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प्रेगनेंसी का चौथा महीना – लक्षण, डाइट और सावधानियां

Fourth Month of Pregnancy- Symptoms, Diet and Precautions गर्भावस्था का चौथा महीना यानी की प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही का आगाज़, इस दौरान महिला थोड़ी बेफिक्र हो सकती है। क्योंकि अब महिला के गर्भपात होने का खतरा कम हो जाता है। लेकिन शिशु का विकास और भी तेजी से होना शुरू हो जाता है। क्योंकि अब शिशु के अंग पूरी तरह बन चुके होते हैं और अब उन अगों का विकास तेजी से होना शुरू हो जाता है।

ऐसे में जरुरी होता है की महिला अपना अब अच्छे से ध्यान रखें। किसी भी तरह की लापरवाही नहीं करें इसके अलावा प्रेगनेंसी के दौरान माँ व् बच्चे के लिए जो जो चीजें करना जरुरी है महिला अब वह करें। प्रेगनेंसी के चौथे महीने में भी महिला के शरीर में बहुत से लक्षण महसूस होते हैं, महिला को बहुत सावधानियां बरतनी जरुरी होती है। तो आइये अब आगे इन सभी चीजों का बारे में विस्तार से जानते हैं।

गर्भावस्था के चौथे महीने के लक्षण

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में भी महिला को शरीर में बहुत से लक्षण महसूस होते हैं। जिनकी वजह से महिला को कई शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। तो आइये अब जानते हैं की वो लक्षण कौन से हैं।

थोड़ा पेट दिखाई देना

ज्यादा नहीं लेकिन इस महीने में महिला का पेट थोड़ा बाहर निकल सकता है। लेकिन कई महिलाओं के पेट से तो इस महीने भी अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल होता है की महिला गर्भवती है।

वजन बढ़ना

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में महिला का वजन पहले की अपेक्षा बढ़ जाता है। क्योंकि इस दौरान गर्भ में शिशु का वजन भी पहले की अपेक्षा बढ़ जाता है। साथ ही महिला के शरीर में भी बदलाव आता है।

पाचन क्रिया से जुडी समस्या

इस दौरान गर्भाशय का आकार बढ़ने के कारण पेट के निचले हिस्से पर दबाव बढ़ जाता है। जिसकी वजह से पाचन क्रिया थोड़े धीमे काम कर सकती है। और पाचन क्रिया के धीमे काम करने की वजह से कब्ज़, पेट में गैस जैसी परेशानी का सामना महिला को अधिक करना पड़ सकता है।

भूख व् प्यास में बढ़ोतरी

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में शारीरिक परेशानियां पहले की अपेक्षा थोड़ी कम हो जाती है। साथ ही गर्भ में शिशु का विकास भी तेजी से होने लगता है ऐसे में महिला की भूख व् प्यास पहले से ज्यादा महिला को लग सकती है। ऐसे में महिला को अपनी डाइट में ज्यादा पोषक तत्वों को शामिल करना चाहिए जिससे माँ व् बच्चे दोनों का विकास बेहतर होने में मदद मिल सके।

कमजोरी व् थकान महसूस होना

इस दौरान गर्भ में शिशु का विकास तेजी से होता है जिसकी वजह से उसे ज्यादा पोषक की जरुरत होती है। ऐसे में शरीर में खून के उत्पादन में बढ़ोतरी हो जाती है जिसकी वजह से ब्लड फ्लो व् ब्लड प्रैशर पर भी असर पड़ता है। साथ ही इसकी वजह से हार्मोनल अंसतुलन की समस्या भी हो सकती है। ऐसे में महिला को थकान व् कमजोरी महसूस हो सकती है।

स्किन में बदलाव

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में कुछ महिलाएं अपनी स्किन में भी बदलाव का अनुभव कर सकती है। जैसे की कुछ महिलाओं की स्किन ग्लोइंग हो सकती है तो कुछ महिलाओं को स्किन पर दाग धब्बे महसूस हो सकते हैं।

एनर्जी आती है

गर्भावस्था के पहले तीन महीने जहां महिला शरीर में ज्यादा कमजोरी का अनुभव करती है। वहीं प्रेगनेंसी के चौथे महीने में महिला अपने अंदर थोड़ी एनर्जी का अनुभव करती है। लेकिन ऐसा जरुरी नहीं है की हर महिला के साथ ऐसा हो कुछ महिलाएं इस दौरान भी बहुत ज्यादा शारीरिक परेशानियां झेल सकती है।

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में यह खाएं

गर्भावस्था के चौथे महीने में जान गर्भ में शिशु के अंगों का विकास ज्यादा तेजी से होने लगता है तो इसका मतलब यह है की महिला को पोषण भी ज्यादा चाहिए होगा। ऐसे में जरुरी है की गर्भवती महिला अपनी डाइट में और भी बदलाव करें और ज्यादा पोषक तत्वों को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं। ताकि माँ व् बच्चे को फिट रहने और परेशानियों से बचें रहने में मदद मिल सकें।

फाइबर युक्त डाइट

इस दौरान पाचन क्रिया के धीमे काम करने के कारण महिला की कब्ज़ की समस्या बढ़ सकती है। ऐसे में इस परेशानी को कम करने के लिए महिला को फाइबर युक्त डाइट लेनी चाहिए। क्योंकि फाइबर युक्त डाइट लेने से इस परेशानी को कम करने में मदद मिलती है। और फाइबर के लिए महिला को साबुत अनाज, हरी पत्तेदार सब्जियां, ओट्स, फल आदि को अपनी डाइट का अहम हिस्सा बनाना चाहिए।

कैल्शियम

गर्भ में शिशु की हड्डियों के विकास में कोई कमी न हो साथ ही महिला को भी थकान व् कमजोरी की समस्या नहीं हो इसके लिए जरुरी है की महिला अपनी डाइट में कैल्शियम भरपूर मात्रा में लें। ऐसे में कैल्शियम के लिए महिला को नियमित रूप से दूध, दही व् अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए।

आयरन व् फोलिक एसिड

आयरन और फोलिक एसिड दोनों ही ऐसे पोषक तत्व है जो यदि शिशु को सही मात्रा में न मिलें तो इसकी वजह से शिशु के शारीरिक व् मानसिक विकास में कमी आ सकती है। साथ ही आयरन की कमी के कारण गर्भवती महिला को भी बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में महिला को आयरन व् फोलिक एसिड की शरीर में कमी नहीं होने देनी चाहिए। इसके लिए महिला हरी सब्जियां, गाजर, अनार, सेब, ड्राई फ्रूट्स आदि का सेवन कर सकती है।

प्रोटीन है जरुरी

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में महिला को अपनी डाइट में प्रोटीन का भी भरपूर सेवन करना चाहिए ताकि शिशु की मांसपेशियों के बेहतर विकास में मदद मिल सकें। साथ ही महिला भी एनर्जी से भरपूर रहे और प्रोटीन के लिए महिला ड्राई फ्रूट्स, दालें, फल व् सब्जियों आदि को अपनी डाइट का अहम हिस्सा बना सकती है।

फैटी एसिड

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में महिला नॉन वेग व् अंडों का सेवन भी कर सकती है और ये फैटी एसिड, आयरन, प्रोटीन आदि से भरपूर होते हैं। जो माँ व् बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं ऐसे में महिला को चौथे महीने में फैटी एसिड का सेवन भरपूर करना चाहिए।

क्या प्रेगनेंसी के चौथे महीने में अंडे व् नॉन वेज खाना सेफ होता है?

जी हाँ, यदि महिला अंडे व् नॉन वेज का सेवन कर लेती है तो महिला चौथे महीने से अंडे व् नॉन वेज खा सकती है। लेकिन ध्यान रखें की कच्चे अंडे, कच्चा नॉन वेज, अच्छे से न पका हुआ अंडा या नॉन वेज, बासी नॉन वेज आदि का सेवन महिला नहीं करे। क्योंकि इसकी वजह से महिला की पेट सम्बन्धी समस्या अधिक बढ़ सकती है और डायरिया जैसी समस्या होने का खतरा बढ़ जाता है। जिससे महिला व् शिशु दोनों की सेहत को खतरा होता है।

क्या प्रेगनेंसी के चौथे महीने में सम्बन्ध बनाना सेफ होता है?

डॉक्टर्स के अनुसार यदि आपकी प्रेगनेंसी में किसी भी तरह के कॉम्प्लीकेशन्स नहीं है, महिला को कोई दिक्कत नहीं है, महिला की रजामंदी है, तो पूरी सावधानी के साथ सम्बन्ध बनाने में कोई भी दिक्कत नहीं होती है। लेकिन यदि महिला को परेशानी होती है और महिला का मन नहीं करता है तो आपको सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए।

गर्भावस्था के चौथे महीने में शिशु का विकास

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में शिशु का विकास पहले की अपेक्षा थोड़ा और बढ़ जाता है। और इस महीने की शुरुआत में यदि आपको डॉक्टर अल्ट्रासॉउन्ड के लिए बोलते हैं तो उसमे आपको शिशु गर्भ में थोड़ा मूव करता हुआ भी दिखाई देता हैं। इसके अलावा शिशु के विकास में और क्या बदलाव आते हैं आइये उसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

  • इस दौरान आपका शिशु लगभग 5.1 या 6 इंच तक लंबा हो जाता है और इसका वजन 120 से 150 ग्राम तक हो सकता है।
  • शिशु का आकार इस दौरान एक संतरे के बराबर हो जाता है।
  • इस दौरान शिशु के सिर, पलकों, आइब्रो आदि पर बाल आने शुरू हो चुके होते हैं।
  • शिशु के कानों का विकास होना भी इस दौरान शुरू हो जाता है।
  • एमनियोटिक बैग में फ्लूइड की मात्रा भी बढ़ जाती है क्योंकि अब शिशु धीरे धीरे और ज्यादा मूव करना शुरू करता है।

प्रेगनेंसी के चौथे महीने में बरतें यह सावधानियां

गर्भावस्था के चौथे महीने में महिला को और ज्यादा सावधानी बरतनी शुरू कर देनी चाहिए। ताकि न तो किसी तरह की परेशानी हो और साथ ही महिला व् शिशु के बेहतर विकास में मदद मिल सकें। तो आइये महिला को किन- किन सावधानियों को बरतना चाहिए उसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

  • महिला को खाने पीने में लापरवाही नहीं करना चाहिए बल्कि महिला को पोषक तत्वों से भरपूर डाइट लेनी चाहिए और साथ ही पानी का भरपूर सेवन करना चाहिए।
  • नींद भरपूर लेनी चाहिए ताकि महिला को फ्रैश व् एनर्जी से भरपूर रहने में मदद मिल सकें।
  • महिला को ज्यादा तेजी से चलना नहीं चाहिए।
  • ज्यादा सीढ़ी चढ़ने और तेजी से सीढ़ी चढ़ने से परहेज करना चाहिए।
  • पेट के बल नहीं सोना चाहिए क्योंकि अब ऐसा करने से गर्भ पर बुरा असर पड़ सकता है।
  • गर्म पानी से नहीं नहाना चाहिए।
  • नशीले पदार्थों का सेवन करने से बचें साथ ही जिस जगह इनका कोई सेवन कर रहा हो वहां भी न जाएँ।
  • अगर आपके घर में कोई पालतू जानवर है तो उसका काम करने से बचें व् उससे दूरी बनाकर रखें।
  • कैफीन का सेवन जरुरत से ज्यादा नहीं करें क्योंकि इससे शिशु के विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
  • ज्यादा भीड़भाड़, ज्यादा शोर, ज्यादा प्रदूषण वाली जगह पर जाने से बचें।
  • भारी सामान उठाने, किसी चीज पर चढ़कर काम करने, झुककर काम करने, पेट के बल काम करने, लम्बे समय तक खड़े रहकर काम करने आदि से बचें।
  • नियमित समय पर डॉक्टर से जांच करवाना नहीं भूलें।

तो यह है प्रेगनेंसी के चौथे महीने में क्या करें क्या नहीं करें, क्या लक्षण महसूस होते हैं, बच्चे का विकास कितना होता है, आदि से जुडी जानकारी। तो यदि आप भी माँ बनने वाली है तो आपके लिए यह जानकारी फायदेमंद हो सकती है। उम्मीद करते हैं आपको यह जानकारी पसंद आये और आपके लिए फायदेमंद भी हो।

प्रेगनेंसी का तीसरा महीना- लक्षण, डाइट और सावधानियां

Third Month of Pregnancy Symptoms, Diet and Precautions प्रेगनेंसी के हर महीने महिला नए अनुभव नए अहसास व् नए लक्षण को अनुभव करती है। प्रेगनेंसी का तीसरा महीना महिला के लिए प्रेगनेंसी के पहली तिमाही को पूरा करता है। और यदि महिला तीसरे महीने तक अपनी अच्छे से केयर कर लेती है तो आगे का सफर महिला के लिए थोड़ा आसान हो जाता है। साथ ही प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में महिला के शरीर में और भी अलग अलग लक्षण महसूस हो सकते हैं। इसके अलावा शिशु के शारीरिक विकास में भी वृद्धि हो जाती है।

गर्भावस्था के तीसरे महीने में महीने में महिला यदि अपना अच्छे से ध्यान रखती है, अपनी डाइट अच्छी रखती है तो इससे शिशु के शारीरिक विकास को मानसिक विकास को शुरुआत से ही बेहतर होने में मदद मिलती है। तो आइये अब इस आर्टिकल में प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में महिला को क्या-क्या लक्षण महसूस हो सकते हैं, शिशु का शारीरिक विकास कितना हो जाता है, महिला को क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए उसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

प्रेगनेंसी के तीसरे महीने के लक्षण

गर्भावस्था के तीसरे महीने में महिला को शरीर में अलग-अलग लक्षण महसूस हो सकते हैं। लेकिन हर महिला को एक ही जैसे लक्षण महसूस हो ऐसा भी जरुरी नहीं होता है। यह हर महिला के शारीरिक कंडीशन पर निर्भर करता है। ऐसे में हर महिला के शरीर में अलग अलग लक्षण महसूस हो सकते हैं। तो आइये जानते हैं की प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में महिला के शरीर में कौन-कौन से लक्षण महसूस हो सकते हैं।

पेट में दर्द

तीसरे महीने में गर्भाशय का आकार भी थोड़ा बढ़ जाता है जिसकी वजह से लिगामेंट्स में खिंचाव महसूस होता है। खिंचाव महसूस होने के कारण महिला को पेट में निचले हिस्से में थोड़ा दर्द महसूस हो सकता है।

कब्ज़

हार्मोनल बदलाव व् बढ़ते गर्भाशय के दबाव के कारण पाचन क्रिया थोड़ा धीमे काम कर सकती है। जिसकी वजह से महिला को कब्ज़ जैसी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।

बार बार यूरिन आने की समस्या

बढ़ते गर्भाशय के दबाव के कारण, शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण महिला के यूरिन करने की इच्छा में बढ़ोतरी हो जाती है। और प्रेगनेंसी में जैसे जैसे समय आगे बढ़ता महिला की यह समस्या बढ़ जाती है।

खाने के स्वाद में बदलाव

इस दौरान महिला अपने खान पान के स्वाद में भी बदलाव का अनुभव करती है। जैसे की महिला का उन चीजों को खाने का मन हो सकता है जो महिला को पहले नहीं करता था। साथ ही अब महिला को उन चीजों को खाने का मन नहीं करता है जो महिला का पहले करता था।

स्त्राव हो सकता है

गर्भवती महिला को इस समय प्राइवेट पार्ट से सफ़ेद पानी का स्त्राव महसूस हो सकता है। इसमें घबराने की कोई बता नहीं होती है ऐसा होना बहुत आम होता है। साथ ही यह महिला को संक्रमण की समस्या से बचाये रखने में मदद करता है।

थकान व् कमजोरी

प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में महिला यदि अपनी डाइट का ध्यान नहीं रखती है। पोषक तत्वों से युक्त डाइट का सेवन नहीं करती है, स्ट्रेस में रहती है तो इसकी वजह से महिला को थकान व् कमजोरी की समय बहुत ज्यादा हो सकती है।

तीसरे महीने में महसूस होने वाले अन्य लक्षण

  • इस दौरान महिला को नींद ज्यादा आ सकती है।
  • कुछ महिलाओं को उल्टी की समस्या अधिक तो कई महिलाओं को यह समस्या कम हो सकती है।
  • मूड स्विंग्स होना अधिक चिड़चिड़ाहट महसूस होना इस दौरान बहुत आम बात होती है।
  • ब्रेस्ट में दर्द और सूजा हुआ सा महसूस होना।
  • मॉर्निंग सिकनेस की समस्या होना।
  • सीने में जलन की समस्या हो सकती है।
  • सिर दर्द की समस्या व् घबराहट महसूस हो सकती है।

गर्भावस्था के तीसरे महीने की डाइट

प्रेगनेंसी में खान पान का बहुत अधिक महत्व होता है। जो गर्भवती महिला अपनी डाइट अच्छे से लेती है उतना ही गर्भवती महिला को स्वस्थ व् एक्टिव रहने में मदद मिलती है। इसके अलावा शिशु को भी अपने विकास के लिए भरपूर पोषक तत्व मिलते हैं। ऐसे में तीसरे महीने में महिला को अपनी डाइट से जुडी किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए आइये उसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

पानी पीएं भरपूर

जितना भोजन शरीर के लिए जरुरी है उतना ही पानी भी शरीर के लिए जरुरी है। ऐसे में गर्भवती महिला को खाने के साथ इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए की महिला दिन भर में आठ से दस गिलास पानी जरूर पीएं।

अन्य तरल पदार्थ भी लें

पानी के साथ निम्बू पानी, घर में निकला फलों का ताजा रस आदि भी महिला ले सकती है। इनसे महिला के शरीर में पानी की मात्रा भी पूरी होती है साथ ही महिला को फलों में मौजूद पोषक तत्व भी मिलते हैं। ध्यान रखें की घर में निकला जूस पीएं न की डिब्बाबंद जूस का प्रयोग करें।

कैल्शियम युक्त डाइट ले

प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में गर्भ में शिशु के शरीर की आकृतियां बन चुकी होती है और अब उन अंगों के विकास का समय होता है। खासकर हड्डियों का विकास ऐसे में महिला के लिए कैल्शियम युक्त डाइट का सेवन करना बहुत जरुरी होता है। इसके लिए महिला डेयरी प्रोडक्ट्स, फल, दालें आदि का भरपूर सेवन कर सकती है।

फाइबर युक्त डाइट लें

तीसरे महीने में अपनी डाइट में फाइबर युक्त खाद्य पदाथों को भी शामिल करें। क्योंकि इस दौरान पाचन क्रिया धीमे होने के कारण महिला को पेट सम्बन्धी समस्या हो सकती है ऐसे में फाइबर युक्त डाइट लेने से महिला की इस परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है। फाइबर के लिए महिला केला, मूंग दाल, व् अन्य चीजों का सेवन कर सकती है।

फल व् सब्जियां ले भरपूर

गर्भावस्था के दौरान महिला को फलों व् सब्जियों का भरपूर सेवन करना चाहिए क्योंकि महिला को फलों व् सब्जियों से भरपूर मात्रा में अलग अलग तरह क विटामिन्स मिनरल्स मिलते हैं। जो प्रेग्नेंट महिला व् शिशु दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। खासकर मौसमी सब्जियों व् फलों का तो खूब सेवन करना चाहिए।

दालें

फल व् सब्जियों के साथ महिला को दिन में एक समय में किसी न किसी दाल का सेवन भी जरूर करना चाहिए। क्योंकि दालें भी आयरन, प्रोटीन, कैल्शियम का बेहतरीन स्त्रोत होती है। ऐसे में दालों का सेवन करने से शिशु के शारीरिक व् मानसिक विक्स को बेहतर करने में मदद मिलती है।

तीसरे महीने में खाने से जुड़े अन्य टिप्स

  • एक बार भरपेट खाने की बजाय थोड़ा थोड़ा करके खाएं ताकि खाने को आसानी से हज़म करने में मदद मिल सकें।
  • बासी व् ठंडा खाना खाने से बचें हमेशा ताजा खाना बनाकर ही खाएं।
  • किसी भी खाद्य पदार्थ को खाने से यदि आपको दिक्कत महसूस होती है तो उन चीजों का सेवन नहीं करें।
  • डिब्बाबंद चीजें नहीं खाएं।
  • जनक फ़ूड का सेवन करने से बचें।
  • कुछ चटपटा खाने का मन है तो घर में ही नई नई रेसिपीज ट्राई करें।
  • कच्चा अंडा, नॉनवेज आदि को खाने से बचें।
  • नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करें साथ ही जहां पर इन चीजों का सेवन कोई कर रहा हो वहां भी जाने से बचें।
  • डॉक्टर द्वारा बताएं गए विटामिन्स का समय से सेवन करें।

गर्भावस्था के तीसरे महीने में शिशु का विकास

प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में शिशु का विकास तेजी से बढ़ने लगता हैं। शिशु के अंग लगभग बन चुके होते हैं इसके अलावा शिशु के विकास में और भी बदलाव आ चुके होते है और आ रहे होते हैं। जैसे की:-

  • शिशु इस दौरान ढाई इंच लम्बा हो जाता है और शिशु का वजन भी पच्चीस से तीस ग्राम के बीच हो जाता है।
  • शिशु का दिल पूरी तरह से काम करना शुरू कर चूका होता है और आप डोपलर की मदद से किसी भी समय डॉक्टर के पास जाकर शिशु के दिल की धड़कन को सुन सकते हैं।
  • इस दौरान शिशु का प्रजनन अंग भी बन चूका होता है।
  • शिशु के फेफड़े गुर्दे, पाचन तंत्र आदि सब बन चूका होता है।
  • गर्भ में शिशु के दिमाग का विकास भी होना शुरू हो जाता है।
  • शिशु की हड्डियों का ढांचा पूरी तरह से तैयार हो जाता है।
  • गर्भ में शिशु की आँख, कान, नाक सब बन चुके होते हैं, नाख़ून आने लग जाते हैं।

क्या प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में सम्बन्ध बना सकते हैं?

गर्भावस्था के तीसरे महीने में महिला को सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए क्योंकि शुरूआती तीन महीने महिला के लिए अबे ज्यादा नाजुक होते हैं। और ऐसे में यदि कोई गलती हो जाये तो इसकी वजह से दिक्कत हो सकती है। ऐसे में प्रेगनेंसी के पहले तीन महीने में महिला को सम्बन्ध बनाने से बचना चाहिए और उनके पार्टनर को भी उनका साथ देना चाहिए और उन्हें प्रेगनेंसी में संभालना चाहिए ताकि प्रेगनेंसी को और भी आसान बनाने में मदद मिल सके।

गर्भावस्था के तीसरे महीने में बरतें यह सावधानियां

  • गर्भवती महिला को ज्यादा उछल कूद नहीं करनी चाहिए।
  • डाइट नहीं करनी चाहिए।
  • पेट के बल कोई काम नहीं करना चाहिए।
  • ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगह, प्रदूषण वाली जगह पर नहीं जाना चाहिए।
  • अपने साइज से थोड़े ढीले कपडे पहनें।
  • नींद में लापरवाही नहीं करें बल्कि भरपूर नींद लें।
  • लम्बे समय तक पैरों के भर बैठकर काम करने, झुककर काम करने से बचें।
  • डॉक्टर से समय से अपनी जांच करवाएं।
  • तनाव नहीं लें बल्कि खुश रहें।
  • बिना डॉक्टरी सलाह के दवाइयों का सेवन नहीं करें।
  • आराम जरूर करें न की शरीर को हमेशा थकाकर रखें।
  • जरुरत से ज्यादा व्यायाम नहीं करें।
  • यदि आपको डॉक्टर इस दौरान अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए बोलते हैं तो आपको समय से उसे करवा लेना चाहिए। या फिर अन्य कोई भी जांच डॉक्टर करवाने के लिए बोलते हैं तो आपको वो भी करवा लेना चाहिए। ताकि आगे चलकर कोई दिक्कत न आये।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में महिला को क्या लक्षण महसूस हो सकते हैं, महिला को क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, आदि। यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी इन टिप्स को जरूर फॉलो करना चाहिए ताकि आपको प्रेगनेंसी को आसान बनाने में मदद मिल सकें।

ध्यान रखें:- इसके अलावा आप प्रेगनेंसी से जुडी किताबे पड़े, डॉक्टर से सलाह लें, हर किसी की बातों को न मानें, आदि। क्योंकि इन सभी टिप्स से आपको प्रेगनेंसी को समझने में मदद मिलती है।

प्रेगनेंसी का दूसरा महीना लक्षण, डाइट और सावधानियां

Second month of Pregnancy- tips, symptoms and dietगर्भावस्था महिला के लिए बहुत ही खूबसूरत समय होता है। खासकर जब महिला पहली बार माँ बनने वाली होती है तो यह ख़ुशी अलग ही होती है। साथ ही हर महिला अपने जीवन में माँ बनने का सुख प्राप्त करना चाहती है। गर्भवती महिला जब नौ महीने गर्भ में अपने शिशु को रखती है तो यह महिला के जीवन का सबसे प्यारा और अनोखा अनुभव होता है।

प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने तक महिला के शरीर में अलग अलग बदलाव आते हैं, शिशु के विकास में बदलाव आता है, महिला के शरीर में अलग अलग लक्षण महसूस होते हैं, आदि। प्रेगनेंसी के पहले महीने में महिला ज्यादातर लक्षणों को आंतरिक रूप से महसूस करती है।

गर्भावस्था के दूसरे महीने में कुछ लक्षण आपको और ज्यादा महसूस होने लग जाते हैं। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम आपको प्रेगनेंसी के दूसरे महीने से जुडी कुछ जानकारियां शेयर करने जा रहे हैं। जैसे की महिला को क्या लक्षण महसूस होते हैं, डाइट क्या होनी चाहिए, शिशु का विकास कितना होता है आदि।

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने के लक्षण

जब महिला गर्भवती होती है तो उसके साथ ही महिला के शरीर में तेजी से हार्मोनल बदलाव होने लगते हैं। और इन्ही हार्मोनल बदलाव के कारण महिला को कई शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। तो आइये जानते हैं की वह परेशानियां या फिर लक्षण कौन से हैं।

मॉर्निंग सिकनेस की समस्या

गर्भावस्था के दूसरे महीने में अधिकतर महिलाओं को इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता हैं। मॉर्निंग सिकनेस का मतलब होता है की सुबह उठते ही महिला को उल्टी या जी मिचलाने की समस्या जैसा महसूस होता हैं। कुछ महिलाओं को ऐसा केवल सुबह ही महसूस होता है तो कुछ महिलाएं पूरा दिन भी इस समस्या का सामना कर सकती है। जिसकी वजह से महिला को थकावट व् कमजोरी जैसी परेशानी भी अधिक हो सकती है।

पाचन क्रिया धीमी होना

पेट सम्बंधित समय जैसे की कब्ज़ होना, एसिडिटी होना जैसी परेशानी भी प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में हो सकती है। शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण पाचन क्रिया पर असर पड़ता है जिसकी वजह से महिला की पाचन क्रिया धीमे काम करने लगती है। इसीलिए महिला को थोड़ा थोड़ा करके खाने की सलाह दी जाती है ताकि महिला को इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सके।

चक्कर आना

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में शरीर में तेजी से बदलाव होने के कारण महिला की शारीरिक परेशानियां बढ़ सकती है। जिसकी वजह से महिला को कमजोरी, थकावट, सिर दर्द, चक्कर आना जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

भूख से जुड़े बदलाव

इस दौरान कुछ महिलाओं को अलग अलग चीजें खाने का मन करता हैं। जैसे की कुछ महिलाओं को खट्टा, कुछ को मीठा या चटपटा खाने की इच्छा हो सकती है। साथ ही कुछ महिलाओं को इस दौरान भूख में कमी जैसी परेशानी भी हो सकती है। लेकिन महिला को खाने से परहेज नहीं करना चाहिए।

ब्रेस्ट साइज में बदलाव

इस दौरान महिला को अपने ब्रेस्ट का साइज बड़ा हुआ भी महसूस हो सकता है। साथ ही महिला को निप्पल के रंग में बदलाव, स्तनों को छूने में दर्द की समस्या भी हो सकती है। ऐसा होने का कारण महिला के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन हॉर्मोन का असंतुलन होने के कारण होता है।

बार बार यूरिन आने की समस्या होना

शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण किडनी का काम बढ़ जाता है जिसकी वजह से महिला को बारे बार यूरिन पास करने की इच्छा भी हो सकती है।

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में महसूस होने वाले अन्य लक्षण

  • थकान बढ़ जाती है।
  • नींद ज्यादा या कम हो जाती है।
  • कब्ज़ की समस्या हो सकती है।
  • सीने में जलन महसूस हो सकती है।
  • मूड स्विंग्स की दिक्कत हो सकती है।
  • उल्टी की समस्या अधिक हो सकती है।
  • शरीर में दर्द व् ऐंठन की समस्या हो सकती है।
  • एसिडिटी की समस्या अधिक हो सकती है।

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने की डाइट

गर्भावस्था के दौरान खान पान का ध्यान रखना बहुत जरुरी होता है। क्योंकि पोषक तत्वों से भरपूर आहार लेने से महिला को एनर्जी मिलती है। जिससे महिला को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है और बच्चा भी माँ के जरिये ही पोषक तत्व लेता हैं। ऐसे में जितना माँ स्वस्थ रहेगी उतना ही बच्चा भी, इसीलिए जरुरी है की महिला प्रेगनेंसी के दौरान अपनी डाइट का अच्छे से ध्यान रखें। तो प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में महिला को डाइट से जुडी किन किन बातों का ध्यान रखें चाहिए आइये जानते हैं।

फाइबर युक्त डाइट

महिला को फाइबर युक्त डाइट अधिक लेनी चाहिए जिससे महिला की पाचन क्रिया को बेहतर होने में मदद मिल सकें। जैसे की महिला को दालें, फल आदि भरपूर लेना चाहिए क्योंकि इनमे फाइबर की अधिकता होती है।

कैल्शियम और प्रोटीन युक्त डाइट

दूसरे महीने में शिशु का विकास भी बढ़ने लगता हैं साथ ही महिला की शारीरिक परेशानियां भी बढ़ती है। ऐसे में महिला एनर्जी से भरपूर रहे और शिशु का विकास भी अच्छे से हो इसके कैल्शियम प्रोटीन युक्त डाइट जरुरी होती है। और डेयरी प्रोडक्ट्स जैसे की दूध दही पनीर आदि कैल्शियम प्रोटीन से भरपूर होते हैं। ऐसे में महिला को डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन जरूर करना चाहिए।

फोलिक एसिड है जरुरी

फोलिक एसिड प्रेगनेंसी के दौरान शिशु के विकास के लिए एक अहम पोषक तत्व होता है। यदि शिशु को फोलिक एसिड भरपूर मात्रा में नहीं मिलता है तो इसकी वजह से शिशु के शारीरिक व् मानसिक विकास में कमी आ सकती है। ऐसे में महिला को प्रेगनेंसी की शुरुआत से आखिर तक अपनी डाइट में फोलिक एसिड युक्त डाइट को जरूर शामिल करना चाहिए। इसके लिए महिला हरी सब्जियां, गाजर, अनार जैसी चीजों को अपनी डाइट में शामिल कर सकती है।

आयरन युक्त डाइट

गर्भवती महिला को आयरन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन भी जरूर करना चाहिए। क्योंकि महिला के शरीर में यदि खून की कमी होती है तो इसकी वजह से महिला को एनीमिया जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता हैं। साथ ही इससे शिशु को जन्म के समय वजन में कमी जैसी दिक्कत भी हो सकती है। ऐसे में महिला को आयरन युक्त डाइट जरूर लेनी चाहिए ताकि माँ व् बच्चे को ऐसी कोई दिक्कत नहीं हो। इसके लिए महिला हरी सब्जियां, दालें, आदि का भरपूर सेवन कर सकती है।

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में शिशु का विकास

गर्भावस्था के दूसरे महीने में शिशु का विकास थोड़ा बढ़ने लग जाता है साथ ही शिशु के अंगों की आकृतियाँ बननी भी शुरू हो जाती है। तो आइये अब जानते हैं की दूसरे महीने में शिशु के विकास में क्या- क्या बदलाव आते हैं।

  • शिशु का वजन व् आकार पहले की अपेक्षा बढ़ जाता है।
  • हड्डियां बननी शुरू हो जाती है।
  • शिशु की मांसपेशियां बननी शुरू हो जाती है।
  • हाथ, पैर व् उनकी उंगलियां, कान बनने शुरू हो जाते है।
  • स्पाइनल कॉर्ड और दिमाग बनाने वाली न्यूरल ट्यूब बनने लग जाती है।

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में आने वाले बदलाव

गर्भावस्था के दूसरे महीने में महिला को अपने शरीर में थोड़े बदलाव भी महसूस हो सकते हैं। जैसे की:

  • महिला का वजन थोड़ा बढ़ जाता है।
  • कुछ महिलाओ को चीजों की स्मैल से दिक्कत हो सकती है।
  • प्राइवेट पार्ट से खून के हलके धब्बे महसूस हो सकते हैं।
  • सफ़ेद पानी की समस्या भी हो सकती है।
  • गर्भाशय का आकर बढ़ने में कारण पेट में हल्का दर्द महसूस हो सकता है या पेट के निचले हिस्से में भी दर्द महसूस हो सकता है।
  • कुछ महिलाओं को कमजोरी व् थकावट अधिक होने के कारण सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।

क्या प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में सम्बन्ध बना सकते हैं?

गर्भावस्था के दूसरे महीने में महिला को सम्बन्ध बनाना चाहिए या नहीं ये सवाल अधिकतर कपल के मन में होता है। तो इसका जवाब होता है की प्रेगनेंसी के शुरूआती समय में महिला को सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि शुरूआती समय में यदि कभी सम्बन्ध बनाते समय पेट पर जोर अधिक पड़ जाये या और कोई गलती हो जाये तो इसकी वजह से महिला को दिक्कत हो सकती है। ऐसे में प्रेगनेंसी के पहले तीन महीने तो खासकर महिला को सम्बन्ध बनाने से बचना चाहिए।

गर्भावस्था के दूसरे महीने में बरतें यह सावधानियां

प्रेगनेंसी के दूसरे महीने में महिला को बहुत सावधानियां बरतनी चाहिए ताकि महिला या शिशु को किसी भी तरह की दिक्कत न हो। जैसे की:

  • महिला को समय से डॉक्टर से मिलना चाहिए।
  • डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों का सेवन समय से करना चाहिए।
  • खाने पीने में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।
  • ज्यादा थकाने वाले काम नहीं करना चाहिए।
  • बहुत तेजी से सीढ़ियां चढ़नी या उतरनी न चाहिए।
  • किसी भी तरह का स्ट्रेस नहीं लेना चाहिए।
  • पेट के बल कोई काम नहीं करना चाहिए।
  • पैरों के भार बैठने से बचना चाहिए।
  • लम्बी यात्रा से बचना चाहिए।
  • ज्यादा टाइट कपडे, ऊँचे जूते चप्पल नहीं पहनने चाहिए।
  • किसी भी शारीरिक दिक्कत के होने पर अपनी मर्ज़ी से दवाई का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • किसी भी लक्षण के अधिक महसूस होने या उसकी वजह से दिक्कत बढ़ने पर उसे नज़रअंदाज़ करने की बजाय डॉक्टर से मिलना चाहिए।

तो यह है प्रेगनेंसी के दूसरे महीने से जुडी जानकारी, यदि आप भी अभी अभी प्रेग्नेंट हुई है तो इस आर्टिकल में बताई गई जानकारी आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। साथ ही आपको अन्य जानकारी के लिए डॉक्टर से भी मिलना चाहिए। उम्मीद करते हैं यह जानकारी आपके लिए फायदेमंद हो।

प्रेगनेंसी का पहला महीना – लक्षण, डाइट और सावधानियां

1st Month of Pregnancy Symptoms Diets and Tips Precautions : प्रेगनेंसी महिला की जिंदगी में आने वाली वो ख़ुशी है जो महिला के अस्तित्व में बहुत बड़ा बदलाव ला देती है। जैसे ही महिला की प्रेगनेंसी की न्यूज़ कन्फर्म होती है वैसे ही आपके महिला व् उनसे जुड़े सभी करीबी बहुत खुश हो जाते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगो का ऐसा मानना है की यदि आप गर्भ ठहर गया है। और आपने प्रेगनेंसी टेस्ट किया है व् प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आया है।तो इस खबर के पता चलते ही सबको आपको नहीं बताना चाहिए बस कुछ लोग जो आपके बहुत करीबी है जैसे आपके सास-ससुर माता-पिता पति आदि को ही बताना चाहिए।

क्योंकि तीन महीने तक प्रेगनेंसी में बहुत से उतार चढ़ाव आ सकते हैं। आज इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको प्रेगनेंसी के पहले महिला में क्या-क्या लक्षण महसूस होते हैं, आपकी डाइट कैसी होनी चाहिए, आपको क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए, आदि। इसके बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं। यदि आपकी प्रेगनेंसी की न्यूज़ अभी कन्फर्म हुई है या फिर आप प्रेगनेंसी के लिए ट्राई कर रही हैं तो आपके लिए यह आर्टिकल फायदेमंद साबित हो सकता है। तो आइये अब आगे इस आर्टिकल में प्रेगनेंसी के पहले महीने से जुडी जानकारी को शेयर करते हैं और उम्मीद करते हैं की आपके लिए यह फायदेमंद साबित होगी।

गर्भावस्था के पहले महीने में मह्सूस हो सकते हैं यह लक्षण

प्रेगनेंसी के पहले महीने से ही महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव होने शुरू हो जाते हैं। ऐसे में यह लक्षण आपको बाहरी रूप से महसूस हो सकते हैं। कई महिलाएं इन लक्षणों को आसानी से समझ जाती है लेकिन कुछ महिलाओं को कई बार कुछ महसूस भी नहीं हो सकता हैं। तो आइये वो लक्षण कौन-कौन से हैं उनके बारे में जानते हैं।

पीरियड्स मिस होना

गर्भावस्था का सबसे सामान्य लक्षण है की महिला के पीरियड्स मिस हो जाते हैं। हां कई महिलाओं को बीच में हल्का फुल्का खून का धब्बा मह्सूस हो सकता हैं। लेकिन महिला को पूरी तरह पीरियड्स नहीं आते हैं।

ब्रेस्ट संवेदनशील होना और निप्पल का रंग बदलना

यदि महिला को ब्रेस्ट छूने में दर्द महसूस होता है या महिला को निप्पल का रंग पहले से अधिक गहरा महसूस होता है तो यह भी प्रेगनेंसी के पहले महीने में महसूस होने वाला एक समय लक्षण ही हैं। लेकिन ध्यान रखें की हर महिला के शरीर में एक ही जैसे लक्षण महसूस हो ऐसा जरुरी नहीं होता हैं।

सूंघने की क्षमता में वृद्धि होना

प्रेगनेंसी के शुरूआती समय में बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण नाक के सूखने की क्षमता में वृद्धि हो जाती है। जिसकी वजह से कई महिलाओं को दिक्कत भी अधिक होती हैं क्योंकि प्रेगनेंसी में महिला को बहुत सी चीजों की गंध से एलर्जी होती है। और ऐसा होने पर महिला को उल्टी जैसी परेशानी का सामना अधिक करना पड़ सकता है।

सीने में जलन

गर्भावस्था के शुरूआती दिनों में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण शरीर में एसिड रिफ्लेक्स बढ़ जाता है जिसकी वजह से महिला को सीने में जलन जैसी परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है। पर यह समस्या धीरे धीरे ठीक हो जाती है बस इसके लिए महिला को अपने खान पान का अच्छे से ध्यान रखने की जरुरत होती है।

मूड बदलना

मूड स्विंग्स होने भी प्रेगनेंसी के शुरूआती दिनों में महसूस होने वाला एक सामान्य लक्षण है। जिसकी वजह से कई बार महिला अधिक उदास तो कभी बहुत खुश या कभी बहुत चिड़चिड़ी भी हो जाती है।

ऐंठन होना

जब महिला का गर्भ ठहरता है तो निषेचन की प्रक्रिया होती है जिस समय अंडा गर्भाशय में स्थापित होता हैं। ऐसे में महिला को ऐंठन जैसी परेशानी का महसूस होना भी आम बात होती है।

उल्टी होना

उल्टी आने की समस्या होना भी प्रेगनेंसी के सामान्य लक्षणों में से एक है। अधिकतर प्रेग्नेंट महिलाएं प्रेगनेंसी के पहले तीन महीने इस परेशानी से ग्रसित रहती हैं। साथ ही कुछ महिलएं तो प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने तक इस परेशानी का सामना कर सकती हैं।

प्रेगनेंसी के पहले महीने में महसूस होने वाले अन्य लक्षण

  • कब्ज़ की परेशानी होना।
  • जी मिचलाने की समस्या होना।
  • थकावट व् कमजोरी की परेशानी होना।
  • सिर में दर्द की समस्या होना।
  • पेट में सूजन की समस्या होना।
  • या तो बहुत कम या बहुत ज्यादा भूख प्यास लगना।
  • खाने पीने की आदतों में बदलाव आना।
  • बार बार यूरिन आने की समस्या होना।
  • शरीर में दर्द व् ऐंठन महसूस होना।

गर्भावस्था के पहले महीने की डाइट

जैसा की हमने आपको ऊपर बताया की प्रेगनेंसी के दौरान महिला को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में महिला यदि चाहती है की महिला व् उसका होने वाला शिशु बिल्कुल स्वस्थ रहे तो इसके लिए जरुरी है की महिला अपने खान पान का अच्छे से ध्यान रखें। जैसे की महिला को अपने खाने पीने से जुडी इन बातों का ध्यान रखना जरुरी है।

डाइट न करें

गर्भावस्था के दौरान वजन बढ़ना सामान्य होता है ऐसे में महिला को अपने वजन को नियंत्रित रखने के लिए डाइट नहीं करने चाहिए। बल्कि अपनी डाइट में भरपूर पोषक तत्वों की शामिल करना चाहिए। लेकिन साथ ही इस बात का ध्यान रखना चाहिए की महिला को न तो जरुरत से ज्यादा खाना चाहिए न ही जरुरत से कम खाना चाहिए।

मिनरल्स ले भरपूर

प्रोटीन, आयरन, पोटैशियम, विटामिन्स व् अन्य मिनरल्स जो की प्रेगनेंसी के दौरान महिला के फिट रहने के लिए और शिशु के विकास के लिए जरुरी होते हैं। उन्हें मौसमी सब्जियों व् फलों के माध्यम से अपनी डाइट का अहम हिस्सा बनाना चाहिए। जाइए की यदि सर्दियां है तो गाजर, हरी सब्जियों का सेवन जरूर करना चाहिए।

डेयरी प्रोडक्ट्स लेना न भूलें

कैल्शियम व् मैग्नीशियम से भरपूर डेयरी प्रोडक्ट्स प्रेगनेंसी के दौरान माँ व् बच्चे दोनों के शारीरिक व् मानसिक विकास के लिए जरुरी होते हैं। ऐसे में डेयरी प्रोडक्ट्स को अपनी डाइट में जरूर शामिल करें।

दालें जरूर खाएं

सब्जियों के साथ दालों को भी अपनी डाइट का हिस्सा जरूर बनाएं। क्योंकि दालें प्रोटीन, आयरन, विटामिन जैसे पोषक तत्वों का अहम स्त्रोत होती है ऐसे में दिन में एक समय किसी न किसी दाल का सेवन जरूर करें।

बाहरी खाने से बचें

गर्भवती महिला को पैकेट वाला खाना, रोड साइड मिलने वाला खाना, जंक फ़ूड, बासी खाना, आदि से भी परहेज करना चाहिए। क्योंकि ऐसे खाने में किसी तरह के पोषक तत्व नहीं होते हैं। साथ ही ऐसे खाने को खाने से महिला को सेहत सम्बन्धी परेशानी जरूर हो सकती है। ऐसे में महिला को इससे परहेज करना चाहिए।

एलर्जी का ध्यान रखें

यदि किसी भी चीज को खाने पीने से महिला को किसी भी तरह की एलर्जी या दिक्कत हो रही है। तो महिला को ऐसे खाने से परहेज करना चाहिए। साथ ही महिला को एक बार इस बारे में डॉक्टर से भी राय जरूर लेनी चाहिए।

डॉक्टर द्वारा बताए गए विटामिन्स

गर्भावस्था के दौरान शरीर में पोषक तत्वों की कमी नहीं हो इसके लिए महिला को डॉक्टर द्वारा कुछ विटामिन्स लेने की सलाह दी जाती है। ऐसे में महिला को उन विटामिन्स को समय से लेना चाहिए।

गर्भावस्था के पहले महीने में शिशु का विकास

प्रेगनेंसी के पहले महीने में ही गर्भ में शिशु के विकास की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यदि आप भी माँ बनने के लक्षणों को अपने शरीर में महसूस कर रही हैं या फिर माँ बनने की ट्राई कर रही हैं तो आपको शिशु के विकास की प्रक्रिया के बारे में कुछ जानकारियां होना चाहिए। तो आइये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी के पहले महीने में शिशु का विकास किस प्रकार और कितना होता है।

फर्टिलाइजेशन होता है

फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया सम्बन्ध बनाने के दो या तीन दिन बाद से शुरू हो सकती है। इस प्रक्रिया में शुक्राणुओं और अंडाणुओं का मिलन होता है और इसे निषेचन भी कहा जाता है। फर्टिलाइजेशन के शुरुआती समय में जब शुक्राणु और अंडाणु आपस में मिलते हैं तो एक युग्म बनता है जिसे की जाइगोट भी कहा जाता है।

प्रत्यारोपण की प्रक्रिया

निषेचन की प्रक्रिया होने के तुरंत बाद प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसमे जाइगोट यानी युग्म फैलोपियन ट्यूब से गर्भाशय में प्रत्यारोपित हो जाता है और 4-6 दिनों के अंदर यह ढेरों कोशिकाओं में बंट जाता है। और उसके बाद यह एक गेंद का आकार लेती हैं जिसे ब्लास्टोसिस्ट कहा जाता है। यदि ब्लास्टोसिस्ट गर्भाशय की दीवार से अच्छे से चिपक जाए तो महिला की प्रेगनेंसी पूरी तरह से कन्फर्म हो जाती है।

गर्भ में शिशु का विकास

जैसे ही प्रत्यर्पण पूरा होता है वैसे ही गर्भ में एमनियोटिक सैक का निर्माण होता है। इसी दौरान गर्भनाल भी विकसित होने लगती है साथ ही शिशु के चेहरे का विकास भी शुरू हो जाता है। इसके अलावा शिशु का निचला जबड़ा और गला भी बनने शुरू हो जाते हैं। रक्त की कोशिकाएं बनने लगती हैं और शिशु तक ब्लड फ्लो की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। और आपको यह जानकर ख़ुशी होगी की प्रेगनेंसी के पहले महीने के अंत तक शिशु का दिल एक मिनट में लगभग 65 बार धड़कने लगता है। और पहले महीने के अंत तक शिशु का आकार लगभग एक चावल के दाने के बराबर हो जाता है।

गर्भावस्था के पहले महीने में बरतें यह सावधानियां

प्रेगनेंसी के दौरान जितना खान पान का ध्यान देना जरूरी है उतना ही महिला को सावधानियां बरतनी भी जरुरी है। क्योंकि थोड़ी सी गलती भी कई बार आपको दिक्कत में डाल सकती हैं। तो आएये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी के दौरान महिला क्या सावधानियां बरतें।

  • भारी वजन न उठाएं।
  • तनाव न लें।
  • भूखी न रहें।
  • ज्यादा उछल कूद करने से बचें।
  • पेट पर ज्यादा दबाव नहीं डालें।
  • सम्बन्ध बनाने से बचें।
  • ज्यादा टाइट कपडे नहीं पहने।
  • ज्यादा भीड़भाड़ व् प्रदूषण वाली जगह पर जाने से बचें।
  • कोई भी शारीरिक समस्या होने पर डॉक्टर से मिलें।
  • बिना डॉक्टरी परामर्श के किसी दवाई का सेवन न करें।
  • गर्म पानी, सोना बाथ लेने से बचें।
  • ऊँची एड़ी के जूते चप्पल पहनने से बचें।
  • कच्चा अंडा, कच्चा पपीता, कच्चा मॉस, किसी भी तरह का नशा आदि से बचें।
  • लम्बी यात्रा पर न जाएँ।
  • एक ही बारी में पेट भर के खाने की बजाय थोड़ा थोड़ा करके खाएं।
  • किसी की नेगेटिव बातों पर ध्यान न दें।
  • हर किसी के द्वारा बताएं गए टिप्स को फॉलो न करने लग जाएँ।
  • पालतू जानवरों के संपर्क में आने से बचें।
  • ज्यादा व्यायाम नहीं करें।

तो यह है प्रेगनेंसी के पहले महीने में महिला को किन टिप्स को फॉलो करना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही महिला को डॉक्टर से भी राय लेनी चाहिए और उनके शरीर के हिसाब से क्या सही है क्या नहीं है इसके बारे में जानना चाहिए। आशा करते हैं की यह जानकारी आपके लिए फायदेमंद होगी।

प्रेगनेंसी के दौरान कौन- कौन से ड्राई फ्रूट्स खाने फायदेमंद होते हैं

प्रेगनेंसी के दौरान महिला को अपना बहुत ज्यादा ध्यान रखने की सलाह दी जाती है जैसे की महिला को क्या खाना चाहिए, क्या पीना चाहिए, उठना बैठना कैसे चाहिए, एक्सरसाइज करनी चाहिए या नहीं, कौन सा खाद्य पदार्थ कितनी मात्रा में खाना चाहिए, आदि। यदि प्रेग्नेंट महिला इन सभी बातों का ध्यान रखती है तो इससे गर्भवती महिला को स्वस्थ रहने और गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। आज इस आर्टिकल में हम आपसे प्रेग्नेंट महिला के खाने पीने से जुडी सलाह आपको देने जा रहे हैं की प्रेग्नेंट महिला को कौन कौन से ड्राई फ्रूट्स खाने चाहिए।

क्या प्रेग्नेंट महिला ड्राई फ्रूट्स खा सकती है?

जी हाँ, प्रेगनेंसी के दौरान ड्राई फ्रूट्स का सेवन करना बिल्कुल सेफ माना जाता है लेकिन इनकी तासीर गर्म होती है इसीलिए इनका सेवन प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही से शुरू करना अच्छा माना जाता है। साथ ही ड्राई फ्रूट्स से आपको केवल फायदे हो इसके लिए गर्भवती महिला को सिमित मात्रा में ही ड्राई फ्रूट्स का सेवन करना चाहिए।

प्रेगनेंसी में कौन कौन से फ्राई फ्रूट्स खाएं?

ड्राई फ्रूट्स अलग अलग तरह के होते हैं जैसे की बादाम, काजू, पिस्ता, मूंगफली, अखरोट, आदि, लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान महिला इनमे से कौन से ड्राई फ्रूट्स खा सकती है आइये उसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

चिलगोजा

चिलगोजा एक ड्राई फ्रूट होता है जिसमे जिंक प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। और जिंक से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करने से गर्भवती महिला की इम्युनिटी को मजबूत करने में मदद मिलती है। जिससे माँ व् बच्चे दोनों को फायदा मिलता है। इसीलिए गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान चिलगोजा ड्राई फ्रूट का सेवन जरूर करना चाहिए।

मूंगफली

मूंगफली भी ड्राई फ्रूट में ही शामिल होती है और मूंगफली को गरीब लोगो का बादाम भी कहा जाता है। साथ ही मूंगफली में फोलेट की मात्रा सबसे अधिक होती है जो की गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास में मदद करता है। इसीलिए गर्भवती महिला को मूंगफली का सेवन प्रचुर मात्रा में जरूर करना चाहिए। लेकिन ध्यान रखें की जिन गर्भवती महिलाओं को मूंगफली से एलर्जी हो या प्रेगनेंसी के दौरान मूंगफली का सेवन करने से किसी भी तरह की समस्या आये तो उन महिलाओं को मूंगफली का सेवन नहीं करना चाहिए।

अखरोट

अखरोट को देखे तो ऐसा लगता है की आप मस्तिष्क को देख रहे हैं और अखरोट का सेवन करने से मस्तिष्क के बेहतर विकास में भी मदद मिलती है। क्योंकि अखरोट में ओमेगा फैटी एसिड मौजूद होते हैं जो गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर मानसिक विकास में मदद करते हैं।

बादाम

बादाम का सेवन करना भी प्रेगनेंसी के दौरान बहुत फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें विटामिन डी, कैल्शियम, मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। जो माँ व् बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। ऐसे में यदि गर्भवती महिला बादाम का सेवन करती है तो इससे गर्भवती महिला को शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के साथ शिशु के शारीरिक व् मानसिक विकास में भी मदद मिलती है।

काजू

जिन गर्भवती महिलाओं में खून की कमी होती है, महिला का वजन कम होता है उन महिलाओं को काजू का सेवन प्रेगनेंसी के दौरान जरूर करना चाहिए। क्योंकि काजू में आयरन प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है जिससे प्रेग्नेंट महिला को एनीमिया की समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है। साथ ही काजू का सेवन करने से महिला के वजन को बढ़ाने में भी मदद मिलती है।

खजूर

प्रेगनेंसी की तीसरी तिमाही में महिला को खजूर का सेवन जरूर करना चाहिए क्योंकि इससे महिला के शरीर को एनर्जी मिलती है। जिससे शिशु के बेहतर विकास के साथ महिला को प्रसव पीड़ा को सहन करने की ताकत भी मिलती है। लेकिन ध्यान रखें की जरुरत से ज्यादा खजूर का सेवन नहीं करें।

सूखे अंजीर

प्रेगनेंसी के दौरान माँ व् शिशु दोनों के लिए ही विटामिन ए एक जरुरी पोषक तत्व होता है। ऐसे में यदि महिला सूखे अंजीर का सेवन करती है तो इससे महिला के शरीर में विटामिन ए की मात्रा को सही रहने में मदद मिलती है। जिससे माँ व् बच्चे दोनों को सेहत सम्बन्धी फायदे मिलते हैं साथ ही विटामिन आँखों के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है।

खुबानी

खुबानी भी एक ड्राई फ्रूट होता है जिसमे कैलोरी प्रचुर मात्रा में मौजूद होती है और गर्भावस्था के दौरान महिला को अतिरिक्त कैलोरी की जरुरत होती है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला खुबानी का सेवन सेवन करती है तो इससे महिला के शरीर में ऊर्जा को सही रहने में मदद मिलती है।

किशमिश

प्रेगनेंसी के दौरान महिला के लिए किसमिश का सेवन करना भी फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें फाइबर, विटामिन्स भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। जो गर्भवती महिला और शिशु दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं।

हेज़लनट

यह भी एक ड्राई फ्रूट होता है जिसका सेवन करना प्रेगनेंसी के दौरान बिल्कुल सेफ होता है। और इसमें फोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है ऐसे में यदि गर्भवती महिला हेज़लनट का सेवन करती है तो इससे गर्भ में पल रहे शिशु को प्रचुर मात्रा में फोलिक एसिड मिलता है जिससे शिशु को न्यूरल दोष के खतरे, जन्म दोष के खतरे से सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।

प्रेगनेंसी में ड्राई फ्रूट्स खाने के फायदे

  • ड्राई फ्रूट्स में विटामिन्स, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन व् अन्य मिनरल्स भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं और यह सभी पोषक तत्व माँ व् बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। ऐसे में यदि महिला ड्राई फ्रूट्स का सेवन करती है तो इससे महिला को शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने में मदद मिलने के साथ शिशु के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास में मदद मिलती है।
  • यदि महिला ड्राई फ्रूट्स का सेवन करती है तो इससे गर्भवती महिला को बहुत सी शारीरिक परेशानियों से निजात पाने में मदद मिलती है। जैसे की ड्राई फ्रूट्स में डाइट्री फाइबर होता है जिससे महिला को पेट सम्बन्धी समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है साथ ही ड्राई फ्रूट्स में मौजूद कैल्शियम होता है जिससे माँ व् बच्चे की हड्डियों व् दांतों को पोषण मिलता है, आदि।
  • गर्भ में शिशु के शारीरिक व् मानसिक विकास के लिए जरुरी सभी पोषक तत्व ड्राई फ्रूट्स में मौजूद होते हैं। ऐसे में यदि प्रेग्नेंट महिला ड्राई फ्रूट्स का सेवन करती है तो इससे शिशु के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास में मदद मिलती है।

प्रेग्नेंट महिला ड्राई फ्रूट्स का सेवन करने से पहले इन बातों का ध्यान रखें

  • ऐसा माना जाता है की ड्राई फ्रूट्स की तासीर थोड़ी गर्म होती है ऐसे में पहली तिमाही के बाद ही महिला को ड्राई फ्रूट्स का सेवन करना चाहिए। हो सके तो आप इसके लिए एक बार डॉक्टर से भी राय ले सकते हैं।
  • यदि आपको किसी ड्राई फ्रूट से एलर्जी है तो आपको प्रेगनेंसी के दौरान उसका सेवन नहीं करना चाहिए साथ ही प्रेगनेंसी के दौरान किसी ड्राई फ्रूट को खाने से यदि आपको किसी तरह की समस्या होती है तो आपको उसका सेवन भी नहीं करना चाहिए।
  • महिला को बंद पैकेट वाले ड्राई फ्रूट ही खरीदने चाहिए खुले ड्राई फ्रूट खरीदने से बचना चाहिए।
  • जब भी ड्राई फ्रूट का पैकेट खरीदें तो उसपर डेट चेक जरूर करें।

तो यह हैं प्रेगनेंसी में ड्राई फ्रूट्स का सेवन करने से जुडी जानकारी, यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी सिमित मात्रा में ड्राई फ्रूट्स को अपनी डाइट का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए। ताकि आपको व् आपके होने वाले शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिल सकें।

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काले होंठों को गुलाबी करने के उपाय

आपके होंठों की मुस्कराहट आपकी ख़ूबसूरती में चार चाँद लगा देती है। लेकिन यदि आपके होंठ फाटे हुए हो, काले हो तो इसकी वजह आपको अच्छा महसूस नहीं हो सकता है। क्या आपके भी होंठ काले हैं? यदि हाँ, तो ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं। और ऐसा भी नहीं है की आप इस समस्या से राहत नहीं पा सकें। तो आइये अब इस आर्टिकल में जानते हैं की काले होंठ होने के क्या क्या कारण हो सकते हैं। और साथ ही किस तरीके से आप इस परेशानी से निजात पा सकते हैं।

काले होंठ होने के कारण

  • यदि आपके होंठ काले है तो इसका एक कारण यह होता है की रात को सोने से पहले आप अपने होंठों पर लगी लिपस्टिक को साफ़ नहीं करते हैं। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो इसकी वजह से आपके होंठों के काले होने के साथ हमेशा होंठों के फटे रहने की समस्या भी बढ़ जाती है।
  • जो महिला या पुरुष अधिक धूम्रपान करते हैं तो उन्हें भी इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
  • शरीर में खून की कमी होने के कारण भी आपको इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
  • केमिकल युक्त चीजों का अधिक इस्तेमाल होंठों के लिए करने की वजह से भी आपको इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
  • कई बार वातावरण जैसे ही शुष्क हवा, तेज धूप आदि के बुरे प्रभाव के कारण भी आपके होंठों के काले होने की समस्या हो सकती है।

काले होंठों को गुलाबी बनाने के घरेलू उपाय

यदि आपके होंठ काले हो गए हैं और आपको इसकी वजह से शर्म महसूस होती है तो घबराएं नहीं। क्योंकि कुछ आसान घरेलू नुस्खों को ट्राई करके आप आसानी से इस परेशानी का समाधान कर सकते हैं। तो आइये अब जानते हैं की वो घरेलू नुस्खे कौन से हैं।

नारियल तेल

नारियल तेल का इस्तेमाल स्किन से जुडी समस्याओं के करने से आपको जरूर फायदा दिलाता है। वैसे ही आपके काले होंठों की समस्या से निजात पाने के लिए नारियल तेल का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है। इसके इस्तेमाल के लिए आप दिन में दो बार अपनी ऊँगली की मदद से नारियल तेल को लिप बाम की तरफ अपने होंठों पर लगाएं। ऐसा कुछ दिनों तक रोजाना करें ऐसा करने से आपकी होंठों की स्किन की कोमलता बढ़ने के साथ होंठों को गुलाबी बनाने में भी मदद मिलेगी।

हल्दी और मलाई

हल्दी और मलाई को मिक्स करके एक मिश्रण तैयार करें और उसे रात को सोने से पहले होंठों पर लगाएं। उसके बाद सुबह उठकर होंठों को साफ़ कर लें। ऐसा करने से भी आपके होंठों को गुलाबी और कोमल रखने में मदद मिलती है क्योंकि मलाई आपके होंठों की स्किन को मॉइस्चराइज रखने में मदद करती है वहीँ हल्दी आपकी स्किन की ख़ूबसूरती को बढ़ाने में मदद करती है।

गुलाबजल

गुलाबजल का इस्तेमाल करने से भी आपके होंठों की रंगत को निखारने में मदद मिलती है। इसके इस्तेमाल के लिए आप दिन में दो बार अपने होंठों पर गुलाबजल लगाएं। इससे आपके होंठ भी नहीं फटेंगे साथ ही आपके होंठों की ख़ूबसूरती को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

केसर

केसर का इस्तेमाल करने से भी आपको होंठों के कालेपन को दूर करने में मदद मिलती है। इसके लिए आप दूध में केसर के कुछ रेशे मिलाकर उस दूध को दो से तीन बार अपने होंठों पर लगाएं हो सके तो ऐसा रात को करें। कुछ दिनों तक नियमित इस उपाय को करने से आपके होंठों के कालेपन को दूर करने में मदद मिलेगी।

निम्बू का रस

निम्बू के रस का इस्तेमाल करने से भी होंठों की ख़ूबसूरती को बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके लिए आप निम्बू के रस को दिन में एक बार अपने होंठों पर लगाएं और दस मिनट बाद होंठों को साफ़ पानी से धो लें ऐसा कुछ दिनों तक करें आपको इसका असर जरूर दिखाई देगा।

जैतून का तेल

जैतून के तेल को वैसेलिन में मिलाएं और उसके बाद इस मिश्रण को अपने होंठों पर लगाएं और थोड़ी देर के लिए छोड़ दें। हो सकें तो ऐसा रात को करें ऐसा करने से भी आपके होंठों को कालेपन की समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।

हल्दी वाला दूध

एक चम्मच दूध में थोड़ा सा हल्दी मिलाएं उसके बाद इस मिश्रण को अपने होंठों पर लगाएं। होंठों पर इस मिश्रण को लगाने के बाद थोड़ी देर के लिए होंठों को ऐसे ही छोड़ दें। उसके बाद आप अपने होंठों को साफ़ कर लें ऐसा कुछ दिनों तक नियमित रूप से करें आपको फ़र्क़ जरूर दिखाई देगा।

एलोवेरा जैल

एलोवेरा जैल का इस्तेमाल करने से स्किन सम्बन्धी परेशानियों से निजात पाने में मदद मिलती है ऐसे में आप होंठों के स्किन से जुडी समस्या के लिए भी एलोवेरा जैल का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए आप एलोवेरा के पत्ते को तोड़कर उसके अंदर से थोड़ा जैल निकालकर होंठों पर लगाएं। यदि आपके घर में ताजा एलोवेरा नहीं है तो आप मार्किट में एलोवेरा जैल मिल जाता है वो भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

शहद

थोड़े से शहद में चार पांच बूंदे निम्बू के रस की मिलाएं और इस मिश्रण को अच्छे से मिक्स कर लें। ऐसा करने के बाद आप इस मिश्रण को होंठों पर लगाएं और थोड़ी देर के लिए इसे होंठों पर लगे रहने दें। और फिर थोड़ी देर बाद होंठों को अच्छे से साफ़ कर लें।

नमक

ओलिव आयल में थोड़ा नमक मिलाकर उसे होंठों पर लगाएं और उसके बाद आप एक मुलायम कपडे का इस्तेमाल करके हल्की मसाज करें। और उसके बाद होंठों को साफ़ पानी से धो लें ऐसा करने से भी आपको होंठों के कालेपन को दूर करने में मदद मिलती है।

खीरा

खीरे की स्लाइस काटकर होंठों पर रगड़ें या फिर खीरे के रस में एलोवेरा जैल मिक्स करके इस मिश्रण को थोड़ी देर होंठों पर लगाएं। उसके बाद होंठों को साफ़ पानी से धो लें इस उपाय को करने से भी होंठों के कालेपन को दूर करने में मदद मिलती है।

कोलगेट

सबसे पहले आप थोड़ा सा कोलगेट ले और उसे अपने होंठों पर लगाएं उसके बाद आप अपने होंठों पर मसाज करें ऐसा करने से होंठों पर मौजूद डेड स्किन निकल जाएगी। आप चाहे तो हाथों से मसाज करने के साथ ब्रश की मदद से होंठों पर हल्के हाथों से ब्रश भी कर सकतें हैं। ऐसा करने से भी आपको इस समस्या से निजात मिलता है।

चुकंदर

चुकंदर का एक टुकड़ा लें और उससे दो या तीन मिनट तक अपने होंठों की मसाज करें, और ऐसा दिन में दो से तीन बार करें। कुछ दिनों तक ऐसा करने से आपको होंठों को गुलाबी करने में मदद मिलती है।

सरसों का तेल

ऐसा माना जाता है की सरसों के तेल की तीन से चार बूंदे अपनी नाभि में रोजाना डालें ऐसा करने से आपके होंठों को गुलाबी रहने में मदद मिलेगी। साथ ही ऐसा करने से आपको फटे होंठों की समस्या से निजात पाने में भी मदद मिलती है।

आयरन युक्त डाइट लें

शरीर में खून की कमी के कारण भी होंठों के काले होने की समस्या हो जाती है ऐसे में यदि आप उन खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट में शामिल करते हैं जिससे आपके शरीर में खून की कमी को पूरा करने में मदद मिलती है। तो ऐसा करने से भी आपकी स्किन को ग्लोइंग व् होंठों को गुलाबी रहने में मदद मिलती है।

तो यह हैं वो घरेलू नुस्खे जिन्हे ट्राई करने से आप अपने काले होंठों को गुलाबी कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रखें की एक ही दिन में कोई चीज पूरी तरह से ठीक नहीं होती है। ऐसे में कुछ दिनों तक आप इन टिप्स को फॉलो करें आपको धीरे धीरे इसका असर साफ़ दिखाई देगा। और आपके होंठ गुलाबी व् आकर्षक दिखेंगे।

Lips care tips

गर्भ में शिशु किक नहीं कर रहा है तो यह 10 तरीके ट्राई करें शिशु किक करें लगेगा?

गर्भ में शिशु के होने का अहसास महिला को तब महसूस होता है जब गर्भ में शिशु हलचल करना शुरू कर देता है। और गर्भ में शिशु का हलचल करना प्रेगनेंसी का सबसे बेहतरीन और खूबसूरत लम्हा होता है। प्रेगनेंसी के पांचवें महीने में शिशु की हलचल महिला को अच्छे से महसूस हो सकती है। लेकिन शुरुआत में शिशु की हलचल कम और धीरे धीरे यह बढ़ने लगती है उसके बाद फिर जब डिलीवरी का समय पास आता है तो फिर से महिला को शिशु की हलचल में थोड़ी कमी महसूस हो सकती है।

क्योंकि इस दौरान गर्भ में शिशु का विकास बढ़ चूका होता है जिसकी वजह से शिशु को गर्भ में घूमने के लिए कम जगह मिलती है साथ ही गर्भ में शिशु अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आने लगता है यानी की शिशु का सिर नीचे की तरफ और पैर ऊपर की तरफ होने लगते हैं। और जब गर्भ में शिशु की हलचल में कमी आती है तो इसे लेकर गर्भवती महिला घबरा सकती है। लेकिन इसमें घबराने की बात नहीं होती है ऐसा होना बहुत आम बात होती है। परन्तु यदि लम्बे समय तक गर्भ में शिशु की हलचल महसूस नहीं हो तो इसे महिला को अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि यह परेशानी का कारण हो सकता है।

शिशु की हलचल में कमी के कारण

  • गर्भ में शिशु की हलचल में कमी का सबसे अहम कारण गर्भ में शिशु के विकास में कमी का होना होता है यदि गर्भ में शिशु का विकास कम होता है तो बच्चे की हलचल महिला को कम महसूस हो सकती है।
  • बच्चे का सम्पूर्ण विकास होने पर गर्भ में शिशु को घूमने की जगह कम मिलती है जिसके कारण शिशु कम हलचल करता है।
  • जन्म लेने की सही पोजीशन में आने पर भी आपको गर्भ में शिशु की हलचल में कमी महसूस हो सकती है।
  • जब गर्भ में शिशु आराम कर रहा होता है तो भी शिशु की हलचल कम हो सकती है।
  • कई बार जब महिला काम में व्यस्त होती है तो इस दौरान भी महिला को शिशु की हलचल कम महसूस हो सकती है।

गर्भ में शिशु को किक करवाने के तरीके

यदि आपको ऐसा लग रहा है की बहुत देर से गर्भ में शिशु हलचल नहीं कर रहा है तो ऐसे में कुछ आसान टिप्स को ट्राई करके आप शिशु की हलचल महसूस कर सकती है। जैसे की:

करवट लेकर आराम से लेट जाएँ

यदि शिशु गर्भ में हलचल नहीं कर रहा है तो आप आराम से करवट लेकर लेट जाएँ और बाईं और करवट लेकर लेटें। आराम से लेटने पर जब शिशु को बाहर की कोई हलचल महसूस नहीं होती है तो ऐसे में शिशु ज्यादा हलचल करने लगता है। इसीलिए ऐसा माना जाता है की शिशु दिन की अपेक्षा रात में ज्यादा हलचल करता है। यदि आपको लेटना नहीं है तो आप आराम से बैठ भी सकती हैं।

ठंडा पानी पीएं

शिशु की हलचल यदि महिला महसूस नहीं कर रही है तो ऐसे में महिला ठन्डे पानी का सेवन करें इससे गर्भाशय के तापमान में बदलाव आ सकता है। और तापमान में बदलाव आने के कारण शिशु ज्यादा हलचल कर सकता है। क्योंकि जब गर्भाशय के तापमान में बदलाव आता है तो शिशु को अलग महसूस होता है और शिशु हलचल करना शुरू कर देता है।

शोर में जाएँ

गर्भ में पल रहे सुनने की क्षमता धीरे धीरे बढ़ने लगती है इसीलिए महिला को ज्यादा शोर वाली जगह पर जाने के लिए मना किया जाता है। क्योंकि ज्यादा शोर में जाने के कारण शिशु की सुनने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है साथ ही शिशु घबरा कर गर्भ में ज्यादा हलचल करना शुरू कर देता है। ऐसे में शिशु को किक करवाने के लिए महिला को थोड़ा शोर वाली जगह पर जाएँ या फिर तेज आवाज़ में गाने सुने। ध्यान रखें की ऐसा ज्यादा समय के लिए नहीं करें। ऐसा करने से भी गर्भ में शिशु हलचल करना शुरू कर देता है।

कुछ खाएं

माँ जब भी कुछ खाती है तो उसका स्वाद गर्भ में शिशु तक भी पहुँचता है ऐसे में जिन चीजों का स्वाद शिशु को अच्छा लगता है तो उसे खाने के बाद आप गर्भ में शिशु की हलचल तेज महसूस कर सकती है। और धीरे धीरे महिला को यह समझ आने लग जाता है की बच्चे को क्या पसंद है ऐसे में जिस चीज को खाने से गर्भ में शिशु की हलचल बढ़ जाती है उन चीजों का सेवन महिला को करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से आपको गर्भ में शिशु की हलचल महसूस हो सकती है।

पेट पर हाथ फेरे

गर्भ में पल रहे शिशु की हलचल को महसूस करने के लिए महिला को थोड़ी देर अपने पेट पर हाथ फेरना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे को अपनी माँ के टच का अहसास होता है। ऐसे में गर्भ में शिशु की हलचल या किक महसूस करने के लिए महोला इस टिप्स को भी ट्राई कर सकती है।

बच्चे से बात करें

सुनने की क्षमता में विकास होने के साथ गर्भ में पल रहा शिशु बाहर की चीजों पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है और यह प्रतिक्रिया शिशु अपनी मूवमेंट के साथ देता है। ऐसे में गर्भ में शिशु को किक करवाने के लिए महिला को शिशु से बातें करनी चाहिए।

पेट पर रौशनी डालें

पेट पर लीग करने का मतलब होता है की आप पेट पर टोर्च की मदद से रौशनी डालें। क्योंकि सुनने के साथ शिशु लाइट की तेज रौशनी पड़ने पर भी शिशु प्रतिक्रिया देता है। और तेह रौशनी पर पर आप शिशु की हलचल ज्यादा महसूस कर सकते हैं।

जम्प करके आराम से बैठ जाएँ

शिशु को किक करवाने के लिए महिला थोड़ा जम्प करें और फिर आराम से बैठ जाएँ ऐसा करने पर भी गर्भ में शिशु थोड़ा उत्तेजित हो जाता है। जिसकी वजह से गर्भ में शिशु हलचल करना शुरू कर देता है।

ऐसा कुछ सोचें जिससे आपको परेशानी हो

प्रेगनेंसी के दौरान जब महिला तनाव लेती है तो इसका असर गर्भ में पल रहे शिशु पर भी पड़ता है। ऐसे में गर्भ में शिशु को किक करवाने के लिए महिला को ऐसा कुछ सोचना चाहिए जिससे महिला थोड़ी परेशान हो जाये जैसे की महिला डिलीवरी के बारे में सोचें। ऐसा सोचने से महिला के साथ शिशु पर भी असर पड़ेगा और शिशु ऐसा होने के कारण किक करना शुरू कर सकता है। ध्यान रखें की प्रेगनेंसी के दौरान ज्यादा तनाव नहीं लें क्योंकि इसका बुरा असर गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ सकता है।

अपने पेट को थोड़ा हिलाएं

गर्भ में शिशु की मूवमेंट को महसूस करने के लिए महिला को थोड़ा अपने पेट को हिलाना चाहिए। लेकिन ध्यान रखें की अपने हाथों से बिलकुल आराम से अपने पेट को हिलाएं ऐसा करने से भी गर्भ में शिशु उत्तेजित हो सकता है जिसके कारण गर्भ में शिशु की मूवमेंट में बढ़ोतरी हो सकती है।

डॉक्टर से कब मिलें:

यदि लम्बे समय तक गर्भ में शिशु की हलचल महसूस नहीं हुई है और आपने सभी टिप्स को ट्राई कर लिया है। तो महिला को ऐसे में तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। क्योंकि लम्बे समय तक शिशु की हलचल यदि गर्भ में महसूस नहीं होती है तो इसका मतलब होता है की गर्भ में शिशु को जरूर कोई दिक्कत है।

तो यह हैं गर्भ में शिशु की किक महसूस करने के कुछ आसान टिप्स, ऐसे में यदि आप भी माँ बनने वाली हैं तो आपको भी शिशु की हलचल का ध्यान रखना चाहिए। ताकि गर्भ में पल रहे शिशु को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं हो।

Tricks for getting your baby to move in womb

प्रेगनेंसी में भुट्टा खाने का फायदे

प्रेगनेंसी का समय महिला के लिए जितना सूंदर व् खूबसूरत है उतना ही महिला के लिए कठिनाई व् परेशानियों से भरा भी होता है। क्योंकि इस दौरान महिला शारीरिक, मानसिक व् भावनात्मक रूप से बहुत से बदलाव का अनुभव करती है। इसके अलावा इस दौरान महिला को अपना बहुत ज्यादा ध्यान रखने की जरुरत होती है। क्योंकि महिला जितना ज्यादा अच्छे से अपना ध्यान रखती है उतना ही गर्भवती महिला व् गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

गर्भावस्था के दौरान महिला को सबसे ज्यादा अच्छे से अपने खान पान का ध्यान रखना होता है क्योंकि जितना अच्छा महिला का खान पान होता है, महिला जितना ज्यादा पोषक तत्वों से भरपूर डाइट लेती है, क्या खाना है क्या नहीं खाना है इस बात का ध्यान रखती है, खाने की मात्रा कितनी होनी चाहिए इस बात का ध्यान रखती है, आदि। तो उतना ही माँ व् बच्चे को ज्यादा फायदा मिलता है। तो आज इस आर्टिकल में हम आपसे प्रेगनेंसी के दौरान भुट्टे के सेवन के बारे में बात करने जा रहे हैं।

प्रेग्नेंट महिला को भुट्टा खाना चाहिए या नहीं?

गर्भावस्था के दौरान महिला का अलग अलग चीजें खाने का मन करता है ऐसे में कुछ महिलाओं का भुट्टा खाने का मन भी करता है। क्या आप भी प्रेग्नेंट हैं और आपका भी भुट्टा खाने का मन कर रहा है और आप सोच रही हैं की भुट्टा खाएं या नहीं? तो इसका जवाब हैं की आप भुट्टा खा सकती है क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान सिमित मात्रा में भुट्टा खाना फायदेमंद होता है।

क्योंकि भुट्टे में आयरन, फोलेट, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, विटामिन सी, फाइबर जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। जो गर्भवती महिला को स्वस्थ रखने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में भी मदद करते हैं। लेकिन जिन महिलाओं को कॉर्न से एलर्जी हो या प्रेगनेंसी के दौरान कॉर्न खाने के बाद कोई दिक्कत हो रही है उन महिलाओं को कॉर्न खाने से बचना चाहिए।

प्रेगनेंसी में भुट्टा खाने के फायदे

गर्भावस्था के दौरान महिला को हर वो चीज खानी चाहिए जिसे खाने से गर्भवती महिला व् शिशु को फायदा मिलें। और भुट्टा एक ऐसा ही खाद्य पदार्थ है जिसे खाने से महिला व् बच्चे को फायदा मिलता है साथ ही भुट्टा खाने से महिला का थोड़ा टेस्ट भी बदल जाता है। तो आइये अब उन फायदों के बारे में विस्तार से जानते हैं जो भुट्टा खाने से गर्भवती महिला व् शिशु को मिलते हैं।

कब्ज़ से आराम

प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं को कब्ज़ की समस्या होना बहुत ही आम बात होती है लेकिन यदि यह समस्या ज्यादा हो तो महिला को परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है। इसीलिए महिला को फाइबर युक्त चीजों का सेवन करने की सलाह दी जाती है ताकि महिला को पेट सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने में मदद मिल सके और महिला का पेट साफ़ रहें। ऐसे में भुट्टा खाना महिला के लिए फायदेमंद होता है क्योंकि भुट्टे में फाइबर की मात्रा मौजूद होती है जो महिला के पेट को साफ़ रखने में मदद करती है।

जन्म दोष का खतरा होता है कम

गर्भ में पल रहे शिशु का विकास पूरी तरह से गर्भवती महिला पर निर्भर करता है ऐसे में महिला को शिशु के विकास के लिए सभी जरुरी पोषक तत्वों से भरपूर डाइट लेनी चाहिए। और फोलेट एक ऐसा ही जरुरी पोषक तत्व होता है क्योंकि यदि शिशु को फोलेट सही मात्रा में नहीं मिलता है तो इसकी वजह से शिशु को जन्म के समय होने वाली दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में यदि महिला भुट्टे का सेवन करती है तो इससे महिला को फोलेट मिलता है क्योंकि भुट्टे में फोलेट नामक तत्व मौजूद होता है जिससे शिशु को जन्म दोष के खतरे से सुरक्षित रखने में भी मदद मिलती है।

विटामिन ए

विटामिन ए भी एक जरुरी पोषक तत्व होता है जो गर्भ में पल रहे शिशु के विकास के लिए जरुरी होता है और यह पोषक तत्व भुट्टे में प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला भुट्टे का सेवन करती है तो इससे महिला को विटामिन ए प्रचुर मात्रा में मिलता है जिससे शिशु के फेफड़ों व् आँखों के बेहतर विकास में मदद मिलती है।

एनीमिया से बचाव

एनीमिया यानी की खून की कमी, प्रेगनेंसी के दौरान यदि महिला एनीमिया से पीड़ित होती है तो इसकी वजह से महिला की शारीरिक परेशानियां बढ़ने के साथ शिशु के विकास में कमी आने का भी खतरा रहता है। ऐसे में भुट्टे का सेवन करने से महिला को शरीर में आयरन की कमी को पूरा करने में मदद मिलती है क्योंकि भुट्टे में आयरन प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है।

कोलेस्ट्रॉल कण्ट्रोल

भुट्टे में मौजूद पोषक तत्व शरीर में कोलेस्ट्रॉल को बढ़ने से भी रोकते हैं साथ ही इससे प्रेगनेंसी के दौरान हदय सम्बन्धी समस्या से बचे रहने में भी मदद मिलती है।

ब्लड फ्लो होता है बेहतर

प्रेगनेंसी के दौरान यदि शरीर में ब्लड फ्लो सही तरीके से नहीं होता है तो इसकी वजह से गर्भवती महिला की शारीरिक परेशानियां जैसे की बॉडी पेन, सूजन आदि बढ़ने के साथ शिशु तक भी पोषक तत्व सही मात्रा में नहीं पहुँच पाते हैं। ऐसे में जरुरी है की महिला के शरीर में खून का फ्लो अच्छे से हो और प्रेगनेंसी के दौरान भुट्टे का सेवन करने से शरीर में ब्लड फ्लो अच्छे से होने में मदद मिलती है।

हड्डियां होती है मजबूत

भुट्टे में मैग्नीशियम, फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं जो प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला की हड्डियों को पोषण पहुंचाने के साथ शिशु की हड्डियों के बेहतर विकास में भी मदद करते हैं।

स्किन और बालों के लिए होता है फायदेमंद

प्रेगनेंसी के दौरान बहुत सी महिलाएं स्किन व् बालों से जुडी समस्याओं का सामना भी करती है ऐसे में महिला यदि भुट्टे का सेवन करती है तो इससे महिला को फायदा मिलता है। क्योंकि भुट्टे में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स स्किन व् बालों की चमक को बरकरार रखने में मदद करते हैं।

प्रेगनेंसी के दौरान इन तरीकों से खाएं भुट्टा

गर्भावस्था के दौरान भटका सेवन भून कर, इसे उबाल कर चाट बनाकर, सैंडविच में डालकर, पालक के साथ कॉर्न की सब्ज़ी बनाकर, सूप में डालकर आदि तरीकों से इसका सेवन किया जा सकता है।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के दौरान भुट्टा खाने के फायदे, यदि आप भी माँ बनने वाली है और आपको भी भुट्टा पसंद है तो कभी कभार आपको भी इसका सेवन करना चाहिए। ताकि भुट्टा खाने के बेहतरीन फायदे आपके और आपके बच्चे को मिल सकें।

Benefits of eating corn during pregnancy

सर्दियों में शिशु की त्वचा की देखभाल ऐसे करें

सर्दियों के मौसम में स्किन में रूखापन आना आम बात होती है इसीलिए सर्दियों में स्किन की एक्स्ट्रा केयर की जरुरत होती है। खासकर छोटे बच्चों की स्किन तो और भी ज्यादा कोमल और मुलायम होती है ऐसे में बच्चों की स्किन का भी खास ख्याल रखने की जरुरत होती है। क्योंकि यदि स्किन का अच्छे से ध्यान न रखा जाये तो स्किन रूखी व् बेजान हो जाती है जिसके कारण खुजली, स्किन फटने, जैसी समस्या होने का खतरा होता है। तो आइये अजा इस आर्टिकल में हम आपको सर्दियों में शिशु की त्वचा की देखभाल कैसे करनी चाहिए उसके बारे में कुछ टिप्स बताने जा रहे हैं जिनसे शिशु की त्वचा को सर्दियों में भी कोमल व् मुलायम बने रहने में मदद मिलती है।

मालिश

छोटे बच्चों की रोजाना नहाने से पहले मालिश करनी चाहिए इससे बच्चे की स्किन को पोषण मिलता है साथ ही त्वचा में नमी बरकरार रहती है। जिससे सर्दियों में भी स्किन की कोमलता भी बरकरार रहती है। इसके अलावा मालिश करने से बच्चे की हड्डियों को पोषण भी मिलता है और शरीर में ब्लड फ्लो भी अच्छे से होता है।

कच्चा दूध

नहलाने से पहले बच्चे की स्किन पर रुई की मदद से कच्चा दूध लगाएं ऐसा करने से स्किन को पोषण मिलता है साथ ही शिशु की रंगत भी निखरती है। जिससे सर्दियों के मौसम में भी शिशु की त्वचा की कोमलता को बरकरार रहने में मदद मिलती है।

मॉइस्चराइजर

शिशु की स्किन के लिए बहुत से प्रोडक्ट्स आते हैं जैसे की शिशु का शैम्पू, बॉडी वाश, मॉइस्चराइजर आदि। ऐसे में बच्चे की स्किन की कोमलता को बरकरार रखने के लिए बच्चे को रोजाना मॉइस्चराइजर लगाएं इससे स्किन को पोषण मिलता है जिससे शिशु की स्किन की नमी बरक़रार रहती है।

देसी घी

पुराने समय में शिशु की मालिश व् स्किन की कोमलता को बरकरार रखने के लिए देसी घी का इस्तेमाल किया जाता था और यह काफी फायदेमंद भी होता है। ऐसे में सर्दियों के मौसम में शिशु की स्किन की कोमलता को बरकरार रखने के लिए आप शिशु की देसी घी से मालिश करें ऐसा करने से शिशु की स्किन की कोमलता को बरकरार रखने में मदद मिलती है।

ज्यादा गर्म पानी से शिशु को नहीं नहलाएं

सर्दियों के मौसम में शिशु को गर्म पानी से ही नहलाना चाहिए लेकिन ध्यान रखें की पानी उतना ही गर्म हो जिससे शिशु को ठण्ड नहीं लगे। क्योंकि ज्यादा गर्म पानी से नहलाने के कारण भी शिशु की स्किन को नुकसान पहुँचता है। इसके अलावा जरुरत से ज्यादा साबुन आदि भी शिशु को न लगाएं क्योंकि इसकी वजह से भी शिशु की स्किन के रूखे होने की समस्या हो सकती है।

शिशु को सूती कपडे पहनाएं

सर्दियों में ठण्ड से बचाव के लिए ऊनी कपडे ही पहनने चाहिए लेकिन शिशु को सबसे पहले कोई सूती कपडा पहनाना चाहिए उसके बाद ऊनी कपडा पहनाना चाहिए। क्योंकि ऊनी कपडे जब शिशु की स्किन के संपर्क में आते हैं तो इससे स्किन पर लाल निशान, खुजली जैसी समस्या शिशु को होने का खतरा रहता है और सूती कपडे पहले पहनाने से इस समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।

जरुरत से ज्यादा धूप में नहीं बिठाएं

सर्दियों के मौसम में शिशु के लिए धूप जरुरी होती है लेकिन शिशु को जरुरत से ज्यादा धूप में नहीं लिटाएं क्योंकि इससे भी स्किन नमी खोने लगती है जिससे शिशु की स्किन रूखी व् बेजान होने का खतरा रहता है।

जरुरत से ज्यादा नहीं नहलाएं

छोटे बच्चों की साफ सफाई का ध्यान रखते हुए रोजाना नहलाना अच्छी बात होती है। लेकिन सर्दियों के मौसम में रोजाना बच्चे को नहलाने के कारण बच्चे को ठण्ड लगने व् स्किन की नमी खोने की समस्या हो सकती है। ऐसे में आप एक दिन नहलाकर एक या दो दिन बच्चे को गीले कपडे से पोछ दें। इससे शिशु को ठण्ड भी नहीं लगेगी और शिशु की स्किन की कोमलता को बरकरार रहने में मदद मिलेगी। इसके अलावा शिशु को नहलाने के बाद मॉइस्चराइजर जरूर लगाएं।

तो यह हैं कुछ आसान टिप्स जिन्हे फॉलो करने से सर्दियों के मौसम में भी शिशु की स्किन की कोमलता को बरकरार रहने में मदद मिलती है। इसके अलावा शिशु के खान पान, नींद आदि का भी अच्छे से ध्यान रखना चाहिए ताकि शिशु को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

Baby skin care tips for winter

प्रेगनेंसी के छठे महीने में पेट के निचले हिस्से में दर्द हो तो क्या करें?

प्रेगनेंसी के दौरान महिला को शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण, वजन बढ़ने के कारण बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही इस दौरान शरीर में बदलाव आने के कारण और शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण महिला बहुत से बदलाव का अनुभव भी करती है। क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान गर्भ में पल रहा शिशु अपने लिए गर्भ में जगह बनाता है जिसके कारण पेट के आस पास के हिस्से में खिंचाव बढ़ता है। और बच्चे का विकास बढ़ने के साथ महिला का पेट बाहर की और निकला हुआ महसूस होता है।

ऐसे में अधिकतर गर्भवती महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द या पेल्विक एरिया में दर्द की समस्या का सामना कर सकती है। और थोड़ा बहुत पेट या पेट के आस पास के हिस्से में दर्द महसूस होना बहुत ही आम बात होती है। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम प्रेगनेंसी के दौरान पेल्विक एरिया में दर्द होने के कारण व् प्रेगनेंसी के छठे महीने में पेट के निचले हिस्से में दर्द होने पर महिला को क्या करना चाहिए उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

प्रेगनेंसी में पेट के निचले हिस्से में दर्द होने के कारण?

  • गर्भवती महिला को यदि पेट के निचले हिस्से में दर्द महसूस होता हैं तो इसका कारण गर्भ में पल रहे बच्चे का वजन बढ़ना हो सकता है क्योंकि बच्चे का भार बढ़ने के साथ पेट के निचले हिस्से पर दबाव पड़ता है।
  • गर्भ में पल रहा शिशु जब हलचल करता है तो वो पेट के किस हिस्से में हाथ पैर चलाता है है इसके बारे में कहना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसे में यदि शिशु नीचे की तरफ यदि ज्यादा किक करता है तो इसके कारण महिला को पेट के निचले हिस्से में दर्द महसूस हो सकता है।
  • जिन गर्भवती महिलाओं को कब्ज़ की समस्या अधिक रहती है उन गर्भवती महिलाओं को भी पेल्विक एरिया में दर्द की समस्या हो सकती है।
  • यदि प्रेग्नेंट महिला को यूरिन इन्फेक्शन की समस्या है तो भी महिला को पेल्विक एरिया में दर्द की समस्या हो सकती है।
  • प्रेग्नेंट महिला के अंडाशय में यदि कोई गाँठ होती है तो इसके कारण भी महिला को पेल्विक एरिया में दर्द महसूस हो सकता है।
  • डिलीवरी का समय नजदीक आने पर गर्भ में पल रहे शिशु का सिर नीचे की तरफ होने के कारण पेट के निचले हिस्से पर दबाव बढ़ सकता है जिसके कारण महिला को पेल्विक एरिया में दर्द महसूस होता है।
  • गर्भपात या समय से पहले डिलीवरी होने के कारण भी महिला को पेल्विक एरिया में दर्द महसूस हो सकता है।

प्रेगनेंसी के छठे महीने में पेट के निचले हिस्से में दर्द हो तो क्या करें?

गर्भावस्था के समय महिला को शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों व् बदलाव पर ध्यान देना बहुत जरुरी होता है और जब भी कोई ऐसा लक्षण दिखे जिससे महिला को दिक्कत हो सकती है या शिशु को खतरा हो सकता है तो महिला को तुरंत डॉक्टर्स से बात करनी चाहिए। ऐसे में प्रेगनेंसी के दौरान पेट के निचले हिस्से में दर्द होना जितना सामान्य होता है उतना ही महिला को यह ध्यान रखना भी जरुरी होता है की दर्द कितना हो रहा है।

जैसे की प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में यदि प्रेग्नेंट महिला को पेल्विक एरिया में तेज दर्द महसूस होता है तो यह गर्भपात का लक्षण हो सकता है साथ ही एक्टोपिक प्रेगनेंसी के कारण भी ऐसा हो सकता है। वैसे ही प्रेगनेंसी के छठे महीने में यदि महिला को पेल्विक एरिया में दर्द महसूस हो तो महिला को क्या करना चाहिए इस बात का ध्यान रखना जरुरी होता है।

दर्द होने पर क्या करें

प्रेगनेंसी के छठे महीने में यदि महिला को पेट के निचले हिस्से में यदि ज्यादा दर्द महसूस हो तो यह समय से पहले डिलीवरी होने का संकेत हो सकता है। साथ ही यदि दर्द के साथ महिला को यूरिन के रंग में बदलाव, बदबू, यूरिन करते समय जलन जैसे लक्षण महसूस हो तो यह यूरिन इन्फेक्शन के कारण भी हो सकता है।

ऐसे में इन दोनों में से चाहे कोई भी कारण हो लेकिन महिला को अनदेखा नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। क्योंकि समय से पहले डिलीवरी होने पर भी माँ और बच्चे को खतरा होता है और यदि कोई इन्फेक्शन ज्यादा बढ़ जाये तो इस कारण भी महिला को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा यदि पेल्विक एरिया में दर्द के साथ महिला को ब्लीडिंग भी महसूस हो तो महिला जल्द से जल्द डॉक्टर से मिलना चाहिए। इसके अलावा महिला को यदि दर्द तेजी से हो रहा है और प्राइवेट पार्ट से किसी तरह का फ्लो नहीं हो रहा है तो भी महिला को डॉक्टर से मिलना चाहिए। ध्यान रखें की धैर्य रखें और बिल्कुल घबराएं नहीं।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के छठे महीने में पेट के निचले हिस्से में दर्द होने के क्या कारण हो सकते हैं व् इससे बचने के लिए महिला को क्या करना चाहिए उससे जुड़े टिप्स। ऐसे में महिला को पेल्विक एरिया में दर्द के अलावा यदि बॉडी में कोई भी असहज लक्षण महसूस हो या कोई परेशानी ज्यादा हो तो महिला को जल्द से जल्द डॉक्टर से मिलना चाहिए। ताकि माँ व् बच्चे को हर दिक्कत से सुरक्षित रहने में मदद मिल सके।