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सिर दर्द का घरेलू रामबाण इलाज

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सिर का दर्द एक आम समस्या है जो कभी भी हो सकता है, और इससे निजात पाने के लिए आपको बहुत सी दवाइयां भी मिल जाती है। लेकिन बार बार दवाइयों का सेवन आपको दर्द से राहत तो दिलाता है। लेकिन इसके अधिक सेवन से आपको नुक्सान भी हो सकते हैं। सिर दर्द का कारण नींद का पूरा न होना, बहुत ज्यादा किसी चीज को सोचना, थकावट के कारण, आदि हो सकते है। सिर दर्द के कारण कई बार बहुत परेशानी भी होती है क्योंकि यह दर्द असहनीय हो सकता है। तो लीजिये आज हम आपको इस परेशानी से बचने के लिए कुछ ऐसे आसान घरेलू और रामबाण नुस्खे बताने जा रहे हैं जो आपको सिर दर्द की परेशानी से निजात दिलाने में मदद करते हैं।

तुलसी

आपके स्वास्थ्य से सम्बन्धी हर समस्या से बचाव के लिए तुलसी एक फायदेमंद औषधि है। सिर दर्द से निजात पाने के लिए आप एक कप पानी में आठ दस तुलसी के पत्ते अच्छे से उबाल लें, उसके बाद उसे छानकर उस पानी को गर्म चाय की तरह पीलें आपको आराम महसूस होगा।

सेब

सेब पर काला नमक डालकर खाएं, ये आसान होने के साथ बहुत ही असरदार घरेलू नुस्खा है। जो की आपको सिर दर्द से निजात दिलाने में मदद करता है और आप इसका इस्तेमाल कहीं भी कर सकते हैं।

लौंग

पांच छह लौंग की कलियों को लेकर तवे पर भून लें, उसके बाद उसे कॉटन के रुमाल में डालकर उसकी खुशबू को थोड़ी देर सूंघते रहें। और ऐसा करने से भी आपको आराम महसूस होता है।

एक्यूप्रेशर

अपनी उँगलियों की मदद से सिर के उन हिस्सों पर दबाव डालें, जहां आपको दर्द महसूस हो रहा है, या आप तेल का इस्तेमाल करके अपनी उँगलियों से हल्के हाथों से सिर की मसाज भी कर सकते हैं। यह भी आपको सिर दर्द से तुरंत आराम दिलाने में मदद करता है और एक्यूप्रेशर का इस्तेमाल तो आप कभी भी कभी भी सिर दर्द होने पर कर सकते है।

पानी

सिर दर्द होने पर आप थोड़ी थोड़ी देर में थोड़ा थोड़ा पानी पीएं, इससे आपकी बॉडी हाइड्रेट होती है। और आपको सिर दर्द जैसी परेशानी से राहत पाने में भी मदद मिलती है।

पुदीने और काली मिर्च की चाय

यदि आप चाय बनाते समय उसमे दो से तीन पुदीने की पत्तियां और दो काली मिर्च डालकर अच्छे से उबाल लेते हैं। और उसके बाद उसे छानकर गर्म गर्म पीते हैं तो इससे भी आपको राहत का अहसास होता है।  पुदीने का रस पीने से भी आपको चुटकियों में सिर दर्द की समस्या से निजात पाने में मदद मिलती है।

निम्बू का रस

एक चम्मच निम्बू के रस में एक चम्मच अदरक का रस मिलाकर उसका सेवन करें, ऐसा करने से भी आपको सर दर्द से राहत मिलती है। ज्यादा परेशानी होने पर दिन में दो से तीन बार इसका सेवन करें। या आप गर्म पानी में निम्बू का रस डालकर उसे पीएं इससे भी आपको तुरंत सिर दर्द से आराम पाने में मदद मिलती है।

आइस पैक

आइस क्यूब को कपडे में बांधकर सिर की सिकाई करें ऐसा करने से भी आपको आराम महसूस होता है। और उसके बाद आप आराम करें, आपको उसके बाद फ्रैश महसूस होगा और सिर दर्द भी गायब हो जाएगा।

अदरक

एक बर्तन में अदरक के टुकड़े काटकर अच्छे से उबाल लें, उसके बाद इस पानी की भाप लें। भाप लेने के बाद आराम से सो जाएँ। ऐसा करने से आपको सिर दर्द से निजात पाने में मदद मिलती है।

लहसुन

सिर दर्द से निजात पाने के लिए लहसुन एक पेनकिलर का काम करता है, इसके इस्तेमाल के लिए आप लहसुन की कलियों को पीसकर एक चम्मच उसका रस निकाल लें। उसके बाद एक चम्मच इसे पीएं आपको आराम मिलेगा।

मसाज करें

नारियल या बादाम का तेल सिर दर्द से निजात दिलाने में बहुत तेजी से असर दिखाता है। इसके लिए आप नारियल या बादाम का तेल लेकर अपने सिर की मसाज करें, ऐसा करने से आपको ठंडक का अहसास मिलता है जिससे आपको सिर दर्द जैसी परेशानी से भी निजात मिलता है।

तो यह हैं कुछ खास घरेलू उपाय जिनका इस्तेमाल करने से आपको इस परेशानी से राहत पाने में मदद मिलती है। और साथ ही आप इनका इस्तेमाल कभी भी कर सकती है और इससे आपको किसी तरह का कोई नुकसान भी नहीं होता है और आपको बहुत जल्दी आराम भी मिलता है।

गर्भावस्था में रोजाना एक कटोरी दाल खाने के फायदे

दालों में भरपूर मात्रा में जरुरी पोषक तत्व पाए जाते है। गर्भावस्था में दाल का सेवन माँ और शिशु दोनों के लिए ही बहुत फायदेमंद होते है। प्रेगनेंसी के दौरान सबसे ज्यादा शरीर में जिस चीज की जरुरत होती है वो है फोलिक एसिड।  और दाल एक बहुत अच्छा स्रोत है फोलिक एसिड का। दाल में भरपूर मात्रा में नुट्रिएंट्स पाए जाते है उनमे से कुछ एक है पोटैशियम,  कैल्शियम, विटामिन के, आयरन, प्रोटीन और फाइबर आदि। दाल बहुत प्रकार की होती है पर सभी दालों मे न्यूट्रिशनल वैल्यू बराबर मात्रा में ही पायी जाती है। आप अपनी पसंद के हिसाब से किसी भी दाल का सेवन कर सकते है।

प्रेगनेंसी के दौरान दाल एक सुपर फ़ूड की तरह काम करता है। डॉक्टर्स का भी मानना है के यदि गर्भवती महिला दाल का सेवन नियमित रूप से करती है तो कई तरह के मेडिकल समस्याओं से खतरा कम हो जाता है। गर्भावस्था के दौरान दाल के सेवन क्या क्या लाभ मिल सकते है इन्हे डिटेल में जाने।

ब्लड प्रेशर

दाल में भरपूर मात्रा में पोटैशियम पाया जाता है। और पोटैशियम हमारे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने का काम करता है। पोटैशियम का दूसरा महत्वपूर्ण काम होता है ब्लड के सर्कुलेशन को अच्छे से बढ़ाना। गर्भावस्था में स्ट्रेस और हार्मोनल बदलावों के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। गर्भावस्था के दौरान बढ़ता ब्लड प्रेशर माँ और शिशु दोनों के लिए ही हानिकारक होता है।

हाई ब्लड प्रेशर के कारण गर्भवती महिला को नींद ना आना और हार्ट से संबंधित भी अन्य बिमारियों का सामना करना पड़ सकता है। हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, तनाव व हार्ट से संबंधित बीमारियों के कारण शिशु के विकास पर भी रोक लगने का खतरा बढ़ जाता है। इन सभी समस्याओं से निजात पाने के लिए जरुरी है के आप नियमित रूप से रोजाना एक कटोरी दाल का सेवन जरूर करे।

कब्ज

गर्भावस्था के दौरान कब्ज की समस्या एक बहुत ही सामान्य समस्या होती है। इस दौरान गर्भाशय पर प्रेशर बढ़ जाता जिससे पाचन क्रिया धीमी पड़ जाती है जिससे खाना पचने में परेशानी होती है कब्ज और पेट से संबंधित समस्याएं खड़ी हो जाती है।

फाइबर एक ऐसा पोषक तत्व होता है जो हमारी पेट से जुडी प्रोब्लेम्स से छुटकारा दिलाता है और साथ ही ओबेसिटी जैसी समस्या से निजात में भी मदद करता है। फाइबर का एक बहुत अच्छा स्रोत है दाल। गर्भवती महिला को पेट से जुड़ी समस्या और कब्ज आदि से छुटकारा पाने के लिए दाल को नियमित रूप से सेवन करना चाहिए।

जन्म के समय की विकलांगता

दाल में पावरफुल विटामिन बी काम्प्लेक्स पाया जाता है। गर्भावस्था के इसके सेवन से जन्म के समय शिशु में होने वाली विकलांगता से रोकथाम मिलती है। इसके अतिरिक्त दाल में मौजूद शरीर में नए सेल्स का निर्माण करते है। दाल का सेवन शरीर की प्रोटीन की जरुरत को भी पूरा करता है।

एनीमिया

गर्भावस्था में शरीर में खून की कमी होने से एनीमिया की प्रॉब्लम हो जाती है। जिसके कारण डिलीवरी के समय भी कई चीजों का खतरा बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त खून की कमी होने से शिशु की ग्रोथ पर भी असर पड़ता है। रोजाना दाल का सेवन करने से हमारे शरीर में आयरन की कमी पूरी होती है। आयरन की कमी पूरी होने से एनिमिक होने का खतरा भी कम हो जाता है।

Daily one bowl of pulses during pregnancy

प्रेगनेंसी में चॉकलेट खाने के फायदे

चॉकलेट अधिकतर महिलाओं को पसंद होती है और गर्भावस्था के दौरान कई बार महिला को चॉकलेट खाने की बहुत इच्छा होती है। लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान चॉकलेट का सेवन करना चाहिए या नहीं इसे लेकर महिला के मन में सवाल जरूर आता है। तो लीजिये आज हम प्रेगनेंसी में चॉकलेट खानी चाहिए या नहीं? इसी सवाल का जवाब देने जा रहे हैं।

प्रेगनेंसी में चॉकलेट खाएं या नहीं?

पुराने समय में बुजुर्ग महिलाएं कहती थी की प्रेग्नेंट महिला का जो भी खाने का मन करता है उसे जरूर खाना चाहिए। क्योंकि यदि महिला अपने मन की इच्छा को मार लेती है तो होने वाले बच्चे की लार टपकती है। लेकिन कोई भी चीज सिर्फ स्वाद की पूर्ति के लिए ही खाना चाहिए। साथ ही चॉकलेट्स आजकल सभी को पसंद होती है ऐसे में गर्भवती महिला का यदि चॉकलेट खाने का मन करता है।

तो प्रेग्नेंट महिला को अपना मन मारने की बिल्कुल भी जरुरत नहीं है क्योंकि प्रेग्नेंट महिला चॉकलेट का सेवन कर सकती है। लेकिन चॉकलेट का सेवन करते समय इस बात का ध्यान रखें की जरुरत से ज्यादा चॉकलेट न खाएं। और यदि महिला इस बात का ध्यान रखती है तो चॉकलेट का सेवन करने से प्रेग्नेंट महिला को बहुत से स्वास्थ्य सम्बन्धी फायदे भी मिलते हैं। जैसे की:

ब्लड प्रैशर रहता है कण्ट्रोल

गर्भावस्था के दौरान चॉकलेट का सेवन करने से महिला को ब्लड प्रैशर से सम्बंधित परेशानी से बचे रहने में मदद मिलती है। जिससे माँ व् बच्चे दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

तनाव होता है दूर

प्रेग्नेंट महिला बॉडी में होने वाले बदलाव व् परेशानियों के कारण कई बार तनाव में आ जाती है। और तनाव में आने के कारण माँ व् बच्चे दोनों को परेशानी होती है। लेकिन चॉकलेट का सेवन करने से महिला को तनाव से बचे रहने में मदद मिलती है। सतह ही चॉकलेट खाने से महिला का मूड भी खुशनुमा रहता है।

इम्युनिटी बढ़ती है

चॉकलेट्स में फ्लेवनॉइड्स और एंटी ऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। जो गर्भावस्था के दौरान महिला की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। जिससे प्रेगनेंसी के दौरान महिला व् बच्चे को संक्रमण व् बिमारियों से बचे रहने में मदद मिलती है।

गर्भपात का खतरा होता है कम

ऐसा माना जाता है की जो महिलाएं सिमित मात्रा में प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में चॉकलेट का सेवन करती है। उनके मिसकैरिज होने के चांस बेहतर कम होते हैं।

बच्चे का विकास होता है बेहतर

चॉकलेट गर्भ में पल रहे बच्चे के मानसिक विकास के लिए भी बेहतर होती है। इससे आपका बच्चा गर्भ में हैप्पी हैप्पी रहता है।

पोषक तत्वों से होती है भरपूर

चॉकलेट में विटामिन्स, प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम व् अन्य पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। जो गर्भवती महिला व् बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं।

प्रेगनेंसी में चॉकलेट खाते समय इन बातों का ध्यान रखें

गर्भवती महिला चॉकलेट का सेवन कर सकती है लेकिन जरुरत से ज्यादा चॉकलेट का सेवन महिला को नहीं करना चाहिए। क्योंकि चॉकलेट मीठी होने के साथ कैफीन से भरपूर होती है। और जरुरत से ज्यादा कैफीन का सेवन माँ व् बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही चॉकलेट का अधिक सेवन करने से महिला की भूख में कमी आ सकती है जिससे महिला व् बच्चे दोनों को परेशानी हो सकती है।

तो यह है प्रेगनेंसी में चॉकलेट का सेवन करने के फायदे, इसीलिए आपका भी यदि प्रेगनेंसी में चॉकलेट खाने का मन करता है तो आप भी प्रेगनेंसी में चॉकलेट का सेवन कर सकती है। लेकिन ध्यान रखें की केवल स्वाद के लिए खाएं पेट भरने के लिए न खाएं।

सिजेरियन डिलीवरी होने के क्या कारण होते हैं?

माँ बनना हर महिला के लिए उसकी जिंदगी का सबसे बेहतरीन लम्हा होता है। और डिलीवरी का समय महिला के लिए वो समय होता है जब महिला अपनी जिंदगी की परवाह न करते हुए एक नन्ही जान को इस दुनिया में लाती है। लेकिन हर महिला चाहे वो पहली बारे माँ बन रही हो या दूसरी बार या फिर तीसरी बार कहीं न कहीं, महिला के मन में डिलीवरी को लेकर सवाल चल रहे होते हैं की महिला की डिलीवरी नोर्मल होगी या सिजेरियन।

अधिकतर प्रेग्नेंट महिलाएं यही चाहती है की उनकी डिलीवरी नोर्मल हो, लेकिन कई बार डिलीवरी के समय या प्रेगनेंसी के दौरान कुछ ऐसी कॉम्प्लीकेशन्स आ जाती है जिसके कारण नोर्मल की बजाय सिजेरियन डिलीवरी से महिला का प्रसव करवाना पड़ता है। तो आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसे ही कारण बताने जा रहे हैं जिनकी वजह से महिला को सिजेरियन डिलीवरी की मदद से बच्चे को जन्म देना पड़ता है।

शिशु की पोजीशन: यदि पेट में पल रहे बच्चे की पोजीशन सही नहीं है जैसे की बच्चे के पैर नीचे और सिर ऊपर की तरफ है, बच्चा लेटी हुई स्थिति में है यानी की न तो बच्चे के पैर नीचे की तरफ है न ही सिर, बच्चे ने गले में गर्भनाल लपेटी हुई हो, तो ऐसी कुछ पोज़िशन्स में डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

प्रेगनेंसी में कॉम्प्लीकेशन्स: यदि आपको गर्भावस्था के दौरान बहुत ज्यादा परेशानियां हुई हैं। और आपकी प्रेगनेंसी में बहुत ज्यादा कॉम्प्लीकेशन्स आ रही हैं। तो ऐसे में डॉक्टर प्रेगनेंसी की शुरुआत से ही आपको बता सकते हैं की आपकी डिलीवरी सिजेरियन होगी।

बच्चे की हलचल: यदि किसी कारण पेट में बच्चे की हलचल कम हो जाती है या मूवमेंट बिल्कुल बंद हो जाती है। तो ऐसे केस में बच्चे की जान को खतरा होता है। ऐसे में ऐसी स्थिति होने पर डॉक्टर तुरंत सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं। इसके अलावा यदि गर्भ में बच्चे का विकास भी न बढ़ रहा हो तो उसे केस में भी डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

बच्चे का मल: कुछ बच्चे गर्भ में मल पास कर देते हैं ऐसे में शिशु को दिक्कत हो सकती है। यदि ऐसा कुछ होता है तो उस केस में भी डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी की मदद से बच्चे को जन्म देने की सलाह देते हैं।

एक से ज्यादा शिशु: यदि गर्भ में एक से ज्यादा शिशु होता है तो भी महिला की सिजेरियन डिलीवरी होने के चांस बढ़ जाते हैं।

खून की कमी: प्रेगनेंसी के दौरान बहुत सी महिलाएं खून की कमी के कारण परेशान हो सकती है और जिन महिलाओं को यह समस्या होती है। उन महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी होने के चांस बढ़ जाते हैं।

गर्भपात: यदि आपका पहले एक या एक से ज्यादा गर्भपात हो चूका है और दूसरी बार गर्भधारण में बहुत सी परेशानियां आई हैं तो ऐसे में भी डॉक्टर महिला को नोर्मल का रिस्क लेने की बजाय सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह देते हैं।

डिलीवरी की डेट निकल जाने पर: यदि किसी महिला की डिलीवरी की डेट निकल जाती है तो ऐसे केस में समय ज्यादा होने पर पेट में बच्चे और माँ दोनों को दिक्कत हो सकती है। ऐसे में भी डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी करवाने की सलाह दे सकते हैं।

उम्र: जो महिलाएं ज्यादा उम्र में गर्भधारण करती है उन महिलाओं की भी नोर्मल की बजाय सिजेरियन डिलीवरी होने के चांस अधिक होते हैं।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से प्रेग्नेंट महिला को नोर्मल की बजाय सिजेरियन डिलीवरी करवानी पड़ सकती है। यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी यह जानकारी होनी चाहिए और प्रेगनेंसी के दौरान आपको अपना अच्छे से ध्यान भी रखना चाहिए। ताकि आपको या आपके बच्चे दोनों को इन परेशानियों से बचे रहने में मदद मिल सके।

प्रेगनेंसी के दौरान वजाइनल इन्फेक्शन का ऐसे करें उपचार

प्रेगनेंसी के दौरान वजाइनल इन्फेक्शन का ऐसे करें उपचार, गर्भवती महिला प्राइवेट पार्ट में इन्फेक्शन होने पर अपनाएँ यह टिप्स, वजाइनल इन्फेक्शन से बचने के टिप्स, प्रेगनेंसी में इन्फेक्शन से ऐसे बचें

गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे की तनाव, मॉर्निंग सिकनेस, उल्टी, सिर दर्द, चक्कर, पेट में दर्द, आदि। ऐसी ही एक और परेशानी का सामना गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान करना पड़ सकता है जिसे की वजाइनल इन्फेक्शन या फंगल इन्फेक्शन भी कहते हैं। और इसके होने पर खुजली, जलन, दर्द, सूजन, आदि की समस्या भी गर्भवती महिला को हो सकती है। यदि गर्भवती महिला को प्राइवेट पार्ट में यह इन्फेक्शन हो जाता है, तो इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। या तो इसके लिए डॉक्टर से राय लेनी चाहिए या फिर घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल करके इसका इलाज करना चाहिए, क्योंकि प्राइवेट पार्ट में इन्फेक्शन ज्यादा होने के कारण गर्भ में शिशु को भी नुकसान पहुँच सकता है। तो आइये अब जानते हैं की गर्भवती महिला को वजाइनल इन्फेक्शन से बचाव के लिए क्या करना चाहिए।

लहसुन

लहसुन प्राइवेट पार्ट के इन्फेक्शन से निजात दिलाने में आपकी बहुत मदद करता है, क्योंकि यह एंटीफंगल गुणों से भरपूर होता है। इसके इस्तेमाल के लिए आप लहसुन की दो कली को छीलकर पीस दें, उसके बाद इसे अपने प्राइवेट पार्ट में लगाएं, और उसके बाद इसे थोड़ी देर के लिए छोड़ दें, सुबह उठकर प्राइवेट पार्ट को अच्छे से प्राइवेट पार्ट को साफ़ कर लें। इससे आपको बहुत जल्दी इस समस्या से निजात पाने में मदद मिलेगी।

सेब का सिरका

एंटीमाइक्रोबील गुण गुणों से भरपूर सेब का सिरका प्राइवेट पार्ट में फंगल इन्फेक्शन को बढ़ने से रोकता है। साथ ही आपको इस समस्या से निजात दिलाने में भी मदद करता है, इसके इस्तेमाल के लिए आप दो चम्मच सेब के सिरके के साथ एक गिलास पानी का मिलाएं और उसे स्प्रे की बोतल में डाल दें। उसके बाद दिन में दो बार प्राइवेट पार्ट को अच्छे से साफ़ करके थोड़ा सा मिश्रण उस पर छिड़क दें, और उसे सूखने दें, इससे भी आपको इस समस्या से बचाव करने में मदद मिलेगी।

दही

दही भी आपको प्रेगनेंसी के दौरान वजाइनल इन्फेक्शन की समस्या से निजात दिलाने के साथ प्राइवेट पार्ट में हानिकारक बैक्टेरिया के जमाव को खत्म करने में मदद करती है। इसके लिए आप दही को फैट कर अपने प्राइवेट पार्ट पर रुई की मदद से लगाएं और पांच से दस मिनट बाद प्राइवेट पार्ट को साफ़ कर लें। ऐसा नियमित इन्फेक्शन के ठीक होने तक करें।

पानी का भरपूर सेवन करें

पानी की कमी के कारण भी गर्भवती महिला को यह समस्या हो सकती है, ऐसे में पानी का भरपूर सेवन करना चाहिए। ताकि बॉडी में मौजूद सभी विषैले पदार्थो को बाहर निकालने में मदद मिल सके। और इससे आपको वजाइनल इन्फेक्शन की समस्या से राहत पाने में भी मदद मिलती है।

नारियल तेल

नारियल तेल को यदि आप अपने खाने में इस्तेमाल करते हैं तो भी आपको वजाइनल इन्फेक्शन से बचने में मदद मिलती है। क्योंकि इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट प्राइवेट पार्ट के ph स्तर को सामान्य रखने में मदद करते हैं जिससे आपको फायदे मिलता है।

डॉक्टर से कब राय लें

यदि इन्फेक्शन को एक हफ्ते से ज्यादा समय हो जाए, साथ ही खुजली, जलन के साथ सफ़ेद पानी अधिक आने लगे, यूरिन में से बदबू आये, दर्द महसूस हो तो ऐसे में इसे अनदेखा न करते हुए जल्द से जल्द डॉक्टर से राय लेनी चाहिए।

प्रेगनेंसी में प्राइवेट पार्ट के इन्फेक्शन से बचने के अन्य टिप्स

  • यूरिन पास करने के बाद अच्छे से प्राइवेट पार्ट को साफ़ करना चाहिए।
  • ज्यादा टाइट अंडरवीअर नहीं पहननी चाहिए।
  • सूती कपडे वाली अंडरवीअर ही पहननी चाहिए।
  • मैला अंडरवीअर न पहने, साथ ही यदि सफ़ेद पानी अधिक आये या गीलापन महसूस हो तो आपको तुरंत अंडरवीअर को बदलना चाहिए।
  • ज्यादा गंध वाले प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल प्राइवेट पार्ट के लिए नहीं करना चाहिए।
  • ज्यादा मसालेदार आहार का सेवन न करें।
  • खुजली, जलन आदि की समस्या यदि एक हफ्ते से ज्यादा हो तो इससे बचने के लिए तुरंत डॉक्टर से राय लेनी चाहिए।

तो यह हैं कुछ खास उपाय जिनका इस्तेमाल प्रेगनेंसी के दौरान वजाइनल इन्फेक्शन की समस्या से बचने के लिए आप कर सकते हैं। इसके अलावा आपको डॉक्टर से भी एक बार जरूर राय लेनी चाहिए, ताकि इस समस्या को बढ़ने से रोका जा सके, और गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु को किसी भी तरह की समस्या से बचाव करने में मदद मिल सके।

चर्म रोग क्या होता है? चर्म रोग के कारण, लक्षण और उपाय

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चर्म रोग क्या होता है?

ऐसा कोई भी संक्रमण या समस्या जिससे त्वचा प्रभावित हो उन्हें चर्म रोग कहते हैं। चर्म रोग एक गंभीर रोग है जिसमे त्वचा पर दाग, काले निशान, खुजली जलन आदि की समस्या होने लगती है। अंग्रेजी में इसे एक्ज़िमा भी कहते हैं। लेकिन ये केवल एक तरह का चर्म रोग है। इसके अलावा और भी कई तरीके से त्वचा में समस्याएं होती है। जो त्वचा को स्थाई और अस्थाई रूप से प्रभावित करती हैं। आज हम आपको चर्म रोग की सम्पूर्ण जानकारी दे रहे हैं।

चर्म रोग के कारण

त्वचा शरीर का सबसे बाहरी हिस्सा होता है क्यूंकि शरीर के भीतरी अंगों की तुलना में त्वचा सीधे बाहरी वातावरण के सम्पर्क में रहती है। इसलिए बाहर की धूप, धूल, मिट्टी, गंदगी और बाकी चीजें सीधा त्वचा को प्रभावित करती हैं। चर्म रोग भी इसी कारण होता है। इसके अलावा चर्म रोग होने के और भी कई कारण हो सकते हैं। वो कारण निम्नलिखित हैं –

  • रासायनिक चीजें जैसे साबुन, डिटर्जेंट आदि का अधिक इस्तेमाल।
  • पेट में कब्ज के कारण।
  • तनाव लेने के कारण।
  • त्वचा के पोर्स और बालों के रोम में बैक्टीरिया होने के कारण।
  • त्वचा पर मौजूद कवक, परजीवी और सूक्ष्मजीव।
  • रक्त विकार होने पर।
  • साफ-सफाई न रखने पर।
  • गंदे पानी का इस्तेमाल करने से या सम्पर्क में रहने से भी त्वचा रोग होने लगते हैं।
  • शरीर से पसीना कम निकलने पर।
  • अधिक समय तक हाथ-पैर पानी में रहने के कारण भी ये रोग हो सकता है।
  • मौसम बदलने के कारण खासकर सर्दियों के दिनों में उँगलियों में ये समस्या हो जाती है।
  • महिलाओं में मासिक धर्म की परेशानी।
  • संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आने या उसके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चीजों को यूज करने से।
  • थायराइड, प्रतिरक्षा प्रणाली, गुर्दे की समस्या के कारण।
  • वायरस
  • कमजोर इम्यून सिस्टम
  • अनुवांशिकता

चर्म रोग के लक्षण

ऐसे तो त्वचा में जरा सी समस्या होने पर लोग डॉक्टर के पास जाते हैं। और जाना भी चाहिए। लेकिन त्वचा रोग एक ऐसी समस्या है जो बहुत तेजी से बढ़ती हैं। ऐसे में सही समय पर इलाज न किया जाए तो समस्या गंभीर हो सकती है। इसीलिए जरुरी है की आपको चर्म रोग के लक्षण पता हो। ताकि समय रहते इलाज करवाया जा सके। त्वचा रोग के लक्षण निम्नलिखित है –

  • त्वचा पर लाल-सफेद रंग के उभार।
  • खुजली होना।
  • त्वचा में खुरदुरापन।
  • त्वचा का छिलना।
  • छाले होना।
  • बाहरी हिस्से पर घाव या जख्म होना।
  • सुखी व् ड्राई स्किन।
  • त्वचा पर धब्बे आना।
  • मस्से या अन्य रूप में त्वचा पर उभार आना।
  • त्वचा के रंग में असमानता।
  • चेहरे, कान, गर्दन, धड़ में गर्मी महसूस होना।
  • त्वचा के उभरे हिस्से पर दर्द होना।
  • सूजन, रैशेस और जलन की समस्या।
  • त्वचा पर दाने निकलना।
  • बुखार आना।

चर्म रोग के प्रकार

त्वचा में होने वाली समस्यायों को चर्म रोग कहते हैं। और ये कई प्रकार के होते हैं। यहाँ हम उन्ही के बारे में बता रहे हैं –

  • Acne (मुहांसे)
  • Athlete Foot (पैरों के दाद)
  • Boil (बालतोड़)
  • Dermatitis (त्वचा पर खुजली और लाल दाने)
  • Dandruff (रुसी)
  • Eczema (एक्जिमा)
  • Lucoderma (सफेद दाग)
  • Measles (खसरा, छोटी माता)
  • Melasma (त्वचा पर भूरे दाग)
  • Miliaria (घमौरी)
  • Nail Infection (नाखूनों में संक्रमण)
  • Psoriasis (सोरायसिस)
  • Ringworm (दाद)
  • Scabies (खाज)
  • Small Pox (चेचक, बड़ी माता)
  • Sunburn (धूप में झुलसी त्वचा)
  • Wart (मस्सा)

चर्म रोग के उपाय

त्वचा में होने वाली समस्यायों से बचने के लिए आपको कुछ विशेष बातों का ख्याल रखना होगा।

  • एक्जिमा ठीक करने के लिए रोजाना समुद्र के पानी में नहाएं।
  • त्वचा के रोग होने पर नमक का सेवन कम से कम करें। या हो सके तो नमक खाएं ही नहीं।
  • त्वचा में संक्रमण आदि होने पर रोजाना नीम के पत्तो को पानी में उबालकर नहाएं। जलन और खुजली कम होगी।
  • साफ-सुथरे धुले हुए कपडे पहनें।
  • खट्टी, चटपटी, मीठी चीजों का सेवन ना करें। ये रोग को बढ़ा सकते हैं।
  • अगर त्वचा रोग गीले किस्म का है तो पानी का इस्तेमाल ना करें।
  • गेंदे के फूल में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल तत्व होते हैं जो चर्म रोग में लाभ पहुंचाते हैं। गेंदे की पत्तियों को पानी में उबालकर दिन में दो बार चर्म रोग से प्रभावित हिस्से पर लगाएं।
  • अलसी का प्रयोग करके भी त्वचा रोग ठीक होता है। अलसी में ओमेगा 3 एसिड होता है जो पाचन तंत्र को मजबूत करता है और चर्म रोग में राहत मिलती है। इसीलिए अलसी के तेल की 1 से 2 चम्मच का रोजाना सेवन करें।

ये कुछ उपाय हैं जिनकी मदद से त्वचा में होने वाले रोग को ठीक किया जा सकता है। दोस्तों, चर्म रोग बहुत कष्टदायी होता है। इसलिए उसका समय रहते उपचार कराना जरुरी होता है। चर्म रोग एक ऐसी समस्या है जो समय के साथ पुरे शरीर में फैल सकती है। तो बेहतर यही है तो समय रहते इलाज करवा लिया जाए। एक बात और, ये उपाय केवल जानकारी मात्र के लिए हैं किसी भी उपाय का इस्तेमाल करने से पूर्व डॉक्टर को दिखा लें और उनके बताए अनुसार ही इलाज करें। ताकि समस्या से जल्द से जल्द छुटकारा पाया जा सके।

क्यों जरुरी होता है गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाना

क्यों जरुरी होता है गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाना, प्रेगनेंसी में अल्ट्रासॉउन्ड क्यों करवाते हैं, गर्भवती महिला के लिए अल्ट्रासॉउन्ड करवाना क्यों है जरुरी, गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासॉउन्ड करवाने से क्या पता चलता है

गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान बहुत से टेस्ट करवाने पड़ते हैं जैसे की ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, थायरॉइड टेस्ट, एड्स के लिए टेस्ट, आदि। ऐसे ही प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाने की सलाह भी दी जाती है, लेकिन प्रेगनेंसी में महिला को कितनी बार अल्ट्रासॉउन्ड करवाना पड़ता है इसके लिए आपको डॉक्टर ही बेहतर तरीके से बता पाते हैं। जहां प्रेगनेंसी के दौरान किसी भी तरह की परेशानी न होने पर महिला को तीन से चार बार अल्ट्रासाउंड करवाना पड़ता है। वहीँ उम्र अधिक होने पर या प्रेगनेंसी में किसी तरह की कॉम्प्लीकेशन्स होने पर चार या पांच से ज्यादा बार अल्ट्रासॉउन्ड करवाना पड़ता है।

प्रेगनेंसी के दौरान क्यों करवाते हैं अल्ट्रासॉउन्ड

गर्भवती महिला के गर्भ में एक नन्हा शिशु पल रहा होता है और शिशु की गर्भ में स्थिति को जानने के लिए अल्ट्रासॉउन्ड किया जाता है। इसके अलावा और भी कई कारण होते नहीं जिनकी वजह से गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाना पड़ता है। तो आइये जानते हैं की क्यों गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाना पड़ता है।

शिशु की हार्टबीट जानने के लिए

गर्भ में पल रहे शिशु की हार्टबीट जानने के लिए अल्ट्रासॉउन्ड किया जाता है। इससे शिशु का हार्ट रेट भी पता चल जाता है। जिन महिलाओं के पहले अल्ट्रासॉउन्ड में हार्टबीट का पता नहीं चलता है उन्हें डॉक्टर दोबारा से अल्ट्रासॉउन्ड के लिए बोल सकते हैं।

गर्भ में शिशु के विकास को जानने के लिए

गर्भ में शिशु के अंगो का विकास अच्छे से हो रहा है या नहीं, शिशु की लम्बाई, हार्ट ग्रोथ, हाथों, पैरों, रीढ़ की हड्डी आदि की ग्रोथ ठीक तरह से हो रही है या नहीं, आदि को जानने के लिए गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड करवाने की सलाह दी जाती है।

शिशु के अंग की गतिशीलता जानने के लिए

माँ के पेट में शिशु के अंगो का विकास होने के साथ सभी अंग ठीक से काम कर रहे है या नहीं इस बारे में भी अल्ट्रासॉउन्ड के माध्यम से पता लगाया जा सकता है। जैसे की शिशु में विकलांगता हो, हड्डियों के विकास में कोई कमी हो आदि का पता अल्ट्रासॉउन्ड से चल सकता है।

गर्भ में शिशु की जानकारी

अल्ट्रासॉउन्ड के माध्यम से यह भी पता चल जाता है की गर्भ में एक शिशु है या दो या तीन। इसीलिए भी प्रेग्नेंट महिला का अल्ट्रासॉउन्ड करवाना जरुरी होता है।

एमनियोटिक फ्लूड

एमनियोटिक फ्लूड में ही शिशु माँ के गर्भ में नौ महीने तक रहता है, और अल्ट्रासॉउन्ड के माध्यम से गर्भ में एमनियोटिक फ्लूड के लेवल का पता लगाया जा सकता है।

शिशु की पोजीशन

गर्भ में शिशु की पोजीशन का पता लगाने के लिए भी अल्ट्रासॉउन्ड करवाया जाता है, खासकर प्रेगनेंसी के आखिरी अल्ट्रासॉउन्ड को गर्भ में शिशु की सही पोजीशन और वजन आदि जानने के लिए किया जाता है।

डिलीवरी डेट जानने के लिए

अल्ट्रासॉउन्ड के माध्यम से गर्भ में पल रहे शिशु के जन्म की तिथि का अंदाजा भी लगाया जा सकता है, और डॉक्टर अल्ट्रासॉउन्ड को देखकर हो डिलीवरी की तारीख देते हैं। यह एक अनुमानित तिथि होती है ऐसा बिल्कुल भी जरुरी नहीं होता है की शिशु का जन्म उसी तिथि को ही होगा यह दो दिन पहले या दो दिन बाद में भी हो सकता है।

प्रेगनेंसी की कॉम्प्लीकेशन्स पता चलती है

अल्ट्रासॉउन्ड करवाने से यदि शिशु को जन्म देने में किसी तरह की कॉम्प्लीकेशन्स होती है इस बारे में भी पता लगाया जाता है। जैसे की कुछ महिलाओं को एक्टोपिक प्रेगनेंसी हो जाती है यानी शिशु गर्भाशय में होने की बजाय कहीं और बढ़ने लगता है, ऐसे में महिला को बहुत रिस्क हो जाता है। और यदि ऐसी कोई दिक्कत होती है तो यह भी प्रेगनेंसी के पहले अल्ट्रासॉउन्ड में पता चल जाता है।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला को अल्ट्रासॉउन्ड जरूर करवाना पड़ता है। और महिला को कितने अल्ट्रासॉउन्ड करवाने चाहिए, कब अल्ट्रासॉउन्ड करवाना चाहिए इस बारे में आपको डॉक्टर ही अच्छे तरीके से बता पाते हैं।

दांत दर्द से तुरंत आराम दिलाएंगे यह घरेलू उपाय

बॉडी में पेन होने की समस्या बहुत ही आम बात होती है कई बार यह दर्द सहन हो जाता है तो कई बार इसका उपचार करना पड़ता है। लेकिन यदि बात दांत की हो, तो दांत का दर्द असहनीय होता है। साथ ही इसके कारण चेहरे पर सूजन, खाने पीने में परेशानी होने की समस्या भी हो जाती है। दांत के दर्द की कोई उम्र नहीं होती है बल्कि यह बच्चों, जवान, बूढ़े सभी को हो सकता है।

दांत का दर्द जैसे ही शुरू होता है वैसे ही लोग सबसे पहले दवाइयों का सेवन करने लगते हैं ताकि उन्हें आराम मिल जाये। कई बार दवाई से तुरंत आराम मिल जाता है तो कई बार समय लगता है। लेकिन दवाइयों का जरुरत से ज्यादा सेवन करना सही नहीं होता है। तो आज इस आर्टिकल में हम आपको दांतों में दर्द होने से जुडी समस्या के बारे में बात करने जा रहे हैं की दांत में दर्द क्यों होता है और इससे निजात पाने के घरेलू नुस्खे क्या हैं।

दांतों में दर्द होने के कारण

  • जो लोग अपने दांतों की साफ़ सफाई नहीं रखते हैं उनके दांतों में कीड़े लग जाते हैं, कैविटी अधिक होती है जिसके कारण दांत दर्द की परेशानी होती है।
  • अक्ल दाढ़ निकलने के समय दांत में दर्द की परेशानी हो सकती है।
  • बहुत ज्यादा मीठे का सेवन करने से भी दांत खराब हो जाते हैं जिनकी वजह से दांतों में दर्द की समस्या हो जाती है।
  • गलत तरीके से दांतों की सफाई करने पर दांतों की जड़े कमजोर हो जाती है जिसके कारण दांत में दर्द की समस्या हो जाती है।
  • दांतों या मसूड़ों में इन्फेक्शन के कारण भी यह समस्या होती है।
  • बॉडी में कैल्शियम की कमी होने के कारण भी दांतों में दर्द की समस्या हो जाती है।

दांतों के दर्द से निजात पाने के घरेलू तरीके

यदि आपको दांत में दर्द की समस्या है तो कुछ आसान घरेलू तरीको का इस्तेमाल करने से दांत दर्द की परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सकती है। तो आइये अब जानते हैं की वो घरेलू तरीके कौन से हैं।

लहसुन (Garlic)

दांत के दर्द से आराम पाने के लिए लहसुन का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है। क्योंकि इसमें एलिसिन मौजूद होता है जो दांतों व् उसके आस पास मौजूद बैक्टेरिया को खत्म करता है जिससे दांत दर्द आराम मिलता है। इसके इस्तेमाल के लिए दांत दर्द होते ही एक या दो लहसुन की कली का छिलका उतार कर चबाएं।

लौंग (Cloves)

लौंग का इस्तेमाल करने से भी दांतों के दर्द से मिनटों में आराम मिलता है। इसके इस्तेमाल के लिए आप जिस दांत में दर्द है उस दांत में एक लौंग को दबा लें या फिर रुई की मदद से लौंग का तेल उस दांत में लगाएं। ऐसा करने से दांत दर्द से तुरंत आराम पाने में मदद मिलती है।

हल्दी (Turmeric)

एंटी बायोटिक गुणों से भरपूर हल्दी का सेवन करने से भी दांत दर्द की परेशानी से आराम मिलता है। इसके इस्तेमाल के लिए आप चुटकी भर हल्दी लें, नमक लें और उसमे थोड़ा सा तेल मिलकर एक पेस्ट बनाएं और उसे दर्द वाले दांत में लगाकर छोड़ दें। कुछ ही देर में आपको आराम मिलेगा।

हींग (Hing)

दांत दर्द से निजात पाने का हींग भी एक बेहतरीन तरीका है। इसके इस्तेमाल के लिए आप चुटकी भर हींग को मौसमी के रस में मिलाएं। उसके बाद रुई में इस पेस्ट को लगाकर अपने दर्द वाले दांत में रखकर दबा लें। थोड़ी देर में आपको राहत महसूस होगी।

नमक वाले पानी से कुल्ला

यदि आपको दांत में दर्द हो रहा है तो तुरंत पानी को थोड़ा गर्म करें और उसमे नमक मिलाएं। अब उस पानी से कुल्ला करें, ऐसा दो से तीन बार करें। ऐसा करने से आपको दांत दर्द की समस्या से आराम पाने में मदद मिलेगी।

अल्कोहल (Alcohol)

जिस दांत में आपको दर्द हो रहा है उस दांत में रुई को अल्कोहल में भिगोकर रखें और दांत को दबाएं। ऐसा करने से भी आपको दांत दर्द से आराम महसूस होने में मदद मिलेगी।

पुदीने के रस

पुदीने की पत्तियों को पीसकर उनका रस निकाल लें। उसके बाद उस रस को रुई की मदद से अपने दांत में लगाएं। ऐसा करने से भी आपको दांत के दर्द को कम करने में मदद मिलती है।

आलू (Potato)

आलू के छोटे टुकड़े को काटकर दांत दर्द होने पर चबाएं। ऐसा करने से भी भी दांत दर्द से राहत पाने में मदद मिलती है।

प्याज़ का रस (Onion Juice)

प्याज़ को कद्दूकस करके उसका रस निकाल लें और उसके बाद इस रस को दांत में लगाएं। इस रस को लगाने से दांत के आस पास मौजूद बैड बैक्टेरिया को खत्म करने में मदद मिलेगी। जिससे दांत दर्द कम होगा।

बर्फ (Ice)

दांत में दर्द होने पर गाल पर बर्फ का टुकड़ा लेकर सिकाई करें इससे दांत के आस पास सुन्न हो जायेगा। जिससे आपके दर्द को खत्म करने में मदद मिलेगी।

बेकिंग सोडा (Baking soda)

बेकिंग सोडा का इस्तेमाल दो तरह से करके आप दांत दर्द से आराम पा सकते हैं। पहला गुनगुने पानी में बेकिंग सोडा डालकर कुल्ला करें। दूसरा रुई को पानी में भिगोकर थोड़ा निचोड़ लें उसके बाद उस पर थोड़ा सा बेकिंग सोडा रखें और उसे दर्द वाले दांत के आस पास घुमाकर दो मिनट दांतों के बीच रखें। ऐसा करने से आपको दांत दर्द की समस्या से निजात पाने में मदद मिलेगी।

काली मिर्च (Black Pepper)

थोड़ी सी काली मिर्च का पाउडर और थोड़ा सा नमक लें उसमे थोड़ा पानी मिलाकर पेस्ट बनाएं। अब इस पेस्ट को जिस दांत में दर्द है उस दांत पर लगाएं। ऐसा करने से भी भी आपको राहत मिलेगी।

अमरुद के पत्ते (Guava Leaf)

अमरुद के पत्तों में एंटी बैक्टेरियल गुण मौजूद होते हैं जो दांत दर्द की समस्या से राहत दिलाने में मदद करते हैं इसके इस्तेमाल के लिए आप या तो अमरुद की पत्तियों को धोकर चबाएं या फिर अमरुद की पत्तियों को पानी में डालकर उबाल लें। उसके बाद उस पानी को छानकर उसमे थोड़ा नमक मिलाकर कुल्ला करें।

तो यह हैं दांत दर्द के कारण व् इस परेशानी से बचने के कुछ आसान घरेलू तरीके, यदि आपको भी कभी यह परेशानी होती है। तो आप भी इन में से किसी भी घरेलू तरीके का इस्तेमाल करके इस परेशानी से निजात पा सकते हैं। इसके अलावा आपको दांत में दर्द की परेशानी न हो इससे बचने के लिए दांतों की साफ़ सफाई का ध्यान रखे, रोजाना गुनगुने पानी नमक के कुल्ले करें, सही तरीके से अपने दांतों को साफ़ करें।

Home Remedies for Teeth Pain

नाभि खिसकने के क्या कारण होते है और उनकी जाँच कैसे करें?

Nabhi Khisakne ke Karan Aur Lakshan : नाभि खिसकना जिसे नाभि का डिगना, धरण, धरण गिरना, नाप जाना, नाप खिसकना आदि के नामों से भी जाना जाता है के बारे में अक्सर आप सभी ने सुना होगा। क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार नाभि को शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, यूनानी चिकित्सा पद्धति में भी नाभि को शरीर का सबसे जरुरी अंग माना जाता है परंतु एलोपैथी में इसके बारे में कुछ खास जानकारी नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार, जिस तरह रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन आ सकता है उसी प्रकार पेट और नाभि की मांसपेशियों में भी कभी कभार मरोड़ व् दर्द होने लगता है जिसकी वजह से नाभि अपनी जगह से इधर उधर खिसक जाती है। सामान्यतौर पर नाभि ऊपर या नीचे की तरफ खिसक जाती है जिसका कारण भारी वजन उठाना, अचानक झुकना आदि हो सकते हैं।

वैसे तो नाभि डिगने का कोई प्रॉपर इलाज मौजूद नहीं है लेकिन आयुर्वेद, योग और अन्य तरीको की मदद से नाभि खिसकने की समस्या से निजात पाई जा सकती है। यहाँ हम आपको नाभि खिसकने के कारण, लक्षण और नाभि खिसकने के घरेलू उपाय बता रहे हैं। जिनकी मदद से इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

नाभि खिसकने (नाप जाने) के क्या कारण होते है? Causes of Naap Khisakna

वैसे तो ये समस्या अक्सर बचपन में ही होती है लेकिन कई बार यह बड़ों को भी हो जाती है जिसके पीछे कई कारण होते हैं,

  • खेलना,
  • दौड़ना,
  • सीढ़ियां चढ़ना,
  • अधिक भार उठाना,
  • अचानक मुड़ना या झुकना,
  • संबंध बनाने के दौरान,
  • बहुत देर तक एक ही पैर पर खड़े रहने के कारण,
  • भार उठाते समय एक तरफ वजन देने के कारण भी नाप चली जाती है।

कुछ लोगों का कहना है की ज्यादातर पुरुषों की नाभि बाई तरफ खिसकती है जबकि महिलाओं की दाई तरफ खिसकती है। लेकिन ऐसा क्यों होता है इसका कोई प्रमाण नहीं है!

नाभि खिसकने (धरण डिगने) के लक्षण :-

जब नाभि अपनी जगह से खिसक जाती है तो उसकी वजह से शरीर में कुछ बदलाव होते है जिनसे पता लगाया जा सकता है की नाप चली गयी है, वे बदलाव कुछ इस तरह है –

ऊपर की ओर खिसकने पर – घबराहट, उल्टी, कब्ज और जी मचलने लगता है। साथ में दस्त भी लग जाते हैं।

नीचे की ओर खिसकने पर – दस्त, स्वप्न दोष और पाचनतंत्र में गड़बड़ी होने लगती है।

आगे या पीछे खिसकने पर – पेट में तेज दर्द होता है।

महिआओं की नाभि खिसकने पर – गर्भाशय से संबंधित परेशानी जैसे मासिक धर्म में अनियमितता होना। साथ ही पेट के निचले हिस्से में दर्द और जांघो में भी दर्द होता है।

बाएं कूल्हे की तरफ खिसके – शरीर के दाएं भाग में दर्द होता है।

बाई तरफ खिसके – किडनी और आंतों में दर्द हो सकता है।

नाभि खिसकने का परिक्षण कैसे करें? How to Measure Naval Displacement (Pet ki dharan)

नाभि खिसकने की समस्या की जाँच घर पर भी की जा सकती है, जिसके लिए तीन तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। ये तरीके कुछ इस प्रकार हैं –

1. नाभि से पैर के अंगूठे की दुरी को नापना :

इसे नापने के लिए नीचे जमीन पर पीठ के बल सीधा लेट जाएं। अब किसी एक अन्य व्यक्ति की मदद से एक रस्सी से अपनी नाभि से पैर के अंगूठे तक की दुरी को नाप लें। अब इसी तरह नाभि के दूसरे पैर के अंगूठे तक दूसरी रस्सी से नापें। अब दोनों रस्सियों को नापें अगर दोनों में कोई अंतर आता है तो यह नाप जाने का संकेत है।

2. नाभि में नाड़ी ढूंढना :

इस परीक्षण के लिए आपको एक अन्य व्यक्ति की सहायता की आवश्यकता होगी। इसके लिए जमीन पर पीठ के बल लेट जाएं और उस व्यक्ति को कहें की वो अपने अंगूठे को नाभि के स्थान पर रखकर थोड़ा दबाये और नाड़ी ढूंढने की कोशिश करे। अगर नाड़ी नाभि की जगह पर ही अनुभव होती है तो नाप सही है लेकिन अगर नाड़ी की धड़कन सुनाई न दें तो हो सकता है नाप खिसक गई है।

3. नाभि से निप्पल की दुरी को नापना :

इसमें आपको अपनी नाभि से निप्पल तक की दुरी को नापना होगा। अगर इनमें अंतर होता है तो हो सकता है नाभि खिसक गयी हो। इसके लिए आप किसी रस्सी की मदद ले सकते हैं।

हालाँकि चिकित्सीय जगत में इसका कोई परिणाम नहीं है लेकिन इन घरेलू तरीकों की मदद से नाभि के खिसकने का अनुमान लगाया जा सकता है। – Pet ki dharan ko kaise mape

गर्मियों में गर्भ में शिशु को बीमार होने से ऐसे बचाएं

प्रेगनेंसी एक ऐसा समय होता है जब महिला को यदि कोई तकलीफ या परेशानी होती है तो उसका असर बच्चा भी महसूस कर सकता है। ऐसे ही गर्मी के मौसम में जब प्रेग्नेंट महिला को गर्मी, धूप, पसीने, खान पान के कारण किसी तरह की परेशानी होती है तो उसका असर भी बच्चे पर पड़ सकता है। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को गर्मी के मौसम में अपना अच्छे से ध्यान रखना चाहिए ताकि प्रेग्नेंट महिला को किसी भी तरह की परेशानी न हो और गर्भ में बच्चा भी बीमार न हो। और इसके लिए प्रेगनेंसी के दौरान आपको गर्मियों के मौसम में कुछ आसान टिप्स को ध्यान में रखना चाहिए ताकि माँ और बच्चे दोनों को बीमार होने से बचने में मदद मिल सके।

नमक का सेवन

गर्भवती महिला यदि गर्मी के मौसम में अधिक नमक का सेवन करती है तो इसके कारण प्रेग्नेंट महिला का ब्लड प्रैशर बढ़ सकता है। और प्रेग्नेंट महिला के ब्लड प्रैशर का बढ़ना गर्भ में शिशु को भी बीमार कर सकता है। ऐसे में गर्भ में शिशु को स्वस्थ रखने के लिए प्रेग्नेंट महिला को जितना हो सके गर्मियों में नमक का सेवन कम करना चाहिए।

ठंडी चीजों का सेवन

गर्मी के मौसम में ठंडी चीजें आपको राहत तो पहुंचा सकती है लेकिन अधिक ठंडी चीजें बॉडी के तापमान को बढ़ा देती है, साथ ही इससे महिला को खांसी, जुखाम, गले में इन्फेक्शन जैसी समस्या हो सकती है। जिससे पेट में बच्चा असहज महसूस कर सकता है। ऐसे में गर्मी के मौसम में प्रेग्नेंट महिला को न तो ज्यादा गर्म और न ही ज्यादा ठंडी चीजों का सेवन करना चाहिए। यदि आप इस बात का ध्यान रखती हैं तो इससे पेट में बच्चा स्वस्थ रहता हैं, और महिला को भी सेहत सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने में मदद मिलती है।

बॉडी को ठंडक पहुंचाएं

गर्मी, पसीना, आदि के कारण प्रेग्नेंट महिला को बहुत अधिक परेशानी हो सकती है। साथ ही महिला आलस, कमजोरी, थकान आदि की परेशानी भी अधिक हो सकती है। जिसका असर बच्चे पर पड़ सकता है और गर्भ में बच्चा भी सुस्त महसूस करता है। ऐसे में महिला को गर्मी में रहने से बचना चाहिए और अपने बैठने वाले कमरे को थोड़ी देर एसी या कूलर चलाकर ठंडा करना चाहिए, और महिला को भी सेहत सम्बन्धी परेशानियों से बचे रहने में मदद मिलती है। ताकि महिला को गर्मी अधिक महसूस न हो और बच्चा भी रिलैक्स कर सके।

पानी पीएं भरपूर

शरीर में पानी की कमी होने के कारण भी गर्मी के मौसम में माँ के पेट में बच्चा अधिक परेशानी महसूस कर सकता है। साथ ही पानी की कमी के कारण शिशु बीमार भी महसूस कर सकता है। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को पानी का भरपूर सेवन करना चाहिए। जिससे प्रेग्नेंट महिला को हाइड्रेट रहने व् बच्चे को गर्भ में स्वस्थ रहने में मदद मिल सके। और पानी के अलावा प्रेग्नेंट महिला को नारियल पानी, निम्बू पानी, फलों के रस आदि का भी भरपूर सेवन करना चाहिए, क्योंकि यह भी गर्मी से राहत पहुंचाने में मदद करते हैं।

कपडे पहने आरामदायक

गर्मी के मौसम में प्रेग्नेंट महिला को आरामदायक कपडे पहने चाहिए, कपड़े सूती होने के साथ खुले भी होने चाहिए। ऐसे कपड़ों में प्रेग्नेंट महिला को गर्मी का अहसास नहीं होता है साथ ही महिला को रिलैक्स रहने में मदद मिलती है। जिससे गर्भ में बच्चा भी रिलैक्स रहता है और बीमार नहीं होता है और स्वस्थ रहता है।

भोजन हल्का करें

प्रेगनेंसी के दौरान अपनी डाइट का प्रेग्नेंट महिला को अच्छे से ध्यान रखना चाहिए। जैसे की ज्यादा भारी भोजन नहीं करना चाहिए जिसे पचाने में मुश्किल हो, ज्यादा मिर्च मसाले नहीं खाने चाहिए, जरुरत से ज्यादा नहीं खाना चाहिए, आदि। क्योंकि इससे पाचन क्रिया पर बुरा असर पड़ सकता है। जिससे महिला को कब्ज़, गैस, पेट में दर्द जैसी परेशानियां हो सकती है और पेट में बच्चा भी परेशानी महसूस कर सकता है। ऐसे में महिला को पोषक तत्वों से भरपूर आहार लेने के साथ थोड़ा थोड़ा करके भोजन खाना चाहिए, और भोजन को आराम से और अच्छे से चबाकर खाना चाहिए। जिससे माँ व् बच्चा दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

तो यह हैं कुछ आसान टिप्स जिनका ध्यान गर्मी के मौसम में यदि प्रेग्नेंट महिला रखती है तो इससे पेट में बच्चे को भी बीमार होने से बचाने में मदद मिलती है।