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प्रेगनेंसी में पेट छोटा हो तो समस्या तो नहीं?

गर्भावस्था में पेट

प्रेगनेंसी के दौरान तीन महीने महीने के बाद महिला का बेबी बंप थोड़ा थोड़ा करके दिखना शुरू हो जाता है। और गर्भवती महिला के पेट को देखकर बहुत सी बातों का अंदाजा लगाया जा सकता है जैसे की गर्भ में पल रहा शिशु लड़का है या लड़की, आदि। इसके अलावा प्रेगनेंसी के दौरान कुछ महिलाओं का पेट थोड़ा ज्यादा बड़ा हो जाता है तो कुछ महिलाओं का कम रहता है। और इसे लेकर महिला को टेंशन भी हो सकती है लेकिन आपको इसे लेकर परेशान होने की जरुरत नहीं होती है। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान महिला के पेट का निकलना गर्भ में शिशु के विकास, महिला की शारीरिक सरंचना जैसी बातों पर निर्भर करता है।

प्रेगनेंसी में पेट छोटा होने के कारण कोई परेशानी तो नहीं होती

गर्भवती महिला प्रेगनेंसी के दौरान पेट का आकार छोटा होने के कारण परेशान हो सकती है। हमेशा नहीं लेकिन कई बार गर्भ में शिशु के विकास से सम्बंधित समस्या होने के कारण महिला का पेट छोटा दिखाई दे सकता है, यह गर्भवती महिला के लिए थोड़ा परेशानी का कारण हो सकता है।लेकिन हर बार एक ही कारण की वजह से महिला का पेट छोटा दिखाई दे ऐसा कोई जरुरी नहीं है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेग्नेंट महिला के प्रेगनेंसी में पेट किन कारणों की वजह से छोटा होता है।

महिला की हाइट

प्रेगनेंसी के दौरान महिला का पेट महिला की लम्बाई पर निर्भर करता है जैसे की जिन महिलाओं की लम्बाई ज्यादा होती है। उनका पेट छोटी हाइट की महिलाओं के मुकाबले कम दिखाई देता है। ऐसे में महिला को परेशान होने की जरुरत नहीं होती है।

उम्र

जिन महिलाओं की उम्र अठारह वर्ष के आस पास या पेंतीस से अधिक होती है यदि वो प्रेग्नेंट होती है तो उम्र के अनुसार उन्हें भी प्रेगनेंसी के दौरान पेट का आकार छोटा महसूस हो सकता है। लेकिन इसमें किसी तरह की घबराने की बात नहीं होती है।

शिशु का विकास

जो महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान अपना अच्छे से ध्यान नहीं रखती है, खाने में लापरवाही करती है, नशे का सेवन करती है, जिन महिलाओं के शरीर में पोषक तत्वों की कमी होती है, आदि। इन कमियों के कारण गर्भ में शिशु के विकास में कमी आ सकती है। और यदि गर्भ में शिशु का विकास कम होता है तो इस कारण भी महिला का पेट कम दिखाई देता है।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से प्रेग्नेंट महिला का पेट कम दिखाई दे सकता है। यदि शिशु के विकास से सम्बंधित परेशानी के कारण ऐसा होता है तो महिला को अपनी डाइट और सेहत का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए ताकि गर्भ में शिशु का विकास बेहतर तरीके से होने में मदद मिल सके।

गर्भधारण के पहले महीने की सावधानियां

गर्भधारण के पहले महीने की सावधानियां, प्रेगनेंसी के पहले महीने इन बातों का रखें ध्यान, प्रेगनेंसी के पहले महीने के लिए टिप्स, गर्भावस्था का पहला महीना, Tips for First Month of Pregnancy

प्रेगनेंसी के पहले महीने में ज्यादातर महिलाओं को यह नहीं पता होता है की उनका गर्भ ठहर गया है, लेकिन यदि आप प्रेग्नेंट होना चाहती हैं। तो आपको प्रेगनेंसी के पहले महीने से ही इसकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। और इस दौरान आपको बहुत सी सावधानियां भी रखनी चाहिए। यदि आप ओवुलेशन पीरियड में बेहतर सम्बन्ध बनाते हैं, तो इससे आपकी प्रेगनेंसी के चांस बढ़ जाते हैं। और यदि इस दौरान निषेचन हो जाता हैं तो शरीर में उसी समय से हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं, जिन्हे महसूस किया जा सकता हैं। ऐसे में यदि आपको ऐसा महसूस हो की आपका गर्भ ठहर गया हैं तो आपको बहुत सी सावधानियां बरतनी चाहिए। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी के पहले महीने में कौन कौन सी बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।

स्वस्थ आहार लें

बेहतर प्रेगनेंसी के लिए आपके शरीर का स्वस्थ होना बहुत जरुरी होता हैं, ऐसे में शारीरिक रूप से फिट रहने के लिए आपको अपने आहार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। और जितना हो सके स्वस्थ व् पोषक तत्व से भरपूर आहार का सेवन करना चाहिए। और जितना आप शारीरिक रूप से फिट रहते हैं उतना ही आपको प्रेगनेंसी के दौरान आने वाली परेशानियों से बचाव करने में मदद मिलती हैं।

तनाव से बचें

यदि आप तनाव लेती हैं तो इसके कारण आपको प्रेगनेंसी की नेगिटिव रिपोर्ट का सामना करना पड़ सकता हैं। क्योंकि तनाव आपको मानसिक रूप से प्रभावित करता हैं, और आपकी बॉडी में होने वाले सभी कार्यो को मस्तिष्क करता है ऐसे में यदि आप तनाव लेती हैं तो आपको समस्या हो सकती हैं। यहां तक की पहले तीन महीने में तनाव गर्भपात का कारण भी बन सकता हैं।

इन चीजों का सेवन न करें

गरम तासीर वाली चीजें जैसे ड्राई फ्रूट, इलायची, आदि के सेवन से आपको परहेज करना चाहिए। साथ ही विटामिन सी युक्त चीजें जैसे कच्चा पपीता, कटहल, अनानास आदि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण गर्भ गिरने के चांस बढ़ जाते हैं। इसके आलावा कच्चा पनीर, कच्चे अंडे, अधपका मांस आदि भी नहीं खाना चाहिए।

ज्यादा भागादौड़ी न करें

पहले महीने में आपको इस बात का भी खास ध्यान रखना चाहिए की आप ज्यादा भागादौड़ी न करें, सीढ़ियां न चढ़ें, काम करने में ज्यादा तेजी न दिखाएं, यात्रा करने से बचें, क्योंकि शुरूआती दिनों में इसके कारण झटका आदि लगने के कारण गर्भ न ठहरने के चांस बढ़ जाते हैं, और यदि आप प्रेग्नेंट होना चाहती हैं तो आपको इससे बचना चाहिए।

पेट पर दबाव न डालें

उल्टा होकर सोना, भारी सामान उठाना, पेट के बल काम करना, या किसी भी अन्य ऐसे काम को न करें जिससे पेट पर दबाव पड़े। क्योंकि शुरूआती दिनों में पेट पर दबाव आपके लिए परेशानी का कारण बन सकता हैं।

दवाइयों का सेवन

कई बार शुरूआती दिनों में ही गर्भ ठहरने के कारण हार्मोनल बदलाव के कारण बॉडी में थकान, कमजोरी व् शरीर के अंगो में दर्द आदि की समस्या होने लगती हैं। ऐसे में आपको दवाइयों का सेवन नहीं करना चाहिए और यदि आपको ऐसे लक्षण महसूस होते हैं तो यह इस बात का संकेत देते हैं की आप प्रेग्नेंट हैं।

भीड़ व् प्रदूषण से बचें

शिशु के अंग गर्भधारण के पहले महीने से ही बनने शुरू हो जाते हैं ऐसे में आपको भीड़ व् प्रदूषण वाली जगह पर जाने से भी बचना चाहिए क्योंकि यह शिशु के विकास पर बुरा असर डाल सकते हैं।

नशा न करें

यदि आप शराब या धूम्रपान करती हैं, या आपके सामने भी कोई करता हैं तो ऐसी जगह पर नहीं बैठना चाहिए और न ही आपको करना चाहिए, क्योंकि इसका बुरा असर गर्भनाल के रास्ते शिशु तक पहुंचकर उसके शारीरिक व् मानसिक रूप से विकास में समस्या उत्पन्न कर सकता हैं।

डाइटिंग न करें

शुरूआती समय में खाने का मन नहीं करता या मोटापे के डर से कुछ महिलाएं डाइटिंग भी शुरू कर देती हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण आपको भी कमजोरी आदि की समस्या के साथ शिशु के विकास पर भी असर पड़ सकता हैं।

बाहर का खाना खाने से बचें

यदि आप अधिक मसालेदार खाना, या जंक फ़ूड का अधिक सेवन करते हैं तो इसके कारण आपको पेट में गैस व् जलन की समस्या का सामना करना पड़ सकता हैं, साथ ही इसका बुरा प्रभाव शिशु पर भी पड़ सकता हैं ऐसे में आपको प्रेगनेंसी के पहले महीने से ही अपनी डाइट से इन्हे बाहर कर देना चाहिए।

तो यह हैं कुछ सावधानियां जो महिला को प्रेगनेंसी के पहले महीने में रखनी चाहिए साथ ही जैसे ही पीरियड्स के मिस होने के बाद आपको प्रेगनेंसी कन्फर्म होती हैं। वैसे ही आपको एक अच्छे से डॉक्टर के पास जाकर अच्छे से अपना चेकअप करवाना चाहिए सभी जरुरी टेस्ट करवाने चाहिए। ताकि शुरुआत से ही आपको प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली परेशानियों से बचने के साथ शिशु के बेहतर विकास में मदद मिल सके।

किसी को बहुत ज्यादा और किसी को बहुत कम बच्चे क्यों होते हैं?

ज्यादा व् कम बच्चे होने के कारण, किसी भी महिला की प्रेगनेंसी के केवल पति और पत्नी के बीच केवल सम्बन्ध बनाने से ही जुडी हुई नहीं होती है। बल्कि प्रेगनेंसी और भी बहुत सी चीजों पर निर्भर करती है। जैसे की महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ है या नहीं। महिला मानसिक रूप से स्वस्थ है या नहीं। महिला को बार बार गर्भपात की समस्या तो नहीं हो रही है। महिला आंतरिक रूप से किसी शारीरिक परेशानी से ग्रसित तो नहीं है। महिला की उम्र सही है या नहीं, आदि।

इन सभी लक्षणों पर प्रेगनेंसी निर्भर करती है। ऐसे में कई महिलाएं ऐसी होती हैं जिन्हे बहुत आसानी से प्रेगनेंसी ही जाती है। तो कुछ महिलाएं गर्भधारण करने से जुडी परेशानियों का सामना ही करती रहती है। आखिर ऐसा क्यों होता है? तो आइये आज हम आपके इनकी सवालों का जवाब देने जा रहें हैं। की किसी महिला को कम और किसी महिला को ज्यादा बच्चे क्यों होते हैं।

शारीरिक स्वस्थता

  • यदि महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ है, और मानसिक रूप से भी स्वस्थ है।
  • तो ऐसे में महिला को प्रेगनेंसी आसानी से हो सकती है यदि महिला अपने पार्टनर के सम्बन्ध बनाती है।
  • लेकिन यदि महिला किसी बिमारी से पीड़ित है।
  • शारीरिक रूप से कमजोर है या शिशु को जन्म देने के लिए तैयार नहीं है।
  • तो ऐसे में महिला को गर्भधारण आसानी से नहीं होता है जिसके कारण महिला के कम बच्चे हो सकते हैं।

ज्यादा व् कम बच्चे होने का कारण है उम्र

  • अब बच्चे होने में उम्र भी बहुत मायने रखती है।
  • क्योंकि यदि आपकी शादी बीस साल की उम्र में हुई है।
  • तो आपके अंडाशय में अंडे अच्छे से बनते हैं।
  • अंडो की गुणवत्ता अच्छी होती है।
  • ऐसे में सम्बन्ध बनाने पर निषेचन का चांस भी बढ़ जाता है। जिससे बहुत जल्दी गर्भधारण हो सकता है।
  • और बच्चे ज्यादा होने की सम्भावना बढ़ सकती है।
  • लेकिन यदि आपने शादी की तीस या बत्तीस की उम्र में की है।
  • तो ऐसे में अंडाशय में अंडे कम बनते हैं। अंडो की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है।
  • जिसके कारण महिला को प्रेग्नेंट होने के चांस कम होते हैं। जिससे कम बच्चे होते हैं।

ज्यादा व् कम बच्चे होने का कारण है सम्बन्ध

  • यदि कोई कपल हमेशा बिना सुरक्षा के सम्बन्ध बनाता है। और नियमित रूप से सम्बन्ध बनाता है।
  • तो ऐसे में प्रजनन अंग बेहतर तरीके से काम करते हैं।
  • जिसके कारण महिला को बार बार गर्भधारण हो सकता है।
  • लेकिन यदि महिला सम्बन्ध बनाने के बाद गर्भनिरोधक दवाई का सेवन करती है।
  • या किसी तरह की सुरक्षा का इस्तेमाल करती है।
  • और या सम्बन्ध कभी कभी बनाती है तो उन महिलाओं को गर्भधारण आसानी से नहीं होता है।
  • जिससे उन्हें जल्दी जल्दी गर्भधारण नहीं होता है।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से कुछ महिलाओं को ज्यादा तो कुछ महिलाओं को कम बच्चे होते हैं। इसीलिए प्रेग्नेंट होने के लिए इन सभी बातों का ध्यान रखना जरुरी होता है।

बेल का शरबत पीने से क्या होता है गर्भवती महिला को

प्रेगनेंसी में बेल का शरबत

बेल का शरबत पीने से बहुत फायदे मिलते हैं, जैसे की कब्ज़ से राहत, भूख बढ़ाने में मदद मिलती है, मुँह के छाले की समस्या से निजात, कफ से राहत, गर्मी में ठंडक का अहसास, लू से होने वाली परेशानी से बचाव आदि। लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान महिला को खान पान का ध्यान अच्छे से रखना चाहिए और और केवल उन चीजों का सेवन करना चाहिए जिससे गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को फायदा मिल सके। ऐसे में गर्भवती महिला को बेल के शरबत का सेवन करने से बचना चाहिए, क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान बेल का शरबत पीने से गर्भवती महिला बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, साथ ही इसके कारण गर्भ में पल रहे शिशु को भी परेशानी हो सकती है।

प्रेगनेंसी में बेल का शरबत पीने के नुकसान

गर्भवती महिला यदि प्रेगनेंसी के दौरान बेल के शरबत का सेवन करती है तो इसके कारण गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को नुकसान पहुँच सकता है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी में बेल का शरबत पीने से कौन से नुकसान होते है।

गर्भपात

बेल के रस का सेवन करने से गर्भवती महिला के गर्भ ठहरने में परेशानी हो सकती है, जिसके कारण महिला के गर्भपात के चांस बढ़ जाते हैं। ऐसे में गर्भपात के खतरे से बचने के लिए गर्भवती महिला को बेल के रस के सेवन से बचना चाहिए।

पेट सम्बन्धी समस्या

बेल का शरबत बहुत भारी होता है, और गर्भवती महिला के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण पाचन क्रिया धीमी पड़ सकती है। और बेल के जूस को हज़म करने में समय लग सकता है, जिसके कारण गर्भवती महिला को पेट में दर्द, गैस, एसिडिटी आदि होने की समस्या से परेशान होना पड़ सकता है। ऐसे में पेट सम्बन्धी समस्या से बचने के लिए भी गर्भवती महिला को बेल के रस के सेवन को करने से बचना चाहिए।

डिलीवरी में दिक्कत

यदि आप दूसरी बार माँ बनने जा रही है और आपका पहले शिशु सिजेरियन डिलीवरी से हुआ है, तो भी बेल के रस का सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि बेल का जूस पीने के कारण दूसरी बार डिलीवरी होने पर महिला को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

शिशु के विकास

बेल के रस का सेवन करने से शिशु के विकास में भी कमी आ सकती है जिसके कारण शिशु का स्वास्थ्य कमजोर हो सकता है। और शिशु के जन्म के बाद भी उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या होने का खतरा रहता है।

स्किन सम्बन्धी समस्या

गर्भवती महिला यदि बेल का शरबत पीती है तो इसके कारण ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है, जिसके असर शिशु पर पड़ सकता है। और शिशु को स्किन सम्बन्धी समस्या होने का खतरा रहता है।

निमोनिया

तासीर में ठंडा होने के कारण बेल के शरबत का असर माँ के गर्भ में शिशु पर भी पड़ सकता है, जिसके कारण शिशु को जन्म के बाद निमोनिया जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में जितना हो सके गर्भवती महिला को शिशु को स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या से सुरक्षित रखने के लिए बेल के शरबत का सेवन नहीं करना चाहिए।

शिशु का मानसिक विकास

यदि गर्भवती महिला बेल के शरबत पीती है तो इसके कारण गर्भ में पल रहे शिशु की मस्तिष्क की कोशिकाओं पर बुरा असर पड़ सकता है। जिसके कारण शिशु का दिमागी विकास ठीक से नहीं हो पाता है, ऐसे में शिशु के बेहतर मानसिक विकास के लिए गर्भवती महिला को बेल के शरबत का सेवन करने से बचना चाहिए।

शिशु के जन्म के बाद

स्तनपान करवाने वाली महिला को भी बेल का शरबत पीने से परहेज रखना चाहिए, क्योंकि इसके सेवन के कारण गर्भ में पल रहे शिशु के लिए बन रहे दूध के उत्पादन में कमी आ सकती है, जिससे शिशु भूखा रह सकता है।

तो यह हैं कुछ नुकसान जो गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी में बेल का शरबत पीने से हो सकते है, ऐसे में नियमित इसका सेवन नहीं करना चाहिए। लेकिन यदि आपका कभी मन करे तो महीने में एक या दो बार थोड़ा बहुत इसका सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा बेल का जूस आपको कितनी मात्रा पीना चाहिए या नहीं आप इसके लिए एक बार अपने डॉक्टर से भी राय ले सकती है।

बालों में तेल लगाने के फायदे

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अपने शरीर को फिट रखने के लिए आप स्वस्थ व् संतुलित आहार का सेवन करते है, अपने चेहरे को नमीयुक्त और खूबसूरत बनाने के लिए आप तरह तरह के उपाय करते है, ऐसे ही आपके बालों को भी पोषण की जरुरत होती है, साथ ही लम्बे और घने बाल आपकी पर्सनैलटी को बढ़ाने में मदद करते है, और यदि आप चाहते है की आपके बाल हमेशा चमकते हुए, मुलायम और घने रहे तो इसके लिए सबसे अच्छा और आसान उपाय है की आप अपने बालों की अच्छे से मसाज करें और तेल लगाएं और इसके लिए आप आंवले के तेल, नारियल के तेल, सरसों के तेल, अन्य किसी का भी इस्तेमाल कर सकती है, तो आइये आज हम आपको विस्तार से बताते है की बालों में तेल लगाने के कौन कौन से फायदे होते हैं।

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बालों का रूखापन दूर होता है:-

बालों में तेल लगाने से बालों का रूखापन दूर होने में मदद मिलती है, क्योंकि इससे आपके बालों को अच्छे से पोषण मिलता है, जिससे जड़ से पोषण मिलने के कारण आपके बाल रूखे नहीं रहते है, और उनकी नमी को बरकरार रखने में मदद मिलती है।

मुलायम और चमकदार बनते हैं:-

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यदि आप तेल से अच्छे से अपने बालों की मसाज करते हैं तो इससे आपके बालों में नमी आ जाती है, और सिर में रक्तसंचार भी अच्छे से होता है, जिससे आपके बालों को मजबूत मुलायम और चमकदार बनने में मदद मिलती है।

प्रदूषण और सूर्य की किरणों के प्रभाव से बचाया जाता है:-

बालों में तेल लगाकर रखने से आपके सिर में धूल मिट्टी नहीं लगती है, बल्कि तेल वाले बालों से ही चिपक जाती है, और जब आप अपने बालों को धोते हैं, तो इसे आसानी से निकलने में मदद मिलती है, और साथ ही सूर्य की पराबैंगनी किरणों से जो आपके बालों पर दुष्प्रभाव पड़ते है, उससे भी आपके बालों को बचाने में मदद मिलती है।

बालों को सफ़ेद होने से बचाया जाता है:-

बालों को पोषण देने से आपके बालों की नेचुरल चमक को हमेशा बरकरार रखने में मदद मिलती है, कई लोगो का ऐसा भी मानना है की बालों में ज्यादा ऑइलिंग करने से आपके बल सफ़ेद हो जाते है, जबकि यह बिलकुल गलत होता है, हर दिन रात को कम से कम दस मिनट तक अच्छे से अपने बालों को मसाज करें इससे आपके बालों को काला होने में मदद मिलती है, और सफ़ेद होने की समस्या से बचाव होता है।

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बालों को लम्बा करने में मदद मिलती है:-

तेल लगाने से आपके बालों की जड़े अच्छे से पोषित हो जाती है, जिसके कारण आपके बालों की ग्रोथ तेजी से बढ़ती है, और आपके बालाओं को लम्बा होने में मदद मिलती है, इसीलिए यदि आप भी लम्बे बालों की छह रखते है, तो अपने बालों की नियमित मसाज करें।

डैंड्रफ की समस्या दूर होती है:-

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यदि आपके सिर में डैंड्रफ है तो इसक कारण भी आपके बालों पर बुरा असर पड़ता है, लेकिन तेल से मसाज करने पर आपके सिर के रूखेपन को दूर करके डैंड्रफ की समस्या से निजात मिलता है, और आपके बालों को अच्छे से पोषण भी मिलता है।

बालों को घना करने में मदद मिलती है:-

बालों में तेल लगाने से उन्हें मजबूत बनाया जाता है, साथ ही जड़ों के पोषित होने के कारण आपके बालों की ग्रोथ को जड़ से बढ़ाने में मदद मिलती है, और आपके बाल घने बनते है,जिनसे आपकी पर्सनैलिटी को बढ़ाने में भी मदद मिलती है।

बालों को प्रोटीन मिलता है:-

बालों को अच्छे से पोषण के लिए जरुरी होता है की आपके बालाओं को प्रोटीन भरपूर मिलें, और यदि आप अपने बालों में आवलें का तेल, बादाम का तेल, सरसों का तेल आदि मिलाते हैं, तो इससे आपके बालों को प्रोटीन अच्छे से मिलता है, जिसके कारण बालों से जुडी हर परेशानी का समाधान करने में भी मदद मिलती है।

तो ये हैं कुछ फायदे जो आपको बालों में तेल लगाने से मिलते हैं, यदि आप भी चाहती हैं की आपके बाल भी घने और आकर्षित लगे तो आपको अपने बालों को पोषण देने के लिए तेल से मसाज जरूर करनी चाहिए, साथ ही बालों को धोने से पहले यदि आप बालों में तेल लगाती है तो आप खुद ही देखेंगी की आपके बाल कितने अच्छे हो जाते है।

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गर्भवती महिला गर्मियों में यह नहीं खाएं नुकसान होगा

गर्भवती महिला गर्मियों में यह नहीं खाए नुकसान होगा, प्रेग्नेंट महिलाओं को गर्मियों में क्या नहीं खाना चाहिए, प्रेगनेंसी के दौरान न करें इनका अधिक सेवन, प्रेगनेंसी टिप्स, गर्मियों में गर्भवती महिला को क्या नहीं खाना चाहिए, Pregnancy tips for summer

गर्मियों में गर्मी, पसीना, धूप से दिक्कत, आलस अधिक आना, आदि परेशानियों का होना आम बात होती है। और गर्भवती महिलाओं को तो गर्मियों में ज्यादा परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है। क्योंकि बॉडी में हो रहे हार्मोनल बदलाव के कारण शारीरिक परेशानी, गर्मी का अधिक अनुभव होने के कारण ज्यादा परेशानी हो सकती है। लेकिन फिर भी महिला को स्वस्थ रहने और गर्भ में शिशु के बेहतर विकास के लिए किसी भी तरह की लापरवाही न करते हुए अपना अच्छे से ध्यान रखना चाहिए। ताकि प्रेगनेंसी के दौरान किसी भी तरह की दिक्कत न हो, ऐसे में कुछ चीजें हैं जिनका सेवन महिला को अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए, जैसे की जिन चीजों की तासीर अधिक गरम होती है, या जो बॉडी के तापमान को बढ़ाती है, आदि। क्योंकि इसके सेवन के कारण प्रेगनेंसी के दौरान महिला को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। तो आइये अब जानते हैं की गर्भवती महिलाओं को किन की चीजों का सेवन गर्मियों में नहीं या फिर कम करना चाहिए।

ठंडी चीजें

गर्मी से राहत पाने के लिए ठंडा खाने की इच्छा सबसे ज्यादा होती है, जैसे की आइस क्रीम, ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक, आदि। लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान ठंडी चीजों का अधिक सेवन बॉडी के तापमान को बढ़ाने के काम करता है, साथ ही बाहर की मीठी और ठंडी चीजों में कैलोरी भी अधिक होती है, ऐसे में ज्यादा ठंडी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। हाँ आप चाहे तो खीरा, दही, केला, या अन्य फल आदि को ठंडा करके उसका सेवन कर सकती है।

नमक

गर्मियों में प्रेगनेंसी के दौरान आपको नमक का सेवन भी अधिक नहीं करना चाहिए। क्योंकि गर्भवती महिला की बॉडी में सोडियम की अधिक मात्रा के कारण अतिरिक्त पानी इक्कठा होने के लगता है, जिसके कारण गर्भवती महिला को सूजन जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

मसालेदार भोजन

प्रेग्नेंट महिला को ज्यादातर चटपटा खाने की इच्छा होती है, लेकिन गर्मियों में अधिक चटपटा और मसालेदार भोजन खाने से गर्भवती महिला को परेशानी हो सकती है। जैसे की एसिडिटी, सीने में जलन, खट्टी डकार, पेट में ऐंठन आदि। ऐसे में गर्भवती महिला को गर्मियों में हल्का और पोषक तत्वों से भरपूर आहार का सेवन करना चाहिए जिससे प्रेगनेंसी के दौरान परेशानी से बचाव में मदद मिल सके।

ड्राई फ्रूट

ड्राई फ्रूट्स जैसे बादाम, किशमिश आदि की तासीर बहुत ही गरम होती है। और गर्मी में अधिक गरम करने वाली चीजे खाने से पेट में गर्मी बढ़ सकती है, जिसके कारण गर्भाशय में संकुचन आदि की समस्या उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में इन चीजों का सेवन करने से बचना चाहिए, और साथ ही बादाम आदि खाने हो तो रात भर के लिए इन्हे पानी में भिगोकर इनका सेवन करना चाहिए।

कैफीन

चाय, कॉफ़ी, में कैफीन की मात्रा अधिक होती है, और कैफीन का अधिक सेवन गर्भवती महिला के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी परेशानी खड़ी कर सकता है। ऐसे में गर्मियों में प्रेगनेंसी के दौरान चाय या कॉफ़ी का सेवन भी अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।

अंडे

प्रेगनेंसी के दौरान अंडे का सेवन गर्भवती महिला के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर शारीरिक और मानसिक विकास में मदद करता है। लेकिन गर्मियों में आपको इसका अधिक सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि अंडे की तासीर भी गरम होती है, और आवश्यकता से अधिक इसका सेवन करने से आपको परेशानी का अनुभव हो सकता है।

अदरक

बॉडी में हो रहे हार्मोनल बदलाव के कारण प्रेगनेंसी के समय कमजोरी व् थकान का अनुभव होना आम बात होती है। ऐसे में अदरक की चाय का सेवन आपको इस समस्या से निजात दिला सकता है, लेकिन गर्मियों में यदि आप प्रेग्नेंट हैं तो आपको अदरक का सेवन सोच समझ कर करना चाहिए। क्योंकि अदरक का सेवन अधिक मात्रा में करने से गर्भवती महिला को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि अदरक की तासीर गरम होती है।

मटन

गर्मियों में यदि गर्भवती महिला मटन, नॉन वेज आदि का अधिक सेवन करती है, तो ऐसा करने से पेट में गर्मी हो सकती है। जिसके कारण पेट सम्बन्धी समस्या का सामना गर्भवती महिला को करना पड़ सकता है।

तो यह हैं कुछ बातें जो गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान ध्यान रखनी चाहिए ताकि गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिल सकें। साथ ही क्या खाना चाहिए और क्या नहीं इसके बारे में आप चाहे तो अपनी डॉक्टर से भी राय ले सकते है। साथ ही जितना हो सकें गर्मियों में प्रेगनेंसी के दौरान तरल चीजों का भरपूर सेवन करें क्योंकि गर्मियों में यह गर्भवती महिला को एनर्जी से भरपूर रखने और डिहाइड्रेशन की समस्या से बचाव करने में मदद करता है।

Hindi Video : Garbhvati mahila garmiyon me ye nahi khayen?

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प्रेगनेंसी के पहले महीने में शिशु का विकास और महिला के शरीर में क्या क्या बदलाव होते हैं

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प्रेगनेंसी किसी भी महिला के लिए बहुत ही खास और अनोखा अनुभव होता है, क्योकि महिला अपने गर्भ में एक नहीं सी जान को रखकर उसे जन्म देने का सौभाग्य पाती है। ऐसे में प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने, महिला के लिए बहुत खास होते हैं। और इस दौरान महिला को बहुत सी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन उसके बाद भी महिला यह जानने के लिए उत्सुक रहती है की गर्भ में शिशु का विकास कैसे हो रहा है। तो आइये आज हम आपके लिए इसी खास अनुभव को शेयर करने जा रहें हैं जिससे आपको पता चलता है की पहले महीने में प्रेगनेंसी के क्या लक्षण होते हैं और इस दौरान शिशु का विकास कैसे होता है।

महिला का गर्भ कैसे ठहरता है?

जब महिला और पुरुष सम्बन्ध बनाते हैं, और दोनों सम्बन्ध बनाकर संतुष्ट हो जाते हैं, उसके बाद शुक्राणु निकलते हैं जो की प्रेगनेंसी के के लिए बहुत अहम होते हैं और साथ ही महिला के गर्भ ठहरने की प्रक्रिया निषेचन पर निर्भर करती है, यदि महिला का गर्भ ठहरता है तो फैलोपियन ट्यूब में महिला के गर्भ में रखे अंडे का निषेचन पुरुष के शुक्राणु द्वारा किया जाता है। ऐसे में महिला के गर्भ ठहरने के लिए बेहतर शुक्राणु का होना बहुत जरुरी होता है। और यदि निषेचन की प्रक्रिया बेहतर तरीके से हो जाती है तो महिला का गर्भ ठहर जाता है।

महिला के गर्भ ठहरने के लक्षण

पीरियड्स के खत्म होने के एक महीने तक महिला को यह पता नहीं चलता है की उसका गर्भ ठहर गया है। लेकिन यदि निषेचन हो जाता है तो उसी समय से बॉडी में बहुत से बदलाव होने शुरू हो जाते हैं। जैसे की तेजी से हार्मोनल बदलाव होने के कारण सिर में दर्द, कमजोरी, वजन कम होना, उल्टी आदि का आना, कुछ खाने का मन न करना आदि लक्षण होते हैं जो महिला में प्रेग्नेंसी के पहले महीने में ही दिखाई देने लग जाते हैं।

गर्भावस्था के पहले महीने में शिशु का विकास

  • प्रेगनेंसी के पहले महीने महिला को खुद भी नहीं पता होता है की वो प्रेग्नेंट हैं, लेकिन महिला के पीरियड्स के आखिरी दिन से ही महिला का गर्भ ठहरने की तैयारी शुरू हो जाती है, क्योंकि अंडाशय में अंडे का निर्माण हो जाता है।
  • लेकिन यदि निषेचन की प्रक्रिया यानी महिला के गर्भ में रखे अंडे का पुरुष के शुक्राणु द्वारा निषेचन हो जाता है तो ऐसे में महिला का गर्भ ठहर जाता है।
  • और गर्भ ठहरते ही शिशु का विकास भी शुरू हो जाता है, ऐसे में सबसे पहले एमनियोटिक थैली का निर्माण होता है, जिसमे शिशु नौ महीने तक रहता है।
  • साथ ही इस समय प्लेसेंटा का भी निर्माण होता है यह एक गोल चपटी नाल होती है जो शिशु को महिला के साथ जोड़कर रखती है, और इसी के द्वारा शिशु तक आहार पहुँचाया जाता है, और शिशु इस के माध्यम से मल भी बाहर निकालता है।
  • पहले महीने में शिशु के अंगो का विकास होने लगता है इसमें शिशु की आँखे, मुँह, जबड़ा, गर्दन आदि सबसे पहले विकसित होने लगते हैं।
  • इसके अलावा शिशु की आंतरिक सरंचना भी शुरू हो जाती है जिसमे रक्त कोशिकाएं बनने लगती है, और उनमे रक्त का प्रवाह भी शुरू हो जाता है।
  • पहले महीने में शिशु का आकार बिल्कुल चावल के दाने जितना होता है, और उसके बाद जैसे जैसे समय आगे बढ़ता है उसी अनुसार शिशु भी विकसित होने लगता है।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु के विकास से जुडी कुछ बातें ऐसे में यदि आप एक महीने बाद पीरियड्स मिस होने के बाद टेस्ट करती है, और रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो उसके बाद महिला को डॉक्टर से तुरंत मिलना चाहिए ताकि शिशु का और बेहतर तरीके से विकास होने में मदद मिल सके।

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गर्भावस्था के पहले महीने में शिशु का विकास और गर्भवती महिला में क्या क्या बदलाव आते हैं?

प्रेग्नेंट नहीं हो इसके लिए क्या करें

प्रेग्नेंट नहीं हो इसके लिए क्या करें, अनचाहे गर्भ से बचने के टिप्स, प्रेगनेंसी रोकने के तरीके, गर्भधारण से बचने के आसान तरीके, प्रेग्नेंट न होने के आसान टिप्स

शादी के बाद कुछ कपल अपनी फैमिली को जल्दी आगे बढ़ाने के लिए नहीं सोचते हैं, साथ ही दूसरे बच्चे में गैप हो इसके लिए भी प्रेगनेंसी न हो इसके लिए तरह तरह के तरीके इस्तेमाल करते हैं। अनचाहे गर्भ की समस्या से महिला के शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि बार बार गर्भपात होने के कारण महिला के शरीर में कमजोरी आने लग जाती है। ऐसे में इस समस्या से बचने के लिए कपल को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए की सम्बन्ध बनाते समय वो अच्छे से ध्यान रखें और सुरक्षा का इस्तेमाल करें। कई बार तो प्रेगनेंसी के डर से महिलाएं सम्बन्ध बनाने में भी कतराने लगती है जिसके कारण कपल के रिश्ते में तनाव आने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। तो आज हम आपको कुछ ऐसे ही खास टिप्स बताने जा रहें हैं जिनसे आपको अनचाहे गर्भ से बचने में मदद मिलेगी।

सुरक्षा का इस्तेमाल

प्रेगनेंसी से बहने का सबसे आसान तरीका होता है की जब भी आप अपने पार्टनर कके साथ सम्बन्ध बनाते हैं तो उस दौरान महिला या पुरुष दोनों में से किसी एक को सुरक्षा का इस्तेमाल करना चाहिए। महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए ही यह आसानी से किसी भी मेडिकल स्टोर पर मिल जाती है।

कॉपर टी

मेडिकल ने भी कॉपर टी जैसी सुविधा महिलाओं के लिए दी है जिसमे महिलाओं के प्राइवेट पार्ट में इसे इन्सर्ट कर दिया जाता है। और उसके बाद आप बिना किसी डर के सम्बन्ध बना सकते हैं, महिलाएं इसे तीन, पांच या दस साल के लिए भी इन्सर्ट करवा सकती है।

गर्भनिरोधक गोलियां

सम्बन्ध बनाने के बहत्तर घंटे के अंदर यदि आप इस गोली का सेवन कर लेते हैं तो इसके कारण भी आपका गर्भ नहीं ठहरता हैं। इस दवाई को यदि समय के बाद लिए जाए तो यह अपना असर नहीं दिखाती है। वैसे महिला के लिए प्रेगनेंसी से बचने का यह सबसे आसान तरीका है लेकिन इसके अधिक सेवन से महिला को परेशानी भी हो सकती है।

प्रेगनेंसी से बचने के अन्य टिप्स

  • पीरियड्स खत्म होने के पांच से सात दिन के बाद एक हफ्ते तक सम्बन्ध बनाने से बचना चाहिए क्योंकि यह ओवुलेशन पीरियड होता है इसमें महिला के गर्भ ठहरने के चांस सबसे ज्यादा होते हैं।
  • सम्बन्ध बनाने के बाद उसी समय उठकर यूरिन पास कर आएं, यह भी महिला का गर्भ न ठहरे इसके लिए एक घरेलू उपाय है।
  • गर्भपात न हो इसके डर से बचने के लिए महिलाओं को प्रेगनेंसी में विटामिन सी कम लेना चाहिए, लेकिन यदि आप इनका सेवन भरपूर मात्रा में करती हैं तो इसके कारण भी गर्भ ठहरने के चांस बहुत कम होते हैं।
  • सम्बन्ध बनाने के बाद लेटे न रहे बल्कि उठकर अपने प्राइवेट पार्ट को साफ़ कर लेना चाहिए इससे भी गर्भ ठहरने के चांस को कम किया जा सकता है।

तो यह हैं कुछ खास टिप्स जिनका इस्तेमाल करने से महिलाओं को अनचाहे गर्भ की समस्या से बचने में मदद मिलती है। इसके अलावा कई बार महिलाओं को थोड़ा लेट पता चलता है की उनका गर्भ ठहर गया है तो ऐसे में इसके लिए आपको डॉक्टर से राय लेनी चाहिए।

छह लक्षण जो बताते हैं की डिलीवरी होने वाली है

प्रेगनेंसी के आखिरी समय में महिला को यही डर सताता है की पता नहीं उसकी डिलीवरी कैसे होगी, प्रसव का समय आ गया है इस बारे में कैसे पता चलेगा, आदि। ऐसा डर ज्यादातर पहली बार माँ बन रही महिलाओं को महसूस हो सकता है, क्योंकि दूसरी बार उन्हें प्रसव पीड़ा के संकेत के बारे में जानकारी हो जाती है। साथ ही प्रेगनेंसी के आखिरी समय में डॉक्टर से भी जांच करवाते रहना चाहिए, ताकि गर्भ में पल रहे शिशु की स्थिति और गर्भवती महिला की हालत का पता चलता रहे। इसके अलावा आज हम आपको कुछ ऐसे लक्षणों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनसे गर्भवती महिला को अंदाजा लग सकता है की डिलीवरी का समय पास आ गया है, और उसे जितना जल्दी हो सके डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, तो आइये अब जानते हैं की प्रसव का समय पास आने के लक्षण कौन से हैं।

शिशु का भार नीचे की तरफ महसूस हो

प्रेगनेंसी के दौरान लगातार पेट का आकार बढ़ता रहता है, ऐसे में डिलीवरी का समय पास आने के दौरान कुछ महिलाओं को महसूस को सकता है, कि बच्चे का सर पेडू की हड्डी के नीचे बीच में आ गया है। साथ ही कुछ महिलाओं को ऐसा भी महसूस हो सकता है की शिशु नीचे गिरने वाला है, ऐसे में डरने की कोई बात नहीं होती है। बल्कि यह लक्षण डिलीवरी का समय नजदीक आने का संकेत होता है।

यूरिन पास करने की इच्छा अधिक होना

शिशु के नीचे की तरफ आने और पेडू पर दबाव पड़ने के कारण बार बार यूरिन पास करने की इच्छा हो सकती है। और यदि हर दस मिनट बाद ही यूरिन पास करने की इच्छा होती है तो यह भी महिला के प्रसव का समय नजदीक आ गया है इस बात की और इशारा करता है।

पीठ में दर्द

जैसे जैसे शिशु पेट से नीचे की तरफ आने लगता है वैसे वैसे मांसपेशियों में अधिक खिंचाव महसूस होने लगता है। जिसके कारण गर्भवती महिला को बहुत पेडू पर अधिक दबाव महसूस होने के साथ पीठ में भी दर्द की समस्या अधिक हो सकती है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला को यदि पीठ में भी बहुत अधिक दर्द महसूस हो तो यह भी प्रसव पीड़ा का संकेत देता है।

पेट के आकार में बदलाव

डिलीवरी का समय पास आने पर पेट के आकार में भी बदलाव महसूस होता है, यदि गर्भवती महिला को महसूस हो की पेट नीचे की तरफ झुकता जा रहा है। तो यह भी शिशु के गर्भ में प्रसव के लिए अपनी सही पोजीशन में आने का संकेत होता है। साथ ही यदि में कम फिर ज्यादा पेट में दर्द का अनुभव हो या रुक रुक कर दर्द का अहसास हो तो यह भी शिशु के जन्म होने का संकेत देता है।

प्राइवेट पार्ट से स्त्राव

शिशु गर्भ में एमनियोटिक फ्लूड में होता है, ऐसे में जब शिशु गर्भ में बाहर आने के लिए तैयार होता है तो एमनियोटिक बैग खुल जाता है और प्राइवेट पार्ट से गाढ़ा चिपचिपा स्त्राव होना शुरू हो जाता है। हो सकता है की महिला को इसमें खून के धब्बे भी दिखाई दें, ऐसे में यह स्त्राव लगातार महसूस हो तो आपको बिना देरी किये डॉक्टर के पास जाना चाहिए क्योंकि यह इस बात का संकेत देता है की डिलीवरी का समय पास आ गया है और किसी भी समय अब शिशु हो सकता है।

शरीर के अन्य भागो में आराम महसूस होना

तीसरी तिमाही के आख्रिर समय में एक अच्छी बात यह होती है की जैसे जैसे शिशु नीचे की तरफ होता है वैसे वैसे शरीर के बाकी अंगो को आराम महसूस होता है। और यदि गर्भवती महिला को पेट पर अधिक जोर महसूस हो और बाकी अंग रिलैक्स हो तो भी यह प्रसव पीड़ा अब किसी भी समय शुरू हो सकती है इस बात की और इशारा करती है।

तो यह हैं कुछ लक्षण जो यदि गर्भवती महिला बॉडी में महसूस करती है, तो यह इस बात का संकेत देती है की अब जल्द ही नन्हा मेहमान उनकी जिंदगी में आने वाला है। साथ ही ऐसा भी हो सकता है की डिलीवरी की दी गई तारीख के बाद भी महिला को बॉडी में कोई ऐसा लक्षण महसूस न हो तो भी ज्यादा देरी न करते हुए एक बार डॉक्टर से जरूर संपर्क करना चाहिए।

Hindi Video : Delivery Symtoms in 9th Month of Pregnancy

Delivery Symtoms in 9th Month

प्रेगनेंसी के सातवें से नौवें महीने में कैसे रखे ध्यान?

गर्भावस्था के सातवें से नौवें महीने को थर्ड ट्रिमेस्टर या तीसरे भाग के नाम से जाना जाता है। प्रेगनेंसी का यह समय गर्भवती महिला के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इस भाग के अंत में डिलीवरी का समय आ जाता है। इस समय में गर्भवती महिला को बहुत से टेंशन भी होती है। आइये देखते है गर्भावस्था के आखिरी तीन महीनो में कैसे बदलाव होते है और कैसे अपना ध्यान रखना होता है।

शारीरिक बदलाव

प्रेगनेंसी के आखिरी तीन महीनो में गर्भवती महिला को ज्यादा कमर दर्द, सूजन, चलने फिरने के परेशानी आदि से गुजरना पड़ता है। इस समय में बेबी गर्भाशय में बहुत सी मूवमेंट्स करता है। इस दौरान पेट कई बार बहुत ज्यादा टाइट हो जाता है। सामान्यतः पेट के टाइट होने से दर्द नहीं होता फिर भी अगर दर्द महसूस हो तो डॉक्टर से जरूर सलाह लें। इस समय में गर्भाशय पर प्रेशर ज्यादा बढ़ने से बार बार पेशाब के लिए जाना पड़ता है। प्रेगनेंसी के आखिरी महीनो में स्तनों में दूध अच्छे से भरा होने के कारण कई बार दूध रसाव भी होने लगता है। इस समय में गर्भवती महिला को नींद कम आने की परेशानी से भी गुजरना पड़ता है।

गर्भवस्था के इस भाग में शिशु और अपना ध्यान रखने के लिए अच्छे से भोजन करे। भोजन में दो से ज्यादा घंटो का गैप ना दे। इस समय में डॉक्टर द्वारा बताई गयी विटामिन्स और आयरन की दवाइयां समय पर लेते रहे। इस दौरान फल, सब्जियां और फाइबर से भरपुर भोजन जरूर खायें। अच्छे से आराम ले और रात में कम से कम 8 घंटे की नींद और दिन में 2 घंटे की नींद लें। एक्टिव रहने के लिए मॉर्निंग वाक जरूर करें।

मानसिक बदलाव

इस भाग में लगभग सभी महिलाये डिलीवरी को लेकर बहुत चिंतित रहती है। इस समय में बहुत सी महिलाये ज्यादा स्ट्रेस लेती है। नींद कम आने से भी तनाव उनके चेहरे पर नजर आता है। इसके लिए जरुरी है के अपने डॉक्टर से बात करें। डॉक्टर आपको सोने के लिए सही पोजीशन बताएंगे जिससे आपको आराम करने में आसानी होगी। इसके अतिरिक्त डॉक्टर से आप डिलीवरी को लेकर भी बात कर सकते है जिससे आपका स्ट्रेस कम हो।

शिशु का विकास

प्रेगनेंसी के इस भाग में शिशु की मूवमेंट्स सबसे महत्वपूर्ण होती है। जैसे जैसे डिलीवरी का समय आता है भ्रूण का पूरी तरह विकास हो जाता है उसी हिसाब से शिशु की हरकते भी बदल जाती है। आखिरी महीने में शिशु पैर मारने के बजाय पेट में पूरी तरीके से घूमने लगता है। बेबी की इन मूवमेंट्स पर हमेशा ध्यान दीजिये। जब भी आप खाना खाये तो अपने शिशु की मूवमेंट्स को गिनिए। इस समय में आपके डॉक्टर भी आपको बेबी की मूवमेंट्स काउंट करने को कहते है। उनके हिसाब से एक घंटे में कम से कम शिशु की 8 से 10 मूवमेंट्स जरूर होनी चाहिए। अगर आपको इस समय में अपने शिशु की मूवमेंट्स महसूस नहीं हो पाती तो अपने डॉक्टर को जरूर बताये।