Home Blog Page 243

रगड़कर छिली त्वचा को कैसे ठीक करें?

रगड़कर छिली त्वचा को सामान्य करने के उपाय :- मनुष्य का शरीर बेहद नाजुक होता है और उससे भी नाजुक होती है उसकी त्वचा जिस पर थोड़ी से समस्या भी बहुत बड़ी लगती है. लेकिन कई बार ये छोटी छोटी समस्याएं भी बहुत तकलीफदेह हो जाती है. जिनमे से एक है त्वचा का रगड़कर छिल जाना. लगातार घर्षण और त्वचा पर रगड़ लग जाने के कारण वह छिल जाती है.

त्वचा के छिलने के बाद बहुत दर्द होता है और बेचैनी भी हो सकती है क्योंकि ये हमारी त्वचा की सबसे ऊपरी सतह में होती है जो बहुत नाजुक होती है. ऐसे तो ये शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है लेकिन मुख्यतः कोहनी, घुटने, कमर, गर्दन और जांघो पर ये सबसे अधिक होती है.

ऐसे तो किसी भी वस्तु से घर्षण के बाद त्वचा रगड़कर छिल जाती है लेकिन कई बार साइकिल से गिरने, दौड़ते समय घुटने रगड़ जाने और ऐसी कई वजहों से भी ये परेशानी हो सकती है. त्वचा के छिल जाने पर शुरू-शुरू में उसमे से खून निकलता है लेकिन कुछ देर बाद उस पर खून के थक्के जमने लगते है और वे एक अस्थायी घाव का रूप ले लेती है.ragdi-twacha

यूँ तो इस समस्या के लिए अधिकतर प्राथमिक उपचार की सहायता ली जाती है लेकिन यदि स्थिति गंभीर है तो डॉक्टरी सलाह की जरूरत भी पड़ सकती है. त्वचा के रगड़कर छिल जाने पर उस हिस्से का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि उसमे और कोई परेशानी न होने पाए. इसके साथ ही त्वचा के उस क्षेत्र को सुख रखे. घाव के ठीक होने तक ढीले कपडे पहने क्योंकि कपड़ो के सम्पर्क में आने से भी त्वचा में जलन और दर्द हो सकता है.

इसके अलावा और भी कुछ सावधानिया और उपाय है जिनकी मदद से रगड़कर छिली त्वचा को ठीक किया जा सकता है. तो आईये जानते है रगड़कर छिली त्वचा को ठीक करने के उपाय.

रगड़कर छिली हुई त्वचा के लिए उपचार

1. घाव को सुख रखें :

त्वचा की इस मामूली समस्या का उपचार करने के लिए उसे सूखा रखना बेहद जरुरी है. क्योंकि ये जितना गिला रहेगा उसमे जलन उतनी ही अधिक होगी. इसके लिए आप टैल्कम पाउडर का प्रयोग कर सकते है. यदि किसी कारण से आपके कपडे गीले हो गए है या उनमे पसीना आ गया है तो तुरंत उन्हें बदल लीजिये. क्योंकि पसीने के सम्पर्क में आने से छिली हुई त्वचा में दर्द और जलन हो सकती है,

2. लुब्रिकेट का इस्तेमाल :

रगड़कर छिली त्वचा पर पेट्रोलियम जेली और चिकने उत्पादों का प्रयोग करना लाभकारी होता है. क्योंकि ये लुब्रिकेंट्स का काम करते है जो त्वचा को ज्यादा घिसने और रगड़ खाने से बचाते है. और आज कल तो पेट्रोलियम जेली बहुत आसानी से और किफायती दामों में उपलब्ध है.

इसके अलावा शारीरिक संबंध बनाने से पूर्व भी अपनी त्वचा (जिन जगह त्वचा अधिक रगड़ती है) पर पेट्रोलियम जेली या अन्य चिकने पदार्थ को लगाएं. ऐसा करने से घर्षण कम होगा और त्वचा नहीं छिलेगी.

3. सही कपड़े पहने :

त्वचा के छिल जाने के बाद उस जगह का विशेष ध्यान रखना बेहद जरुरी होता है. क्योंकि जरा सी लापरवाही से भी दर्द और जलन होने लगती है. इसीलिए इस चोट को ठीक करने के लिए सही कपड़े पहनना भी बेहद जरुरी है.

इसके लिए जब भी व्यायाम या किसी अन्य शारीरिक गतिविधि को करें तो नमी को सोखने वाले सिंथेटिक कपड़े पहने. कॉटन के कपड़े पहनकर कभी भी व्यायाम न करें. इसके अलावा छोटे और कैसे हुए कपड़े कटाई न पहने और न फिटिंग वाले कपड़े तो कुछ दिन भूल ही जाएँ. लेकिन है ज्यादा ढीले कपड़े पहनने से भी बचें.

4. ओटमील का प्रयोग :

अपने घाव को ठीक करने के लिए लगभग 20 से 25 मिनट तक बाथ तब में बैठे रहे. अब डालिये को छिली हुई त्वचा पर आराम से हलके हाथों से लगाएं. बाद में उसे साफ़ कर लें. लेकिन हां, पानी को धीरे-धीरे पानी से थपथपाए. इससे त्वचा में रगड़ भी नहीं आएगी और जल्द ही आराम मिलेगा.

5. पानी से साफ़ करें :vasleen-lagayen

यदि आपकी त्वचा भी रगड़कर छिल गई है तो सबसे पहले उसे साफ़ पानी से धो लें. इससे उसमे मौजूद बैक्टीरिया और पूरी गंदगी भी साफ़ हो जाएगी. उसके बाद उसमे किसी चिकने पदार्थ जैसे पेट्रोलियम जेली लगा लें. ऐसा करने से घाव में जलन व् दर्द कम होगा. और कुछ ही दिनों में आपकी त्वचा की समस्या भी ठीक हो जाएगी.

रगड़कर छिली त्वचा को कैसे ठीक करें, रगड़कर छिली त्वचा को सामान्य करने के उपाय, रगड़ी हुई त्वचा को ठीक करने के आसान उपाय, छिली त्वचा की ऐसे ठीक करें

सांवला होने की क्या वजह होती है? ये है सांवलापन दूर करने के उपाय

Sanvlepan ke Karan aur Upay

सांवलापन होने के कारण और उपाय, सांवला होने की वजह, Causes of Dark skin, सांवलापन के कारण क्या है, त्वचा का रंग सांवला क्यों होता है, धुप के अलावा सांवलापन

आज के समय में लोगों ने अपनी दिनचर्या को इतना व्यस्त कर लिया है की उन्हें न तो ठीक से खाने के लिए समय मिलता है और न ही ठीक प्रकार से सोने के लिए। जिसका प्रभाव सीधा उनके स्वास्थ्य और खूबसूरती पर पड़ता है। पुरुषों का तो समझ आता है लेकिन आजकल की महिलाएं भी इस दौड़ में शामिल रहती है जिसकी वजह से उनकी कोमल और मुलायम त्वचा मुरझाने लगती है। और साथ ही उसका अच्छा खासा रंग भी दबने लगता है।

सामान्य तौर पर हम सभी लोग धुप, धूल, मिट्टी और प्रदुषण आदि को ही सांवलेपन का कारण मानते है जबकि असल कारण तो कुछ और ही होते है। दरअसल, जब आप पुरे दिन धुप में रहते है तो शाम के समय आपकी स्किन थोड़ी काली-काली सी प्रतीत होती है जिसमे आपको लगता है की धुप में घूमने की वजह से स्किन काली हुई है। जबकि कारण कुछ और ही होता है। धुप से आने के बाद स्किन के डार्क होने का कारण टैनिंग भी हो सकती है।

इसके अलावा आपकी स्किन पर जमी धूल मिट्टी भी इस सांवलेपन का कारण हो सकती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की लाइफस्टाइल और आपका खान पान आपके शरीर के रंग को प्रभावित कर सकता है। अगर नहीं, तो बता दें की आपके द्वारा खाये जाने वाला खाना भी आपके स्किन के रंग के लिए उत्तरदायी होता है।

बड़े बड़े विशेषज्ञों का कहना है की अन्य कारणों के अतिरिक्त खान पान की वस्तुएं भी आपके त्वचा के रंग को प्रभावित करती है। ऐसे में इन खाद्य पदार्थों को अवॉयड करना ही बेहतर रहेगा। यहाँ हम आपको बहुत से ऐसे कारणों के बारे में बताने जा रहे है जिनकी वजह से सांवलापन बढ़ता है। इसके अलावा हम ये भी बताएंगे की कौन सी खाने की चीजें आपके रंग को सांवला करती है।

Read More : गोरापन और सुन्दरता पाने के आसान तरीके

सांवलेपन से बचने के लिए इन बातों का रखें ध्यान :-

=> अच्छी और बेहतर क्वालिटी के स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करें। इनसे गोरापन बढ़ता है।

=> महीने में एक बार फेशियल करवाएं। यह फेस में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करता है जिससे रंग साफ़ होने में मदद मिलती है।

=> फेस और हाथ-पैरों पर सनस्क्रीन लगाए बिना घर से बाहर नहीं निकलें। इसे सूर्य की UV रेज़ का प्रभाव स्किन पर नहीं पड़ेगा।

Read More : आर्मपिट को साफ़ और गोरा बनाने के उपाय

=> अधिक से अधिक पानी का सेवन करें। इससे स्किन में नमी बनी रहती है और रंग साफ़ होता है।

इन कारणों से होता है सांवलापन :-

1. स्किन डिसऑर्डर :skin

स्किन डिसऑर्डर होने के कारण स्किन ठीक और डार्क हो जाती है जिसकी वजह से सांवलापन तो बढ़ता ही है साथ-साथ स्किन में रफनेस भी बढ़ती है।

2. विटामिन सी की कमी :

शरीर में विटामिन A, C, B की कमी के कारण भी स्किन डल होने लगती है। जिसकी वजह से स्किन में सांवलापन बढ़ता है।

3. लिवर की समस्या :

शरीर में लिवर से संबंधित समस्या होने पर उसका नकारत्मक प्रभाव स्किन सेल्स पर होता है। जिसकी वजह से सांवलापन होता है। और अगर समस्या को समय रहते ठीक नहीं किया जाए तो यह और भी बढ़ सकता है।

4. हार्मोनल बदलाव :

शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलावों का प्रभाव भी सीधे स्किन पर ही पड़ता है। जिसकी वजह से कई बार स्किन में सांवलेपन की समस्या होने लगती है।

5. धुप :

अधिक समय तक धुप में रहने और सूरज की किरणों की डायरेक्ट संपर्क में आने से भी त्वचा का रंग डार्क हो जाता है जिसे आप और हम सांवलापन कहते है। वैसे तो ये टैनिंग ही होती है लेकिन अगर आप रोज इतने समय के लिए बाहर रहते है तो हो सकता है धीरे धीरे आपका रंग सांवला हो जाए।

6. कास्मेटिक :

बहुत बार देखा गया है की कॉस्मेटिक के चयन में छोटी सी गलती भी आपके रंग को डार्क दिखा सकती है। ऐसे में सही और परफेक्ट कॉस्मेटिक का प्रयोग करना ही आपके लिए बेहतर होगा।

7. गर्मियों में :

गर्मियों के मौसम में बहुत अधिक धूल मिट्टी, प्रदुषण और गर्मी रहती है जिसकी वजह से स्किन के सभी तत्व पसीने में बह जाते है और पीछे छोड़ जाते है सांवलापन। गौर किया जाए तो सर्दियों की तुलना में गर्मियों के मौसम में सांवलेपन की सबसे अधिक समस्या देखने को मिलती है।

सांवलेपन से बचने के लिए क्या न खाएं?

जैसा की हमने आपको बताया की सिर्फ धुप, धूल और मिट्टी से नहीं बल्कि और भी कई वजह होती है जिनके कारण त्वचा का सांवलापन बढ़ता है। खाने पीने की वस्तुएं भी उन्ही कारणों में से एक है। तो आइये जानते है सांवलेपन से बचने के लिए किन किन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

1. मीठी चीजें :

इन खानों को खाने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ता है जिससे स्किन के टिश्यू जैसी कोलोजन डैमेज होने लगते है। और इनके डैमेज होने की वजह से सांवलापन बढ़ने लगता है।

2. वाइट ब्रेड :

वाइट ब्रेड खाने से शरीर में इन्सुलिन का लेवल बढ़ता है। और साथ ही स्किन में आयल का अधिक उत्पादन होने लगता है। जिसके परिणामस्वरूप सांवलापन बढ़ता है।

3. चटपटा भोजन :

इस तरह के भोजन को खाने से शरीर का टेम्परेचर बढ़ता है। जिसके कारण रक्त वाहिकाएं फैलती है और सांवलपान बढ़ता है।

4. सी फ़ूड (समुद्री भोजन) :

इस तरह के खाने में आयोडीन की अधिक मात्रा पाई जाती है जो स्किन के पोर्स को बंद कर देता है। और जब स्किन के पोर्स बंद हो जाते है तो स्किन साँस नहीं ले पाती जिससे चेहरे का रंग डार्क होने लगता है।

सांवलेपन से छुटकारा पाने के घरेलू उपायों के बारे में जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएँ : 

सांवलेपन से छुटकारा पाने के उपाय

गर्भ में शिशु सांस कैसे लेता है?

माँ के पेट में बच्चे की दुनिया बहुत ही अलग होती है क्योंकि जिस तरह माँ अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को देख नहीं सकती है केवल उसे महसूस कर सकती है। उसी तरह बच्चा भी बाहर की गतिविधियों को महसूस कर सकता है और अपनी हलचल के माध्यम से उस पर प्रतिक्रिया देता है। गर्भ में बच्चा एक पानी की थैली में होता है जिसमे पूरे नौ महीने तक उसका विकास होता है। और जिस पानी में बच्चा होता है उसे एमनियोटिक फ्लूड कहा जाता है।

एमनियोटिक फ्लूड गर्भ में बच्चे के विकास के लिए बहुत जरुरी होता है। बच्चे के विकास को लेकर गर्भवती महिला के मन में बहुत से सवाल आते हैं। जैसे की गर्भ में बच्चे का विकास कैसे होता है? क्या बच्चा बाहर की चीजों को महसूस कर सकता है? क्या गर्भ में बच्चा सांस लेता है? आदि। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको गर्भ में बच्चा सांस लेता है या नहीं? इस बारे में बताने जा रहे हैं।

क्या गर्भ में बच्चा सांस लेता है?

गर्भ में बच्चा एमनियोटिक फ्लूड में होता है और बच्चे के विकास के लिए सभी जरुरी चीजें जैसे की बच्चे के विकास के लिए पोषक तत्व, रक्त व् ऑक्सीजन, सभी गर्भनाल द्वारा शिशु तक पहुंचाया जाता है। गर्भनाल वह नाल होती है जिससे माँ और बच्चा दोनों आपस में जुड़े होते हैं। और माँ जो भी खाती है, पीती है, बॉडी में ब्लड फ्लो होता है वह सभी उस नाल से शिशु तक पहुँचता है और महीने दर महीने शिशु का विकास बढ़ता है।

ऐसे में जब गर्भनाल में रक्त के साथ ऑक्सीजन शिशु तक पहुँचती है तो उसी नाल के माध्यम से कार्बन डाई ऑक्साइड बॉडी से बाहर निकलती है जो महिला द्वारा बॉडी से बाहर की जाती है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता है की गर्भ में बच्चा सांस लेता है लेकिन बच्चे की सभी जरूरतें जब माँ द्वारा पूरी की जाती है तो गर्भ में पल रहे बच्चे की जगह सांस भी माँ ही लेती है।

गर्भ में बच्चा सांस कैसे लेता है?

माँ के गर्भ में जब बच्चा होता है तो शिशु के फेफड़ों में हवा नहीं होती है बल्कि शिशु के फेफड़ों में द्रव भरा होता है। ऐसे में शिशु के फेफड़े माँ के गर्भ में विकसित तो होते हैं लेकिन उस तरह काम नहीं करते हैं जैसे बच्चे के जन्म के बाद करते हैं। लेकिन गर्भ में शिशु की बॉडी में ऑक्सीजन का फ्लो होता है और कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर निकलती है। और यह गर्भनाल की मदद से होता है।

जैसे महिला सांस लेती है तो बॉडी में रक्त की मदद से जैसे महिला की बॉडी में ऑक्सीजन का फ्लो सभी अंगो तक होता है। वैसे ही शिशु के शरीर में गर्भनाल के माध्यम से रक्त के साथ ऑक्सीजन का प्रवाह होता है। जिससे शिशु का विकास लगातार होता रहता है। साथ ही कार्बन डाई ऑक्साइड भी गर्भनाल की मदद से महिले की सांस लेने की प्रक्रिया से बॉडी से बाहर निकल जाती है।

जन्म के बाद शिशु सांस कैसे लेता है?

अब हो सकता है की आपके मन में यह सवाल आये की जब शिशु गर्भ में सांस नहीं लेता है तो जन्म लेने के तुरंत बाद सांस कैसे लेता है। आप सभी को यह तो पता है की जन्म लेने के तुरंत बाद शिशु जोर से रोता है। और यदि शिशु नहीं रोता है तो उसे पीठ या तलवे पर थपकी देकर से रुलाने की कोशिश की जाती है।

ऐसा इसीलिए किये जाता है की शिशु जब रोता है तो वो जोर लगाता है जिससे फेफड़ों में मौजूद द्रव बाहर निकलता है और फेफड़ें अपना काम करने लगते हैं। और जब फेफड़ों में वायु के आने जाने का मार्ग खुल जाता है तो बच्चा अपने आप सांस लेना शुरू कर देता है। ऐसे में जन्म के बाद बच्चे के सांस लेने के लिए बच्चे का रोना बहुत जरुरी होता है।

तो यह हैं गर्भ में बच्चे के सांस लेने से जुडी कुछ बातें, यदि आप भी माँ बनने वाली है और आपका बच्चा किस प्रकार गर्भ में सांस लेता है। आप यह जानना चाहती है तो इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद आपके सवालों का जवाब मिलने में आपको मदद मिल सकती है।

 

इन लक्षणों से पता चलता है की आपकी डिलीवरी सिजेरियन होगी

गर्भावस्था की आखिरी तिमाही में अधिकतर गर्भवती महिलाएं इस बात को लेकर परेशान हो जाती है की उनकी डिलीवरी नोर्मल होगी या सिजेरियन? ऐसे में यह जानना तो मुश्किल होता है की क्या होगा। क्योंकि यह पूरी तरह से महिला की शारीरिक स्थिति और गर्भ में बच्चे की पोजीशन पर निर्भर करता है। लेकिन कुछ केस में महिला को शरीर में ऐसे लक्षण महसूस होते हैं जिनसे महिला को यह पता चल जाता है की उनकी डिलीवरी सिजेरियन ही होगी। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको सिजेरियन डिलीवरी के लक्षण क्या होते हैं उस बारे में बताने जा रहे हैं।

ब्लड प्रैशर का बढ़ना

यदि डिलीवरी का समय पास आने पर या वैसे भी पूरी प्रेगनेंसी के दौरान महिला का ब्लड प्रैशर हाई रहता है। तो ऐसे में केस में सिजेरियन डिलीवरी करवानी पड़ती है। क्योंकि नोर्मल डिलीवरी से महिला की लिवर, किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है।

बच्चे के सही पोजीशन में न आने के कारण

यदि डिलीवरी का समय पास आने पर भी बच्चे का सिर नीचे की तरफ नहीं होता है यानी की बच्चा जन्म लेने की सही पोजीशन में नहीं आता है। और बच्चा किसी और पोजीशन में होता है जैसे की बच्चा उल्टा होता है। तो ऐसे में डॉक्टर्स महिला को सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

बच्चेदानी का मुँह न खुलने पर

नोर्मल डिलीवरी के लिए बच्चेदानी का मुँह खुलना जरुरी होता है। लेकिन यदि किसी केस में महिला की बच्चेदानी का मुँह नहीं खुलता है तो ऐसे में महिला की सिजेरियन डिलीवरी होती है।

गर्भनाल

गर्भ में शिशु कई बार गर्भनाल में लिपट जाता है और फिर खुल भी जाता है ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि गर्भ में बच्चा इधर से उधर मूव करता रहता है। लेकिन डिलीवरी का समय पास आने पर यदि बच्चे ने गर्भनाल को गर्दन में लपेटा हुआ होता है। तो ऐसे केस में डॉक्टर्स किसी तरह का रिस्क नहीं लेते हैं और सिजेरियन डिलीवरी करते हैं।

शिशु की धड़कन या हलचल

यदि गर्भ में शिशु की हलचल या धड़कन कम हो जाती है। तो ऐसे में गर्भ में शिशु की जान को खतरा हो सकता है। और यदि ऐसा किसी गर्भवती महिला के साथ होता है तो इस समस्या से बचने के लिए महिला की सिजेरियन डिलीवरी करवानी पड़ती है।

एक से ज्यादा शिशु

गर्भ में जुड़वां या ट्रिप्लेट्स या उससे ज्यादा बच्चे होने पर भी नोर्मल डिलीवरी होने चांस बहुत कम होते हैं। और डॉक्टर्स भी ऐसे केस में बच्चों के लिए कोई रिस्क न लेते हुए सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

जिन महिलाओं की हाइट कम होती है

जिन महिलाओं की हाइट कम होती है उनकी कूल्हे ही हड्डी भी छोटी होती है। जिसकी वजह से नोर्मल डिलीवरी से बच्चे के जन्म होने के चांस कम होते हैं। और सिजेरियन डिलीवरी होने के चांस अधिक होते हैं।

एमनियोटिक फ्लूड की कमी

यदि महिला का एमनियोटिक फ्लूड पूरा खत्म हो जाता है तो ऐसे केस में गर्भ में शिशु को दिक्कत होने का खतरा बढ़ जाता है। जिसकी वजह से महिला की सिजेरियन डिलीवरी होने के चांस भी बढ़ जाते हैं।

प्रसव पीड़ा नहीं होना

डिलीवरी डेट निकाल जाने के बाद भी यदि महिला के शरीर में प्रसव का कोई लक्षण महसूस नहीं होता है, आर्टिफिशल पेन का भी यदि महिला पर कोई असर नहीं होता है, तो ऐसे में केस में माँ व् बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए डॉक्टर्स सिजेरियन डिलीवरी की सलाह देते हैं।

पेट में गन्दा पानी निकाल देने के कारण

यदि गर्भ में बच्चा मल मूत्र कर देता है तो इसके कारण भी गर्भ में बच्चे की जान को खतरा हो जाता है। ऐसे केस में भी बच्चे की जाना बचाने के लिए डॉक्टर्स सिजेरियन डिलीवरी की सलाह देते हैं।

तो यह हैं कुछ लक्षण जिनकी वजह से महिला को सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दी जाती है। ऐसे में यदि आप चाहती है की आपकी डिलीवरी नोर्मल हो तो आपको प्रेगनेंसी के दौरान अपने स्वास्थ्य का अच्छे से ध्यान रखना चाहिए।

मुँह की दुर्गन्ध से परेशान है तो आजमाए यह उपाय

0

मुँह की दुर्गन्ध तभी आती है जब बैक्टीरिया ज्यादा बढ़ जाते है। जब आप कुछ खाते है तो आपके दांतो के बीच फंस जाता है। यही फंसा हुआ भोजन बैक्टीरिया रिलीज़ करता है जिस कारण मुँह से स्मेल आने लगती है। कई बार कुछ बिमारियों के कारण भी मुँह से स्मेल आने लगती है। इसके अतिरिक्त जो लोगो दवाइयों का नियमित सेवन करते है उनसे भी बदबू आने लगती है। 

साँसों से दुर्गन्ध आने का कोई भी कारण हो पर इनके कारण हमे कई बार सबके सामने शर्मिंदा होना पड़ जाता है और यह हमारी अच्छे खासे कॉन्फिडेंस को भी गिरा देता है। कुछ लोग मुँह की दुर्गन्ध से छुटकारा पाने के लिए डेंटिस्ट के पास भी जाते है। जो हमारे टीथ को क्लीन करके उनकी दुर्गन्ध दूर करते है पर यह प्रक्रिया महंगी भी होती है और साथ कुछ समय के लिए ही असरदार होती है। बार बार डेंटिस्ट के पास जाना हमारी जेब भी खाली करवा सकता है और ऊपर से केमिकल्स का साइड इफ़ेक्ट अलग। इससे बेहतर है के मुँह की दुर्गन्ध दूर करने के लिए हम कुछ घरेलु और प्राकृतिक उपाय अपनाये। जिन्हे अपनाने से हमे कोई नुकसान भी नहीं होगा और साथ ही अपनी सुविधानुसार हम इन्हे किसी भी तरह प्रयोग में ला सकते है। आइये जानते है मुँह की दुर्गन्ध दूर करने के लिए क्या करना चाहिए। 

पानी 

क्या आप जानते के दिन बहुत बार हम पानी पीने नजरअंदाज कर देते है यहां तक के तब भी जब हमे प्यास लगी होती है। ज्यादातर लोग यही गलती करते है जिससे मुँह सूखता रहता है और इसके आलावा हमे पेट संबंधित परेशानिया भी हो जाती है। इस कारण भी हमारे मुँह से दुर्गन्ध आने लगती है। इसीलिए रोजाना कम से कम 8 से 10 ग्लास पाने के पिए। इससे आपकी बॉडी हाइड्रेट रहेगी और मुँह की दुर्गन्ध भी दूर होगी। इसके अतिरिक्त अच्छी मात्रा में पानी पीने से पेट संबंधित समस्याए भी नहीं होगी।

दालचीनी का तेल

दालचीनी तेल में बहुत से पावरफुल एंटीबैक्टीरियल गुण है। यह VCS हाइड्रोजन सल्फाइड के लेवल भी कम करता है। रिसर्च के अनुसार यह भी पता चलता है के दालचीनी से मसूड़ों को नुक्सान नहीं पहुंचता है। दालचीनी के तेल को अपनी टूथपेस्ट में मिलकर पेस्ट करने से मुँह की दुर्गन्ध दूर करने में बहुत सहायता मिलती है। 

ग्रीन टी 

यह एंटी ऑक्सीडेंट तत्वों का एक बहुत अच्छा स्रोत है। इसमें मौजूद एंटी बैक्टीरिया के गुण मुँह में जमे सभी बैक्टीरिया को खत्म करके मुँह की स्मेल को खत्म करते है। ग्रीन टी को आप अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकते है। इसे पीने से पेट की समस्याओं से भी निजात मिलती है। 

अनानास का रस 

बहुत से लोगों का मानना है के मुँह की दुर्गन्ध दूर करने के लिए अनानास का रस बहुत ही फायदेमंद है। इसका फायदा लेने के लिए हर बार खाना खाने के बाद अनानास का जूस का सेवन करे। चाहे तो जूस के जगह पर अनानास के टुकड़े कुछ देर मुँह में रख कर चबा लें। 

दही 

दही में अच्छे बैक्टीरिया मौजूद होते है जिन्हे हम लैक्टोबैसिलस के नाम से जानते है। इसके अच्छे बैक्टीरिया हमारे बॉडी के किसी भी पार्ट में मौजूद खराब बैक्टीरिया को खत्म करते है। एक रिसर्च में यह बात साबित हुई है के दहीं के सेवन से मुँह की दुर्गन्ध से छुटकारा मिलता है। दही में मौजूद प्रोबिओटिक साँस की बदबू को कम करने में बहुत कारागार होते है। मुँह की बदबू से छुटकारा पाने के लिए दिन कम से कम एक बार दही का सेवन जरूर करें। 

सोंफ 

सदियों से सोंफ को माउथ फ्रेशनर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आपने भी देखा होगा के कुछ घरों और होटलों में खाने के बाद सोंफ और मिश्री सर्व की जाती है। सोंफ को आप सादा, या मिठे के साथ हर बार खाना खाने के बाद इस्तेमाल कर सकते है।

बेकिंग सोडा

अध्ययन के अनुसार यह पता चलता है के बेकिंग सोडा को सोडियम बाईकार्बोनेट के नाम से भी जाना जाता है यह हमारे मुँह के बैक्टीरिया को खत्म करने के काम आता है। रिसर्च में अनुसार यह भी बात सामने आयी है के ज्यादातर टूथपेस्ट में बेकिंग सोडा मिला होता है। कितना अच्छा हो अगर मुँह की सफाई के लिए हम घर पर ही बेकिंग सोडा से माउथ-वाश तैयार कर लें। एक कप गर्म पानी में दो चम्मच बेकिंग सोडा बनाये और कम से कम 30 सेकंड तक इस घोल को मुँह में रख कर गार्गल करें। ऐसा करने से आपके मुँह की दुर्गन्ध खत्म हो जायेगी।

सेब का सिरका

सिरका एक प्राकृतिक एसिड का रूप होता है। मुँह के बैक्टीरिया कभी भी एसिडिक वातावरण में नहीं पनप पाते। इसीलिए मुँह के बैक्टीरिया को कम करने के लिए सेब के सिरके से कुल्ला करें। दो चम्मच सेब का सिरके को एक ग्लास पानी में मिलाये। और इस घोल को माउथ-वाश की तरह इस्तेमाल करें। सेब के सिरके की जगह पर सफ़ेद सिरका भी इस्तेमाल कर सकते है।

पुदीना 

पुदीना यानि मिंट इसकी खुशबु से ही एकदम फ्रेश स्मेल आती है। आयुर्वेद में इसे मुँह की दुर्गन्ध दूर करने के लिए बहुत कारागार माना गया है। कई आयुर्वेदिक टूथपेस्ट और माउथ-वाश में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। आप इंस्टेंट रिलीफ के लिए पांच मिंट तक इसकी पत्तियों को चबा लें, आपके मुँह की दुर्गन्ध एकदम खत्म हो जाएगी। इसमें मौजूद एंटी माइक्रोबियल गुण मुँह के खराब बैक्टीरिया को खत्म कर देते है। अगर आप इसका नियमित सेवन करते है तो आपको मुँह की स्मेल से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जायेगा।  

साफ़ सफाई

जो लोग अपने मुँह की अच्छे से साफ़ सफाई नहीं रखते उनके मुँह से दुर्गन्ध आने लगती है। इसीलिए जरुरी है के हर बार भोजन के बाद ब्रश करे अगर ब्रश करना पॉसिबल नहीं है तो माउथ-वाश का इस्तेमाल करें। अगर आप स्मोकिंग और ड्रिंकिंग करते है तो दिन हर बार सोमकिंग के बाद माउथ-वाश या ब्रश का इस्तेमाल जरुरी है।

जिस तरह हमे अपने शरीर और त्वचा देखभाल करना जरुरी है, उसी प्रकार अपने मुँह और दांतो की भी केयर करनी पड़ती है। केयर ना मिलने से इनमे बैक्टीरिया जमा होने लगता है और बदबू आने लगती है।  

क्या चुम्बन (Kiss) करने से बीमारी होती है?

0

Point to Remember Before Kiss : हम सभी अपने अपने पार्टनर्स को चुम्बन करते है. इस तरह से हम अपना प्यार दिखाते है. प्रेमी लड़के लड़कियाँ एक दूसरे का चुम्बन लेते है और अपने प्यार का इजहार करते है. इससे दोनों का भावनात्मक रिश्ता और मजबूत हो जाता है, रिश्तो में गर्माहट और अंतरंगता आ जाती है. किसी के रोमांटिक रिश्ते की शुरुवात हमेशा एक चुम्बन (kiss) से होती है. कोई भी व्यक्ति अपने पहले चुम्बन को नही भूल पाता है. पाश्चात्य देशो- जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि में चुम्बन लेने का कुछ जादा ही फैशन है. होठो से होठो पर चुंबन करने को Lip Kiss कहते है. किस कई प्रकार का होता है जैसे- हाथो पर किस, गालो पर किस, फ्रेंच किस, माथे पर किस, गले पर किस, कानो पर किस आदि.

यह देखने में तो बहुत अच्छा लगता है पर क्या आप जानते है कि चुम्बन लेने से अनेक प्रकार की बीमारियाँ भी फैलती है. चुम्बन लेने के दौरान करीब 5000 बैक्टीरिया का आदान प्रदान होता है. कुछ बैक्टीरिया अच्छे होते पर कुछ बुरे होते है जो आपको बिमारी भी दे सकते है. दोस्तों, आज हम इसी बारे में चर्चा करेंगे.

चुम्बन (kiss) लेने से होने वाली बीमारियाँ-

इन्फेक्शन की समस्या –

चुम्बन लेते वक्त लार का आदान प्रदान होता है जिससे इन्फेक्शन का खतरा बहुत जादा बढ़ जाता है. अगर आपके पार्टनर को दांतों या मसूड़ों का दर्द, सड़न, सूजन जैसी कोई समस्या है तो आपको भी हो जायेगी. इसलिए ऐसी किसी समस्या पर चुम्बन से परहेज करना चाहिये.

छीकने से कीटाणु फैलते है-

आपने सुना होगा कि हमेशा छीकते समय मुंह पर हाथ लगा लेना चाहिये. ऐसा चुम्बन के वक़्त भी हो सकता है. अगर पार्टनर को चुम्बन लेते वक़्त छींक आ जाये तो उसके कीटाणु आपको बीमार बना सकते है. आपको इन्फेक्शन की समस्या हो सकती है. कीटाणु हवा से और छूने से फैलते है.

खांसी जुकाम-

अगर आपके साथी को सर्दी जुकाम, खांसी आ रही है तो उसका चुम्बन लेने से आपको ये समस्या हो सकती है.

बुखार होना-

बुखार के कीटाणु भी छूने से फैलते है. इसलिए बुखार से पीढित साथी का चुम्बन न ले.

मुंह में मस्से होना-

अगर आपके पार्टनर को यह रोग है तो उसे किस करने से आपको भी आसानी से यह रोग हो सकता है. संक्रमण के द्वारा यह फैलता है.

मुंह में छाले निकलना-

शरीर में गर्मी की वजह से मुंह में छाले निकल आते है. ये बहुत दुखते है और दर्द देते है. कुछ भी खाने पीने में बहुत दिक्कत होती है. अगर आपके पार्टनर को मुंह में छाले है तो चुम्बन करते समय वो हानिकारक बैक्टीरिया आपके मुंह में जा सकते है. इससे आपको भी छाले होने का खतरा हो जाता है. इसलिए अगर किसी के मुंह में छाले हो तो चुम्बन लेने से परहेज करना चाहिये.

चिकन पॉक्स का खतरा-

इसे हम आम भाषा में छोटी माता भी कहते है. इसलिए ऐसे पार्टनर का चुम्बन न लें जो चिकन पॉक्स से पीढित हो. किस करने से आपको यह रोग हो सकता है.

हेपेटाईटिस बी का खतरा-

इस रोग से ग्रस्त किसी व्यक्ति के कीटाणु लार से माध्यम से दूसरे व्यक्ति में आसानी से चले जाते है और उसे भी हेपेटाईटिस बी हो जाता है.

क्या चुम्बन से गर्भधारण होता है?

नही, यह बात बिलकुल गलत है और एक भ्रांति मात्र है. लड़की तभी गर्भवती होती है जब पुरुष का वीर्य उसके शरीर में प्रवेश करे और ओवरी में अंडो को फ़र्टिलाइज करे तब ही स्त्री गर्भवती होती है. इसलिए किसी भी प्रकार के चुम्बन से गर्भधारण नही होता है.

चुम्बन करने से होने वाले फायदे- (Kissing Benefits)

  • रिश्ते मजबूत करता है, प्यार को बढ़ाता है
  • हार्मोंस की अदला बदली जिससे सेक्स के अवसर बढ़ जाते है
  • तनाव को कम करता है, चिंता को दूर करता है
  • मूड अच्छा करता है
  • पार्टनर की उत्तेजना को बढ़ा देता है
  • ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है
  • चेहरे की माँसपेशियों को मजबूत करता है
  • इससे दोनों पार्टनर्स की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
  • कैलोरी बर्न होने से वजन कम होता है
  • शरीर में सकारात्मक ऊर्जा भरता है
  • कपल के बीच का झगड़ा खत्म करता है

Point to Remember Before Kiss
चुम्बन : Point to Remember Before Kiss

चुम्बन से पहले इन बातों पर ध्यान दें-

अगर आपने अपने पार्टनर को गलत तरह से किस किया तो उसे बिलकुल पसंद नही आयेगा. खामखा नाराज भी हो सकता है. इसलिए हम आपको बतायेंगे की सही तरह से कैसे किस करना है.

  • अपने दांतों को अच्छे से साफ़ कर लें
  • दांतों के बीच फँसे रेशे निकाल लें
  • दांतों का पीला पन दूर करे
  • मुंह की दुर्गन्ध को दूर करे. माउथ फ्रेशनर, मिंट कैंडी, चुइंगम खा लें.
  • अपनी लार को कंट्रोल करें
  • अगर आपने प्याज लहसुन का सेवन किया हो तो ब्रश कर लें
  • साँसों को सुगन्धित बनाने के लिए मिंट या स्प्रे का प्रयोग करें
  • माउथवाश करे
  • हर दिन फ्लॉस करे
  • जीभ भी साफ़ करें

निष्कर्ष: चुम्बन लेने के अनेक फायदे है. ये दिखाता है की आप अपने पार्टनर को कितना प्यार करते है. ये तनाव कम करने में मदद करता है. इससे आपको खुशी मिलती है. आपका मूड अच्छा हो जाता है. इसे करने से प्यार के लिए जरूरी हार्मोन ऑक्सीटोसिन का स्तर हमारे शरीर में काफी बढ़ जाता है. ये रिश्तो को मजबूत बनाता है. पर हमे सोच समझकर चुम्बन करना चाहिये. अगर हमारे पार्टनर को किसी तरह का रोग या समस्या है तो उसे चुम्बन नही करना चाहिये. होठो के बजाय आप उसके हाथो पर या गालो पर चुम्बन करके अपने प्यार का इजहार कर सकते है. आज का लेख आपको कैसा लगा, हमे जरुर बतायें.

कौन से महीने में क्या खाना चाहिए क्या नहीं

आयुर्वेद के अनुसार यदि आप मौसम के अनुसार अपने भोजन का सेवन करते हैं। तो ऐसा करने से आपको स्वस्थ रहने में मदद मिलती है। जैसे की कुछ चीजों के बारे में आप जानते हैं की दूध के साथ दही खाने से, दूध के साथ मछली खाने से आपको स्वास्थ्य या स्किन सम्बन्धी परेशानियां होती है। वैसे ही कौन से महीने में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं इसके बारे में जानना भी जरुरी होता है।

ताकि मौसम के बदलाव के साथ आपके खान पान में गड़बड़ी होने पर आपके स्वास्थ्य पर किसी भी तरह का बुरा असर न पड़े। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको कौन से महीने में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए इस बारे में बताने जा रहे हैं।

चैत्र माह में क्या खाएं क्या नहीं: चैत्र माह मार्च से अप्रैल के बीच में आता है। चैत्र माह में गुड़ का सेवन नहीं करना चाहिए इस माह में चना का सेवन करना फायदेमंद होता है।

वैशाख माह में क्या खाएं क्या नहीं: वैशाख माह अप्रैल और मई के बीच में आता है। इस महीने तली, भुनी, मसालेदार, चटपटी, टिकी चीजों का सेवन करने से बचना चाहिए। जबकि बेल का सेवन करना इस महीने में फायदेमंद होता है।

ज्येष्ठ माह में क्या खाएं क्या नहीं: ज्येष्ठ या जेठ का महीना मई जून के बीच आता है। इस महीने में जितना हो सके हल्का खाना खाएं और तरल पदार्थों का भरपूर सेवन करें।

आषाढ़ माह में क्या खाएं क्या नहीं: आषाढ़ माह जून जुलाई के बीच आता है। आषाढ़ माह में आप सभी चीजों का सेवन कर सकते हैं लेकिन जितना हो सके हरे सब्जियों व् पके बेल का सेवन नहीं करना चाहिए।

श्रवण माह में क्या खाएं क्या नहीं: श्रावण या सावन का महीना जुलाई अगस्त के बीच आता है। हरी सब्जियों व् दूध व् दूध से बनी चीजों का सेवन श्रवण माह में कम करना चाहिए। इसके अलावा आप सभी चीजों का सेवन कर सकते हैं।

भाद्रपद महीने में क्या खाएं क्या नहीं: भाद्रपद का महीना अगस्त से सितम्बर के बीच में आता है। भाद्रपद में दही, छाछ आदि के सेवन से बचना चाहिए। और इस दौरान तिल का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है।

आश्विन महीने में क्या खाएं क्या नहीं: आश्विन महीना सितम्बर से अक्टूबर के बीच में आता है। इस माह में करेले के सेवन से परहेज करना चाहिए व् रोजाना गुड़ का सेवन करना इस माह में फायदेमंद माना जाता है।

कार्तिक महीने में क्या खाएं क्या नहीं: कार्तिक माह अक्टूबर से नवंबर के बीच में आता है। कार्तिक माह में दही, जीरा, बैंगन का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। लेकिन इस दौरान मूली का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है।

मार्गशीर्ष माह में क्या खाएं क्या नहीं: मार्गशीर्ष महीना नवंबर से दिसंबर के बीच में आता है। इस माह में जीरे का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए और अपने आहार में तेल का सेवन जरूर करना चाहिए।

पौष महीने में क्या खाएं क्या नहीं: पौष माह दिसंबर से जनवरी के बीच में आता है। धनिया खाने से पौष महीने में परहेज करना चाहिए। लेकिन दूध का सेवन इस माह में करना बहुत फायदेमंद होता है।

माघ माह में क्या खाएं क्या नहीं: माघ माह जनवरी से फरवरी के बीच आता है। मूली, धनिया, मिश्री जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन इस माह में नहीं करना चाहिए। लेकिन इस माह में घी, खिचड़ी आदि का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है।

फाल्गुन महीने में क्या खाएं क्या नहीं: फाल्गुन का महीना फरवरी से मार्च के बीच में आता है। फाल्गुन के महीने में सभी चीजों का सेवन किया जा सकता है। लेकिन इस महीने में चने का सेवन करने से परहेज करना चाहिए।

तो यह है कौन से महीने में क्या खाना चाहिए क्या नहीं इससे जुड़े टिप्स। तो आप भी मौसम के बदलाव के साथ खान पान से जुड़े इन टिप्स का ध्यान रखें। ताकि आपको भी स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

ओवुलेशन पीरियड माहवारी (Periods) के कितने दिन पहले या कितने दिन बाद होता है?

Ovulation Period In Womens : महिलाओं के शरीर में दिन-रात बहुत से परिवर्तन होते रहते है जिनके बारे में किसी को पता नहीं होता। ओवुलेशन पीरियड भी एक ऐसा ही परिवर्तन है जो माहवारी प्रारंभ होने के बाद हर महिला को होता है। लेकिन बहुत ही कम ऐसी महिलाएं है जो इस पीरियड के बारे में विस्तार से जानती हैं। इसीलिए आज हम आपको ओवुलेशन पीरियड के बारे में जानकारी दे रहें है।

ओवुलेशन पीरियड क्या होता है? (What is Ovulation Period)

ओवरी (अंडाशय) से अंडे के बाहर आने की क्रिया को ओवुलेशन कहा जाता है। जो हर महिला को मासिक धर्म के दौरान होती है। ओवुलेशन महीने का वो (12 से 24 घंटे का) समय होता है जब अंडा स्पर्म के साथ मिलने और निषेचित होने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है। ये अंडे मासिक धर्म प्रारंभ होने से कुछ समय पूर्व फ़ैलोपिन ट्यूब से होते हुए गर्भाशय में पहुंच जाते है और एक बार में अंडाशय से 15 से 20 अंडे निकलते है।

ओवुलेशन का गर्भधारण से क्या संबंध है? (Role of Ovulation Period in Pregnancy)

आम लोगों की समझ के अनुसार गर्भधारण बहुत ही आसान क्रिया है जिसे शारीरिक संबंध स्थापित करके किया जा सकता है, जबकि ऐसा नहीं है। गर्भधारण करना या अंडे का स्पर्म के साथ निषेचित होना एक लंबी क्रिया का परिणाम होता है। जो माहवारी खत्म होने के बाद से ही शुरू हो जाती है और गर्भ ठहरने के बाद समाप्त होती है। ओवुलेशन इस पूरी प्रक्रिया में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान देता है, बिना ओवुलेशन पीरियड के बारे में जाने गर्भधारण करना आसान नहीं होता।

इस तरह जानें ओवुलेशन क्या है :

चक्र के प्रारंभ में ग्रीवा (प्राइवेट पार्ट और गर्भाशय के बीच का रास्ता) थोड़ा सख्त, नीचा और बंद होता है। परंतु ओवुलेशन के प्रारंभ होते ही यह खुल जाता है और मुलायम हो जाता है ताकि स्पर्म आसानी से अंदर जा सके। ये जगह मासिक धर्म के दिनों में खुली रहती है और पीरियड खत्म होने के बाद फिर से सख्त हो जाती है। परंतु जिन महिलाओं के पीरियड्स रेगुलर नहीं होते उनका ओवुलेशन पीरियड भी अलग होता है।

कभी-कभी एक के बाद अंडाशय में अंडे मैच्योर हो जाते है और हॉर्मोन में वृद्धि होने के कारण वे परिपक्व होकर बाहर आते है। जिसके बाद ये अंडे फ़ैलोपिन ट्यूब से होते हुए गर्भाशय की तरफ आते हैं और ट्यूब में रूककर निशेषित होने के लिए शुक्राणुओं की प्रतीक्षा करते हैं।

ओवुलेशन गर्भधारण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है और इसके कई फायदे भी है जो गर्भधारण में मदद करते हैं।

ओवुलेशन पीरियड को कैसे जानें? How to Calculate Ovulation PeriodOvulation Period

इस पीरियड को जानने से पहले आपको अपने मासिक चक्र की अवधि को समझना होगा। मासिक चक्र एक पीरियड्स शुरू होने से दूसरे पीरियड्स शुरू होने तक की अवधि होती है। यह मासिक धर्म का पहला दिन और अगले मासिक धर्म के बीच के दिन की अवधि होती है जिसे इस उदाहरण से समझें –

  • पीरियड्स का पहला दिन – मार्च 1
  • अगले पीरियड्स का पहला दिन – मार्च 31
  • मासिक चक्र की अवधि (मार्च 1 से मार्च 31 के बीच का समय) – 30 दिन

अब ओवुलेशन पीरियड को समझते है –

उपरोक्त उदाहरण के मुताबिक मासिक चक्र की अवधि 30 दिन है जिसके अनुसार ओवुलेशन 16वें  दिन के आस पास होगा। क्योंकि ओवुलेशन अगले पीरियड्स के प्रारंभ होने के 10 से 14 दिन पहले होता है तो अगर आप (30 – 14 = 16) इस हिसाब से समझेंगी तो ओवुलेशन पीरियड को बेहतर तरह से समझ पाएंगी। यानी आपका ओवुलेशन पीरियड 17 मार्च से प्रारंभ हो जाएगा।

मासिक चक्र की अवधि ओवुलेशन का दिन प्रेग्नेंट होने की अधिक संभावनाएं
22 दिन Day 8 Day 6-8
23 दिन Day 9 Day 7-9
24 दिन Day 10 Day 8-10
25 दिन Day 11 Day 9-11
26 दिन Day 12 Day 10-12
27 दिन Day 13 Day 11-13
28 दिन Day 14 Day 12-14
29 दिन Day 15 Day 13-15
30 दिन Day 16 Day 14-16
31 दिन Day 17 Day 15-17
32 दिन Day 18 Day 16-18
33 दिन Day 19 Day 17-19
34 दिन Day 20 Day 18-20
35 दिन Day 21 Day 19-21
36 दिन Day 22 Day 20-22

ओवुलेशन के लक्षण :

जिन महिलाओं को रेगुलर पीरियड्स होते है वे ओवुलेशन प्रक्रिया को आसानी से समझ सकती हैं क्योंकि इनका ओवुलेशन का दिन निश्चित होता है।

अगर किसी का मासिक धर्म 28 दिनों के भीतर होता है तो 12वें और 16वें दिन लक्षणों को पहचाना जा सकता है। इसी दिन ओवुलेशन प्रकिया हो सकती है।

जिन महिलाओं को रेगुलर पीरियड्स नहीं होते उनमे यह क्रिया अनिश्चित होती है। क्योंकि उनके मासिक धर्म टाइम पर नहीं होते इसलिए ओवुलेशन पीरियड भी बदलता रहता है।

ओवुलेशन पीरियड के दौरान शरीर में आने वाले बदलाव : Symptoms Of Ovulation Period

सर्विकल म्यूकस : ओवुलेशन प्रकिया के दौरान सर्विकल, म्यूकस में बदलने लगता है जो समय बढ़ने के साथ और गाढ़ा व् चिपचिपा होने लगता है। ओवुलेशन के समय यह बहुत चिकना रहता है। इस स्थिति से आसानी से पता लगाया जा सकता है की आप फर्टाइल स्टेज पर है।

शरीर का तापमान : अन्य दिनों की तुलना में इस दौरान शरीर का तापमान बढ़ जाता है। अगर आपको लगता है की शरीर का तपमान कुछ ज्यादा है तो समझ की आपका ओवुलेशन शुरू हो चुका है।

संबंध बनाने की इच्छा : फर्टाइल फेज होने के कारण इन दिनों संबंध बनाने की इच्छा बढ़ जाती है।

ब्रेस्ट में बदलाव : ओवुलेशन पीरियड के दौरान महिलाओं के ब्रेस्ट संवेदनशील हो जाते हैं और कई बार उनमे दर्द भी होता है।

हल्का भूरा चिपचिपा पदार्थ : ओवुलेशन के दौरान महिलाओं की योनि से हल्का भूरे रंग का चिपचिपा पदार्थ निकलता है जो आगे चलकर लाल में बदल जाता है। ये चिपचिपा पदार्थ एक कवच होता है जो परिपक्व अंडे को निषेचन तक कवर करके रखता है।

पांच सुपर फ़ूड जो गर्भ में शिशु को बनाये हेल्दी

पांच सुपर फ़ूड जो गर्भ में शिशु को बनाये हेल्दी, प्रेगनेंसी के दौरान कैसे अपने शिशु को बनाये हेल्दी, गर्भावस्था में स्वस्थ्य शिशु पाने के उपाय, Ways to have Healthy Baby during Pregnancy

गर्भावस्था के दौरान हर माता पिता अपने शिशु के लिए बहुत से सपने देखने लगते है और चाहते है के उनका आने वाला शिशु पूरी तरह स्वस्थ हो। जो पूरी तरह से उचित भी है। एक हेल्दी बेबी के लिए हेल्दी प्रेगनेंसी का होना बहुत जरुरी है। मतलब अगर गर्भवती महिला गर्भावस्था के नौ महीने पूरी तरह से स्वस्थ रहती है तभी वह एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है।

एक स्वस्थ शिशु के लिए जरुरी है के गर्भवती महिला इन दिनों में शारीरिक और मानसिक तौर पर अपना ध्यान रखे।

पांच सुपर फ़ूड जो गर्भ में शिशु को बनाये हेल्दी

आइए आज हम आपको कुछ ऐसे भोजन के बारे में बताते है जो गर्भ में पल रहे शिशु को बनाएँगे स्वस्थ।

ताजे फल:

  • गर्भवती महिला को एक में कम से कम चार फलों का सेवन जरूर करना चाहिए।
  • ध्यान रहे फल ताजे होने चाहिए।
  • फलों का सेवन आपका वजन नियंत्रित रखता है।
  • इन्हे खाने से शिशु की दिमाग का भी विकास होता है।
  • फलों को खाने से गर्भवती महिला का एनर्जी लेवल भी बना रहता है।

हरी सब्जियाँ:

  • प्रेगनेंसी के दौरान हर महिला को ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियों का सेवन करना चाहिए।
  • हरी सब्जियों से आयरन की कमी पूरी होती है।
  • इससे शिशु और माँ दोनों में खून की कमी नहीं होती है।
  • हरी सब्जियां एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन सी, विटामिन के, विटामिन ए से भरपूर होता है।
  • यह सभी पोषक तत्व एक गर्भवती महिला और उसके शिशु के लिए बहुत जरुरी होते है।
  • हरी ताज़ी सब्जियों के सेवन से लो बर्थ वेट का खतरा कम होता है।

डेरी उत्पाद:

  • गर्भावस्था में भूर्ण की सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक्स्ट्रा विटामिन्स, कैल्शियम और प्रोटीन की जरूरत पड़ती है।
  • मिल्क और मिल्क से बने सभी उत्पाद प्रेगनेंसी के दौरान फायदेमंद होते है।
  • बहुत से मिल्क प्रोडक्ट्स में प्रोबिओटिक बैक्टीरिया होते है।
  • जो पाचन क्रिया को अच्छा करने में मदद करते है।
  • दूध और दूध से बने उत्पादों से कैल्शियम की अच्छी मात्रा ली जा सकती है।
  • कैल्शियम शिशु और माँ की हड्डियों को मजबूत बनाता है।
  • दही भी गर्भावस्था के दौरान बहुत फायदेमंद होता है।
  • दही के प्रोबिओटिक बैक्टीरिया डिलीवरी के रिस्क को कम करते है।

शकरकंद:

  • शकरकंद में बीटा कैरोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
  • बीटा कैरोटीन हमारे शरीर में विटामिन ए की मात्रा को बढ़ाता है।
  • गर्भवती महिलाओं को विटामिन ए की मात्रा को बढ़ाने की सलाह दी जाती है।
  • 100 से 150 ग्राम शकरकंद खाने से गर्भवती महिला के शरीर की रोज की विटामिन ए की जरूरत पूरी होती है।
  • विटामिन ए गर्भ में पल रहे भूर्ण की ग्रोथ में मदद करता है।
  • शकरकंद का सेवन गर्भावस्था में होने वाली शुगर के खतरे को भी कम करता है।

सूखे मेवे:

  • मेवे का एक छोटा सा पीस में इतना नुट्रिएंट्स होता है जितना फ्रेश फ्रूट में होता है।
  • थोड़ी सी मात्रा में लिया गया सूखा मेवा विटामिन्स, मिनरल्स और आयरन और पोटैशियम की कमी को पूरा करते है।
  • खजूर में पोटैशियम, फाइबर और आयरन की भरपूर मात्रा होती है।
  • खजूर के सेवन गर्भावस्था के आख़िरी तीन महीनो के लिए फायदेमंद रहता है।
  • सूखे मेवों का उपयोग गर्भावस्था में शिशु और माँ दोनों के लिए ही फायदेमंद होता है।
  • पर ध्यान रखिये सूखे मेवों को एक दिन में एक बार ही प्रयोग करें।

इन सभी चीजों को अपने रोजाना के भोजन में शामिल करने से बच्चा और माँ दोनों स्वस्थ होंगे। आशा है यह लेख आपकी सेहतमंद प्रेगनेंसी में काम आएगा।

गर्मियों में गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स

गर्मियों में गर्भवती महिलाओं के लिए टिप्स, गर्मियों में प्रेग्नेंट महिलाएं ऐसे रखें अपना ध्यान, गर्भवती महिला गर्मी में इन टिप्स का ध्यान रखें, गर्मी से बचाव के लिए गर्भवती महिला यह करें, गर्मियों में होने वाली परेशानी से ऐसे करे गर्भवती महिला बचाव, Pregnancy care tips during summer

प्रेगनेंसी के दौरान महिला के खान पान का ध्यान न रखने से जिस तरह महिला की परेशानी बढ़ सकती है, वैसे ही मौसम का बदलाव होने पर भी गर्भवती महिला को अपनी बेहतर केयर करने की सलाह दी जाती है। क्योंकि मौसम का बदलाव होने के कारण भी महिला को परेशानी हो सकती है। जैसे की गर्मियों में महिला का अधिक ठंडा खाने का मन करता है, और महिला यदि ठंडी चीजों का अधिक सेवन करती है, तो इसके कारण ब्लड प्रैशर से जुडी परेशानी, सूजन से जुडी परेशानी, वजन की परेशानी, जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा और भी बहुत सी बातें हैं जिनका ध्यान गर्भवती महिला को रखना पड़ता है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की गर्मियों में गर्भवती महिला को किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

खान पान का ध्यान रखें

गर्मियों में प्रेगनेंसी के दौरान आपको ऐसे आहार का सेवन करना चाहिए जिसे पचने में आसानी हो। ज्यादा तला हुआ मसालेदार खाने की बजाय हल्के भोजन का सेवन करना चाहिए, क्योंकि ज्यादा भारी भोजन गर्मियों के दौरान आपको उल्टी, पेट से जुडी समस्या, सीने में जलन आदि से ग्रसित कर सकता है। इसके अलावा आपको दही, खीरा, फल व् उनका रस, हरी पत्तेदार सब्जियों आदि का भरपूर सेवन करना चाहिए।

पानी का भरपूर सेवन करें

तरल पदार्थो का सेवन गर्मियों के दौरान करने से गर्भवती महिला को बहुत फायदा मिलता है। क्योंकि पानी शरीर से टॉक्सिन्स निकालने के साथ बॉडी को डिहाइड्रेशन की समस्या से भी बचाता है, साथ ही इससे गर्भ में पल रहे शिशु को भी बहुत फायदा पहुँचता है। इसके अलावा गर्मियों में शरीर में पानी की कमी आपके लिए समस्या का कारण भी बन सकती है, ऐसे में आपको दिन में आठ से दस गिलास पानी का सेवन करने के साथ, जूस, नारियल पानी, निम्बू पानी आदि का भी भरपूर सेवन करना चाहिए।

कपड़ो का ध्यान रखें

ज्यादा टाइट कपडे, चुभने वाले कपडे, जींस, डार्क रंग के कपडे, आदि नहीं पहनने चाहिए। क्योंकि इससे गर्मी का अनुभव अधिक होता है साथ ही ज्यादा टाइट कपडे पहनने के कारण पेट पर दबाव पड़ सकता है, साथ ही चुभने वाले कपडे पहनने से खुजली व् जलन की समस्या हो सकती है। इसके अलावा आपको बंद चप्पल जूते भी नहीं पहनने चाहिए इससे पैरों में गर्मी लगने के कारण सूजन की समस्या हो सकती है, ऐसे में आगे से खुले हुए जूते चप्पल ही पहनने चाहिए इससे पैर ठन्डे रहता हैं।

धूप में न रहें

गर्मियों के दिनों में धूप बहुत तेज होती है और इसकी अल्ट्रावॉयलेट किरणों का बुरा असर गर्भवती महिला पर पड़ सकता है, जैसे की बॉडी का तापमान बढ़ सकता है। और बॉडी का तापमान बढ़ने के कारण गर्भवती महिला को बहुत अधिक परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है। इसीलिए गर्भवती महिला को न तो धूप में बैठना चाहिए और न ही घूमना चाहिए, और यदि कहीं जाना भी है तो छाता लेकर जाएँ।

स्किन का रखें ध्यान

प्रेगनेंसी के दौरान गर्मियों में अपनी स्किन की ख़ूबसूरती को बनाएं रखने के लिए अपने खान पान का अच्छे से ध्यान देना चाहिए, भरपूर पानी का सेवन करना चाहिए, स्किन को मॉइस्चराइज़ करना चाहिए, ताकि प्रेगनेंसी के दौरान भी आपकी स्किन की ख़ूबसूरती को बरकरार रहने में मदद मिल सके।

नहाए जरूर

शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए प्रेगनेंसी के दौरान आपको दिन में दो बार जरूर नहाना चाहिए ऐसा करने से बॉडी को ठंडक पहुँचती है। जिससे गर्मी के दौरान भी आपको ठंडा महसूस होता है, साथ ही गर्मी में ठंडा महसूस करने के लिए बेहतर है की आप शॉवर में नहाएं, और दो दिन बाद बालों को भी जरूर धोएं, इससे ठंडा महसूस होने के साथ गर्मियों में आपको तरोताजा महसूस करने में मदद मिलेगी।

नमक के सेवन से बचे

प्रेगनेंसी के दौरान गर्मियों में महिला को अधिक नमक के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि इसके कारण महिला को परेशानी का अनुभव करना पड़ सकता है। साथ ही डिब्बाबंद आहार जिनमे सोडियम की मात्रा अधिक हो उसके सेवन से भी परहेज करना चाहिए।

तो यह हैं कुछ टिप्स जिनका ध्यान गर्मियों के दौरान गर्भवती महिला को रखना चाहिए। इन टिप्स का ध्यान रखने से गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान गर्मियों में बहुत सी परेशानियों से निजात दिलाने में मदद करता है, इसके अलावा आपको डॉक्टर से भी समय से जांच करवाते रहना चाहिए।