक्सर हो जाती है। स्ट्रेच मार्क्स स्त्री या पुरुष किसी को भी हो सकते हैं, हालाँकि स्त्रियाँ इससे ज़्यादा प्रभावित होती हैं। स्ट्रेच मार्क्स ज़्यादातर पेट, कूल्हों, बाँह व जाँघ के ऊपरी हिस्सों, छाती या कमर में होते हैं। महिलाओं में स्ट्रेच मार्क्स ज़्यादातर गर्भावस्था के दौरान होते हैं। ज़्यादातर गर्भावस्था के 25वें सप्ताह में स्ट्रेच मार्क्स होने लगते हैं। उसके अलावा भारी कसरत से, वज़न अचानक घटने-बढ़ने से और किशोरावस्था में भी ऐसे निशान शरीर पर पड़ जाते हैं। लगभग 70% लड़कियाँ किशोरावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स से प्रभावित होती हैं और लगभग 40% लड़कों में किशोरावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स हो जाते हैं। त्वचा की रचना में तीन परतें होती हैं, सबसे पहली परत अधिचर्म होती है। यह सबसे बाहरी त्वचा होती है, जिसे एपिडर्मिस (Epidermis) भी कहते हैं। इसके बाद मध्य में अंदरूनी परत जिसे डर्मिस (dermis) कहते हैं एवं सबसे निचली परत हायपोडर्मिस (hypodermis) होती है। मुख्यतः स्ट्रेच मार्क्स मध्यम परत में होते हैं। मध्यम परत, डर्मिस में किसी भी तन्तु या कोशिका का खिंचाव स्ट्रेच मार्क्स के लिए जिम्मेदार होते हैं।

स्ट्रेच मार्क्स होने के कारण – स्ट्रेच मार्क्स चिकित्सा की दृष्टि से ख़तरनाक नहीं होते पर कई लोगों के लिए सौंदर्य या चिंता का विषय हो सकते हैं। कई लोग इन स्ट्रेच मार्क्स की वजह से अपने आत्मविश्वास में कमी महसूस करने लगते हैं। स्ट्रेच मार्क्स होने की निम्नलिखित वजहें होती हैं –

गर्भावस्था – गर्भावस्था के दौरान स्ट्रेच मार्क्स होना बहुत ही सामान्य है। गर्भावस्था में शिशु के बढ़ते आकार और वज़न के साथ त्वचा में खिंचाव आता है, जिससे स्ट्रेच मार्क्स होते हैं। गर्भावस्था के 25वें सप्ताह से स्ट्रेच मार्क्स होने लगते हैं। इस दौरान स्त्री के शरीर ने कुछ ऐसे हॉर्मोनस का उत्पादन होता है, जिनसे pelvic ligament नर्म पड़ जाते हैं और उनमें लचीलापन आ जाता है। यही हॉर्मोन त्वचा के रेशों को भी नर्म कर देते हैं, जिससे स्ट्रेच मार्क्स बढ़ने के आसार बढ़ जाते हैं।

किशोरावस्था – किशोरावस्था के दौरान शरीर में बहुत सारे परिवर्तन होते हैं, जिनसे स्ट्रेच मार्क्स हो सकते हैं। किशोरों में अधिकतर स्ट्रेच मार्क्स कंधे और पीठ पर उभरते हैं, जबकि किशोरियों में जाँघों, कूल्हों व छाती पर उभरते हैं।
एकदम से वज़न बढ़ना – अगर किसी का वज़न अचानक से बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है, तब भी स्ट्रेच मार्क्स उभर आते हैं। जैसे कि बॉडी बिल्डर और खिलाड़ी अचानक से अपने मसल्ज़ और वज़न बढ़ लेते हैं।

स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं से –  Cushing’s syndrome और Marfan syndrome नामक बीमारियों में स्ट्रेच मार्क्स हो जाते हैं। Marfan syndrome एक आनुवंशिक बीमारी है, इसमें बहुत कमज़ोरी आ जाती है और शरीर के उत्तकों में लचीलापन घट जाता है। Cushing’s syndrome नामक बीमारी में शरीर में cortisol (stress hormone) नाम के हॉर्मोन का अत्यधिक उत्पादन होने लगता है, जिससे वज़न बहुत जल्दी बढ़ता है, ख़ासकर पेट के हिस्से में मोटापा ज़्यादा आ जाता है और इससे त्वचा में अधिक खिंचाव होने लगता है और स्ट्रेच मार्क्स हो जाते हैं।
Corticosteroids – eczema यानि की खुजली से राहत के लिए corticosteroid युक्त क्रीम व लोशन के अधिक इस्तेमाल से या लम्बे समय तक इस्तेमाल करने से स्ट्रेच मार्क्स हो सकते हैं, क्यूँकि इनके इस्तेमाल से collagen का स्तर कम होता जाता है और चमड़ी पतली होती जाती है।