गर्भावस्था के दौरान महिला को स्वस्थ रहने के लिए अपना अच्छे से ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। और आजकल जब हर जगह संक्रमण का खतरा फैला हुआ है तो सभी को घर में रहने की सलाह दी गई है। और यदि आप बाहर भी जाते हैं तो आपको मास्क लगाने की सलाह दी गई है। लेकिन छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को तो बिल्कुल घर से न निकलने के लिए कहा गया है।
क्योंकि उन्हें संक्रमण जल्दी होने का खतरा है। ऐसे में गर्भवती महिला के लिए जरुरी है की वो फिट रहने के लिए इस दौरान अपना अच्छे से ध्यान रखें। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है की घर में भी प्रेग्नेंट महिला मास्क पहनकर ही रखें। क्योंकि पूरा दिन मास्क लगाना या थोड़े लम्बे समय के लिए भी मास्क लगाना गर्भवती महिला और बच्चे दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
प्रेग्नेंट महिला के लिए मास्क लगाना क्यों हैं नुकसानदायक?
प्रेग्नेंट महिला यदि मास्क का इस्तेमाल करती है तो मास्क लगाने के बाद महिला का मुँह, नाक ढक जाता है। जिसके कारण महिला जब सांस लेती है तो उतने अच्छे से ऑक्सीजन शरीर में नहीं जाती है। क्योंकि चारों तरफ से जब आपका मुँह और नाक ढका हुआ है तो आपको फ्रेश ऑक्सीजन कहाँ से मिलेगी और मास्क में से कार्बन डाई ऑक्साइड अच्छे से नहीं निकल पाएगी।
ऐसे में महिला को सांस लेने में दिक्कत महसूस हो सकती है। और जब महिला अच्छे से सांस नहीं ले पाती है तो इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है। क्योंकि बच्चे तक भी ऑक्सीजन सही से नहीं पहुंचती है जिसके कारण महिला और बच्चे दोनों को दिक्कत हो सकती है। तो आइये अब जानते हैं की और कौन सी दिक्कतें गर्भवती महिला व् बच्चे को मास्क लगाने के कारण हो सकती है।
गलत मास्क का इस्तेमाल करने के कारण परेशानी
आप जब मास्क लेने के लिए मार्किट में जाएंगी तो आपको एक तरह का नहीं बल्कि अलग अलग दाम में अलग अलग तरीके के मास्क मिल जायेंगे। लेकिन आपके लिए कौन सा मास्क सही है इसके बारे यदि महिला को जानकारी नहीं होगी और महिला गलती से गलत मास्क ले आएगी। तो संक्रमण से बचाव होगा या नहीं, लेकिन गलत मास्क लगाने के कारन महिला को परेशानी जरूर होगी। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला के लिए सबसे बेहतर मास्क घर में कॉटन के कपडे का मास्क बनाकर इस्तेमाल करना ही बेहतर विकल्प है।
सांस लेने में होती है दिक्कत
मास्क लगाने के कारण मुँह व् नाक ढक जाता है जिसके कारण महिला मास्क के अंदर ही सांस लेती रहती है और पांच से दस मिनट बाद जब महिला को फ्रैश ऑक्सीजन नहीं मिलती है। तो इसकी वजह से महिला की सांस फूलने लगती है सांस फूलने के कारण माँ और बच्चा दोनों को परेशानी हो सकती है।
घुटन महसूस हो सकती है
प्रेग्नेंट महिला जब मास्क लगाती है तो बाहर की ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है और कार्बन डाई ऑक्साइड भी मास्क से अच्छे से बाहर नहीं निकलती है। ऐसे में जब महिला मास्क में ही सांस लेती रहती है तो थोड़ी देर बाद महिला को मास्क लगाए रहने पर घुटन महसूस हो सकती है। जिसके कारण घबराहट, उल्टी आने का मन होना जैसी परेशानियां भी हो सकती है।
गर्भावस्था में स्वस्थ रहने और मास्क लगाने से पहले इन बातों का ध्यान रखें
ध्यान रखें की जो मास्क आप लगा रहे हैं वो कितनी लेयर का है, वो मास्क अच्छी क़्वालिटी का है या नहीं, मास्क आप सही तरीके से लगा रही हैं या नहीं, आदि।
घर में पूरा दिन आपको मास्क लगाकर घूमने की जरुरत नहीं है लेकिन इस बात का ध्यान जरूर रखें की जब घर में भी बैठें तो सबसे थोड़ा दूरी बनाकर बैठें।
जब तक बहुत ज्यादा जरुरी न हो तब तक गलती से भी घर से न निकलें।
घर में बाहर के ज्यादा लोगो को न आमंत्रित करें, साथ ही किसी भी सार्वजनिक या किसी शादी आदि के प्रोग्राम में जाने से बचें, क्योंकि भीड़भाड़ से आपको ज्यादा खतरा हो सकता है।
हॉस्पिटल में जाएँ तो मास्क जरूर लगाएं और हॉस्पिटल में कहीं भी बैठने या किसी सामान को छूने से बचें।
तो यह हैं कुछ टिप्स जिनका ध्यान मास्क लगाने से पहले प्रेग्नेंट महिला को रखना चाहिए। यदि महिला इन बातों का ध्यान रखती है तो इससे गर्भवती महिला को मास्क लगाने के कारण होने वाली परेशानी से बचने के साथ संक्रमण से बचे रहने में भी मदद मिलती है।
प्रेगनेंसी कन्फर्म होने के बाद जब भी महिला अल्ट्रासॉउन्ड करवाती है तो उस आधार पर डॉक्टर्स महिला को एक अनुमानित डिलीवरी डेट बताते हैं। जिसका यह मतलब होता है की इस डेट के आस पास शिशु का जन्म होगा, परन्तु इसका मतलब यह नहीं होता है की इसी दिन बच्चे का जन्म होगा। लेकिन डिलीवरी एक नेचुरल प्रक्रिया होती है। जो पूरी तरह से गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करती है। साथ ही डिलीवरी नोर्मल होगी या सिजेरियन यह डिलीवरी का समय पास आने पर ही पता चलता है। हाँ, कुछ केस होते हैं जिसमे डॉक्टर पहले ही बता देते हैं की डिलीवरी सिजेरियन होगी।
इसके अलावा कुछ महिलाएं ऐसी होती हैं जो प्रेगनेंसी की पहली और दूसरी तिमाही में तो अपना बहुत अच्छे से ध्यान रखती हैं। लेकिन तीसरी तिमाही में थोड़ी लापरवाह हो जाती है और कुछ ऐसी गलतियां कर जाती है जिसके कारण महिला की डिलीवरी में दिक्कत आ सकती है। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको प्रेग्नेंट महिला को कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए, जिससे आपकी नोर्मल डिलीवरी में दिक्कत हो उसके बारे में बताने जा रहे हैं।
हर किसी की बात न सुनें
आप प्रेग्नेंट हैं, आपकी डिलीवरी का समय पास आने वाला है तो जाहिर सी बात है की आपको सभी राय देंगे। की ऐसा करो नोर्मल डिलीवरी होगी, वैसा करो जल्दी डिलीवरी होगी। लेकिन आपको हर किसी की बात सुनने की जरुरत नहीं है। क्योंकि ऐसा जरुरी नहीं होता है की हर महिला की प्रेगनेंसी एक जैसी हो। जैसा उनके साथ हुआ है वैसा ही आपके साथ हो। ऐसे में हर किसी के द्वारा बताएं गए टिप्स को ट्राई करके आपको अपनी सेहत के साथ कोई लापरवाही नहीं करनी चाहिए। आपकी प्रेगनेंसी कैसी है और आपको कैसा महसूस हो रहा है बस आपको इस बात का ध्यान रखना है।
शरीर पर ज्यादा जोर न डालें
कई महिलाएं आपको ऐसा जरूर कहेंगी की नौवें महीने में जितना काम हो सकता है उतना करों इससे डिलीवरी जल्दी होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है क्योंकि डिलीवरी पेन जब शुरू होगा तो अपनी मर्ज़ी से होगा, आपकी प्रेगनेंसी में हालत कैसी है उसके अनुसार होगा। ऐसे में जरुरत से ज्यादा काम करके अपने शरीर पर जोर डालने से आपको ही नहीं बल्कि बच्चे को भी दिक्कत होगी। साथ ही इस दौरान छोटी सी गलती बहुत बुरा परिणाम ला सकती है। ऐसे में में नौवें महीने में अपने शरीर में आपको ज्यादा जोर नहीं डालना चाहिए बल्कि जैसे आप शुरू से रहती हैं वैसे रहिये।
ज्यादा व्यायाम न करें
यह बात बिल्कुल सच है डिलीवरी का समय पास आने पर थोड़ा बहुत व्यायाम करने से बॉडी लचीली जरूर हो जाती है जिससे डिलीवरी को आसान बनाने में मदद मिलती है। लेकिन यदि आप बहुत ज्यादा व्यायाम करने लग जाती है तो इसके कारण आपको दिक्कत हो सकती है जैसे की ब्लीडिंग होने लग जाती है, बच्चे को गर्भ में नुकसान हो सकता है, आदि। ऐसे में आपको थोड़ा बहुत व्यायाम जरूर करना चाहिए लेकिन जरुरत से ज्यादा व्यायाम करने से बचना चाहिए।
पोछा लगाने से कुछ नहीं होगा
यदि आपके घर में कोई बुजुर्ग महिला है तो डिलीवरी का समय पास आने पर वो आपको जरूर कहेंगी की पोछा लगाओं इससे नोर्मल डिलीवरी होगी। लेकिन आपको यह गलती बिल्कुल नहीं करनी करनी हैं क्योंकि ऐसा करने से पेट पर दबाव पड़ सकता है जिसकी वजह से बच्चा गर्भ में परेशानी का अनुभव कर सकता है।
तो यह हैं कुछ गलतियां जो गर्भवती महिला को नोर्मल डिलीवरी हो इसके लिए नहीं करनी चाहिए। क्योंकि कई बार थोड़ी सी चूक माँ व् बच्चे दोनों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसीलिए आपने जैसे प्रेगनेंसी की पहली और दूसरी तिमाही में अपनी सेहत और स्वास्थ्य का ध्यान रखा है वैसे ही तीसरी तिमाही में भी अपनी सेहत का ध्यान रखें। ताकि आपको और आपके बच्चे दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके और डिलीवरी के दौरान भी किसी तरह की दिक्कत न हो।
हर औरत के लिए इस दुनिया में सबसे बड़ा व अद्भुत सुख है माँ बनना। बच्चे का गर्भ में अनुभव होते ही माँ अपने बच्चे के लिए मीठे-मीठे सपने बुनने लगती है। गर्भावस्था का समय प्रत्येक स्त्री के लिए नए अनुभव का समय भी होता है। अपने इस नए अनुभव के लिए वह जितनी उत्साहित होती है वही चिंतित भी। क्योकि जब भी कोई स्त्री माँ बनती है तो वह उसका दूसरा जन्म होता। इस समय महिलाओ को बहुत से समस्याओ का सामना करना पड़ता है। लेकिन गर्भ में बच्चे की देखभाल व बहुत से बातो को लेकर चिंतित भी रहती है की वह किस प्रकार से बच्चे की देखभाल करे व उसको पूरा पोषण दे।
गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल परिवर्तन होने लगते है और शारीरिक संरचना में भी बदलाव आता है। गर्भवती महिला में होने वाला यह बदलाव गर्भ में बच्चे की विकास की ओर संकेत करता है।अतः गर्भावस्था की कुछ महत्वपूर्ण जानकारी द्वारा आप गर्भ में पल रहे शिशु का अच्छे से ख्यान रख सकेंगे और अपने खानपान व स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगे।
गर्भावस्था के शुरुवाती लक्षण
माहवारी महीने का रुक जाना व गर्भ में भ्रूण का होना।
उलटी आना व जी घबराने की स्थिति होना।
हार्मोनल बदलाव के कारण किसी काम में मन न लगना।
गर्भ की स्थिति व गर्भावस्था का पहला महीना
गर्भ के अंदर निषेचित अंडा विकसित होना शुरू होता है ओर इसके चारो ओर पानी से भरी एक थैली उभरने लगती है। आहार नाल विकसित होने लगती है जिससे बच्चा पोषक तत्व लेना शुरू करता है।
निषेचित अंडा – धीरे- धीरे विकसित होने लगता है। चेहरा ,पैर ओर दो बड़े काले धब्बे होते है जो आगे चलकर आँखों का रूप लेते है। रक्त कोशिकाएं आकर लेने लगती है ताकि रक्त का संचरण हो सके। पहले महीने के आखिर दिनों तक बच्चे का आकर चावल के दाने की तरह होता है।
गर्भावस्था का दूसरा महीना
आपके गर्भ में एक जान पल रही है ऐसा महसूस कर आप उसके के लिए तैयारियां करती है। कई महिलाओ को गर्भावस्था में कुछ बदलाव महसूस नहीं होते जिससे गर्भावस्था की अनुभूति हो।गर्भावस्था की स्थिति में थकावट,चक्कर आना,उलटी ,पेशाब अधिक आना आदि हो सकते है। कुछ महिलाओ में चिड़चिड़ापन,कुछ भी खाने का मन न करना,रोना,खाने की किसी चीज व वस्तु से गंध का आना आदि भी शामिल होते है।
गर्भ के अंदर की गतिविधियां
भ्रूण अब एक बच्चे की तरह दिखाई देता है। सिर ओर धड़ इस महीने विकसित हो जाते है। हाथो की कलाइयां ओर पैर इस महीने के अंत तक विकसित होने लगते है। इस महीने तक गुप्त अंग का पता नहीं चलता। चेहरा धीरे-धीरे सिर पर विकसित होना शुरू होता है ,भीतरी कानो का विकास होना शुरू होता है, आँखे ओर पलके बंद रहती है।
गर्भावस्था का तीसरा महीना
गर्भावस्था का तीसरा महीना काफी संतोषजनक होता है क्योकि इस महीने में आप सुरक्षित महसूस करने लगते है ओर गर्भ में भ्रूण का विकास तेजी से होने लगता है। जिससे आपके शरीर में बदलाव की स्थिति शुरू होने लगती है।
गर्भ के अंदर की गतिविधियां
बच्चे की आँखे,पलके और कान विकसित होने लगते है। शारीरिक संरचना बनना शुरू होता है इसलिए बच्चे की हड्डियां व मासपेशिया बनना प्रारम्भ होता है। बच्चे की पूंछ दिखाई नहीं देती लेकिन इस स्तर पर अभी अनुमान लगाना मुश्किल होता है की यह लड़का हे की लड़की।
गर्भावस्था का चौथा महीना
गर्भावस्था के चौथे महीने गर्भवती स्त्री का पेट बाहर निकलने लगता है। आप सुखद अनुभूति महसूस करते है। इस महीने में बच्चे का हिलना-डुलना थोड़ा शुरू हो जाता है। गर्भवती स्त्री को थकान,गैस,कब्ज,नाक से खून बहना,मसूड़ों में दर्द व खून बहना,नाराजगी,हाथ-पैरो में सूजन,योनि से सफेद स्त्राव,खिचाव आदि के साथ साथ भूख में बढ़ोतरी होती है।
गर्भ के अंदर की गतिविधियां
इस समय तक बच्चा जल्दी से बढ़ने लगता है। बच्चे की गर्दन में धीर-धीरे विकास होता दिखाई देता है,ठोड़ी उबरना शुरू होती है। बच्चे में चेहरे के साथ साथ उंगलियों के निशान बना शुरू हो जाते है। बच्चे में सिर के शीर्ष पर आइब्रो ,बाल और हड्डियों का विकास शुरू होने लगता है। बच्चे में बाहर की उत्तेजनाओं पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता शुरू होने लगती है।
गर्भावस्था का पांचवा महीना
आपके अंदर तेजी से शारीरिक बदलाव हो रहे होते है और आगे चलकर आपको काफी जटिलताओं को सहना होता है। इसलिए थोड़ा सा धीरज रखकर आप बाकि के महीनो में भी सफलतापूर्वक आगे बढ़ेगी। इस महीने बच्चा ज्यादा सक्रिय होता है आप बच्चे की गतिविधियों को अनुभव कर सकती है। इस महीने के अंत तक बच्चे में गतिविधियों और सोने की एक आदत विकसित हो जाती है। गर्भवती स्त्री को थकान,गैस,कब्ज,नाक से खून बहना,मसूड़ों में दर्द व खून बहना,नाराजगी,हाथ-पैरो में सूजन,योनि से सफेद स्त्राव,खिचाव आदि के साथ साथ भूख में बढ़ोतरी, साँस लेने में तकलीफ, पीठ दर्द,त्वचा में खिचाव आदि होती है।
गर्भ के अंदर बच्चे की गतिविधियां
बच्चे के वजन में दुगनी बढ़ोतरी हो जाती है। एमनियोटिक द्रव साँस छोड़ने के लिए फेफड़ो का विकास करता है। बच्चे में गर्मी उतपन्न करने में अब फैट मदद करता है। मूत्र प्रणाली भी काम करना शुरू करते है।सिर,आइब्रो और पलको पर बाल अच्छे से आ जाते है। बच्चा अब जमाही और चेहरे को भाव बना सकता है।
गर्भावस्था का छठा महीना
गर्भावस्था के छठे महीने में, शरीर में तेजी से वजन बढ़ना शुरू हो जाता है। यह बच्चे के तेजी से विकास के कारण होता है। यह शरीर द्वारा बड़े पैमाने पर पानी की प्रक्रिया के कारण होता है। हाथ और पैरो में सूजन आने लगती है इसलिए आराम से चलने की सलाह दी जाती है। गर्भाशय बड़ा और भरी हो जाता है ताकि बच्चे को आरामदायक पकड़ मिल सके। ऐसी अवस्था में नीचे की ओर भारीपन और तनाव महसूस होता है। कान में घुटन महसूस होती है,माशपेशियों में ऐठन और खिचाव निचले हिस्सों में महसूस होता है। बच्चे के विकास के कारण वह अपनी मुट्ठी,कोहनी,घुटनो और पैरो से गर्भाशय की दीवारों को धकेलने की कोशिश करता है जिस कारण दर्द का अनुभव होता है। स्तन बड़े और निप्पल के चारो और काले घेरे बन जाते है। जिस कारण गर्भवती स्त्री को दर्द होता है। लेकिन यह भी दूध बनने की प्रक्रिया है। शरीर के तापमान में वृद्धि होने लगती है।
गर्भ के अंदर की गतिविधियां
सिर से एड़ी तक ३५ सेंटीमीटर तक लम्बाई हो जाती है और वजन लगभग ६६० गर्म हो जाता है। इस महीने में बच्चे के मष्तिष्क के विकास की तीर्व प्रतिक्रिया होती है। अब तक भ्रूण की आंखे रोशनी के प्रतिक्रिया करने लगती है। बच्चे शोर, संगीत और अपनी आवाज सुन सकते है। स्वाद भी छठे महीने तक विकसित होने लगता है।
गर्भावस्था का सातवां महीना
इस समय वजन बढ़ जाता है। प्रसव के लिए और आपके अंदर भ्रूणनाल बड़ा होने के लिए गर्भाशय में गतिविधियां होती रहेगी। रक्त की मात्रा अब सामान्य की तुलना में ५०% अधिक करने के लिए ३०% की वृद्धि होती है। यह कारण है की भ्रूण के विकास के लिए अधिक खून की आवश्यकता होती है। स्तनों से कोलोस्ट्रम एक तरल पदार्थ निकलना शुरू हो सकता है।
गर्भ के अंदर की स्थिति
बच्चा आपके डायाफ्रम, लिवर,पेट और आंतो पर बहुत दबाव डालता है। हर २० मिनट में गर्भाशय की माशपेशियों का कसना शुरू हो जाता है। सफेद योनि स्त्राव तेजी से भारी हो जाता है और स्तनों में कोलोस्ट्रम रिसाव शुरू हो सकता है।
गर्भावस्था का आठवा महीना
गर्भावस्था के आठवे महीने के दौरान देखभाल बहुत जरूरी है। क्योकि गर्भ के अंदर शारीरिक संरचना में बहुत सारे परिवर्तन हो रहे होते है। आपका वजन तेजी से बढ़ेगा। रक्तचाप बढ़ने के कारण पैरो में सूजन आ जाती है। इस महीने के अंत तक ज्यादातर बच्चो का सिर नीचे की स्थिति में होता है।
गर्भ के अंदर की गतिविधियां
इस महीने बच्चा और भी आधी ऊर्जावान हो जाता है। बच्चे की लम्बाई ५० सेंटीमीटर और वजन ६ पोंड हो जाता है। उसकी प्रतिक्रिया और हरकते अधिक होने लगती है। गर्भाशय में बड़े वजन की वजह से पेट के निचले हिस्से में जोर रहता है और बार-बार बाथरूम जाना पड़ता है। बच्चा गर्भाशय में छोटे लयबद्ध धक्को के कारण हिचकी ले सकता है।
गर्भावस्था का नौवा महीना
गर्भावस्था के इस महीने को पूर्ण अवधि माना जाता है। आपको किसी भी समय प्रसव पीड़ा हो सकती है। जिसमे डरने की कोई बात नहीं है क्योकि बच्चा पूरी तरह बाहर आने के लिए तैयार है इस महीने ब्रैक्सटन हिक्स संकुचन अधिक व लगातार हो सकता है। आप अधिक थके और कभी अधिक कार्यशील अनुभव करेंगे।
गर्भावस्था के समय सावधानियाँ
भारी सामान न उठाये।
बहुत देर तक खड़े न रहे।
सीढ़ियों का प्रयोग कम से कम करे।
हील वाली सैंडल व जूते न पहने।
जंक फ़ूड, तला हुआ भोजन अधिक न करे।
कॉफ़ी,चाय,ग्रीन टी और सोडा आदि के सेवन से बचे।
ट्रेवेल्लिंग कम करे।
पेट व पीठ के बल न सोये।
तनावग्रस्त न रहे।
डॉक्टर से पूछे बिना दवाइयों का सेवन न केरे।
ज्यादा तंग कपड़े न पहने और मोबाइल का प्रयोग ज्यादा न करे।
स्मोकिंग,पैसिव स्मोकिंग व शराब आदि न ले।
बिना डॉक्टर की सलाह से कोई व्यायाम न करे।
समय-समय पर डॉक्टर से अपने गर्भ की जाँच करवाते रहे।
किसी भी समस्या के लिए कमेंट करे, उचित सलाह दी जाएगी.
गर्भवती महिला के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण महिला को बहुत सी शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। हर महिला को प्रेगनेंसी में एक जैसी परेशानी हो ऐसा भी कोई जरुरी नहीं होता है, बल्कि यह हर महिला के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव पर निर्भर करता है। प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला उल्टी लगना, मॉर्निंग सिकनेस, जी मचलाना, पेट में दर्द, कब्ज़, पेट में गैस, शरीर के अंगो में दर्द, थकान, कमजोरी आदि जैसी परेशानियों का सामना कर सकती है।
इन परेशानियों का प्रेगनेंसी में होना आम बात होती है, लेकिन यदि कोई परेशानी बढ़ जाये या गर्भवती महिला को असहज महसूस हो तो इसे अनदेखा न करते हुए एक बार डॉक्टर से राय जरूर लेनी चाहिए। इसके अलावा कुछ गर्भवती महिलाएं प्रेगनेंसी में बार बार यूरिन आने की समस्या से भी परेशान हो सकती है। क्योंकि गर्भ में शिशु के आने के बाद गर्भशय के आकार में बदलाव आता है, जिसके कारण मूत्राशय पर दबाव का अनुभव होने के कारण बार बार यूरिन पास करने की इच्छा होती है।
प्रेगनेंसी में बार बार यूरिन आने के कारण
यदि कोई गर्भवती महिला प्रेगनेंसी में बार बार यूरिन आने की समस्या से परेशान होती है, तो इसके पीछे का कारण जानना बहुत जरुरी होता है। क्योंकि प्रेग्नेंट महिला की यदि बार बार यूरिन पास करने की इच्छा होती है तो इसका कोई एक कारण नहीं होता है। बल्कि इसके बहुत से कारण होते हैं, तो आइये पहले प्रेगनेंसी में बार बार यूरिन आने के क्या कारण होते हैं इसके बारे में जानते हैं।
पहली तिमाही में
गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है, और इसका कारण बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण किडनी का अधिक सक्रिय होना होता है। किडनी के अधिक सक्रिय होने के कारण महिला की बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है। खासकर पहली तिमाही में बॉडी में हार्मोनल बदलाव बहुत तेजी से होते हैं इसीलिए इस परेशानी का अनुभव अधिक भी हो सकता है।
इन्फेक्शन के कारण
बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण प्राइवेट पार्ट के आस पास बेड बैक्टेरिया जल्दी पनप सकते हैं। जिसके कारण यूरिन इन्फेक्शन की समस्या का प्रेगनेंसी के दौरान होना आम बात होती है। जिसके कारण भी महिला को बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है। ऐसे में पेशाब करते समय दर्द, जलन, प्राइवेट पार्ट में खुजली आदि की समस्या होने पर इसे अनदेखा न करते हुए तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए। क्योंकि यह यूरिन इन्फेक्शन के लक्षण हो सकते हैं।
गर्भ में शिशु
यदि महिला के गर्भ में शिशु की संख्या एक से ज्यादा होती है तो इसके कारण मूत्राशय पर दबाव अधिक दबाव महसूस हो सकता है, जिसके कारण प्रेगनेंसी की शुरुआत से लेकर आखिर तक गर्भवती महिला को इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
बढ़ता वजन
जैसे जैसे गर्भ में शिशु का वजन बढ़ता है, वैसे वैसे गर्भाशय के आकार में भी बदलाव आता है। और गर्भाशय का आकार बढ़ने के कारण पेट के निचले हिस्से की तरफ दबाव बढ़ने लगता है जिसके कारण गर्भवती महिला की बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है।
तरल पदार्थ की अधिकता
आम दिनों के मुकाबले प्रेगनेंसी के दौरान शिशु के लिए रक्त बनने की प्रक्रिया भी बॉडी में होती है, जिसके कारण किडनी रक्त को साफ़ करने का काम करती है। ऐसे में किडनी की सक्रियता बढ़ने के कारण गर्भवती महिला को बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है।
प्रेगनेंसी में बार बार यूरिन आना समस्या तो नहीं?
यदि गर्भवती महिला को यह समस्या गर्भ में शिशु के वजन बढ़ने के कारण हो रही है तो कोई दिक्कत की बात नहीं होती है। लेकिन यदि इसका कारण यूरिन इन्फेक्शन, प्राइवेट पार्ट में इन्फेक्शन आदि होता है तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। क्योंकि यूरिन इन्फेक्शन का बढ़ना किडनी पर बुरा असर डाल सकता है। जिसका असर शिशु पर भी पड़ सकता है जैसे की जन्म के समय शिशु के वजन में कमी आ सकती है। ऐसे में बार बार यूरिन आने की इच्छा होने पर एक बार जांच जरूर करवानी चाहिए ताकि प्रेग्नेंट महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को हर परेशानी से बचाव करने में मदद मिल सके।
तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से प्रेग्नेंट महिला को बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है। ऐसे में महिला को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की जब भी यूरिन आये तो महिला जरूर बाथरूम में जाए, क्योंकि ज्यादा देर यूरिन को रोककर रखना गर्भवती महिला और शिशु के लिए परेशानी का कारण हो सकता है। और यूरिन पास करने से महिला के शरीर में मौजूद विषैले पदार्थो को बाहर निकलने में मदद मिलती है जिससे गर्भवती महिला को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। इसके अलावा यूरिन इन्फेक्शन से बचने के लिए यूरिन इन्फेक्शन के लक्षण दिखने पर एक बार जांच जरूर करवानी चाहिए।
बेसन के पकोड़ों का आनंद तो आपने बहुत बार लिया होगा पर क्या आप जानते है की बेसन आपकी त्वचा के लिए कितना फायदेमंद होता है, युगों से बेसन का इस्तेमाल त्वचा को निखारने के लिए किया जाता है, बेसन का इस्तेमाल करने से आप अपने चेहरे को दमकता हुआ बना सकते है, इसके साथ ये आपके चेहरे को बेदाग़ करने के साथ मुहांसे की समस्या से भी राहत दिलाता है, और ऐसा भी नहीं है की आपको इसका रोजाना इस्तेमाल करना है, हफ्ते में एक या दो बार नियमित रूप से इसका इस्तेमाल करने पर आपको इसका असर दिखाई दे जाता है, और सबसे बड़ी बात इसका आपके चेहरे पर किसी भी तरह का कोई भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि ये प्राकृतिक गुणों से भरपूर होता है, तो आइये अब हम आपको विस्तार से बताते है की किस प्रकार आप इसका इस्तेमाल करके और त्वचा से सम्बंधित कौन कौन सी समस्या से इसका इस्तेमाल करके राहत पा सकते है।
त्वचा को गोरा करने में करता है मदद:-
बेसन का इस्तेमाल करके आप अपनी सांवली त्वचा को गोरा कर सकते है, इसके इस्तेमाल के लिए आप बेसन में मलाई या दूध को अच्छे से मिलाएं, और उसके बाद इसमें शहद और एक चुटकी हल्दी को मिलाकर एक पेस्ट तैयार करें, अब इस पेस्ट को नहाने से पहले अपने चेहरे पर अच्छे से लगाकर मसाज करें, और उसके बाद इसे पांच मिनट के लिए चेहरे पर ही छोड़ दें, और उसके बाद ठन्डे पानी से अपने मुँह को धो लें, ऐसा करने से आपकी त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाकर उसमे प्राकृतिक चमक लाने में मदद मिलती है।
समय से पहले झुर्रियों को नहीं आने देता है:-
बेसन त्वचा के लचीलेपन को बनाये रखने में मदद करता है, और इसके साथ ही चेहरे पर झुर्रियों को आने से रोकने में मदद करता है। जिससे आपको अपनी त्वचा को जवान और मुलायम रखने में मदद मिलती है। इसके इस्तेमाल के लिए बेसन और ग्रीन टी का पैक बनाएं और इसके लिए एक कटोरी में ग्रीन टी का बैग भिगोकर रखें। उस पानी में दो बड़े चम्मच बेसन, दो बड़े चम्मच शहद और एक चुटकी हल्दी डालकर पैक बना कर तैयार कर लें। उसके बाद उसमें थोड़ा-सा दूध डालने से मिश्रण और भी असरदार बन जाता है। फिर चेहरे पर इस पैक को लगाकर सूखने के बाद ठन्डे पानी की पानी से धो लें, आपको इसका असर जरूर दिखेगा।
मुहांसे की समस्या से राहत दिलाता है:-
कई महिलाएं त्वचा पर होने वाले मुहांसे की समस्या से बहुत परेशान रहती है, और इस समस्या से राहत पाने के लिए आप बेसन में शहद को मिलाकर एक पेस्ट तैयार करें, और इसे अच्छे से इसे अपने चेहरे पर लगाएं, बेसन में मौजूद एंटीमाइक्रोबियल गुण आपको मुहांसे की समस्या से राहत दिलाने में मदद करते है, उसके बाद अपने चेहरे को ठन्डे पानी से धोने के बाद अच्छे से साफ़ करें, आप यदि इसे हर तीसरे दिन अपने चेहरे के लिए करती है, तो इसके कारण आपके चेहरे को साफ़ और मुहांसे की समस्या से राहत पाने में मदद मिलती है, और यदि आप इसमें चन्दन का पैक भी मिलाते है तो भी इसके कारण आपको बहुत से फायदे होते है।
त्वचा के दाग धब्बो को दूर करने में मदद करता है:-
बेसन के अंदर नेचुरल ब्लीचिंग और एन्टी बैक्टिरीअल गुण होने के कारण ये त्वचा के दाग-धब्बों को मिटाने में आपकी मदद करता है। इसके इस्तेमाल के लिए आप बेसन और खीरे के रस का निकाल लें, उसके बाद दो बड़े चम्मच बेसन में ज़रूरत के अनुसार खीरे का रस डालकर पैक बना कर तैयार कर लें। उसके बाद उस पेस्ट को अपने चेहरे पर बीस मिनट तक लगाकर रखें और फिर ठन्डे पानी से धो लें, इसके इस्तेमाल से आपके चेहरे के दाग धब्बो को दूर करने में मदद मिलती है।
त्वचा को नमी प्रदान करता है:-
कई महिलाएं त्वचा के रूखे सूखे होने के कारण भी परेशान रहती है, तो अब आपको परेशान होने की बिलकुल भी जरुरत नहीं है, क्योंकि त्वचा का रूखापन दूर करके त्वचा में नमी को लाने में बेसन आपकी बहुत मदद करता है, इसके लिए आप बेसन में गुलाबजल को मिलाकर एक पेस्ट तैयार करें, और अब इस पेस्ट को अच्छे से अपने चेहरे पर लगाएं, और सूखने के बाद गुनगुने पानी से अपने चेहरे को अच्छे से साफ़ करें, इसकी मदद से आपको त्वचा का रूखापन दूर करने में मदद मिलती है, और त्वचा को प्राकृतिक नमी मिलती है।
चेहरे पर अनचाहे बालों को निकालने में मदद करता है:-
बेसन का इस्तेमाल करके महिलाएं अपने चेहरे पर होने वाले अवांछित बालों की समस्या से निजात पाने के लिए करती है, इससे चेहरे के अवांछित बाल साफ हो जाते हैं, विशेषकर मुँह और गाल के, इसके लिए महिलाये बेसन और हल्दी का इस्तेमाल करती है, इसके इस्तेमाल के लिए एक कटोरी में चार छोटे चम्मच बेसन, एक छोटा चम्मच कच्चा दूध, एक छोटा चम्मच नींबू का रस डालकर अच्छी तरह से पैक बना कर तैयार कर लें, अब इसे अपने चेहरे पर लगाने के बाद गोलाकार गति में घुमाएं, और फिर सूखने के लिए छोड़ दे, और सूखने के बाद पानी से साफ़ कर लें, ऐसा करने से आपकी त्वचा पर होने वाले अवांछित बालों की समस्या से राहत मिलती है, और चेहरा साफ़ हो जाता है।
त्वचा से टैनिंग को कम करने में मदद करता है:-
बेसन का ब्लीचिंग गुण त्वचा पर होने वाली टैनिंग को कम करने में बहुत मदद करता है। बेसन में जो एन्जाइम होता है त्वचा को मुलायम करने और निखार लाने में सहायता करता है। इसके इस्तेमाल के लिए बेसन और दही का पैक बनालें, और इसे बनाने के लिए दो बड़े चम्मच बेसन में एक बड़ा चम्मच दही और एक चुटकी हल्दी डालकर अच्छी तरह से मिलाकर अच्छी तरह से पैक बना कर तैयार कर लें। अब आप इस पैक को आप चेहरे के साथ हाथों और पैरों में भी लगा सकते हैं। इसके लगाने के बाद पंद्रह मिनट के बाद पानी से धो लें, ऐसा करने से आपको त्वचा की टैनिंग को खत्म करने में मदद मिलती है।
गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला को अपने उठने, बैठने, चलने, घूमने, खाने, पीने, सोचने के साथ अपनी पूरी दिनचर्या का अच्छे से ध्यान रखना पड़ता है। यहां तक की यदि ऐसा कहा जाए की गर्भवती महिला को अपनी दिनचर्या ही बदलनी पड़ सकती है तो गलत नहीं होगा। इसके अलावा कई महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान वाशरूम को लेकर भी चिंतित हो जाती है की प्रेगनेंसी के दौरान इंडियन वाशरूम को इस्तेमाल करना चाहिए या वेस्टर्न। ऐसे में इस सवाल का जवाब देने से पहले कुछ बातों को जानते हैं, जिससे आपको यह समझने में आसानी हो जाएगी की प्रेगनेंसी में इंडियन वाशरूम उसे करना चाहिए या फिर वेस्टर्न वाशरूम यूज़ करना चाहिए।
प्रेगनेंसी में इंडियन वाशरूम
एक्सपर्ट्स के अनुसार प्रेगनेंसी के दौरान इंडियन वाशरूम ही यूज़ करना सबसे बेहतर होता है, क्योंकि इससे गर्भवती महिला को बहुत से फायदे मिलते हैं। आइये जानते हैं की इंडियन वाशरूम यूज़ करने के फायदे कौन से हैं।
कब्ज़ और बवासीर से आराम
इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करने से बॉडी में मौजूद विषैले पदार्थ यानी की मल को अच्छे से त्यागने में मदद मिलती है। जिससे पेट अच्छे से साफ़ हो जाता हैं और गर्भवती महिला को पेट में गैस और कब्ज़ की समस्या से राहत पाने में मदद मिलती है। कब्ज़ की समस्या से बहे रहने के साथ प्रेगनेंसी के दौरान बवासीर जैसी परेशानी से बचे रहने में भी मदद मिलती है।
संक्रमण से बचाव
गर्भवती महिला जब इंडियन वाशरूम का इस्तेमाल करती है तो वह टॉयलेट सीट के सीधा संपर्क में नहीं आती है, जिसके कारण संक्रमण की समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।
बेहतर पाचन
इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करने से पाचन क्रिया को भी बेहतर रहने में मदद मिलती है, क्योंकि पैरों के भार बैठने के कारण पेट पर दबाव पड़ता है। जिससे पेट अच्छे से साफ़ हो जाता है और पेट का अच्छे से साफ़ होना गर्भवती महिला को स्वस्थ रखने और पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने में मदद करता है।
सामान्य प्रसव
डॉक्टर्स के अनुसार सामान्य प्रसव के लिए इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है। क्योंकि पैरों के भार बैठने से शिशु की नीचे की तरफ ही रहता है, साथ ही जांघो और पेट की मांसपेशियों की मजबूती को बरकरार रखने में मदद मिलती है, जिससे सामान्य प्रसव के लिए बॉडी को तैयार करने में मदद मिलती है।
प्रेगनेंसी में इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करने के नुकसान
गर्भावस्था की आखिरी तिमाही में पेट के पूरे बढ़ जाने के कारण गर्भवती महिला को पैरों के भार बैठने में परेशानी हो सकती है। साथ ही यदि गर्भवती महिला का पहले गर्भपात हो चूका है और उसके बाद भी महिला इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करती है तो इसके कारण महिला को दिक्कत हो सकती है। इसके अलावा यदि प्रेगनेंसी में किसी तरह की कॉम्प्लीकेशन्स हो या महिला को पूरे आराम की सलाह दी गई हो तो भी इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल प्रेग्नेंट महिला की परेशानी को बढ़ा सकता है।
प्रेगनेंसी में वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल करना
जिन गर्भवती महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान कॉम्प्लीकेशन्स हो, उठने बैठने में दिक्कत हो, पहले गर्भपात हो चूका हो, वो गर्भवती महिलाएं अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल कर सकती हैं। लेकिन जो गर्भवती महिला स्वस्थ हो उन को वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि इसके साथ सीधे संपर्क में आने के कारण गर्भवती महिला को संक्रमण का खतरा हो सकता है, साथ ही मल त्यागने में भी जोर लगाना पड़ता है जिससे गर्भाशय पर दबाव पड़ने के कारण महिला को परेशानी हो सकती है।
तो यह है प्रेगनेंसी के दौरान इंडियन या वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल करने से जुडी कुछ बातें, ऐसे में यदि गर्भवती महिला को कोई दिक्कत न हो तो इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल ही करना चाहिए। लेकिन यदि कोई परेशानी हो तो अपनी सुविधानुसार वेस्टर्न टॉयलेट का इस्तेमाल करना चाहिए।
प्रेगनेंसी में ख़ुशी के पल, प्रेगनेंसी एक ऐसा अहसास है जहां शिशु के गर्भ में आते ही महिला को मातृत्व का अनोखा अनुभव होने लगता है। शिशु के जन्म से पहले ही उसे लेकर महिला इतनी उतावली रहती है। गर्भावस्था के पूरे नौ महीने महिला केवल शिशु के विकास, शिशु के स्वास्थ्य, शिशु का जन्म कब होगा इसे लेकर ही सोचती रहती है। लेकिन जो भी हो इस दुनिया का सबसे प्यारा अनुभव गर्भ में शिशु का आना ही होता है।
और यह नौ महीने महिला तरह तरह के नए अनुभव, नए बदलाव, नई ख़ुशी का अहसास करती है। और प्रेग्नेंट महिला के लिए ऐसे बहुत से पल होते हैं। जो प्रेगनेंसी के सबसे बेहतरीन ख़ुशी के पल होते हैं। तो आज हम प्रेगनेंसी के उन्ही प्यारे और अनोखे पलों को आपसे शेयर करने जा रहें हैं। जो माँ बनने के अनुभव को और भी खास बनाते हैं।
गर्भावस्था के ख़ुशी के पल
क्या आप माँ बनने वाली हैं? या शिशु के जन्म की प्लानिंग कर रही हैं? यदि हाँ तो यह आर्टिकल आपके मन में आ रहें बहुत से सवालों का जवाब दे सकता है। क्योंकि आज हम आपको प्रेगनेंसी के कुछ ख़ुशी के पलों के बारे में बताने जा रहें हैं। जो शिशु के विकास से जुड़े हुए होते हैं। तो आइये अब जानते हैं की वो पल कौन से होते हैं।
प्रेगनेंसी कन्फर्म
पीरियड्स के मिस होने के बाद जब आप अपने आप या डॉक्टर के पास जाकर प्रेगनेंसी टेस्ट करते हैं।
और उसका परिणाम पॉजिटिव आता है साथ ही आप शिशु को जन्म भी देना चाहती हैं।
तो यह प्रेगनेंसी का सबसे पहला ख़ुशी का पल होता है।
और इसी ख़ुशी के पल से आपके अंदर मातृत्व की भावना भी जागृत होने लगती है।
प्रेगनेंसी में ख़ुशी का पल होता है पहला अल्ट्रासॉउन्ड
गर्भवती महिला के लिए पहला अल्ट्रासॉउन्ड बहुत की ख़ुशी का अहसास होता है।
क्योंकि इस दौरान महिला पहली बार अपने गर्भ में पल रहें शिशु की आकृति को स्क्रीन पर देखती है।
साथ ही शिशु के दिल की धड़कन भी सुनती है।
और यह महिला के लिए बहुत ख़ुशी का पल होने के साथ इमोशनल मूवमेंट भी होता है।
शिशु के दिल की धड़कन
शिशु की धड़कन को सुनना प्रेग्नेंट महिला के लिए बहुत ही ख़ुशी का पल होता है।
और इस पल का आनंद महिला जब भी डॉक्टर के पास चेकअप करवाने जाती है तो ले सकती है।
क्योंकि वो मशीन की मदद से महिला को बहुत ही आसानी से शिशु के दिल की धड़कन को सुना देते हैं।
प्रेगनेंसी में ख़ुशी का पल होता है शिशु का किक करना
गर्भावस्था के लगभग चौथे महीने के आखिर या पांचवे महीने में महिला को शिशु की हलचल का अनुभव होने लग जाता है।
और यह हलचल महिला के लिए प्रेगनेंसी के सबसे खास अनुभव और ख़ुशी का पल होता है।
क्योंकि इस हलचल का अनुभव केवल महिला ही कर सकती है।
जैसे जैसे शिशु की हलचल ज्यादा होने लगती है तो महिला इसे और ज्यादा एन्जॉय करती है।
ऐसे में यदि कभी शिशु कम हलचल करें तो इसे लेकर महिला परेशान भी हो जाती है।
प्रेगनेंसी में ख़ुशी का पल होता है दूसरा अल्ट्रासॉउन्ड
गर्भवस्था के दूसरे अल्ट्रासॉउन्ड तक शिशु के सभी अंगो की आकृतियां बन चुकी होती है।
और स्क्रीन पर महिला अपने शिशु को देख सकती है।
शिशु की हलचल को भी महिला देख सकती है।
यह पल महिला को अपने शिशु की गर्भ में हलचल का और भी करीब से अनुभव करवाता है।
इसीलिए प्रेगनेंसी के दूसरा अल्ट्रासॉउन्ड महिला के लिए बहुत ही प्यारा समय होता है।
पेट का आकार
चौथे महीने के बाद महिला के पेट का आकार धीरे धीरे बढ़ता जाता है।
बाहर निकलता हुआ पेट महिला को शिशु के विकास का अनुभव करवाता है।
इसीलिए महिला के लिए पेट का बाहर निकलना भी प्रेगनेंसी के दौरान बहुत ही ख़ुशी का पल होता है।
प्रेगनेंसी में ख़ुशी का पल होता है नौवें महीने की शुरुआत
जैसे ही नौवें महीने की शुरुआत होती है तो महिला की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता है।
क्योंकि जिस शिशु का महिला अब तक गर्भ में अनुभव कर रही थी।
अब उसे अपनी बाहों में लेने का समय बहुत करीब आ चूका होता है।
और जैसे जैसे डिलीवरी की देय तिथि पास आती है वैसे वैसे महिला का उत्साह और ज्यादा बढ़ता रहता है।
लेकिन इस उत्साह में महिला को अपनी सेहत का ध्यान रखना नहीं भूलना चाहिए।
तो यह हैं वो कुछ खास पल, जो महिला की प्रेगनेंसी को और खास बनाते हैं। तो आपको भी प्रेगनेंसी के इन ख़ुशी के पलों को अच्छे से एन्जॉय करना चाहिए। और माँ बनने के प्यारे अनुभव को सेलिब्रेट भी करना चाहिए। और गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह की परेशानी न हो इसके लिए अपना अच्छे से ध्यान भी रखना चाहिए।
जैसा की हम सभी जानते है के पुरे देश में लॉकडाउन हो चूका है। लगभग सभी लोग घर पर ही है। इस महामारी से बचने के लिए जरुरी भी है के हम सभी लॉकडाउन का पालन भी करे। पर हम सभी का रोज का रूटीन बदल गया है। सभी लोग देर तक सो रहे है या फिर रात देर तक जाग रहे है सभी का हर चीज करने का नियम बदल सा गया है। चाहे वह खाने का या पिने का हो।
इस दौरान सभी से निवेदन है के सब अपने खाने पिने की रूटीन को ना बदले क्योंकि ऐसा करने से हमारी इम्युनिटी पावर पर बहुत फर्क पड़ेगा। बात अगर गर्भवती महिला की करे तो उन पर तो इसका बहुत ज्यादा ही फर्क पड़ेगा।
हम अपने आसपास अनुभव भी कर रहे है और सभी को देख भी रहे है के लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर गर्भवती महिलाओं का रूटीन बहुत ही बदल गया है। उनके खाने पिने का समय, सोने का समय, उठने का समय, खाने की चीजें आदि सब बदल गया है। हम जानते है के यह सभी के मुश्किल और परेशानी का समय है पर गर्भवती महिलाओं की थोड़ी सी लापरवाही उनके और शिशु के सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
आइये जानते है गर्भवती महिलाओं को अपनी किन किन आदतों का रखना है ध्यान।
सोने समय
हमे पूरी आशा है के इस समय में सभी गर्भवती महिलाओं ने अपनी सोने की आदत में बहुत बदलाव लाये होंगे। चिंता के कारण देर से सोती होंगी और जिस कारण सुबह देर तक उठना होगा। जिससे पुरे दिन की रूटीन खराब। या कुछ महिलाये आलस के कारण भी देर तक लेटी रहती होंगी।
पर अपनी आदतों में एक बार फिर से सुधार लाईये। रात पर समय पर सोइये और कम से कम 8 घंटे की नींद जरूर लीजिये। दिन में चाहे तो एक घंटे की नींद और ले ले। पर खाली समय देख कर पूरा दिन लेते ना रहे।
खान-पान
महिलाये अक्सर अपने खान-पान को लेकर लापरवाह रहती है और थोड़ी सी रूटीन बदलने पर तो तुरंत अपने खाने पीने को भूल ही जाती है। पर गर्भवती महिलाये ऐसा ना करे। पहला तो हम सभी जानते ही है लॉकडाउन एक खतरनाक वायरस के चलते हुए शुरु किया गया है। यह बीमारी बहुत तेजी से भी फ़ैल रही है। ऐसे में अगर गर्भवती महिलाये अपने खाने पीने का अच्छे से ध्यान नहीं रखेंगी तो उनकी इम्युनिटी और भी कमजोर हो जायेगी। और कोई रोग आसानी से लगने का खतरा बना रहेगा।
पुरे दिन में 4 से 5 बार थोड़ा थोड़ा खाते रहे। अपने भोजन में ताजे फल, हरी सब्जियां, दूध, दही, बीन्स और दाल को भी शामिल करे। इस समय में सूखे मेवों का भी प्रयोग करें। ध्यान रखिये इस समय में पूर्ण संतुलित आहार सिर्फ आपके लिए ही नहीं बल्कि आपके शिशु के लिए भी बहुत आवश्यक है।
विटामिन्स एंड आयरन
समय पर सोने और भोजन के साथ साथ अपनी आयरन और विटामिन्स की दवाइयों को भी समय पर लेते रहे। घर पर रहने से अक्सर कुछ महिलाए इन्हे लेना बंद कर देती है। जिससे आयरन और विटामिन्स की कमी हो सकती है। अपने मॉर्निंग और इवनिंग की टेबलेट्स को बिना मिस किये समय पर लेते रहे।
एक्सरसाइज
घर बैठे सभी लोग आलसी हो जाते है पर गर्भवती होने के नाते आप इस आलस को अपने अदंर ना आने दे। एक्टिव रहने के लिए जरूरी है के सुबह हल्की फुलकी एक्सरसाइज और योग कर लें। इससे आपके दिन की भी सही शुरुआत होंगी। आप पूरा दिन एक्टिव महसूस करेंगे।
तनाव
लॉकडाउन के इस समय पर घर बैठे सभी लोगों को स्ट्रेस से गुजरना पड़ रहा है। पर गर्भवती महिलायें जितना हो सके तनाव से दूर रहे। घर पर ही अपने आप को सुरक्षित रखे और ज्यादा बातो का तनाव ना ले। एक्स्ट्रा स्ट्रेस का असर आप पर आपके शिशु पर भी पड़ेगा।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में तो महिला को पता ही नहीं होता की उनका गर्भ ठहर गया है या नहीं। क्योंकि प्रेग्नेंसी निषेचन पर निर्भर होती है। और यदि महिला के अंडे के साथ पुरुष के शुक्राणु का मिलन हो जाता हैं तो निषेचन हो जाता है। निषेचित होते ही अंडा फैलोपियन ट्यूब से गर्भाशय में जाकर प्रत्यारोपित हो जाता है। जिसके बाद महिला की बॉडी में तेजी से हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं और यही बदलाव बताते हैं की गर्भधारण हो चुका है। गर्भधारण होने के बाद महिला के पेट के निचले हिस्से में दर्द, थकान, कमजोरी, उल्टी की समस्या, जी मिचलाना, वजन में कमी, ऐंठन, मूड स्विंग्स, बार बार यूरिन पास करने की इच्छा होना, खाने की पसंद में बदलाव, सिर में दर्द, हो सकता है। ये लक्षण महिलाओं को प्रेगनेंसी के पहले महीने में ही बॉडी में महसूस हो सकते हैं, और हर गर्भवती महिला के शरीर में महसूस होने वाले हार्मोनल बदलाव पूरी तरह से गर्भवती महिला के शरीर में होने वाले बदलाव पर निर्भर करते हैं।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में शिशु का विकास
निषेचन होने के बाद अंडा गर्भाशय में प्रत्यारोपित हो जाता है। प्रत्यारोपण के बाद अंडा दो भागों में विभाजित हो जाता है। जिसमे से एक भाग प्लेसेंटा बनता है जिसकी मदद से पूरे नौ महीने शिशु को पोषण पहुंचाने में मदद मिलती है। और दूसरा भाग शिशु के रूप में विकसित होने लगता है। पहले महीने में केवल भ्रूण का प्रत्यारोपण होता है और भ्रूण के प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को इम्प्लांटेशन के नाम से जाना जाता है। साथ ही शिशु का विकास दूसरे महीने से शुरू होता है।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में शिशु का वजन
इस दौरान शिशु के वजन के बारे में तो बताना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, लेकिन पहले महीने के आखिर तक शिशु का आकार एक चावल के दाने से भी छोटा होता है।
पहले महीने में गर्भवती महिला का खान पान
यदि कोई महिला प्रेग्नेंट होने का प्रयास कर रही है या पहले महीने में महिला को अपनी बॉडी में में कुछ ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं की उसका गर्भ ठहर गया है तो ऐसे में गर्भवती महिला को अपने खान पान में बहुत सी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं जैसे की किन चीजों का सेवन महिला को करना चाहिए और किन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए, ताकि गर्भधारण में और गर्भावस्था में किसी भी तरह की समस्या न आ सके। तो लीजिये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में महिला को क्या खाना चाहिए
आयरन: हरी सब्जियों जैसे की पालक, बथुआ, आदि, चुकंदर, गाजर, अनार, आदि में आयरन की मात्रा भरपूर होती है जो गर्भवती महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी को पूरा करने में मदद करते हैं। साथ ही गर्भाशय में भ्रूण तक खून का प्रवाह बेहतर तरीके से होते है जिससे शिशु का विकास शुरुआत बेहतर तरीके से होता है।
दूध व् दूध से बनी चीजें: कैल्शियम व् प्रोटीन की मात्रा से भरपूर दूध व् दूध से बनी चीजों का सेवन गर्भवती महिला को भरपूर मात्रा में करना चाहिए, इससे हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। और दही का सेवन करने से महिला को पाचन सम्बन्धी समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।
सालमन मछली: पर्याप्त मात्रा में यदि कोई महिला सालमन मछली का सेवन करती है, तो यह भी पहले महीने में महिला के लिए बहुत फायदेमंद होता है। क्योंकि इसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड, विटामिन डी, कैल्शियम आदि भरपूर मात्रा में होते हैं।
फाइबर: बॉडी में हार्मोनल बदलाव के कारण गर्भवती महिला की पाचन क्रिया धीमी पड़ सकती है ऐसे में महिला को अपनी डाइट में फाइबर युक्त आहार का भरपूर मात्रा में सेवन करना चाहिए। फाइबर युक्त आहार में महिला संतरे, नारियल, सेब, टमाटर, गाजर, मटर, बीन्स आदि का सेवन कर सकती है।
कार्बोहाइड्रेट्स: बॉडी में ऊर्जा को भरपूर रखने के लिए महिला को कार्बोहायड्रेट से युक्त चीजों का सेवन भी करना चाहिए। और इसके लिए महिला केला, साबुत अनाज, योगर्ट, आलू, कॉर्न्स, दूध आदि का भरपूर सेवन कर सकती है।
फोलेट: गर्भ में शिशु के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास को बेहतर तरीके होने के लिए फोलेट युक्त चीजों को भी गर्भवती महिला को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए। और फोलेट के लिए महिला हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे की ब्रोकली, पालक, संतरा, आदि का भरपूर सेवन कर सकती है।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या नहीं खाएं
पपीता व् अनानास: महिला को कच्चे पपीते व् अनानास का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनका अधिक सेवन करने से ब्लीडिंग की समस्या का खतरा रहता है।
कच्चा मांस व् कच्चे अंडे: कच्चा मांस व् कच्चे अंडे का सेवन महिला को नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे पेट सम्बन्धी समस्या, इन्फेक्शन, गर्भपात जैसी समस्या का सामना महिला को करना पड़ सकता है।
क्रीम से बनी चीजें: क्रीम से बने दूध व् पनीर का सेवन भी महिला को करने से बचना चाहिए क्योंकि इसमें मौजूद बैक्टेरिया के कारण गर्भवती महिला को उल्टी, दस्त, गर्भपात, समय पूर्व प्रसव जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
कच्ची अंकुरित चीजें: प्रेगनेंसी के पहले महिला में महिला को कच्ची अंकुरित चीजों का सेवन करने से इसमें मौजूद बैक्टेरिया के कारण महिला को पेट में इन्फेक्शन की समस्या के साथ शिशु पर भी गलत असर पड़ सकता है।
गर्म तासीर की चीजें: जिन खान पान की चीजों की तासीर गर्म होती है उनका सेवन करने से भी महिला को बचना चाहिए क्योंकि ऐसी चीजों का सेवन करने से गर्भपात होने का खतरा रहता है।
मछली: पहले महीने में महिला को मर्क्युरी युक्त मछली का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे गर्भपात, ब्लीडिंग, शिशु की सेहत को नुकसान जैसी परेशानी हो सकती है।
बिना धुली सब्जियां व् फल: खाने के लिए इस्तेमाल में लाने से पहले सब्जियों व् फलों को अच्छे से धो लेना चाहिए, क्योंकि इनमे मौजूद कीटाणु के कारण भी महिला और शिशु की सेहत पर उल्टा प्रभाव पड़ सकता है।
कैफीन: अधिक मात्रा में कैफीन जैसे की चाय, कॉफ़ी का सेवन करने से भी महिला को बचना चाहिए, क्योंकि कैफीन का अधिक सेवन करने से भी गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है।
नशे: धूम्रपान, अल्कोहल जैसे किसी भी तरह के नशे का सेवन भी महिला को नहीं करना चाहिए क्यूंकि ऐसा करना महिला की सेहत के साथ शिशु के विकास में भी बाधा डाल सकता है।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या करे और क्या नहीं?
महिला क्या करती है क्या नहीं इसका सीधा असर गर्भ में शिशु पर पड़ता है ऐसे में प्रेगनेंसी के पहले महीने में महिला को क्या करना चाहिए और क्या नहीं इसका ध्यान रखना बहुत जरुरी होता है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की महिला को प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या करना चाहिए
अपने आहार को समय से लें और खाने में भरपूर मात्रा में पोषक तत्वों को शामिल करें।
तनाव न लें, और जितना हो सके खुश रहने की कोशिश करें।
दिन में आठ से दस गिलास पानी का सेवन जरूर करें।
भरपूर नींद लें, और जितना हो सके आराम करने की कोशिश करें।
अपनी गलत आदतों को सुधारे जो प्रेगनेंसी के दौरान महिला या शिशु की सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
प्रेगनेंसी के बारे में जानकारी इककठी करें अन्य प्रेग्नेंट महिलाओं के अनुभव को जानने की कोशिश करें।
प्रेगनेंसी के दौरान क्या नहीं करना चाहिए
यात्रा करने से बचना चाहिए।
चहलकदमी भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस दौरान अधिक चलना भी नुकसानदायक हो सकता है।
तनाव नहीं लेना चाहिए।
जिस काम को करने से पेट पर जोर पड़े वैसे किसी भी काम को नहीं करना चाहिए, ज्यादा झुकने, पैरों पर भार पड़ने वाले काम को भी नहीं करना चाहिए।
किसी भी तरह की दवाई का सेवन नहीं करना चाहिए।
डाइटिंग नहीं करनी चाहिए।
गरम पानी से नहाना नहीं चाहिए।
ज्यादा ऊँची हील वाली सैंडल या चप्पल, ज्यादा टाइट कपडे नहीं पहनने चाहिए।
तो यह हैं प्रेगनेंसी के पहले महीने से जुडी सम्पूर्ण जानकारी तो यदि आप भी माँ बनने की तैयारी कर रही है या आपको लगता है की आपका गर्भ ठहर गया है इन सभी बातों का ख्याल रखना चाहिए और बिल्कुल भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। ताकि महिला के स्वास्थ्य को प्रेगनेंसी के दौरान बेहतर रहने के साथ शिशु का विकास भी बेहतर तरीके से होने में मदद मिल सके।
गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान सबसे ज्यादा परेशानी अपने खान पान को लेकर होती है क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान क्या खाएं क्या नहीं इसे लेकर महिला को बहुत समस्या होती है। ऐसे में करेले का नाम सुनकर ही हो सकता है की प्रेग्नेंट महिला जीभ पर कड़वाहट महसूस करें, लेकिन ऐसा जरुरी नहीं है की जो स्वाद में कड़वी हो वह नुकसानदायक ही होती है। बल्कि कई बार उन चीजों का सेवन ही फायदेमंद होता है जिनका स्वाद कुछ अलग होता है, और ऐसा ही कुछ करेले के साथ भी है। लेकिन फिर भी करेले का सेवन कितना करना चाहिए, कितना करेला का सेवन फायदेमंद होता है, और करेले का सेवन करने से प्रेगनेंसी के दौरान कोई नुकसान तो नहीं होता है इस बारे में जानना बहुत जरुरी होता है। तो लीजिये आज हम प्रेगनेंसी के दौरान करेले का सेवन करने से जुड़े कुछ टिप्स आपको बताने जा रहे हैं।
प्रेगनेंसी के दौरान करेले का सेवन करना चाहिए या नहीं?
करेले में कैल्शियम, फाइबर, बीटा कैरोटीन, पोटैशियम, विटामिन सी, फोलेट, मैग्नीशियम, आदि जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। जो की प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। लेकिन करेले का सेवन पर्याप्त मात्रा में करना जितना फायदेमंद होता है उतना ही नुकसानदायक आवश्यकता से अधिक करेला का सेवन करना हो सकता है। खासकर करेले के बीजों का सेवन करना गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में गर्भवती महिला करेले का सेवन प्रेगनेंसी के दौरान जरूर कर सकती है, लेकिन जरुरत से ज्यादा और करेले के बीजों के साथ इसका सेवन करने से बचना चाहिए। बिना करेले के बीज का सेवन करने से इसके दुष्प्रभाव की सम्भावना को कम करने में मदद मिलती है।
प्रेगनेंसी में करेले का सेवन करने के फायदे
प्रेगनेंसी के दौरान करेले का सेवन यदि गर्भवती महिला करती है तो ऐसा करने से गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को फ़ायदे जरूर मिलते हैं। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी के दौरान करेले का सेवन करने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं।
फोलेट
फोलेट की मात्रा करेले में भरपूर होती है जो की गर्भवती महिला को एक दिन में जरुरी फोलेट का एक चौथाई हिस्सा करेले के सेवन से लिया जा सकता है, यदि गर्भवती महिला इसका सेवन करती है तो इससे बॉडी में फोलेट की मात्रा को बनाए रखने में मदद करती है। साथ ही बॉडी में फोलेट की मात्रा का पूरा होना गर्भ में पल रहे शिशु को भी जन्म के समय होने वाली बीमारियों से सुरक्षित रखने में मदद करता है।
बॉवेल मूवमेंट
करेले का सेवन यदि गर्भवती महिला करती है तो इससे पेरिस्टालिसिस को बढ़ावा मिलने में मदद मिलती है, जो बॉवेल मूवमेंट को नियंत्रित करने में मदद करता है। साथ ही बॉवेल मूवमेंट का बेहतर होना गर्भवती महिला के पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने के साथ कब्ज़, एसिडिटी, जैसी समस्या से भी प्रेगनेंसी के दौरान आराम पहुंचाने में मदद करता है।
इम्युनिटी सिस्टम
प्रेगनेंसी के दौरान इम्युनिटी सिस्टम का मजबूत होना गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों को बीमारियों से सुरक्षित रखने में मदद करता है। और करेले का सेवन करने से गर्भवती महिला की इम्युनिटी को बूस्ट करने में मदद मिलती है। क्योंकि करेले में मौजूद विटामिन सी जो की एक बेहतरीन एंटीऑक्सीडेंट है उसका गर्भवती महिला की बॉडी में होना हानिकारक बैक्टेरिया से लड़ने में मदद करता है जिससे किसी भी तरह से संक्रमण से गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को बचाने में मदद मिलती है।
पोटैशियम
पोटैशियम की मात्रा भी करेले में भरपूर होती है जो गर्भवती महिला के शरीर में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने के साथ गर्भवती महिला को हदय सम्बन्धी समस्या से भी सुरक्षित रखने में मदद करता है।
फाइबर
करेले में फाइबर भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है जो गर्भवती महिला को कब्ज़ जैसी परेशानी से प्रेगनेंसी के दौरान निजात दिलाने के साथ, महिला की ज्यादा मसालेदार और तेलीय भोजन खाने की इच्छा में कमी लाने में भी मदद करता है। साथ ही करेले का सेवन करने के कारण गर्भवती महिला को वजन अधिक बढ़ने की समस्या से निजात दिलाने में भी मदद मिलती है।
गर्भ में पल रहे शिशु का विकास
जिंक, पाइरोडॉक्सिन, मैग्नीशियम, मैंगनीज पेंटोथेनिक एसिड, आयरन, नियासिन, पोटैशियम जैसे पोषक तत्व करेले में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं जो की गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर विकास में मदद करते हैं, इसीलिए गर्भवती महिला को करेले को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।
करेले का सेवन करने के नुकसान
करेले का सेवन करने से जहां गर्भवती महिला को फायदे मिलते हैं, वहीँ अधिक करेले का सेवन करने और करेले के बीजों का सेवन करने से गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को नुकसान भी हो सकते हैं। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी के दौरान करेले का सेवन करने से कौन से नुकसान हो सकते हैं।
समयपूर्व प्रसव
प्रेगनेंसी के दौरान करेले का अधिक सेवन करने से गर्भाशय में संकुचन बढ़ सकता है, जिसके कारण समयपूर्व प्रसव यानी समय से पहले डिलीवरी होने की आशंका बढ़ सकती है।
पेट से जुडी समस्या
करेले का सेवन अधिक करने से गर्भवती महिला को पेट से जुडी परेशानियां जैसे की पेट में दर्द, ऐंठन, मरोड़ उठना, दर्द रहना, कब्ज़ जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही इसके अधिक सेवन के कारण गर्भवती महिलाओं को उल्टी दस्त जैसी परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है।
गर्भपात
ऐसा माना जाता है की जो महिला गर्भधारण करना चाहती है और वह करेले का सेवन अधिक मात्रा में करती है, तो इसके कारण महिला को गर्भधारण करने में परेशानी हो सकती है। साथ ही प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में इसका अधिक सेवन करने से गर्भपात होने के चांस भी बढ़ सकते हैं, क्योंकि इसमें कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो की गर्भाशय पर बुरा असर डालते हैं।
ब्लड प्रैशर
प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को ब्लड प्रैशर की समस्या का होना उसकी दिक्कतों को और भी बढ़ा सकता है। खासकर जिन गर्भवती महिलाओं का ब्लड प्रैशर लौ रहता है उन्हें तो करेले का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे ब्लड प्रैशर और कम होने के चांस बढ़ जाते हैं।
दूध में कमी
करेले का अधिक सेवन करने से ब्रेस्ट में चल रही दूध बनने की प्रक्रिया पर भी बुरा असर पड़ता है, जिसके कारण शिशु के लिए बन रहे दूध की मात्रा में कमी आ सकती है।
शिशु के विकास में कमी
करेले के बीजों के कुछ ऐसे विषैले पदार्थ मौजूद होते हैं जो गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे में गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान शिशु के बेहतर विकास के लिए करेले का सेवन अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए, और करेले के बीजों को निकालकर उसका सेवन करना चाहिए।
तो यह हैं कुछ फायदे और नुकसान, जो प्रेगनेंसी के दौराम करेले का सेवन करने से हो सकते हैं। इसके अलावा करेले का सेवन एक दिन एक से अधिक करने नहीं करना चाहिए, साथ ही मौसम के अनुसार ही सब्ज़ी खरीदनी चाहिए क्योंकि कई बार रंग लगाकर सब्जियों को हरा किया जा सकता है, साथ ही कोई भी सब्ज़ी हो उसे बनाने से पहले अच्छे से साफ़ पानी से धोने के बाद ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।