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प्रेगनेंसी में मसूड़ों में सूजन होने के कारण

प्रेगनेंसी के दौरान वजन बढ़ना, खाने के स्वाद में बदलाव आना, बार बार यूरिन पास करने की इच्छा होना, भूख ज्यादा या कम लगना, पैरों में सूजन आना, घबराहट थकावट कमजोरी महसूस होना, आदि लक्षणों का महसूस होना बहुत आम बात होती है। ऐसे ही कुछ लक्षणों के साथ कुछ महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान मसूड़ों से जुडी समस्या का सामना भी कर सकती है। मसूड़ों में सूजन होना, ब्रश करते समय मसूड़ों से खून निकलना आदि प्रेगनेंसी के दौरान महसूस होने वाला एक लक्षण होता है। ऐसे में घबराने की बात नहीं होती है। आज इस आर्टिकल में हम आपको प्रेगनेंसी के दौरान मसूड़ों में सूजन के बारे में बात करने जा रहे हैं।

क्या गर्भावस्था में मसूड़ों में सूजन होना आम बात होती है?

गर्भावस्था के दौरान बॉडी में बहुत से बदलाव होते हैं, महिला को बहुत सी शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि इस दौरान शरीर में हार्मोनल बदलाव तेजी से हो रहे होते हैं। और हार्मोनल बदलाव के साथ शरीर में ब्लड फ्लो भी तेजी से हो सकता है ऐसे में इन्ही कारणों की वजह से महिला को मसूड़ों में सूजन, खून आना जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

प्रेगनेंसी में मसूड़ों में सूजन होने के कारण

गर्भावस्था के दौरान कुछ महिलाओं को मसूड़ों में सूजन की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में इस समस्या के क्या-क्या कारण हो सकते हैं आइये उसके बारे में जानते हैं।

हार्मोनल बदलाव

प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं। और इन्ही हार्मोनल बदलाव के कारण कुछ महिलाओं को मसूड़ों में सूजन का सामना कर सकती है।

ब्लड फ्लो

गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में ब्लड फ्लो तेजी से होता है और इसी कारण मसूड़ों में भी ब्लड फ्लो तेजी से होता है। ऐसे में मसूड़ों में ब्लड फ्लो तेजी से होने के कारण भी मसूड़ों में सूजन महसूस हो सकती है।

कैल्शियम की कमी

जिन महिलाओं के शरीर में कैल्शियम की कमी होती है उन महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान मसूड़ों में दर्द, सूजन, खून आना जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता हैं।

ज्यादा मीठा खाने के कारण

जो महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान ज्यादा मीठा खाती है तो इस कारण दांतों की सेंसिटिविटी बढ़ जाती है। और दांतों की सेंसिटिविटी बढ़ जाने के कारण भी महिला को मसूड़ों में सूजन का सामना करना पड़ सकता है।

क्या महिला इस समस्या से बचाव के लिए दवाई का सेवन कर सकती है?

जी नहीं, प्रेगनेंसी के दौरान दांतों की समस्या होने पर महिला को अपने आप से दवाई का सेवन नहीं करना चाहिए। क्योंकि इनका बुरा असर शिशु पर पड़ सकता है। इसके अलावा यदि प्रेग्नेंट महिला को ज्यादा समस्या हो तो महिला को डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

तो यह है प्रेगनेंसी के दौरान मसूड़ों में दर्द या सूजन होने के कारण, और इस समस्या के होने पर महिला को ज्यादा घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा होना प्रेगनेंसी के दौरान आम बात होती है। साथ ही महिला को अपने मुँह की साफ़ सफाई का ध्यान रखना चाहिए ताकि महिला को इस समस्या से बचे रहने में मदद मिल सकें। और इस समस्या से बचाव के लिए गुनगुने पानी में नमक डालकर कुल्ला करना सबसे बेहतरीन उपाय है और ऐसा महिला दिन भर में दो बार करें।

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गर्भवती महिला को कौन-कौन से व्रत रखने चाहिए

प्रेगनेंसी का समय महिला के लिए किसी तपस्या से कम नहीं होता है। क्योंकि इस दौरान महिला एक ही समय में बहुत से बदलाव से गुजरती है, नौ महीने तक एक नन्ही सी जान को अपने गर्भ में पालती है और उसके बाद असहनीय दर्द सहकर उस बच्चे को इस दुनिया में लाती है। ऐसे में प्रेगनेंसी के दौरान महिला की सबसे अहम जिम्मेवारी यही होती है की महिला अपना अच्छे से ध्यान रखे ताकि माँ व् बच्चे दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके। लेकिन इसके बाद भी कुछ गर्भवती महिलाएं व्रत रखने की इच्छा रखती है।

क्या प्रेगनेंसी के दौरान व्रत रखा जा सकता है?

गर्भावस्था महिला के लिए बहुत ही नाजुक समय होता है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं होता है की यह महिला के लिए कोई बीमारी है। और इस दौरान महिला कुछ भी नहीं कर सकती है। ऐसे में महिला कुछ महिलाओं का यदि व्रत रखने का व्रत हो तो महिला अपनी सेहत का अच्छे से ध्यान रखते हुए व्रत कर सकती है।

लेकिन महिला को बस इस बात का ध्यान रखना है की महिला व्रत रखने से पहले डॉक्टर से राय जरूर ले यदि डॉक्टर आपको कहते हैं की आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं और व्रत रख सकती है तो आपको डरने की बात नहीं होती है और व्रत रखना पूरी तरह से सेफ होता है।

प्रेग्नेंट महिला कौन कौन से व्रत रख सकती है?

गर्भवती महिला उन सभी व्रत को कर सकती है जिनमे खाने पीने में कोई रोक टोक नहीं होती है जैसे की महिला कभी भी फलाहार का सेवन कर सकती है पानी या दूध पी सकती है, आदि। लेकिन यदि किसी व्रत में बिना खाए पीए या निर्जला रहना होता है तो महिला को वो व्रत नहीं करने चाहिए। तो आइये अब जानते हैं की महिला कौन- कौन से व्रत कर सकती है।

सोमवार का व्रत

सोमवार का व्रत गर्भवती महिला रख सकती है क्योंकि इस व्रत में महिला को ज्यादा रोक टोक नहीं होती है महिला दिन भर में कभी फलाहार का सेवन कर सकती है ऐसे में महिला के शरीर में एनर्जी सही रहने में मदद मिलती है।

वीरवार का व्रत

गर्भावस्था के दौरान महिला वीरवार का व्रत रखना चाहे तो महिला वो व्रत भी रख सकती है क्योकि इस व्रत में भी ज्यादा भूखा या प्यासा रहने की जरुरत नहीं होती है।

शुक्रवार का व्रत

गर्भवती महिला यदि शुक्रवार का व्रत रखना चाहती है तो महिला वो व्रत भी रख सकती है क्योंकि इस व्रत में भी महिला दिन भर में फलाहार का सेवन करने के साथ एक समय भोजन भी कर सकती है।

नवरात्रि व्रत

नवरात्रि के व्रत भी ज्यादा कठिन नहीं होते हैं ऐसे में यदि गर्भवती महिला नवरात्रि के उपवास रखना चाहे तो महिला वो भी रख सकती है। लेकिन महिला को यदि व्रत रखने के दौरान किसी भी तरह की दिक्कत हो तो महिला को बीच में ही व्रत छोड़ देना चाहिए।

करवा चौथ

करवाचौथ का व्रत महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र के लिए करती है और महिलाएं यह व्रत जरूर करती है ऐसे में एक दिन के इस व्रत में कोई दिक्कत नहीं होती है लेकिन महिला को व्रत के दौरान इस बता का ध्यान रखना चाहिए की महिला सुबह सरगी में हेल्दी चीजों का सेवन करें। साथ ही कथा सुनने के बाद भी फलाहार का सेवन जरूर करें।

शिवरात्रि का व्रत

शिवरात्रि का व्रत भी ज्यादा कठिन नहीं होता है इस व्रत में भी महिला दिन भर में फलाहार, पानी, जूस आदि का सेवन कर सकती है ऐसे में महिला चाहे तो शिवरात्रि का व्रत भी रख सकती है।

तो यह हैं प्रेग्नेंट महिला कौन से व्रत रख सकती है उससे जुडी जानकारी, यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आप भी इन व्रत को रख सकती है। बीएस इतना ध्यान रखें की एक बार डॉक्टर से परामर्श लेना न भूलें।

Dengue in Pregnancy – डेंगू से बचाव गर्भावस्था में क्यों जरुरी है

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गर्भ और गर्भवती महिला के लिए मच्छर काटना और डेंगू बुखार हो जाना कितना खतरनाक है प्रेगनेंसी में देखिये

Know how dengue can affect you and your baby during pregnancy. Dengue will impact your baby once infected by it during pregnancy. It is important to keep yourself safe this monsoon from mosquitos that carry the virus. A pregnant woman is responsible for a healthy fetus. Hence, you should take all possible measures to keep your baby safe from dengue.

Dengue can severely affect you and your fetus if you get infected by it. You must take all the measures and calculate all possible measures beforehand only. Know how you can protect yourself and your baby from this dangerous virus. Keep your family and loved ones safe. Stay healthy and live a healthy lifestyle.

Watch Hindi Video on How to Prevent Your Baby From Dengue During Pregnancy

दिन में सोना क्यों जरुरी है प्रेग्नेंट महिला के लिए

गर्भावस्था के दौरान महिला के लिए जितना खान पान का अच्छा होना जरुरी होता है उतना ही महिला के लिए बेहतर नींद का लेना भी जरुरी होता है। क्योंकि नींद लेने से महिला के शरीर को आराम मिलता है, महिला रिलैक्स होती है, महिला को एनर्जी से भरपूर यानी एक्टिव रहने में मदद मिलती है, आदि। ऐसे में महिला को सलाह दी जाती है की दिन भर में महिला को सात से आठ घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए।

साथ ही महिला को रात को समय से सोना चाहिए और सुबह समय से उठना चाहिए। इसके अलावा महिला को दिन भर में भी थोड़ी देर जरूर सोना चाहिए। इस आर्टिकल में हम आपको प्रेग्नेंट महिला को दिन में क्यों सोना चाहिए और महिला को क्या फायदे मिलते हैं उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

प्रेग्नेंट महिला को दोपहर में क्यों सोना चाहिए?

गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं, महिला को शारीरिक परेशानियां होती है, वजन बढ़ने के कारण महिला को कई बार रात के समय नींद लेने में दिक्कत होती है, आदि। ऐसे में महिला को दिन में एक से डेढ घंटा शरीर को आराम देना चाहिए इससे महिला की नींद पूरी होती है साथ ही महिला को सेहत सम्बन्धी बहुत से फायदे भी मिलते हैं।

गर्भवती महिला को दिन में सोने से कौन से फायदे मिलते हैं?

यदि गर्भवती महिला दिन में आराम करती है तो इससे महिला को एक नहीं बल्कि कई सेहत सम्बन्धी फायदे मिलते हैं जैसे की:

एक्टिव रहती है महिला

दिन में सोने से महिला के शरीर को आराम मिलता है जिससे महिला को रिलैक्स महसूस होता है और महिला ज्यादा एक्टिव रहती है। साथ ही दिन में सोने से सुबह के समय जो थोड़ी बहुत थकान या कमजोरी महिला को महसूस होती है वो भी दूर होने में मदद मिलती है।

नींद पूरी होती है

गर्भावस्था के दौरान सात से आठ घंटे की नींद जरुरी होती है ऐसे में यदि महिला को कभी रात के समय सोने में परेशानी होती है जिस वजह से महिला की नींद पूरी नहीं होती है। तो दिन में आराम करने से महिला की नींद को पूरा होने में मदद मिलती है जिससे महिला को नींद पूरी न होने के कारण होने वाली परेशानियों से बचे रहने में मदद मिलती है।

शारीरिक दिक्कतें होती है कम

यदि गर्भवती महिला सारा दिन उठी रहती है और उठकर या तो काम करती है या सारा दिन एक ही जगह बैठी रहती है तो इसकी वजह से महिला को बॉडी पेन जैसी परेशानी होने का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन यदि महिला दिनभर में थोड़ा आराम कर लेती है तो इससे महिला के शरीर के अंगों को आराम मिलता है जिससे महिला को शारीरिक परेशानियों को कम करने में मदद मिलती है।

बच्चे के विकास में मिलती है मदद

गर्भावस्था के दौरान यदि महिला दिन में आराम करती है तो इसकी वजह से महिला को फिट व् स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला फिट व् स्वस्थ रहती है तो इससे गर्भ में पल रहे शिशु को भी फिट व् स्वस्थ रहने मद मदद मिलती है।

तो यह हैं कुछ फायदे जो गर्भवती महिला को दिन के समय सोने से मिलते हैं ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को रात के समय नींद लेने के साथ दिन में भी थोड़ा आराम करना चाहिए जिससे माँ व् बच्चे दोनों को स्वस्थ रहने मदद मिल सकें।

प्रेगनेंसी में बेबी का सिर नीचे आ गया है इसके बारे में कैसे पता चलेगा और आपको क्या करना चाहिए

गर्भावस्था के पूरे नौ महीने तक महिला बहुत से उतार चढ़ाव से गुजरती है क्योंकि इस दौरान एक ही समय में कई चीजें हो रही होती है। जैसे की महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं, शारीरिक परेशानियां महिला को होती है, वजन में बढ़ोतरी होती है, गर्भ में शिशु के विकास को लेकर महिला के मन में सवाल चल रहे होते हैं, प्रेगनेंसी में क्या करें क्या नहीं इसके बारे में सही जानकारी न होने के कारण महिला परेशान होती है, आदि।

लेकिन फिर भी एक महिला ही है जो इतने उतार चढ़ाव के बाद भी अपने गर्भ में एक नन्ही जान को पाल सकती है और उसे इस दुनिया में लाती है। गर्भ में पल रहे शिशु का विकास महीने दर महीने बढ़ता है और फिर प्रेगनेंसी के नौवें महीने के लगते ही शिशु के जन्म लेने का समय और भी नजदीक आ जाता है।

और गर्भ में शिशु जन्म लेने की सही पोजीशन में आने लगता है यानी की शिशु का सिर नीचे की तरफ और पैर ऊपर की तरफ हो जाते हैं और शिशु ऊपर से खिसककर नीचे की और आ जाता है। आज इस आर्टिकल में हम आपसे प्रेगनेंसी के दौरान गर्भ में शिशु का सिर नीचे की तरफ आ गया है इस बारे में महिला को कैसे पता चलता है और महिला को इस समय क्या करना चाहिए उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

गर्भ में में शिशु का सिर नीचे आने पर महिला को महसूस होते हैं यह लक्षण

प्रेगनेंसी के दौरान महिला के शरीर में अलग अलग लक्षण महसूस हो सकते हैं और उन्ही लक्षणों की सही जानकारी होने पर महिला को यह जानने में मदद मिलती है की आखिर गर्भ में शिशु का सिर नीचे आया है या नहीं। तो आइये अब उन लक्षणों के बारे में जानते हैं।

पेट के ऊपरी हिस्से में खालीपन महसूस होना

यदि प्रेग्नेंट महिला को पेट के ऊपरी हिस्से यानी की सीने के आस पास यदि खालीपन महसूस हो तो इसका मतलब यह होता है की गर्भ में शिशु अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आ चूका है। क्योंकि शिशु का सिर नीचे होने पर भार नीचे की तरफ ज्यादा हो जाता है और पैर ऊपर की तरफ होने पर महिला को पेट के ऊपरी हिस्से में थोड़ा खाली महसूस होने लगता है।

पेल्विक एरिया पर दबाव

यदि प्रेग्नेंट महिला को पेल्विक एरिया यानी की पेट के निचले हिस्से में दबाव अधिक महसूस होता है तो इसका मतलब भी यही होता है की गर्भ में पल रहा शिशु अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आ चूका है।

बार बार यूरिन पास करने की इच्छा होना

बच्चे का भार नीचे की तरफ बढ़ने के कारण मूत्राशय पर दबाव बढ़ जाता है जिसकी वजह से महिला को जल्दी जल्दी यूरिन पास करने की इच्छा होती है। यदि महिला को यह लक्षण महसूस होने लगता है तो महिला को समझ जाना चाहिए की बच्चा जन्म लेने की सही पोजीशन में आ गया है।

हल्का हल्का दर्द महसूस होना

डिलीवरी का समय नजदीक आने से पहले महिला को कई बार पेट में दर्द महसूस हो सकता है जिसे कई बार महिलाएं डिलीवरी पेन भी समझ लेती है। यदि महिला को ऐसा कुछ महसूस हो रहा होता है तो इसका मतलब होता है की बच्चा नीचे की तरफ आ गया है और पेल्विक एरिया पर दबाव बढ़ने के कारण महिला को यह हल्का फुल्का दर्द महसूस हो रहा है।

पीठ में दर्द

जब बच्चा जन्म लेने की सही पोजीशन में आता है तो पेट के निचले हिस्से पर दबाव बढ़ने के साथ पीठ की मांसपशियों में भी खिंचाव बढ़ जाता है। जिसकी वजह से महिला को पीठ में दर्द ज्यादा महसूस हो सकता है यदि महिला को ऐसा महसूस हो रहा है तो इसका मतलब होता है गर्भ में शिशु नीचे की तरफ आ गया है।

भूख बढ़ जाती है

यदि महिला की भूख बढ़ जाती है तो यह लक्षण भी प्रेगनेंसी के नौवें महीने में गर्भ के शिशु के जन्म लेने की सही पोजीशन में आने की और इशारा करता है। क्योंकि पेट के ऊपरी हिस्से में खालीपन होने के कारण महिला को जलन की समस्या कम होती है जिसकी वजह से महिला को ऐसा महसूस हो सकता है।

गर्भ में शिशु के नीचे आने पर क्या करें

डिलीवरी का सही समय हो गया है और शिशु नीचे की तरफ आ गया है तो ऐसे में महिला को कुछ ऐसे काम करने चाहिए जिससे महिला के प्रसव को जल्दी और आसानी से होने में मदद मिलती है। और इसके लिए महिला यह कर सकती है:

सबसे पहले डॉक्टर से मिलें

यदि महिला को ऐसा महसूस हो रहा है की शिशु अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आ चूका है तो महिला को सबसे पहले डॉक्टर से मिलना चाहिए ताकि गर्भ में शिशु की सही स्थिति के बारे में जानने में मदद मिल सके।

वाक करें

गर्भ में शिशु के नीचे की और आने पर महिला को वाक करना शुरू करना चाहिए इससे शिशु को और नीचे खिसकने में मदद मिलती है जिससे प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में मदद मिलती है साथ ही सामान्य प्रसव के चांस बढ़ते हैं।

ऐसी चीजें खाएं जिससे प्रसव पीड़ा होती है

इस दौरान अपनी डाइट में महिला को उन चीजों को शामिल करना चाहिए जिससे महिला की प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में मदद मिल सकें।

स्क्वाट्स करें

यह एक एक्सरसाइज होती है जिससे गर्भ में शिशु के नीचे की और खिसकने पर महिला को करना चाहिए ऐसा करने से महिला को प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में मदद मिलती है।

समय से पहले इन लक्षणों के महसूस होने पर क्या करें?

यदि गर्भ में शिशु के नीचे खिसकने के यह लक्षण समय से पहले महसूस होते हैं तो महिला को बिना देरी किये डॉक्टर से मिलना चाहिए। क्योंकि समय से पहले इन लक्षणों का महसूस होना समय से पहले बच्चे के जन्म होने की तरफ इशारा करता है जो माँ और बच्चे दोनों के लिए सही नहीं होता है।

तो यह हैं गर्भ में शिशु के नीचे की तरफ होने के लक्षण व् इन लक्षणों के महसूस होने पर महिला को क्या करना चाहिए उससे जुड़े टिप्स, यदि आपका भी डिलीवरी का समय नजदीक है तो आपको भी इन टिप्स का ध्यान रखना चाहिए। ताकि डिलीवरी के दौरान आपको या आपके बच्चे को किसी तरह की दिक्कत नहीं हो।

नवजात शिशु की देखभाल के लिए 10 टिप्स

प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने का इंतज़ार ख़त्म होने के बाद जब आपकी नन्ही सी जान आपकी गोद में आती है तो वो ख़ुशी दुनिया की सब खुशियों से ऊपर होती है। क्योंकि जिस नन्ही सी जान को आपअपने गर्भ में सींच रही थी वो अब आपके बहुत करीब होता है। और जब आप उसे गोद में उठाती हैं तो उसकी मुस्कान, उसका कोमल शरीर, आपको सब कुछ आकर्षित करने लगता है।

लेकिन उसके साथ ही मन में बहुत सी बातें भी होती है की बच्चे को कैसे नहलाना है, सुलाना है, दूध पिलाना है, आदि। लेकिन यह परेशान होने की बात नहीं होती है क्योंकि धीरे धीरे आपको सब समझ आने लगता है। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम आपको नवजात शिशु की देखभाल के लिए कुछ टिप्स बताने जा रहे हैं। परन्तु उससे पहले जानते हैं की आपको बच्चे की देखभाल के लिए किन किन चीजों की जरुरत पड़ सकती है।

नवजात की केयर के लिए जरुरी सामान

  • एक पिल्लो जिस पर लिटाकर आप शिशु को दूध पिला सकें।
  • शिशु के लिए आरामदायक कपडे जैसे की मोज़े, दस्ताने, बनियान, लंगोट, टी शर्ट, पजामी, आदि, बिछोने, तौलिया, आरामदायक और कोमल सा कम्बल, आदि।
  • डाइपर भी जरूर लेकर आएं।
  • शिशु के लिए झूला, मच्छर से बचाने वाली जाली, आदि।
  • बेबी वाइप्स, क्रीम, नहाने का साबुन, शैम्पू, बेबी बाथ टब, आदि।
  • अगर बच्चा स्तनपान नहीं करें तो उसके लिए फीडिंग बोतल एक से ज्यादा लेकर आएं।

छोटे बच्चे की देखभाल के लिए टिप्स

जब बच्चा जन्म लेता है तो ख़ुशी होने के साथ मन में टेंशन भी होता है की क्या मैं अपने बच्चे की अच्छे से देखभाल कर पाऊँगी या नहीं। लेकिन ऐसे में महिला को दिक्कत लेने की जरुरत नहीं होती है बल्कि बच्चे के साथ महिला को अपना टाइम एन्जॉय करना चाहिए क्योंकि जब आपके पास बच्चा होता है तो आप उसकी केयर करना सीख जाती है और फिर दूसरों को भी राय देने लगती हैं की बच्चा कैसे पालना चाहिए। तो आइये अब बेबी की देखभाल के कुछ टिप्स जानते हैं।

स्तनपान कैसे और कितना करवाएं?

जब आप बच्चे को फीड करवाती है तो सबसे पहले तो आपको आरामदायक पोजीशन में बैठना चाहिए ताकि आपको कोई दिक्कत नहीं हो और बच्चा जब तक दूध पीना चाहता है आराम से पी सकें। इसके लिए आप एक पिलो का इस्तेमाल करें और पिल्लो को गोद में रखकर बच्चे को उसपर लिटाएं और दूध पिलाएं। उसके बाद बच्चे को आपको जब तक दूध पिलाना चाहिए जब तक की बच्चा दूध पीना खुद बंद नहीं करता है।

साथ ही आपको दोनों ब्रेस्ट से बच्चे को दूध पिलाना चाहिए। पहले दो तीन महीने तक बच्चे को हर दो से तीन घंटे में दूध पिलाना चाहिए। उसके बाद बच्चे के रोने से आपको यह पता चलने लगता है की बच्चा भूखा है ऐसे में आप उसे दूध पीला सकती है। फिर जब बच्चा छह महीने का हो जाता है तो बच्चे को दूध के साथ आपको थोड़ा साबुत आहार भी देने शुरू करना चाहिए।

दूध पिलाने के बाद डकार जरूर दिलाएं

जब आपका बच्चा दूध पीना बंद कर देता हैं तो आपको बच्चे को कंधे से लगाकर हल्के हाथ से थपथपाना चाहिए ताकि बच्चा डकार ले सकें। डकार लेने से बच्चे का दूध हज़म हो जाता है और यदि बच्चा डकार नहीं लेता है तो बच्चे को उल्टी, पेट में दर्द व् गैस बनने की समस्या अधिक हो सकती है।

शिशु को उठायें कैसे

शिशु बहुत ही नाजुक होता है और शुरुआत में जब उसकी गर्दन नहीं लगी होती है तो उसकी बहुत प्यार से उठाना चाहिए केयर से उठाना चाहिए। आप शिशु को उठाने के लिए शिशु की गर्दन और सिर के बीच उँगलियों को फैलाते हुए उठाएं इससे सिर और गर्दन को स्पोर्ट मिलता है। साथ ही बच्चे को हवा में ऊपर की तरफ उछालना, बच्चे को अचानक से बिना सहारे के उठाना लेना आदि नहीं करना चाहिए।

मालिश करें

आपको बच्चे के जन्म के बाद स्वयं या घर में किसी से रोजाना शिशु को नहलाने से पहले मालिश जरूर करवानी चाहिए। इससे शिशु को आराम मिलता है साथ ही शिशु के अंगों को मजबूती मिलती है और मालिश करवाने के बाद शिशु आराम से सोता भी है।

बच्चे को नहलाएं कैसे

बच्चे को नहलाना महिलाओं के लिए सबसे मुश्किल होता है क्योंकि बच्चा इतना नाजुक होता है की कई बार महिला को डर लगता है कहीं बच्चा फिसल कर गिर नहीं जाये। ऐसे में महिला को बिना डर के शिशु को नहलाना चाहिए या तो आप शिशु को बेबी बाथ टब में लिटाएं और उसके सिर व् गर्दन के बीच हाथ रखकर उसका सिर थोड़ी ऊपर करें और फिर थोड़ा थोड़ा पानी डालकर नहलाएं।

पानी के तापमान का खास ध्यान रखें की न तो पानी ज्यादा गर्म होना चाहिए और न हो ज्यादा ठंडा होना चाहिए। उसके बाद शिशु को टॉवल में लपेटकर अच्छे से साफ़ करें और पाउडर का इस्तेमाल करने के बाद उसे कपडे पहनाएं। या फिर शिशु को आप अपने पंजी और ऊपर उठाते हुए अपने पैरों पर बिठाएं और उसके सिर व् गर्दन के बीच हाथ देकर सहारा दें उसके बाद धीरे धीरे पानी कस इस्तेमाल करते हुए शिशु को नहलाएं। जो भी तरीका आपको आसान लगे आप उसी तरीके का इस्तेमाल करके शिशु को नहला सकते हैं।

बच्चे की नाभि का ध्यान रखें

माँ के गर्भ में शिशु नाभि की मदद से ही जुड़ा होता है और बच्चे के जन्म के बाद उसे गर्भनाल से अलग करने के लिए काट दिया जाता है। उसके बाद धीरे धीरे वह सूख जाता है ऐसे में महिला को ध्यान रखना चाहिए की महिला नाभि का वो हिस्सा जब तक सूख नहीं जाता है उसके आस पास की सफाई का ध्यान रखें ताकि बच्चे को संक्रमण से बचे रहने में मदद मिल सकें। इसके अलावा उसके बाद भी नाभि की साफ़ सफाई का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि नाभि यदि साफ़ नहीं होती है तो इससे शरीर में बहुत सी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।

डाइपर का भी ध्यान रखें

आजकल डाइपर का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होना शुरू हो गया है लेकिन जितना हो सके बच्चे को घर में डाइपर नहीं पहनाना चाहिए। क्योंकि इससे रैशेस होने का खतरा होता है जिससे शिशु को बहुत परेशानी होती है। साथ ही जब भी आप बच्चे को डाइपर पहनाएं तो बच्चे को सुखाकर पाउडर का इस्तेमाल करके डाइपर पहनाएं। और हर पांच से छह घंटे में शिशु का डाइपर बदल देना चाहिए। इसके अलावा बीच बीच में शिशु को चेक करते रहना चाहिए क्योंकि यदि शिशु पॉटी करदे और लम्बे समय तक आप उसे चेच नहीं करें तो इससे इन्फेक्शन होने का डर रहता है।

समय पर करवाएं टीकाकरण

बच्चे को तीन महीने तक बहुत सी वैक्सीन लगती है जिससे शिशु को संक्रमण से बचे रहने में मदद मिलती है ऐसे में आप शिशु को सुरक्षित रखने के लिए समय से वैक्सीन लगवाएं।

बच्चे को कितना सुलाएं

आपको यह जानकर हैरानी होगी की नवजात शिशु दिन भर में अठारह से बाइस घंटे तक सो सकता है। ऐसे में आपको इसे लेकर घबराना नहीं चाहिए लेकिन शिशु को लम्बे समय तक भूखा सोने नहीं देना चाहिए। और हर दो से तीन घंटे में शिशु को उठाकर दूध पिलाते रहना चाहिए।

शिशु के नाख़ून कैसे काटें

छोटे बच्चे के नाख़ून बहुत जल्दी बढ़ते हैं ऐसे में आपको बच्चे के नाख़ून की साफ़ सफाई का ध्यान रखना चाहिए। और बच्चे के नाखूनों को काटते रहना चाहिए। नाख़ून काटने के लिए आप बच्चों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नेल कटर का इस्तेमाल कर सकते हैं साथ ही नाख़ून काटते समय तेजी नहीं करें।

तो यह हैं कुछ टिप्स जो नवजात शिशु की केयर में आपकी मदद कर सकते हैं यदि आपने भी अभी अभी एक नन्हे शिशु को जन्म दिया है या देने वाली हैं तो आप भी इन टिप्स का ध्यान रखें। इसके अलावा बदलते मौसम के साथ शिशु की केयर में थोड़ा बहुत बदलाव भी आता है तो आपको उसका भी खास ख्याल रखना चाहिए ताकि शिशु को कोई दिक्कत नहीं हो।

New born baby care tips

ज्यादा काम करने से प्रेग्नेंट महिला को क्या-क्या नुकसान हो सकता है?

प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को घर का काम काज करने की, बाहर आने जाने के काम करने की मनाही नहीं होती है। क्योंकि गर्भावस्था कोई बिमारी नहीं होती है जिसमे महिला को बिल्कुल आराम ही करना हो। लेकिन काम करते समय महिला को कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी होता है ताकि माँ या बच्चे की सेहत पर किसी तरह का बुरा असर नहीं पड़े।

जैसे की यदि महिला काम कर रही है और उस काम को करने पर महिला के पेट पर जोर या दबाव पड़ रहा है तो महिला को वो काम नहीं करना चाहिए, काम करते समय यदि महिला को थकावट महसूस हो रही या सांस फूल रही है तो महिला को थोड़ा आराम करना चाहिए और फिर काम करना चाहिए, यदि बाहर आने जाने वाला काम है जो की आसानी से हो सकता है तो बिना ज्यादा भागदौड़ के महिला वो काम कर सकती है, आदि।

यदि महिला इन बातों का ध्यान रखती है तो महिला को कोई दिक्कत नहीं होती है। लेकिन यदि महिला की प्रेगनेंसी में कॉम्प्लीकेशन्स होती है या महिला जरुरत से ज्यादा काम करती है तो इसके कारण महिला को दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। तो आज इस आर्टिकल में हम आपको जरुरत से ज्यादा काम करने के कारण प्रेग्नेंट महिला को क्या-क्या दिक्कत हो सकती है उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

पेट में दर्द ज्यादा हो सकता है

गर्भावस्था के दौरान पेट दर्द की समस्या होना आम बात होती है लेकिन इस समस्या का ज्यादा होना माँ व् बच्चे दोनों के लिए सही नहीं होता है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला ज्यादा काम करती है और उन काम को ज्यादा काम करती है जिन्हे करने से पेट पर असर पड़ता है जैसे की पेट के बल बैठकर काम करना, प्रेस करना, बाथरूम साफ़ करना, आदि। तो इसकी वजह से महिला को पेट दर्द, पेल्विक एरिया में दर्द, जैसी परेशानी अधिक हो सकती है। और इस परेशानी के अधिक होने पर महिला को ब्लीडिंग, गर्भपात, समय से पहले डिलीवरी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

कमर में दर्द की समस्या हो सकती है

जरुरत से ज्यादा काम करने के कारण गर्भवती महिला को बैक पेन की समस्या से परेशान होना पड़ सकता है। वैसे भी प्रेगनेंसी के दौरान महिला को कमर में दर्द की समस्या होती है लेकिन जरुरत से ज्यादा काम करने के कारण महिला की यह परेशानी ज्यादा बढ़ सकती है। ऐसे में जिन कामों को करने में बैक पेन की समस्या हो जैसे की झुककर काम करना, लम्बे समय तक खड़े रहकर काम करना आदि इन्हे महिला को रूककर करना चाहिए।

पैरों में सूजन बढ़ सकती है

यदि प्रेग्नेंट महिला कोई ऐसा काम कर लेती है जिसमे महिला के पैरों पर दबाव अधिक पड़ता है जैसे की लम्बे समय तक रसोई में काम करते समय महिला यदि खड़ी रहती है। तो इसकी वजह से प्रेग्नेंट महिला को पैरों में सूजन की समस्या अधिक हो सकती है साथ ही महिला को जोड़ो में दर्द, पैरों में दर्द की समस्या भी हो सकती है। जिसकी वजह से महिला को चलने फिरने, आराम से सोने में दिक्कत बढ़ सकती है।

ज्यादा थकावट व् कमजोरी महसूस हो सकती है

प्रेग्नेंट महिला यदि जरुरत से ज्यादा काम कर लेती है तो इसके कारण महिला को थकावट व् कमजोरी की समस्या अधिक हो सकती है। और थकावट व् कमजोरी अधिक होने के कारण महिला को अन्य शारीरिक परेशानियां जैसे की बॉडी पेन, आदि होने का खतरा बढ़ जाता है।

नींद में कमी आ सकती है

ज्यादा काम करने की वजह से ज्यादा थकावट हो सकती है, ज्यादा शारीरिक परेशानियां गर्भवती महिला को हो सकती है। जिसकी वजह से महिला को नींद लेने में परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है। और जब महिला की नींद पूरी नहीं होती है तो इसके कारण महिला की परेशानियां और ज्यादा बढ़ सकती है। ऐसे में बेहतर नींद लेने के लिए महिला को केवल उतना ही काम करना चाहिए जिसमे महिला को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं हो।

उठने बैठने में दिक्कत हो सकती है

प्रेग्नेंट महिला जब जरुरत से ज्यादा काम करती है तो इसकी वजह से बॉडी पार्ट्स में पेन बढ़ सकता है जिसकी वजह से महिला को उठने बैठने में परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है।

गर्भपात का खतरा हो सकता है

गर्भावस्था की पहली तिमाही में महिला को जितना हो सके आराम करना चाहिए क्योंकि यह समय बहुत ही नाजुक होता है। लेकिन यदि ऐसे में महिला जरुरत से ज्यादा काम करने लग जाती है तो इस कारण महिला को ब्लीडिंग की समस्या हो सकती है और यदि महिला को ब्लीडिंग की समस्या अधिक हो जाती है तो महिला को गर्भपात जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

तनाव हो सकता है

ज्यादा काम करने के कारण थकावट बढ़ने लगती है, महिला को शारीरिक परेशानी अधिक हो सकती है, आदि। और जब महिला को शारीरिक परेशानी अधिक होती है तो आराम करने का मन भी नहीं होता है क्योंकि महिला अच्छी नींद नहीं ले पाती है। जिसकी वजह से महिला को स्ट्रेस महसूस हो सकता है।

सिर दर्द व् चक्कर की समस्या

गर्भवती महिला यदि जरुरत से ज्यादा काम कर लेती है तो इसकी वजह से महिला को आराम नहीं मिल पाता है। और आराम न मिल पाने के कारण महिला को सिर दर्द व् चक्कर जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। और सिर दर्द की समस्या बढ़ने के कारण महिला को ज्यादा दिक्कत होने की सम्भावना बढ़ सकती है।

स्किन से सम्बंधित समस्या या इन्फेक्शन होने का खतरा

गर्भवती महिला यदि घर का कोई ऐसा काम अधिक करती है जिसमे केमिकल का इस्तेमाल अधिक होता है। तो ऐसा काम अधिक करने के कारण प्रेगनेंसी के दौरान महिला को केमिकल की स्मेल से इन्फेक्शन व् केमिकल में अधिक काम करने की वजह से स्किन सम्बंधित समस्या होने का खतरा बढ़ जाता है।

तो यह हैं कुछ समस्याएँ जो गर्भवती महिला को ज्यादा काम करने के कारण हो सकती है। ऐसे में गर्भवती महिला को इन परेशानियों से बचे रहने और अपनी व् बच्चे के स्वास्थ्य को सही रखने के लिए जरुरत से ज्यादा काम करने से बचना चाहिए।

Pregnancy me jarurat se jyada kaam karne ke nuksan

आठवें महीने यदि शिशु की हलचल कम हो गई है तो यह करें

गर्भ में शिशु का हलचल करना महिला के लिए प्रेगनेंसी का सबसे अनोखा और खास अनुभव होता है। शुरुआत में शिशु का विकास जब पूरा नहीं होता है तो शिशु कम हलचल करता है लेकिन जैसे जैसे शिशु का विकास बढ़ता है वैसे वैसे शिशु की हलचल बढ़ने लग जाती है।

परन्तु फिर भी शिशु के हलचल करने का कोई तय समय नहीं होता है और न हो शिशु दिन में कितनी बार हलचल करेगा इसका कोई हिसाब होता है। परन्तु प्रेग्नेंट महिला को शिशु की हलचल से जुडी कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी होता है जैसे की शिशु ने कितने समय से हलचल नहीं की है, पहले शिशु ज्यादा हलचल करता था लेकिन अब कम कर रहा है, आदि।

क्योंकि गर्भ में शिशु का हलचल करना शिशु के स्वस्थ होने की और इशारा करता है लेकिन यदि शिशु हलचल कम करें या कभी कभार लम्बे समय तक शिशु की हलचल महसूस न हो तो यह गंभीर समस्या हो सकती है। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम आपको गर्भ में शिशु की हलचल से जुडी जानकारी व् शिशु की हलचल कम होने पर क्या करना चाहिए उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

गर्भ में शिशु कब ज्यादा हलचल करता है?

कई बार ऐसा हो सकता है की जब आप काम कर रही हो या किसी काम में ज्यादा बिज़ी हो तब गर्भ में शिशु हलचल करें और आपको इसका पता भी न चले। और उसके बाद जब आप आराम से बैठ जाये तो शिशु हलचल न करें लेकिन इसका उल्टा भी हो सकता है की जब आप काम करें तो शिशु हलचल कम करें लेकिन जैसे ही आप बैठें तो गर्भ में शिशु जाग जाये और ज्यादा हलचल करें।

साथ ही जब गर्भ में शिशु का विकास बढ़ता है तो शिशु के सुनने की क्षमता में भी वृद्धि होती है। और ऐसे में जब भी शिशु बाहर से आने वाली कोई भी तेज आवाज़ सुनता है तो शिशु उस पर प्रक्रिया देता है। और हलचल करता है, कई बारे शिशु गर्भ पर तेज रौशनी पड़ने, आस पास आने वाली आवाज़ों को सुनकर, माँ के गर्भ पर हाथ फेरने आदि प्रक्रियाओं पर अधिक हलचल करता है।

गर्भ में शिशु की हलचल कम होने के कारण

  • यदि गर्भ में पल रहे शिशु की हलचल कम हो गई है तो इसका मतलब होता है की गर्भ में शिशु के विकास में कोई दिक्कत है यानी की शिशु स्वस्थ नहीं है।
  • आठवें महीने में गर्भ में शिशु का विकास सम्पूर्ण हो चूका होता है ऐसे में शिशु को गर्भ में घूमने की जगह कम मिलती है जिसकी वजह से शिशु की हलचल में कमी महसूस हो सकती है।
  • यदि गर्भ में शिशु को कोई गंभीर दिक्कत हो जाये तो इसकी वजह से भी शिशु की हलचल में कमी आ सकती है।

शिशु की हलचल महसूस कम होने पर क्या करें?

यदि आपको ऐसा लग रहा है की शिशु ने बहुत देर तक हलचल नहीं की है तो इसे अनदेखा नहीं करें और कुछ न कुछ घरेलू नुस्खें जरूर ट्राई करें जिससे शिशु की हलचल को महसूस करने में मदद मिल सकें। जैसे की:

ठंडा पानी पीएं

सबसे पहले ठंडा पानी पीएं इससे शरीर के तापमान में एक दम से बदलाव आएगा जिसकी वजह से शिशु को अलग महसूस होगा। और इसकी वजह से शिशु हलचल करना शुरू कर देगा।

पेट पर हाथ फिराएं

ऐसा माना जाता है की यदि गर्भ पर कोई हाथ फेरता है तो शिशु इसे भी महसूस करता है और अपनी प्रतिक्रिया देता हैं। ऐसे में आप भी ऐसा दो से चार मिनट तक जरूर करें। ऐसा करने से हो सकता है की गर्भ में शिशु हलचल करना शुरू कर दे।

तेज आवाज़ करें

गर्भ में शिशु के बढ़ते विकास के साथ शिशु की सुनने की क्षमता में भी इजाफा होता है। ऐसे में आप तेज आवाज़ में गाना चलाएं हो सकता है की तेज आवाज़ सुनकर गर्भ में शिशु अपनी प्रतिक्रिया दे और हलचल करना शुरू कर दें।

आराम से बैठ जाएँ

अधिकतर शिशु हलचल तब करते हैं जब महिला आराम करने के लिए जाती है ऐसे में आप एक जगह शांत बैठ जाये या फिर करवट लेकर लेट जाएँ। और फिर देखें की गर्भ में शिशु हलचल करता है या नहीं करता है।

डॉक्टर से मिलें

यदि ऊपर दिए गए टिप्स को ट्राई करने के बाद भी गर्भ में शिशु हलचल नहीं करें तो आपको इसे अनदेखा न करते हुए तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। यदि आधी रात को भी आपको कुछ ऐसा महसूस हो तो भी आपको इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि कई बार शिशु के हलचल न करने का कारण गंभीर होता है। ऐसे में आपको डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए।

तो यह हैं कुछ टिप्स जो आपको शिशु की हलचल न महसूस होने पर ट्राई करना चाहिए। यदि आप भी माँ बनने वाली है तो आपको भी इन सभी टिप्स की जानकारी जरूर होनी चाहिए। क्योंकि यदि आप इस जानकारी को अपने पास रखती है तो इससे गर्भ में पल रहे शिशु को स्वस्थ रखने में आपको मदद मिलती है।

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प्रेगनेंसी में बुखार हो जाने पर शिशु को कौन सी बीमारी हो जाती है?

प्रेगनेंसी के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु का विकास पूरी तरह से महिला पर ही निर्भर करता है। इसीलिए प्रेगनेंसी के दौरान महिला को अपना अच्छे से ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। यदि महिला अपने स्वास्थ्य का अच्छे से ध्यान रखती है तो इससे महिला को फिट रहने और गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर विकास में मदद मिलती है।

इसके अलावा प्रेगनेंसी के दौरान महिला को बहुत सी शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है जैसे की उल्टियां होना, पेट दर्द, पीठ दर्द, बॉडी पेन, जी मिचलाना, मूड स्विंग्स होना, आदि। और इन सभी परेशानियों का होना प्रेगनेंसी के दौरान आम बात होती है। लेकिन कई बार कुछ महिलाओं के शरीर का तापमान प्रेगनेंसी के दौरान बढ़ जाता है यानी की महिला को फीवर महसूस होता है।

ऐसे में महिला को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए की महिला फीवर से निजात पाने के लिए किसी भी दवाई का सेवन नहीं करें। और इसके लिए डॉक्टर से राय लें क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान बिना डॉक्टरी परामर्श के दवाई का सेवन करने से शिशु को नुकसान पहुँच सकता है।

इसके अलावा बुखार का इलाज जल्द से जल्द करना चाहिए क्योंकि यदि महिला का बुखार ज्यादा बढ़ जाता है या महिला को किसी संक्रमण के कारण बुखार होता है तो इसका बुरा असर गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ सकता है। और शिशु को समस्या होने खतरा होता है। तो आइये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी में बुखार हो जाने पर शिशु को कौन सी समस्या होने का खतरा रहता है।

गर्भपात

गर्भवती महिला के शरीर का तापमान यदि बढ़ जाता है या महिला को संक्रमण के कारण बुखार होता है। तो इसकी वजह से गर्भ में शिशु के विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है। जिसकी वजह से गर्भपात होने का खतरा होता है।

समय से पहले डिलीवरी

यदि महिला को बुखार अधिक होता है तो इसकी वजह से महिला की डिलीवरी समय से पहले होने का खतरा रहता है। और समय से पहले डिलीवरी होने के कारण शिशु के वजन में कमी, शिशु को जन्म दोष होने का खतरा रहता है।

शिशु के विकास में कमी

यदि प्रेग्नेंट महिला को बुखार होता है और गर्भवती महिला उसका समय से इलाज नहीं करती है या यह बुखार किसी संक्रमण के कारण होता है तो इसके कारण शिशु के विकास में कमी आने का खतरा होता है। क्योंकि संक्रमण के वायरस शिशु तक पहुंचकर शिशु के शारीरिक के साथ मानसिक विकास में बाधा डाल सकते हैं।

तो यह हैं कुछ समस्याएँ जो गर्भवती महिला को बुखार होने पर गर्भ में पल रहे शिशु को हो सकती है। ऐसे में महिला को साफ़ सफाई का, अपने खान पान का व् अन्य बातों का प्रेगनेंसी के दौरान ध्यान रखना चाहिए। ताकि महिला को संक्रमण व् बिमारियों से बचे रहने में मदद मिल सके और शिशु के विकास में किसी भी तरह का खतरा नहीं आये।

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