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सर्दियों में प्रेग्नेंट महिला को क्या-क्या खाना पीना नहीं चाहिए?

गर्भावस्था के दौरान महिला को खान पान का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है की पूरे नौ महीने में महिला को एक ही तरह की डाइट लेनी चाहिए। बल्कि प्रेगनेंसी की तीनों तिमाहियों में बच्चे के बेहतर विकास और महिला को अपनी सेहत को सही रखने के लिए डाइट में बदलाव करना चाहिए। साथ ही महिला को बदलते मौसम के साथ भी अपनी डाइट में बदलाव करना महिला के लिए जरुरी होता है।

क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन्हे गर्मियों में खाना चाहिए और सर्दियों में नहीं, कुछ ऐसी होती है बारिश के मौसम में नहीं खाना चाहिए लेकिन गर्मी के मौसम में गर्भवती महिला उन खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकती है। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम कुछ ऐसी खाने पीने की चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका सेवन प्रेग्नेंट महिला को सर्दियों में नहीं करना चाहिए।

ठंडी चीजें

प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को ठंडी चीजें जैसे की ठंडा पानी, ठंडी कोल्ड ड्रिंक, बर्फ डालकर जूस, ठंडा दूध, फ्रिज से निकला ठंडा खाना, आइस क्रीम, बर्फ आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि ठंडी चीजों का अधिक सेवन करने से सर्दी के कारण होने वाली परेशानियां हो सकती हैं। साथ ही ठंडी चीजों का अधिक सेवन करने से शरीर में गर्मी बढ़ सकती है जिसके कारण गर्भ में बच्चे और महिला दोनों को दिक्कत हो सकती है।

फ्रिज से तुरंत निकाले गए फ़ूड आइटम्स व् फल

ठण्ड के मौसम में गर्भवती महिला को फ्रिज से निकालें हुए फलों व् अन्य फ़ूड आइटम्स का तुरंत सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि ठंडी चीजों का सेवन करने से गले में इन्फेक्शन, सर्दी, खांसी जुखाम जैसी परेशानी होने का खतरा रहता है।

जरुरत से ज्यादा मीठा

सर्दी के मौसम में मीठा खाने की इच्छा में बढ़ावा हो सकता है खासकर कुछ गर्भवती महिला को मीठा खाने की क्रेविंग अधिक हो सकती है। लेकिन प्रेग्नेंट महिला को इस बात का ध्यान अच्छे से रखना है की महिला जरुरत से ज्यादा मीठा नहीं खाएं। क्योंकि जरुरत से ज्यादा मीठा खाने से गर्भवती महिला को वजन ज्यादा बढ़ने, जेस्टेशनल डाइबिटीज़ होने का खतरा होता है। जो माँ के साथ बच्चे की सेहत पर भी बुरा असर डाल सकता है। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को जितना हो सके जरुरत से ज्यादा मीठा नहीं खाना चाहिए।

चटपटा व् मसालेदार आहार

मौसम ठंडा होने पर महिला की तला, भुना, चटपटा, मसालेदार खाना खाने की इच्छा बढ़ सकती है। लेकिन प्रेग्नेंट महिला को अपनी इस इच्छा को कण्ट्रोल करके रखना है। और केवल बाहर का खाना ही नहीं बल्कि घर में भी ऐसी चीजों का सेवन अधिक नहीं करना चाहिए। क्योंकि इसके कारण महिला की पाचन सम्बन्धी परेशानी, कोलेस्ट्रॉल सम्बन्धी परेशानी, वजन बढ़ने की समस्या अधिक हो सकती है।

कैफीन

जब मौसम सर्दी का हो तो दिन में चाय कॉफ़ी पीने की इच्छा भी बढ़ जाती है। लेकिन प्रेग्नेंट महिला को इस बात का ध्यान रखना है की महिला जरुरत से ज्यादा कैफीन का सेवन बिल्कुल नहीं करें। क्योंकि कैफीन का अधिक सेवन गर्भ में शिशु के विकास पर बुरा असर डाल सकता है।

बिना धुले फल व् सब्जियां

सर्दियों में मौसम में महिला को खाने की चीजों में साफ़ सफाई का भी खास ध्यान रखना है। और कोई भी फल या सब्जी को खाने में प्रयोग लाने से पहले महिला को अच्छे से धोना चाहिए। क्योंकि सब्जियों व् फलों को बिना धोये खाने में प्रयोग लाने से उन पर मौजूद बैड बैक्टेरिया शरीर में प्रवेश कर सकता है। जिसके कारण प्रेग्नेंट महिला व् बच्चे दोनों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है।

बासी भोजन

प्रेग्नेंट महिला को सर्दी के मौसम में फ्रिज में रखें बासी भोजन को गर्म करके खाने से भी बचना चाहिए। क्योंकि ऐसे आहार में किसी तरह के पोषक तत्व नहीं होते है साथ ही महिला को पाचन सम्बन्धी परेशानी होने का खतरा बढ़ जाता है।

ठंडी दही

ठण्ड के मौसम में महिला को ज्यादा ठंडी दही का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण महिला को कफ कोल्ड जैसी परेशानी हो सकती है। साथ ही रात के समय तो गलती से भी दही का सेवन नहीं करना चाहिए।

तो यह हैं कुछ चीजें जिनका सेवन सर्दी के मौसम में प्रेग्नेंट महिला को करने से बचना चाहिए। ताकि प्रेग्नेंट महिला व् बच्चे को सर्दी के कारण होने वाली परेशानियों से बचे रहने और स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

What should a pregnant woman not eat in winter

नवजात शिशु को कैसे नहलाएं

जन्म के बाद बच्चे को नहलाना कोई आसान काम नहीं होता है क्योंकि छोटे बच्चे बहुत ही कोमल और नाजुक होते हैं। ऐसे में यदि आप पहली बार पेरेंट्स बनने का अनुभव ले रहे हैं तो बच्चा नहाते समय रो क्यों रहा है, बच्चे को कितनी बार नहलाना चाहिए, कहीं नहलाते समय बच्चा फिसल तो नहीं जाएगा, किस तरह से बच्चे को नहलाना चाहिए ऐसे कुछ सवाल आपके मन में आ सकते हैं। लेकिन यह समय घबराने का नहीं होता है बल्कि शिशु की अच्छे से केयर करने का होता है।

और यदि आपको बच्चे की केयर करने में दिक्कत होती है तो कोई बात नहीं आप बच्चे का काम करने में पूरी सावधानी बरतें, धीरे धीरे आपको इसकी आदत हो जाएगी और बच्चा नहाते समय रोता क्यों है, बच्चे को कैसे नहलाना चाहिए आपको यह सब कुछ आ जाता है। तो आज इस आर्टिकल में हम नवजात शिशु को कैसे नहलाना चाहिए इससे जुड़े कुछ टिप्स बताने जा रहे हैं। जैसे की:

मौसम का ध्यान रखें

नवजात शिशु को नहलाने के लिए मौसम का खास ध्यान रखें। जैसे की यदि ठण्ड या बारिश का मौसम है तो गर्म पानी का इस्तेमाल करें जिससे शिशु को सेहत सम्बन्धी कोई नुकसान न हो। यदि गर्मी का मौसम है तो नोर्मल पानी का इस्तेमाल करें।

शिशु की सेहत को देखें

छोटे बच्चे को रोजाना नहलाना जरुरी नहीं होता है बल्कि जब आपको लगे की आपके बच्चे की तबियत खराब है तो उसे मत नहलाएं। बस आप गुनगुने पानी में सूती कपडे को भिगोकर निचोड़ लें उसके बाद शिशु का शरीर साफ़ कर दें और कपडे बदल दें। इससे शिशु का शरीर साफ़ भी हो जायेगा और शिशु को सेहत सम्बन्धी परेशानी भी नहीं होगी। खासकर सर्दियों में बच्चे को रोजाना नहलाने से बचना चाहिए।

पानी का तापमान सही रखें

शिशु को नहलाने के लिए आप जिस पानी का इस्तेमाल कर रही है उसके तापमान का खास ध्यान रखें। जैसे की न तो पानी ज्यादा ठंडा होना चाहिए और न ही ज्यादा गर्म होना चाहिए। साथ ही बच्चे के ऊपर पानी डालने से पहले महिला को अपने हाथों पर पानी डालना चाहिए जिससे पानी का सही तापमान क्या है इसका अंदाजा लगाने में मदद मिल सके।

नहलाने के लिए चाहिए जरुरी सामान को पहले इकट्ठा कर लें

बच्चे को जब आप नहलाने जा रही है तो ध्यान रखें की जिन जिन चीजों की बच्चे को नहलाते समय जरुरत पड़ती है जैसे की शैम्पू, साबुन, आदि उन सभी को उस जगह पर रख दें जहां बच्चे को नहलाना है। ताकि आप एक जगह आराम से बैठकर बच्चे को नहला सकें और आपको बार बार उठना नहीं पड़े।

नहलाने के बाद जो सामान चाहिए उन्हें एक जगह इकट्ठा कर लें

शिशु को नहलाने के बाद जिन जिन चीजों की जरुरत होती है उन्हें भी एक ही जगह इक्कठा कर लें जैसे की पाउडर, क्रीम, आयल, आदि। ताकि आप शिशु को एक ही जगह पर आराम से बैठकर तैयार कर सकें।

सही जगह का चुनाव करें

शिशु को नहलाने के लिए महिला को सही जगह का चुनाव भी करना चाहिए यानी की बच्चे को ऐसी जगह पर नहलाना चाहिए जहां पर ज्यादा हवा न हो, जहां महिला या बच्चे के फिसलने का खतरा न हो, जहां बैठकर महिला आराम से बच्चे को नहला सके आदि।

बाथ टब का इस्तेमाल करें

छोटे बच्चे को नहलाने के लिए आज कल मार्किट में बहुत से बाथ टब मिल जाते हैं जिनमे आराम से शिशु को लिटाकर नहलाया जा सकता है। बाथ टब में शिशु को नहलाने के लिए सबसे पहले आप अपने एक हाथ से बच्चे को इस तरह से पकड़ें की शिशु का सिर और गर्दन उठी रहें। उसके बाद दूसरे हाथ से शिशु पर पानी डालें और साबुन लगाएं, शैम्पू लगाएं। उसके बाद शिशु को साफ़ पानी से नहलाकर उसे तोलिये में लपेट लें। और उसके बाद बच्चे को कपडे पहनाकर तैयार करे।

सामान्य तरीके से बच्चे को ऐसे नहलाएं

यदि आपके पास बाथ टब नहीं है तो आप सबसे पहले अपने दोनों पैरों को आगे की तरफ फैलाएं। उसके बाद आप शिशु को अपने पैरों पर लिटाएं। फिर शिशु के सिर और गर्दन को सहारा देते हुए एक हाथ से ऊपर उठायें। फिर शिशु के ऊपर थोड़ा पानी डालें, साबुन, शैम्पू लगाकर साफ पानी से शिशु को नहलाएं। ध्यान रखें की शिशु की आँखों, कान, नाक, मुँह आदि में साबुन या पानी नहीं जाएँ। और उसके बाद बेबी को कपडे पहनाकर तैयार करे।

तो यह हैं कुछ टिप्स जो बच्चे को नहलाते समय आपको ध्यान रखने चाहिए। साथ ही एक बात का और ध्यान रखें की नहलाने के बाद शिशु को दूध पिलाकर सुला दें क्योंकि नहाने के बाद बच्चा आरामदायक नींद लेता है जिससे उसे फ्रैश व् एक्टिव रहने में मदद मिलती है।

How to bathe newborn

शिशुओं के मल का रंग अलग-अलग होने के कारण

जन्म के बाद शिशु की केयर करना महिला के लिए कई बार बहुत परेशानी भरा अनुभव होता है खासकर महिला जब पहली बार माँ बनती हैं। क्योंकि शिशु को किस समय क्या चीज चाहिए होती है इसके बारे में महिला को समझ नहीं आता है और महिला महिला धीरे धीरे शिशु के लक्षणों को जानना शुरू करती है। और छोटा बच्चा कुछ कह भी नहीं पाता है ऐसे में महिला को बच्चे के शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों और हरकतों को देखकर यह जानने में मदद मिलती है की शिशु क्या चाहता है या शिशु को कोई दिक्कत तो नहीं है। आज इस आर्टिकल में हम शिशु द्वारा किये जाने वाले रंग के बारे में बताने जा रहे हैं जिनसे आपको शिशु की सेहत व् स्वास्थ्य के बारे में जानने में मदद मिल सकती है। की आखिर शिशु के मल के रंग में बदलाव होने के क्या कारण हैं।

काले रंग का मल

जब बच्चे का जन्म होता है तो शिशु द्वारा किया जाने वाला पहला मल काले रंग का होता है। इस मल को मेकोनियम कहा जाता है और इसे लेकर घबराने की बिल्कुल बात नहीं होती है। क्योंकि जन्म के बाद शिशु के मल का रंग काला होना आम बात होती है। और ऐसा शिशु दो से तीन दिन तक कर सकते हैं लेकिन यदि उसके बाद भी शिशु काले रंग का मल पास करें तो इसे अनदेखा बिल्कुल नहीं करें क्योंकि ऐसा करना बिल्कुल भी सामान्य नहीं होता है और तुरंत बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर जाएँ।

संतरे के रंग जैसा मल

यदि बच्चा संतरे के जैसा पीला मल करता है तो यह शिशु को पीलिया होने का संकेत होता है। ऐसे में आपको एक बार डॉक्टर से जरूर चेक करवाना चाहिए।

लाल

बच्चे जन्म के बाद यदि लाल रंग का मल पास करें तो ऐसा होने पर आपको एक बार भी अनदेखा न करते हुए तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। क्योंकि यह मल में खून हो सकता है, जो की शिशु को किसी तरह के इन्फेक्शन होने की तरफ संकेत करता है।

हरे रंग का मल

कुछ बच्चे जन्म के बाद हरे से रंग का मल भी पास कर सकते हैं ऐसा होना बिल्कुल सामान्य बात होती है। क्योंकि छह महोने तक बच्चा केवल माँ का दूध पीता है जिसकी वजह से शरीर में पानी की कमी हो सकती है और बच्चा हरे रंग का मल पास कर सकते हैं। ज्यादातर वो बच्चे को फार्मूला मिल्क यानी पाउडर वाला दूध पीते हैं वो हरे रंग का मल पास करते हैं।

पीले रंग का मल

जन्म के बाद जब शिशु काले रंग का मल पास करना बंद करते हैं तो उसके बाद बच्चे पीले रंग का मल पास कर सकते हैं। इसमें किसी तरह के घबराने की बात नहीं होती है क्योंकि शिशु का ऐसा करना शिशु के पूरी तरह से स्वस्थ होने की तरफ इशारा करता है।

चटक पीले रंग का मल

यदि आपका बच्चा नोर्मल तरीके से चटक पीले रंग का मल पास कर रहा है तो इसमें घबराने की कोई बात नहीं है। लेकिन यदि शिशु बार बार और बहुत पतला मल पास कर रहा है तो यह बच्चे को डायरिया होने का लक्षण होता है। ऐसे में बच्चा कितनी बार और कितने समय के बाद मल पास कर रहा है इसके बारे में महिला को अच्छे से जानना चाहिए। ताकि शिशु की सेहत के बारे में सही जानकारी मिल सके।

सफ़ेद

बच्चे का मल यदि सफ़ेद रंग का होता है तो यह शिशु को पेट यानी पाचन सम्बन्धी परेशानी होने के कारण होता है। ऐसे में जरुरी है की आपको जल्द से जल्द डॉक्टर से जांच जरूर करवानी चाहिए।

ग्रे रंग

यदि आपका बच्चा ग्रे रंग का मल पास करता है तो यह शिशु को लिवर से संबंधित या अन्य शारीरिक सम्बन्धी परेशानी होने का संकेत होता है। ऐसे में आपको डॉक्टर से जांच जरूर करवाना चाहिए।

बच्चा जन्म के बाद दिन में कितनी बार मल पास करता है?

जन्म के बाद कम से कम दो हफ्ते तक बच्चे एक दिन में कम से कम आठ से दस बार मल त्याग कर सकते हैं। और उसके बाद शिशु का मल त्याग करना सिमित होने लगता है और मल पास करने के अंतराल में भी बदलाव आने लगता है।

तो यह हैं जन्म के बाद शिशु के अलग अलग रंग के मल पास करने से जुड़े कुछ टिप्स, यदि आपने भी अभी अभी बच्चे को जन्म दिया है तो आपको भी इन सभी बातों के बारे में पता होना चाहिए। ताकि यदि आपको अपने बच्चे के मल के रंग में कुछ असहज महसूस हो तो आप तुरंत बच्चे का इलाज करवा सके और बच्चे को भी सेहत सम्बन्धी परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सके।

Causes of different color of baby’s stool

प्रेगनेंसी के दौरान कौन-कौन से टेस्ट किए जाते हैं?

प्रेगनेंसी महिला के लिए ऐसा समय होता है जहां महिला को हर कदम पर सावधानी बरतने की जरुरत होती है। इसीलिए प्रेगनेंसी की शुरुआत से ही डॉक्टर महिला के सभी टेस्ट करते हैं ताकि प्रेग्नेंट महिला और बच्चा दोनों ही स्वस्थ रहें। और महिला के लिए भी यह जरुरी होता है की महिला अपने सभी टेस्ट जरूर करवाए। अब इस आर्टिकल में हम उन्ही टेस्ट के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जो महिला को प्रेगनेंसी के दौरान करवाने पड़ते हैं।

यूरिन टेस्ट

यदि आपने घर में प्रेगनेंसी टेस्ट कर लिया है तो उसके बाद भी डॉक्टर्स यूरिन टेस्ट जरूर करते हैं ताकि प्रेगनेंसी को कन्फर्म किया जाएँ। इसके अलावा यदि महिला को प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन के रंग में बदलाव नज़र आता है, स्मैल आती है, यूरिन पास करते समय दर्द व् जलन का अनुभव होता है तो भी यूरिन इन्फेक्शन न हो इसके लिए यूरिन टेस्ट किया जाता है।

ब्लड टेस्ट

गर्भावस्था के दौरान ब्लड टेस्ट भी किया जाता है इससे शरीर में रक्त की सही मात्रा को जानने में मदद मिलती है, क्योंकि यदि महिला को एनीमिया यानी की खून की कमी की समस्या होती है तो इसके कारण प्रेग्नेंट महिला व् बच्चे दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

शारीरिक बिमारियों से जुड़े टेस्ट

गर्भावस्था के दौरान शारीरिक बीमारियां जैसे की शुगर, थायरॉयड, दमा आदि के भी टेस्ट जरूर किए जाते हैं। ताकि यदि महिला को ऐसी कोई परेशानी है तो उसी के अनुसार महिला का ट्रीटमेंट शुरू किया जा सके।

अल्ट्रासॉउन्ड

गर्भावस्था के दौरान महिला का अल्ट्रासॉउन्ड भी किया जाता है और यह अल्ट्रासॉउन्ड एक से ज्यादा बार होते हैं और आपको डॉक्टर द्वारा बताया जाता है की आपको कब अल्ट्रासॉउन्ड करवाना है। और यह अल्ट्रासॉउन्ड गर्भ में शिशु की स्थिति और विकास को जानने के लिए किया जाता है।

यौन संचारित रोग

महिला का यौन संचारित रोग टेस्ट भी किया जाता है क्योंकि यदि महिला या पुरुष को यह समस्या होती है तो इसके कारण यह समस्या बच्चे को होने का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में यदि प्रेगनेंसी की शुरुआत में ही इस समस्या का पता चल जाता है तो इसे कण्ट्रोल करने में मदद मिलती है।

ब्लड प्रैशर

पूरी प्रेगनेंसी के दौरान जब भी आप डॉक्टर के पास जाती है हमेशा महिला की ब्लड प्रैशर की जांच की जाती है। क्योंकि कुछ महिलाओं का प्रेगनेंसी के दौरान ब्लड प्रैशर हाई रहता है तो कुछ का लौ रहता है। ऐसे में महिला को ब्लड प्रैशर के कारण कोई दिक्कत न हो इसीलिए महिला की यह जांच की जाती है।

तो यह हैं वो टेस्ट जो प्रेगनेंसी के दौरान महिला को करवाने पड़ते हैं। यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपके लिए भी यह सभी टेस्ट करवाने बहुत जरुरी है क्योंकि इससे आपको और आपके बच्चे दोनों को ही स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

What tests are done during pregnancy?

समय से पहले जन्मे बच्चे की देखभाल कैसे करें?

गर्भावस्था के दौरान सैंतीसवें हफ्ते से पहले यदि बच्चे का जन्म हो जाता है तो इसे समय पूर्व प्रसव कहा जाता है। ऐसे में समय से पहले जन्मे बच्चे के वजन में कमी व् अन्य परेशानियां होने का खतरा भी बढ़ जाता है। और इसे लेकर महिला को अधिक तनाव भी हो सकता है। लेकिन यदि समय से पहले जन्मे बच्चे की अच्छे से केयर की जाए, किसी भी तरह की लापरवाही न बरती जाएँ, तो इससे जन्म के बाद बच्चे का विकास अच्छे से होने में मदद मिलती है। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको समय से पहले जन्मे बच्चे की देखभाल के लिए कुछ टिप्स देने जा रहे हैं।

साफ़ सफाई का रखें ध्यान

समय से पहले जन्मे बच्चे का इम्युनिटी लेवल बहुत ही ज्यादा कमजोर होता है जिसकी वजह से बच्चे को इन्फेक्शन होने का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में बच्चे को किसी भी तरह के इन्फेक्शन से बचाने के लिए जरुरी होता है की आप साफ़ सफाई का अच्छे से ध्यान रखें। जैसे की हर किसी के हाथ में बच्चे को नहीं दें, आप भी जब बच्चे को उठाएं तो हाथों को अच्छे से धोएं या फिर सैनिटाइज़ करें, बच्चे के कपडे, बिछौने व् अन्य इस्तेमाल किये जाने वाले सामान की साफ़ सफाई का ध्यान रखें, आदि। ऐसा करने से बच्चे को इन्फेक्शन से बचे रहने में मदद मिलेगी और बच्चे का विकास अच्छे से होगा।

स्तनपान जरूर करवाएं

समय से पहले जन्मे बच्चे के बेहतर विकास के लिए जरुरी है की माँ का दूध बच्चे को जरूर पिलाया जाये। क्योंकि माँ के दूध से बच्चे के विकास के लिए सभी जरुरी पोषक तत्व उसे मिलेंगे साथ ही उसकी इम्युनिटी भी बढ़ेगी। और बच्चे के लिए दूध की कमी न हो इसके लिए महिला को अपने खान पान का अच्छे से ध्यान रखना जरुरी है। यदि बच्चा आपका दूध नहीं पी रहा है तो उसे डॉक्टर से पूछ कर पाउडर वाला दूध पिलायें, यदि आपका दूध तो उतर रहा है लेकिन बच्चा दूध पी नहीं पा रहा है तो दूध निकालकर बच्चे को पिलायें, यदि बच्चा सो रहा है तो हर दो घंटे में उसे उठाकर दूध पिलायें, आदि ताकि बच्चे का विकास अच्छे से हो सके।

ऐसी चीजें बिल्कुल न खाएं जिससे बच्चे को परेशानी हो

माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम आहार होता है इसीलिए महिला को अपनी डाइट का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि महिला अपनी डाइट में यदि लापरवाही करती है जैसे की ऐसा कुछ खा लेती है जिससे बच्चे को दिक्कत हो तो इसके कारण बच्चे की तबियत बिगड़ सकती है और बच्चे ठीक होने की बजाय बीमार हो सकता है।

संक्रमित व्यक्ति से बच्चे को दूर रखें

यदि आपके घर में किसी को संक्रमण है या बाहर से कोई ऐसा व्यक्ति आता है जिसे संक्रमण है तो बच्चे को उससे बिल्कुल दूर रखें। ताकि बच्चे को कोई दिक्कत नहीं हो।

बच्चे के कपड़ों को धूप जरूर लगवाएं

बच्चे के छोटे से लेकर बड़े सभी कपड़ों को धूप जरूर दिखवाएं। क्योंकि बच्चे के कपड़ों को धूप दिखवाने से सभी कीटाणु नष्ट हो जाते हैं साथ ही कपड़ों में से स्मेल भी नहीं आती है।

टीकाकरण

नन्हे शिशु का टीकाकरण समय से करवाएं ताकि बच्चे का विकास अच्छे से हो और बच्चे को किसी भी तरह की दिक्कत न हो। साथ ही समय समय पर बच्चे की जांच जरूर करवाएं।

जान बूझकर बच्चे को न उठाएं

समय से पहले जन्मा बच्चा बहुत ही कमजोर होता है ऐसे में बच्चा जितना आराम करता है उतना ही ज्यादा उसका विकास बेहतर होने में मदद मिलती है। ऐसे में इस बात का खास ध्यान रखें की बच्चा यदि सो रहा है तो बच्चे को जान बूझकर बिल्कुल नहीं उठाएं क्योंकि इससे शिशु को परेशानी हो सकती है।

तो यह हैं कुछ खास टिप्स जिनका ध्यान आपको समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे की केयर करते समय रखना चाहिए। यदि आप इन सभी बातों का ध्यान रखती है तो बच्चे को बहुत जल्दी रिकवर होने में मदद मिलती है।

How to take care of Premature Baby?

डिलीवरी के कितने दिनों बाद सम्बन्ध बनाना चाहिए?

प्रेगनेंसी के दौरान ही नहीं बल्कि डिलीवरी के बाद भी महिला बहुत से शारीरिक व् मानसिक बदलाव का अनुभव कर सकती है। क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद महिला का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है जिसके कारण महिला को शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही शारीरिक परेशानियों के कारण और बच्चे की केयर को लेकर महिला मानसिक रूप से भी परेशानी का अनुभव कर सकती है।

महिला की चाहे नोर्मल डिलीवरी हो या सिजेरियन डिलीवरी हो बच्चे के जन्म के बाद महिला को अपने शरीर की ताकत, फिटनेस को वापिस लाने में थोड़ा समय लगता है। और महिला के जल्दी से जल्दी रिकवर होने के लिए सबसे जरुरी होता है की एक तो महिला अपने खान पान का ध्यान रखें साथ ही भरपूर आराम करें। क्योंकि जितना हेल्दी फ़ूड महिला खाती है और जितना आराम करती है उतना ही जल्दी महिला को फिट होने में मदद मिलती है।

ऐसे में डिलीवरी के बाद ऐसे बहुत से सवाल होते हैं जो महिला के मन में चल रहे होते हैं जिन्हे लेकर महिला बहुत परेशान हो सकती है। जैसे की महिला का पेट अंदर कब जाएगा, टाँके कब तक ठीक होंगे, बच्चे की केयर को लेकर सवाल, डिलीवरी के बाद सम्बन्ध कब बनाया जा सकता है, आदि। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपसे डिलीवरी के बाद महिला को सम्बन्ध कब बनाना चाहिए इस बारे में बात करने जा रहे हैं।

जब तक टाँके ठीक न हो जाएँ

डिलीवरी के बाद टाँके जब तक अच्छे से घुल न जाएँ तब तक गलती से भी कपल को सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि यदि टाँके ठीक होने से पहले कपल सम्बन्ध बना लेता है तो इसके कारण टांकों के खुलने का डर रहता है, साथ ही महिला को भी बहुत ज्यादा परेशानी का अनुभव होता है।

ब्लीडिंग खत्म नहीं होने तक

डिलीवरी के बाद कम से कम चार से पांच हफ्ते तक महिला को ब्लीडिंग हो सकती है। शुरूआती दिनों में यह ब्लीडिंग ज्यादा फिर धीरे धीरे कम होने लगती है। ऐसे में ब्लीडिंग होने तक यदि महिला सम्बन्ध बनाती है तो इसके कारण शारीरिक रूप से परेशानी होने के साथ महिला को इन्फेक्शन होने का खतरा भी रहता है। इसीलिए महिला को कोई दिक्कत न हो इसके लिए महिला को डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग होने तक बिल्कुल भी सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए।

कम से कम इतने समय के लिए इंतज़ार करें

यदि किसी महिला की डिलीवरी नोर्मल होती है तो उसके बाद कम से कम पांच से छह हफ्ते बाद तक बिल्कुल भी सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए। और यदि महिला की डिलीवरी सिजेरियन होती है तो कम से कम आठ से नौ हफ्ते तक महिला को सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए।

जब तक महिला तैयार न हो

प्रसव के बाद कुछ महिलाएं मानसिक रूप से परेशान हो जाती है जिसकी वजह से महिला की सम्ब्नध बनाने की इच्छा में कमी आ सकती है। ऐसे में जब तक महिला स्वयं को सम्बन्ध बनाने के तैयार न हो तब तक महिला को न तो खुद सम्बन्ध बनाना चाहिए और न ही महिला के पार्टनर को उसके साथ किसी तरह की जबरदस्ती करनी चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से महिला को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

डॉक्टर से राय लें

डिलीवरी होने के बाद सम्बन्ध बनाने से पहले एक बार महिला के स्वास्थ्य की सही जानकारी लेने के लिए डॉक्टर से मिलना चाहिए। यदि महिला स्वस्थ हो गई है तो महिला सम्बन्ध बना सकती है। यदि नहीं, तो महिला को बिल्कुल भी सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए।

डिलीवरी के बाद सम्बन्ध बनाते समय इन बातों का ध्यान रखें

  • किसी भी तरह की प्रोटेक्शन का इस्तेमाल जरूर करें।
  • महिला का सम्बन्ध बनाने का मन नहीं है तो पहले महिला को तैयार करें उसके बाद सम्बन्ध बनाएं।
  • कुछ भी नया ट्राई नहीं करें।
  • ध्यान रखें की सम्बन्ध बनाते समय महिला को कोई दिक्कत न हो।

तो यह हैं डिलीवरी के बाद सम्बन्ध कब बनाना चाहिए उससे जुड़े कुछ टिप्स, यदि आपकी अभी डिलीवरी हुई है तो सम्बन्ध बनाने में जल्दी न करें। बल्कि इन बातों का ध्यान रखें। ताकि डिलीवरी के बाद सम्बन्ध बनाने पर आपको किसी भी तरह की परेशानी न हो।

प्रेगनेंसी में पानी की कमी (एमनियोटिक फ्लूड) होने के कारण

माँ के गर्भ में शिशु पूरी तरह से सुरक्षित होता है क्योंकि गर्भ में शिशु एमनियोटिक फ्लूड होता है और गर्भनाल से जुड़ा होता है। गर्भनाल की मदद से शिशु को भरपूर पोषक तत्व मिलते हैं जिससे शिशु का विकास बढ़ता है। और एमनियोटिक फ्लूड शिशु के बेहतर विकास में मदद करने के साथ शिशु को सुरक्षित रखने में भी मदद करता है।

इसीलिए गर्भ में शिशु के बेहतर विकास के लिए गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की मात्रा का सही होना बहुत जरुरी होता है। लेकिन कुछ केस में गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी हो जाती है। और ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं तो आज इस आर्टिकल में हम आपको गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी होने के क्या कारण होते हैं इस बारे में बताने जा रहे हैं।

गर्भनाल से जुडी समस्या

यदि गर्भनाल के माध्यम से शिशु तक पोषक तत्व, ऑक्सीजन, ब्लड अच्छे से नहीं पहुँच पाता है तो इस कारण गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी हो जाती है।

रिसाव होना

कुछ केस में महिला के प्राइवेट पार्ट से रिसाव होना शुरू हो जाता है। इसका कारण गर्भाशय के आस पास की झिल्ली का टूटना होता है। यदि किसी गर्भवती महिला को यह समस्या होती है तो इस कारण भी एमनियोटिक फ्लूड की कमी की समस्या हो जाती है।

पानी की कमी

यदि गर्भवती महिला के शरीर में पानी की कमी होती है तो इस कारण भी गर्भवती महिला को एमनियोटिक फ्लूड की कमी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली परेशानियां

गर्भावस्था के दौरान महिला को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है जैसे की शरीर में खून की कमी का होना, जेस्टेशनल डाइबिटीज़, हाई ब्लड प्रैशर आदि। यदि किसी गर्भवती महिला को यह परेशानियां होती है तो इस कारण भी महिला को एमनियोटिक फ्लूड की कमी की समस्या हो सकती है।

दवाइयों के कारण

कुछ ऐसी दवाइयां होती है जिनका सेवन यदि किसी कारण गर्भवती महिला प्रेगनेंसी के दौरान करती है। तो उन दवाइयों का सेवन करने के कारण भी गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी हो सकती है।

गर्भ में एक से ज्यादा शिशु का होना

यदि प्रेग्नेंट महिला के गर्भ में एक से ज्यादा शिशु होते हैं तो इस कारण भी महिला को इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

डिलीवरी का समय पास आने पर

गर्भवती महिला की डिलीवरी डेट जब पास आती है या फिर डिलीवरी डेट निकल जाती हैं। तो ऐसा होने पर भी गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी हो सकती है।

एमनियोटिक फ्लूड की मात्रा सही रखने के तरीके

एमनियोटिक फ्लूड की मात्रा को सही रखने के लिए गर्भावस्था के दौरान महिला को पानी का भरपूर सेवन करना चाहिए। साथ ही जितना हो सके प्रेगनेंसी में होने वाली परेशानियों से बचे रहने की कोशिश करनी चाहिए। इसके अलावा एक बार डॉक्टर की राय भी जरूर लेनी चाहिए।

तो यह है प्रेगनेंसी में एमनियोटिक फ्लूड में कमी के कारण व् इस समस्या से बचने के कुछ उपाय, यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी यह जानकारी पता होनी चाहिए ताकि आपको ऐसी की दिक्कत न हो।

नोर्मल डिलीवरी के बाद टांकों की देखभाल कैसे करनी चाहिए

गर्भवस्था के दौरान महिला बहुत सी परेशानियों का सामना करती है। और प्रेगनेंसी की शुरुआत से लेकर डिलीवरी तक महिला को परेशानियों का होना बहुत ही आम बात भी होती है। साथ ही ऐसा बिल्कुल भी नहीं है की बच्चे के जन्म के बाद महिला आराम से रहती है। बल्कि डिलीवरी के बाद भी महिला को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। आज इस आर्टिकल में हम डिलीवरी के दौरान लगने वाले टांकों के बारे में बात करने जा रहे हैं।

और यह टांके केवल सिजेरियन डिलीवरी में ही नहीं लगते हैं बल्कि नोर्मल डिलीवरी के बाद भी कई महिलाओं को टाँके लगते हैं और यदि इन टांकों की सही से देखभाल न की जाएँ तो महिला को दिक्कत होने का खतरा रहता है। तो आइये अब इस आर्टिकल में जानते हैं की नोर्मल डिलीवरी के बाद टांकों की देखभाल कैसे करनी चाहिए।

डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाई लगाएं

आज कल डिलीवरी के बाद ऐसे टाँके लगाएं जाते हैं जो आपकी स्किन में घुल जाते हैं। और इन टांकों को जल्द से जल्द ठीक करने के लिए डॉक्टर टांकों पर दवाई लगाने की सलाह देते हैं। डिलीवरी के बाद यदि महिला टांकों पर अच्छे से दवाई लगाती है और डॉक्टर द्वारा बताई गई सभी बातों का ध्यान रखती है तो ऐसा करने से टांको को जल्दी से जल्दी ठीक करने में मदद मिलती है और टांको से जुडी कोई दिक्कत भी नहीं होती है।

टांकों की साफ़ सफाई का ध्यान रखें

महिला को टांको के आस पास की साफ़ सफाई का भी अच्छे से ध्यान रखना चाहिए। यदि महिला टांकों के आस पास अच्छे से साफ़ सफाई का ध्यान नहीं रखती है। तो इसके कारण टांकों में इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है।

ज्यादा पानी नहीं डालें

ध्यान रखें की टांकों की सही देखभाल के लिए टांकों पर पानी नहीं डालें, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है की टांकों की साफ़ सफाई नहीं करें। बल्कि टांकों को साफ़ करने के लिए आप पहले एक सूती कपडे को पानी में डालकर टांकों के आस पास सफाई करें। उसके बाद साफ़ सूखे सूती कपडे से आप टांको को साफ़ कर दें।

सम्बन्ध नहीं बनाएं

जब तक महिला के टाँके नहीं सूखते हैं तब तक टांको की अच्छे से देखभाल करने के लिए महिला को सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए। साथ ही जब तक महिला की ब्लीडिंग बंद नहीं हो जाती है तब तक भी महिला को सम्बन्ध बनाना चाहिए।

फाइबर युक्त आहार

डिलीवरी के बाद अपनी डाइट में फाइबर युक्त चीजों को शामिल करें। क्योंकि फाइबर युक्त चीजों का सेवन करने से पेट अच्छे से साफ़ हो जाता हैं, कब्ज़, पेट में गैस जैसी परेशानी नहीं होती है, महिला अच्छे से फ्रेश होती है। जिससे फ्रेश पास करते समय टांको पर जोर नहीं पड़ता है और महिला को कोई दिक्कत नहीं होती है।

फ्रैश होते समय ज्यादा जोर नहीं लगाएं

जब तक टाँके अच्छे से ठीक नहीं हो जाते हैं तब तक महिला को फ्रैश होते समय ज्यादा जोर नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि जोर लगाने से टांको में दिक्कत हो सकती है।

सैनिटरी पैड समय से बदलें

टांको की अच्छे से साफ़ सफाई का ध्यान रकने के लिए महिला को सैनिटरी पैड भी समय से बदलते रहना चाहिए। ऐसा करने से महिला को संक्रमण से बचे रहने में मदद मिलती है।

तो यह हैं कुछ टिप्स जिनका ध्यान नोर्मल डिलीवरी के बाद लगने वालों टांकों की देखभाल करते समय रखना चाहिए। ताकि आपके टाँके अच्छे से घुल जाये और आपको किसी भी तरह की दिक्कत न हो।

How to take care of stitches after normal delivery

प्रेगनेंसी में शहद खाना चाहिए या नहीं?

यदि किसी की मीठा अधिक खाने की इच्छा हो तो चीनी की जगह शहद का सेवन करना एक बेहतरीन विकल्प होता है। और शहद न केवल खाने में स्वादिष्ट होता है बल्कि शहद विटामिन्स, एंटी ऑक्सीडेंट्स व् अन्य मिनरल्स से भरपूर भी होता है। और यह सभी पोषक तत्व सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। और शहद के बेहतरीन फायदे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी को मिलते हैं। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको शहद के कुछ बेहतरीन फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं।

इम्युनिटी बूस्टर की तरह करता है

शहद एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी बैक्टेरियल गुणों से भरपूर होता है जो शरीर में मौजूद बैड बैक्टेरिया को खत्म करने और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। जिससे आपकी प्रतरोधक क्षमता बढ़ती है और आपको बिमारियों व् संक्रमण से सुरक्षित रहने में मदद मिलती है।

ठण्ड से बचाव

ठण्ड के कारण होने वाली परेशानियां जैसे की सर्दी, खांसी, गले में खराश, जैसी परेशानियों से बचने के लिए भी शहद का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है।

अनिंद्रा की समस्या होती है दूर

यदि आपको रात को नींद नहीं होती है तो रोजाना सोने से पहले एक गिलास गुनगुने दूध में एक से डेढ़ चम्मच शहद डालकर उसका सेवन करें। ऐसा करने से आपको नींद न आने की समस्या से बचे रहने में मदद मिलती है।

तनाव होता है दूर

शहद का सेवन करने से आपको शारीरिक फायदे मिलने के साथ मानसिक रूप से भी फायदे मिलते हैं। क्योंकि शहद का सेवन करने से स्ट्रेस को दूर करने में मदद मिलती है।

वजन रहता है नियंत्रित

रोजाना सुबह एक गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद डालकर सेवन करने से मेटाबोलिज्म बेहतर होता हैं। जिससे वजन को नियंत्रित रहने में मदद मिलती है।

प्रेग्नेंट महिला को शहद खाना चाहिए या नहीं?

प्रेगनेंसी के दौरान कुछ भी खाने पीने से पहले उस खाद्य पदार्थ के बारे में पूरी जानकारी लेना बहुत जरुरी होता है। क्योंकि यदि महिला किसी भी ऐसी चीज का सेवन करती है जिसका सेवन प्रेगनेंसी के दौरान नहीं करना चाहिए तो इसकी वजह से माँ के साथ बच्चे को भी नुकसान पहुँचता है। आज इस आर्टिकल में हम शहद के सेवन के बारे में बात कर रहे हैं और जब गर्भवती महिला के शहद के सेवन को लेकर बात आती है।

तो इसका जवाब होता है हाँ, प्रेग्नेंट महिला शहद का सेवन कर सकती है। और एक दिन में दो से तीन चम्मच शहद का सेवन गर्भवती महिला कर सकती है। क्योंकि शहद में मौजूद पोषक तत्व गर्भवती महिला के साथ गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए भी बहुत फायदेमंद होते हैं।

तो यह है प्रेगनेंसी के दौरान शहद के सेवन से जुडी जानकारी, यदि आप भी प्रेग्नेंट तो आप भी शहद से मिलने वाले इन बेहतरीन फायदों के लिए शहद का सेवन कर सकती है।

Can a pregnant women eat honey or not in Pregnancy

लेबर पेन के 15 लक्षण

प्रेगनेंसी के आठ महीने बीत जाने के बाद जैसे ही महिला को नौवां महीना लगता है वैसे ही महिला को तनाव, घबराहट, डर, बेचैनी जैसी परेशानियां होने लगती है। क्योंकि नौवां महीना लगते ही महिला को डिलीवरी के बारे में सोच सोच कर यह परेशानियां होती है। खासकर जिन महिलाओं की पहली डिलीवरी होती है और जिन महिलाओं को प्रसव के लक्षणों के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती है। उन महिलाओं को यह परेशानी अधिक होती है। लेकिन यदि महिला तनाव लेती है, डरती हैं, तो इससे महिला की परेशानियां और बढ़ जाती है।

इसीलिए प्रेग्नेंट महिला को प्रेगनेंसी के दौरान प्रेगनेंसी व् प्रसव से जुडी जानकारी इक्कठी करने की सलाह दी जाती है। क्योंकि प्रेगनेंसी व् प्रसव से जुडी महिला की जानकारी बढ़ेगी तभी तो महिला की परेशानी घटेगी। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम भी आपसे प्रसव के कुछ लक्षणों के बारे में बताने जा रहे हैं। जिन्हे जानकर आपको प्रसव का समय आया है या नहीं इसे जानने में मदद मिलेगी। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं उन टिप्स के बारे में:

पेट में दर्द व् ऐंठन

प्रसव का समय नजदीक आने पर यदि महिला को पेट में ठीक वैसे ही दर्द होता है। जैसे की महिला को periods के दौरान होता है या पेट में ऐंठन बहुत ज्यादा महसूस होती है। तो यह लक्षण महसूस होना इस बात की और इशारा करता है की आपका प्रसव का समय पास आ गया है और आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।

कमर में दर्द

यदि प्रेग्नेंट महिला को कमर में नीचे की तरफ बहुत अधिक दर्द महसूस होता है और धीरे धीरे यह दर्द जाँघों की तरफ बढ़ता है। तो यह लक्षण इस बात की और इशारा करता है की बच्चा जन्म के लिए तैयार है।

यूरिन पास करने की इच्छा में बढ़ोतरी

तीसरी तिमाही में दौरान गर्भाशय का आकार बढ़ने के कारण महिला की यूरिन पास करने की इच्छा में बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन यदि महिला को थोड़ी थोड़ी देर में यूरिन पास करने की इच्छा हो रही है, तो ऐसा होना भी महिला का प्रसव समय आने का संकेत होता है।

प्राइवेट पार्ट से स्त्राव

यदि प्रेग्नेंट महिला को प्राइवेट पार्ट से रक्त, गुलाबी या भूरे रंग का स्त्राव होता है तो ऐसा होना भी डिलीवरी का समय पास आने का संकेत होता है।

संकुचन

यदि गर्भवती महिला को गर्भाशय के आस पास की मांसपेशियों में बहुत अधिक खिंचाव महसूस होता है। और ऐसा आपको बहुत जल्दी जल्दी महसूस होता है तो यह लक्षण भी प्रसव का संकेत होता है।

पानी की थैली का फटना

गर्भ में शिशु एमनियोटिक फ्लूड में होता है यदि महिला का प्रसव होने वाला होता है तो यह पानी बाहर की तरफ निकलने लगता है। जिसे की पानी की थैली का फटना कहा जाता है, यदि गर्भवती महिला को प्राइवेट पार्ट से सफ़ेद पानी निकलता हुआ महसूस होता है तो गर्भवती महिला को तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। क्योंकि पानी की थैली फटने का मतलब होता है की अब आपका शिशु इस दुनिया में आने वाला है।

शिशु की हलचल में कमी

डिलीवरी का समय पास आने पर शिशु का सिर नीचे की तरफ हो जाता है जिस कारण महिला को शिशु की हलचल थोड़ी कम महसूस हो सकती है। ऐसे में आपको जल्द से जल्द डॉक्टर के पास जाना चाहिए, खासकर जब महिला महिला को बच्चे की हलचल बिल्कुल भी महसूस न हो।

शिशु का भार नीचे की तरफ महसूस होना

डिलीवरी का समय पास आने पर शिशु का भार नीचे की तरफ अधिक पड़ने लगता है जिस कारण महिला को पेल्विक एरिया पर ज्यादा जोर महसूस होता है। और महिला को ऐसा महसूस हो सकता है की जैसे बच्चे नीचे गिर रहा है, ऐसे में महिला को इस लक्षण के महसूस होते ही डॉक्टर से मिलना चाहिए क्योंकि यह भी लेबर पेन का लक्षण होता है।

पेट खराब होना

यदि नौवें महिला में महिला का पेट खराब हो जाता है यानी की महिला की मल पास करने की इच्छा अधिक होती है उल्टियां ज्यादा होती है। या फिर महिला को कब्ज़ हो जाती है तो इस लक्षण का महसूस होना भी प्रसव का समय पास आ गया है इस बात की और इशारा करता है।

जोड़ो की मांसपेशियों में खिंचाव

गर्भवती महिला को यदि घुटनों, जाँघों की मांसपेशियों में खिंचाव अधिक महसूस होता है तो इस लक्षण का महसूस होना भी महिला की डिलीवरी का समय पास आज्ञा है इस बात की और इशारा करता है।

नींद अधिक आना

प्रसव का समय पास आने पर कुछ महिलाओं को नींद भी अधिक आ सकती है लेकिन बेचैनी व् घबराहट अधिक होने के कारण महिला को सोने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

मूड में ज्यादा बदलाव आना

डिलीवरी का समय पास आने पर महिलाओं को मूड स्विंग्स भी अधिक हो सकते हैं। जैसे की महिला बहुत ज्यादा भावुक हो सकती है या महिला को बहुत अधिक चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है।

सीने में हल्कापन महसूस होना

डिलीवरी का समय पास आने पर महिला को पेट में सीने के आस पास हल्का महसूस होता है क्योंकि बच्चे डिलीवरी का समय पास आने पर बच्चे का भार नीचे की तरफ ज्यादा बढ़ने लगता है।

भावनाओं में बदलाव

गर्भ में पल रहे बच्चे से महिला का रिश्ता उसी पल से जुड़ जाता है जब महिला को प्रेग्नेंट होने की खबर मिलती है। और जब बच्चे का जन्म होने वाला होता है तो महिला को अपनी भावनाओं में उतार चढ़ाव अधिक महसूस हो सकता है। यदि डिलीवरी का समय पास आने पर आपको भी ऐसा महसूस हो रहा है तो समझ जाइये की अब कुछ ही समय में आपका नन्हा मेहमान आपकी बाहों में होगा।

डिलीवरी डेट का पास आना

प्रेगनेंसी की शुरुआत में महिला को डिलीवरी के लिए अनुमानित तिथि बताई जाती है यदि महिला की डिलीवरी डेट आने वाली होती है तो यह भी इस बात की और इशारा करता है की महिला को लेबर पेन अब किसी भी समय शुरू हो सकता है।

तो यह हैं वो लक्षण जो यदि गर्भवती महिला को महसूस होते हैं तो इनका मतलब होता है की अब आपका नन्हा इस दुनिया में आने ही वाला है। लेकिन ध्यान रखें की डिलीवरी का समय पास आने पर किसी भी तरह की लापरवाही जैसे की हॉस्पिटल जाने में देरी नहीं करें। क्योंकि इसके कारण केवल महिला को ही परेशानी नहीं होगी बल्कि बच्चे पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है।

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