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जब बेबी पेट में कम या ज्यादा मूव करे तो यह कारण होते हैं?

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प्रेगनेंसी के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु की पहली हलचल को महसूस करना महिला के लिए रोमांचक के साथ बहुत ही भावुक समय हो सकता है। और यह प्रेगनेंसी के सबसे बेहतरीन अनुभवों में से एक होता है। गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास जैसे जैसे बढ़ता है वैसे वैसे गर्भ में शिशु की हलचल भी बढ़ने लगती है। जिसकी वजह से कई बार महिला को पेट में हलके दर्द का अनुभव भी हो सकता है।

ज्यादातर शिशु प्रेगनेंसी के पांचवें महीने के आस पास गर्भ में हलचल करना शुरू कर देते हैं। लेकिन कई बार गर्भ में महिला को शिशु की ज्यादा तो कई बार कम हलचल महसूस हो सकती है और ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको गर्भ में शिशु कम या ज्यादा हलचल क्यों करता है उसके बारे में बताने जा रहे हैं।

माँ के पेट में बच्चे के ज्यादा हलचल करने के कारण

रात के समय: पूरा दिन काम करते हुए महिला को शिशु की हलचल कई बार महसूस नहीं होती है लेकिन जब महिला रात को आराम से लेटती है या सोती है तो गर्भ में पल रहा शिशु ज्यादा मूव करता है। और महिला को शिशु की हलचल अच्छे से महसूस भी होती है। इसके अलावा जब कभी महिला आराम से बैठी भी होती है तो भी गर्भ में शिशु की हलचल ज्यादा महसूस होती है।

ज्यादा तेज आवाज़: गर्भ में पल रहे बच्चे के अंगो का विकास बढ़ने के साथ शिशु की सुनने की क्षमता भी बढ़ जाती है। ऐसे में जब कभी आप तेज आवाज़ में गाने सुनते हैं, अचानक से कोई चिल्लाता है, या आप किसी ऐसी जगह पर जाते हैं जहां शोर होता है, तो इसे सुनकर गर्भ में शिशु घबरा जाता है चौंक जाता है। जिसके कारण शिशु ज्यादा मूव करने लगता है। लेकिन महिला को ज्यादा तेज आवाज़ से दूर रहना चाहिए क्योंकि इसके कारण शिशु की सुनने की क्षमता पर नकारात्मक असर भी पड़ता है।

तापमान बदलने पर: यदि महिला कभी बहुत ज्यादा ठंडा पानी पीती है तो इसके कारण शरीर के अंदर का तापमान बदल जाता है और ऐसा होने की वजह से भी बच्चा ज्यादा मूव करने लगता है। इसीलिए शिशु की मूवमेंट महसूस न होने पर डॉक्टर ऐसा करने की सलाह भी देते हैं ताकि आपको बच्चे की हलचल महसूस हो सके।

गर्भ में शिशु से बातें करने पर: गर्भ में पल रहे बच्चे को यदि कभी महिला बोलकर कहानियां सुनाती है, म्यूजिक सुनाती है, बातें करती हैं, पेट पर हाथ फेरती है, आदि। तो भी बच्चा अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए ज्यादा मूव कर सकता है।

गर्भ में शिशु के कम मूव करने के कारण

शिशु का विकास: यदि गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास अच्छे से नहीं हो रहा है, बच्चे का वजन जरुरत से कम है तो गर्भ में शिशु की हलचल कम महसूस होती है या बच्चा गर्भ में कम मूव करता है।

ऑक्सीजन की कमी: गर्भ में शिशु तक यदि ऑक्सीजन या ब्लड अच्छे से नहीं पहुँचता है तो इस कारण भी गर्भ में शिशु कम हलचल कर सकता है।

डिलीवरी का समय पास आने पर: बच्चे के जन्म लेने का समय पास आने पर बच्चा अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आने लगता है। यानी की बच्चे का सिर नीचे की तरफ और पैर ऊपर की तरफ हो जाते हैं। जिसकी वजह से बच्चे की हलचल में आपको कमी महसूस हो सकती है।

शिशु को दिक्कत: यदि किसी कारण गर्भ में शिशु को कोई समस्या हो जाती है तो इस कारण भी बच्चा कम मूव करने लगता है।

तो यह है गर्भ में शिशु के ज्यादा या कम मूव करने के कारण, ऐसे में यदि आपको ऐसा महसूस हो तो बहुत ज्यादा समय हो गया है और शिशु मूव नहीं कर रहा है। तो आपको इसे अनदेखा न करते हुए तुरंत डॉक्टर से बात करनी चाहिए क्योंकि यह शिशु को होने वाली किसी दिक्कत का संकेत होता है।

Baby movement in Pregnancy

नवजात शिशु के हाथ पैर टेढ़े मेढ़े हैं? तो यह करें

प्रेगनेंसी के समय महिला अपना अच्छे से ध्यान रखती है क्योंकि जब महिला स्वस्थ रहती है तो इससे गर्भ में पल रहे बच्चे के बेहतर विकास में भी मदद मिलती है। साथ ही यदि बच्चे के विकास के लिए सभी जरुरी पोषक तत्व उसे मिलते हैं तो इससे बच्चे को जन्मदोष व् जन्म के समय होने वाली बीमारियों के खतरे से बचे रहने में भी मदद मिलती है।

लेकिन कुछ केस में बच्चे के जन्म लेने के बाद बच्चे के हाथ पैर टेढ़े मेढ़े से लगते हैं जिसकी वजह से नई माँ व् घर में अन्य सदस्य घबरा सकते हैं। लेकिन इसमें घबराने की कोई बात नहीं होती है। क्योंकि जन्म के बाद बच्चों को होने वाली इस परेशानी का इलाज हो सकता है। तो आइये अब इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

जन्म के समय बच्चे के हाथ पैर टेढ़े होने के कारण?

गर्भ में यदि शिशु को उसके विकास के लिए जरुरी पोषक तत्व नहीं मिलते हैं, गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की कमी होती है, महिला धूम्रपान व् अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करती है, यदि आपके घर में पहले भी किसी बच्चे को यह समस्या हुई है, आदि। तो इन कारणों की वजह से आपके होने वाले बच्चे के हाथ पैर टेढ़े मेढ़े हो सकते हैं।

कैसे होते हैं नवजात के टेढ़े मेढ़े हाथ पैर सीधे?

यदि जन्म के बाद आपको ऐसा लगता है की आपके होने वाले बच्चे के हाथ पैर सीधे नहीं हैं तो इसके बारे में सबसे पहले आपको डॉक्टर को बताना चाहिए। क्योंकि इसका सबसे सही इलाज डॉक्टर्स द्वारा ही किया जा सकता है। इस समस्या का इलाज हड्डी के डॉक्टर द्वारा किया जाता है क्योंकि हड्डियों के सही न होने के कारण आपको बच्चे के हाथ पैर टेढ़े मेढ़े महसूस हो सकते हैं।

उसके बाद डॉक्टर्स आपके बच्चे को चेक करते हैं और उसका इलाज प्लास्टर लगाने से होगा या बच्चे की सर्जरी करवानी पड़ेगी। इसके बारे में आपको डॉक्टर्स बता देते हैं। और सही ट्रीटमेंट मिलने के बाद आपका बच्चा धीरे धीरे ठीक होने लगता है।

लेकिन ध्यान रखें की बच्चे के जन्म के बाद जैसे ही आपको इस समस्या का पता चले वैसे ही आपको डॉक्टर से बात कर लेनी चाहिए। क्योंकि उस दौरान बच्चे की हड्डियां कोमल होती है जिससे उन्हें सही समय पर इलाज मिलने से वो जल्दी ठीक हो जाते हैं।

तो यह हैं बच्चे के जन्म के समय यदि हाथ पैर टेढ़े हैं तो उस समस्या से बचने के आसान उपाय, तो यदि आपके नवजात शिशु में भी आपको यदि उसके अंगों से जुडी कोई छोटी मोटी समस्या दिखाई दे रही है तो आप भी इस परेशानी का समय रहते इलाज करवा सकते हैं।

क्या सिजेरियन के बाद नोर्मल और नोर्मल के बाद सिजेरियन डिलीवरी हो सकती है?

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गर्भावस्था के दौरान हर महिला अपना अच्छे से ध्यान रखती है ताकि पूरी प्रेगनेंसी के दौरान महिला को दिक्कतें कम हो, बच्चे का विकास अच्छे से हो, किसी तरह की कॉम्प्लीकेशन्स नहीं आएं, डिलीवरी के समय कोई दिक्कत नहीं हो, आदि। और ज्यादातर गर्भवती महिला नोर्मल डिलीवरी के माध्यम से बच्चे को जन्म देना ही सही समझती हैं।

लेकिन कई बार प्रेगनेंसी में कॉम्प्लीकेशन्स होने के कारण, डिलीवरी के समय माँ या बच्चे से जुडी समस्या होने की वजह से सिजेरियन डिलीवरी करवानी पड़ती है। ऐसे में पहली बार यदि किसी महिला का नोर्मल प्रसव होता है या सिजेरियन प्रसव होता है तो दूसरी बार प्रेग्नेंट होने पर महिला की डिलीवरी उसी तरीके से होगी या अलग तरीके से होगी उसके बारे में आज हम इस आर्टिकल में आपको बताने जा रहे हैं।

सिजेरियन के बाद नोर्मल और नोर्मल के बाद सिजेरियन डिलीवरी हो सकती है या नहीं?

सबसे पहली बात तो महिला की डिलीवरी किस तरीके से होगी इसका फैसला महिला नहीं ले सकती है क्योंकि प्रसव के दौरान आपकी क्या कंडीशन है उसके अनुसार आपकी डिलीवरी होती है। इसके अलावा कुछ केस में डॉक्टर्स पहले से ही बता देते हैं की महिला की डिलीवरी सिजेरियन होगी।

ऐसे में जब महिला दूसरी बार गर्भधारण करती है तो ऐसा बिल्कुल भी जरुरी नहीं होता है की महिला की डिलीवरी वैसे ही होगी जैसे की पहले हुई थी। हाँ, कुछ केस में ऐसा हो सकता है लेकिन यह भी पूरी तरह से प्रेग्नेंट महिला के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। इसके साथ यह भी हो सकता है की महिला की यदि पहले डिलीवरी नोर्मल हुई थी तो दूसरी बार सिजेरियन हो सकती है या इसका उल्टा भी हो सकता है।

ऐसे में महिला डिलीवरी का होना महिला के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। ऐसे में ऐसा हो सकता है की महिला की यदि पहली डिलीवरी नोर्मल हुई थी तो दूसरी सिजेरियन हो सकती है या पहली डिलीवरी सिजेरियन हुई थी तो दूसरी नोर्मल हो सकती है। लेकिन यदि पहली दो डिलीवरी महिला की सिजेरियन होती है तो महिला की तीसरी डिलीवरी भी सिजेरियन होने के चांस होते हैं।

तो यह है सिजेरियन के बाद नोर्मल और नोर्मल के बाद सिजेरियन डिलीवरी हो सकती है या नहीं उससे जुड़े कुछ टिप्स, यदि आपके दिमाग में भी यह सवाल चल रहा है तो आप भी इसका जवाब इस आर्टिकल की मदद से जान सकते हैं। इसीलिए महिला को प्रेगनेंसी के दौरान केवल अपना अच्छे से ध्यान रखना चाहिए ताकि महिला और बच्चे को कोई परेशानी नहीं हो साथ ही डिलीवरी को लेकर महिला को तनाव में नहीं आना चाहिए।

आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान क्या खाने से बच्चा हेल्दी होगा?

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हर गर्भवती महिला यही चाहती है की उसके गर्भ में पल रहे शिशु का विकास अच्छे से हो और उसका होने वाला शिशु स्वस्थ व् हष्ट पुष्ट हो। और जब महिला ने आईवीएफ ट्रीटमेंट के जरिये गर्भधारण किया हो तो महिला गर्भ में बच्चे के विकास को लेकर ज्यादा परेशान होती है। साथ ही महिला अपने खान पान व् अन्य छोटी छोटी चीजों का ध्यान रखती है।

जिससे उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास अच्छे से हो और बच्चे को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं हो। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों के बारे में बताने जा रहे हैं जो आपके गर्भ में पल रहे शिशु को हेल्दी रखने में मदद करते हैं खासकर आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान इन चीजों का सेवन करने से आपका बच्चा हेल्दी होगा।

दालें व् फलियां

गर्भवती महिला को दालों का भरपूर सेवन करना चाहिए क्योंकि यह प्रोटीन का बेहतरीन स्त्रोत होती है। जो गर्भ में पल रहे शिशु के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास में मदद करती है। साथ ही दालों में अन्य पोषक तत्व भी भरपूर मात्रा में विद्यमान होते हैं जो शिशु के बेहतर विकास में मदद करते हैं।

डेयरी प्रोडक्ट्स

दूध, दही, पनीर, छाछ आदि का सेवन भी प्रेग्नेंट महिला को भरपूर करना चाहिए। क्योंकि यह कैल्शियम का बेहतरीन स्त्रोत होते हैं। जो शिशु की हड्डियों व् दांतों के बेहतर विकास में मदद करते हैं।

आयरन और फोलिक एसिड युक्त डाइट

आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान गर्भवती महिला को आयरन व् फोलिक एसिड से भरपूर डाइट भी लेनी चाहिए। क्योंकि यदि प्रेग्नेंट महिला के शरीर में आयरन की कमी होती है या फोलिक एसिड की कमी होती है तो इससे शिशु का विकास प्रभावित होने के साथ शिशु को जन्मदोष होने का खतरा भी रहता है। और आयरन व् फोलिक एसिड की कमी को पूरा करने के लिए महिला को हरी सब्जियां, चुकंदर, गाजर, ब्रोकली, संतरे, आंवला आदि का भरपूर सेवन करना चाहिए।

ड्राई फ्रूट्स

बादाम, अखरोट व् अन्य ड्राई फ्रूट्स का सेवन भी सिमित मात्रा में महिला को जरूर करना चाहिए। क्योंकि ड्राई फ्रूट्स पोषक तत्वों की खान होते हैं जो बच्चे के बेहतर विकास में मदद करते हैं।

फल

सब्जियों के साथ फलों में भी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं ऐसे में महिला को रोजाना किसी न किसी फल का सेवन जरूर करना चाहिए। ताकि शिशु के विकास के लिए सभी जरुरी पोषक तत्व शिशु को मिल सके।

तरल पदार्थ

प्रेग्नेंट महिला को तरल पदार्थों का भी भरपूर सेवन करना चाहिए। ताकि गर्भाशय में एमनियोटिक फ्लूड की मात्रा सही बनी रहे जिससे बच्चे के बेहतर विकास में मदद मिल सके। साथ ही गर्भवती महिला की परेशानियां भी कम हो सकें।

अंडा व् नॉन वेज

यदि गर्भवती महिला अंडे व् नॉन वेज का सेवन कर लेती है तो प्रेगनेंसी के दौरान महिला को इनका सेवन भी करना चाहिए। क्योंकि इनमे पोषक तत्वों की अधिकता होती है जो शिशु के शारीरिक के साथ मानसिक विकास में भी मदद करते हैं।

तो यह हैं कुछ खाद्य पदार्थ जिनका सेवन आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान करने से आपका बच्चा हेल्दी होता है। यदि आप भी आईवीएफ की मदद से माँ बनने जा रही हैं तो आपको भी अपनी प्रेगनेंसी के दौरान इन चीजों का सेवन करना चाहिए ताकि आपका बच्चा भी हेल्दी और स्वस्थ हो।

प्रेगनेंसी में विटामिन-ए क्यों जरुरी होता है और इसके क्या क्या फायदे होते हैं?

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गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला के स्वस्थ रहने के लिए और गर्भ में बच्चे के बेहतर शारीरिक व् मानसिक विकास के लिए महिला को खान पान अच्छे से ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। जैसे की महिला को कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन, विटामिन्स, पोटैशियम, फाइबर, एंटी ऑक्सीडेंट्स व् अन्य पोषक तत्वों से युक्त डाइट लेने की सलाह दी जाती है। इन सभी पोषक तत्वों के अपने अलग अलग फायदे होते हैं जो महिला और बच्चे दोनों को मिलते हैं।

जैसे की कैल्शियम से हड्डियों व् दांतों को फायदा मिलता है, प्रोटीन से मांसपेशियों को फायदा मिलता है, फाइबर पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद होता है, आदि। वैसे ही प्रेगनेंसी के दौरान महिला को विटामिन्स लेने की सलाह भी दी जाती है। आज इस आर्टिकल में हम आपसे प्रेगनेंसी के दौरान विटामिन ए के सेवन के बारे में बात करने जा रहे हैं की आखिर प्रेगनेंसी के दौरान विटामिन ए क्यों जरुरी हैं।

गर्भावस्था के दौरान विटामिन ए क्यों है जरुरी?

प्रेगनेंसी के दौरान विटामिन ए का सेवन करने से गर्भवती महिला की सेहत को फायदा मिलने के साथ गर्भ में शिशु के बेहतर विकास होने में भी मदद मिलती है। जैसे की गर्भ में पल रहे शिशु की आँखों, स्किन, हड्डियों, दांतों, दिल, फेफड़ें, रीढ़ की हड्डी, सांस लेने की नलिका के बेहतर विकास में मदद मिलती है। और यदि विटामिन ए भरपूर मात्रा में शिशु को नहीं मिल पाता है तो विटामिन ए की कमी के कारण गर्भ में शिशु का विकास अच्छे से नहीं हो पाता है।

विटामिन ए युक्त खाद्य पदार्थ कौन से होते हैं?

गाजर, शकरकंदी, संतरे, पालक, सीताफल, मछली, रंग बिरंगी शिमला मिर्च, ब्रोकली आदि खाद्य पदार्थ विटामिन ए का बेहतरीन स्त्रोत होते हैं। साथ ही इन सभी का सेवन गर्भवती महिला और बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद भी होता है।

प्रेगनेंसी में विटामिन ए लेने के फायदे

गर्भावस्था के दौरान यदि महिला विटामिन ए युक्त डाइट लेती है तो विटामिओं ए युक्त डाइट लेने से महिला को बहुत से फायदे मिलते हैं साथ ही बच्चे के लिए भी यह फायदेमंद होता है। तो आइये अब जानते हैं की विटामिन ए का सेवन करने से कौन-कौन से फायदे मिलते हैं।

आँखों के लिए है फायदेमंद

विटामिन ए का सेवन करने से आँखों की दृष्टि में सुधार होता है। ऐसे में गर्भवती महिला यदि विटामिन ए युक्त डाइट लेती है तो इससे प्रेग्नेंट महिला को फायदा मिलने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु की आँखों का बेहतर विकास होने में भी मदद मिलती है।

इम्युनिटी बढ़ती है

गर्भावस्था के दौरान बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण महिला की इम्युनिटी कमजोर पड़ जाती है। ऐसे में महिला को संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है। लेकिन यदि महिला विटामिन ए युक्त डाइट लेती है तो इससे संक्रमण का खतरा कम होता है। क्योंकि विटामिन ए युक्त डाइट महिला की इम्युनिटी को बढ़ाने में मदद करता है।

हड्डियों के लिए है फायदेमंद

कैल्शियम, विटामिन डी के साथ विटामिन ए भी हड्डियों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। ऐसे में यदि प्रेग्नेंट महिला विटामिन ए युक्त डाइट लेती है तो इससे गर्भवती महिला की हड्डियों को मजबूती मिलने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु की हड्डियों के बेहतर विकास में भी मदद मिलती है।

स्किन के लिए है फायदेमंद

प्रेगनेंसी के दौरान कुछ महिलाओं को स्किन से जुडी समस्या से दाग धब्बे, मुहांसे, झाइयां, आदि हो जाते हैं। ऐसे में यदि महिला विटामिन ए युक्त डाइट लेती है तो इससे महिला की स्किन बेहतर रहती है साथ ही स्किन से जुडी समस्याओं से महिला को बचे रहने में मदद मिलती है।

बच्चे का विकास होता है बेहतर

विटामिन ए युक्त डाइट लेने से गर्भ में पल रहे शिशु का विकास बेहतर होने में भी मदद मिलती है। इससे गर्भ में पल रहे बच्चे के अंग अच्छे से विकसित होते हैं।

तो यह हैं प्रेगनेंसी में विटामिन ए का सेवन करने से जुडी जानकारी, यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी विटामिन ए युक्त डाइट लेनी चाहिए। ताकि आपको और आपके होने वाले बच्चे को स्वस्थ रहने में मदद मिल सकें।

Benefits of Vitamin A in pregnancy

आईवीएफ ट्रीटमेंट से पहले क्या करें क्या नहीं करें?

कई बार बहुत मुश्किलों के बाद भी कपल्स को माँ बाप बनने का सुख नहीं मिल पाता है। ऐसे में मेडिकल द्वारा दी गई सुविधा का इस्तेमाल करके कपल्स अपनी इस परेशानी का समाधान कर सकते हैं। लेकिन इस ट्रीटमेंट के फायदे के लिए महिला को बहुत सी बातों का ध्यान रखना पड़ता है।

जैसे की महिला को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए, किन खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए। और किन खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए, आदि। तो आज इस आर्टिकल में हम आईवीएफ ट्रीटमेंट से पहले महिला को क्या करना चाहिए और क्या- क्या नहीं करना चाहिए इसके बारे में बताने जा रहे हैं।

क्या होता है IVF ट्रीटमेंट?

यदि कोई महिला गर्भधारण नहीं कर पा रही होती है तो उन महिलाओं को आईवीएफ ट्रीटमेंट करवाने की सलाह दी जाती है क्योंकि इसकी मदद से महिला को अपनी इच्छा को पूरी करने में मदद मिलती है। इस ट्रीटमेंट के दौरान महिला के अंडाशय में से अंडा निकालकर उसे पुरुष के स्पर्म के साथ निषेचित करके लैब में फर्टिलाइज़ किया जाता है। और यदि अंडा फर्टिलाइज़ हो जाता है तो उसके बाद महिला के गर्भ में इसे स्थापित कर दिया जाता है। और फिर एक नोर्मल बच्चे की तरह बच्चे का माँ के गर्भ में विकास शुरू हो जाता है।

IVF ट्रेंटमेंट से पहले क्या करें?

  • सही आईवीएफ सेन्टर चुने।
  • अपनी सभी जरुरी जांच करवाएं।
  • महिला का वजन यदि ज्यादा है या कम है तो उसे सही करें।
  • खान पान का अच्छे से ध्यान रखें और अपने खाने पीने का एक सही रूटीन बनाएं साथ ही खान पान में पोषक तत्वों से भरपूर चीजों को शामिल करें।
  • व्यायाम व् योगासन करें ताकि आपको स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।
  • तनाव से बिल्कुल दूर रहें और अपने आप को खुश रखें।
  • भरपूर नींद लें।
  • डॉक्टर ने जिन जिन दवाइयों का सेवन करने की सलाह दी है उन सभी दवाइयों का सेवन करें।

आईवीएफ ट्रीटमेंट से पहले क्या -क्या नहीं करें?

  • धूम्रपान नहीं करें और उस जगह पर जाने से भी बचें जहां कोई धूम्रपान कर रहा होता है।
  • शराब व् अन्य किसी भी तरह के नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करें।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी तरह की दवाई का सेवन नहीं करें।
  • कैफीन युक्त पदार्थों के सेवन से बचें।
  • केमिकल युक्त चीजों का सेवन नहीं करें।
  • अपनी इच्छाओं को बिल्कुल नहीं मारें बल्कि जो करने का मन करें वहीँ करें लेकिन वो काम नहीं करें जिससे आपकी सेहत को कोई समस्या हो।

तो यह हैं कुछ काम जो आईवीएफ ट्रीटमेंट से पहले महिलाओं को करने चाहिए और जो काम नहीं करने चाहिए। यदि महिला इन सभी बातों का ध्यान रखती है तो इससे ट्रीटमेंट के सक्सेस रेट को बढ़ाने में मदद मिलती है और आपके मन की इच्छा जल्द से जल्द पूरी होती है।

Do’s and Don’ts during IVF treatment

प्रेगनेंसी के नौवें महीने में हाथों पैरों और मुँह पर सूजन होने के कारण और उपाय

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गर्भावस्था के दौरान महिला को बहुत सी शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। जिसमे से एक समस्या होती है सूजन की समस्या, और इस समस्या का होना प्रेगनेंसी के दौरान आम बात होती है। प्रेगनेंसी की तीसरी तिमाही में महिला को इस परेशानी का सामना अधिक करना पड़ सकता है।

अधिकतर गर्भवती महिलाओं को प्रेगनेंसी के समय पैरों में सूजन की समस्या होती है। जबकि कुछ महिलाओं को हाथों व् मुँह पर भी सूजन की समस्या हो सकती है। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम विस्तार से जानते हैं की सूजन की समस्या होने के क्या कारण होते हैं, और किस तरह महिला इस परेशानी से निजात पा सकती है।

गर्भावस्था में सूजन होने के कारण

प्रेगनेंसी के दौरान पैरों में सूजन की समस्या होने के बहुत से कारण होते हैं। और कुछ महिलाओं को हाथों और मुँह पर भी थोड़ी बहुत सूजन महसूस हो सकती है। पैरों में सूजन का होना जहां सामान्य होता है वहीँ मुँह और हाथों पर सूजन का बढ़ना खतरे का संकेत होता है। ऐसे में गर्भवती महिला हाथों और मुँह पर सूजन बढ़ने पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। इसके अलावा सूजन के क्या क्या कारण हो सकते हैं इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

  • वजन बढ़ने के कारण सिर से पैरों तक ब्लड फ्लो अच्छे से नहीं हो पाता है जिस वजह से महिला को सूजन की समस्या हो सकती है।
  • यदि महिला सारा दिन आराम ही करती है किसी तरह की एक्टिविटी नहीं करती है तो इस कारण बहुत देर तक एक ही मुद्रा में बैठने या लेटे रहने के कारण भी महिला को यह समस्या हो सकती है।
  • प्रेगनेंसी के दौरान नमक का अधिक सेवन करने के कारण भी महिला को इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
  • शरीर में पानी की कमी का होना भी सूजन की समस्या को बढ़ाता है।
  • गर्भवती महिला यदि बहुत देर तक एक ही जगह पर खड़ी रहती है, जरुरत से ज्यादा शारीरिक श्रम करती है तो इस कारण थकावट व् बॉडी के निचले हिस्से पर अधिक दबाव पड़ने के कारण महिला को यह दिक्कत हो सकती है।
  • कैफीन युक्त पदार्थ जैसे की चॉकलेट, चाय, कॉफ़ी का सेवन अधिक करने के कारण भी महिला को यह समस्या हो सकती है।
  • गर्भवती महिला के शरीर में प्रोटीन व् खून की कमी का होना भी इस समस्या का कारण होता है।
  • बॉडी में हार्मोनल उतार चढ़ाव होने के कारण भी महिला को इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
  • यदि प्रेग्नेंट महिला किसी शारीरिक बीमारी जैसे की थायरॉयड, लिवर सम्बन्धी परेशानी आदि से ग्रसित हो गई तो महिला को पैरों के साथ हाथों मुँह आदि पर भी सूजन महसूस हो सकती है।

प्रेगनेंसी में होने वाली सूजन की समस्या से बचाव के उपाय

गर्भावस्था के दौरान सूजन की समस्या से बचाव के लिए महिला कुछ घरेलू नुस्खों को ट्राई कर सकती है। जिससे गर्भवती महिला को इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिलती है। जैसे की:

पोषक तत्वों से भरपूर डाइट

गर्भवती महिला को पोटैशियम, प्रोटीन, आयरन, मैग्नीशियम व् अन्य पोषक तत्वों से भरपूर डाइट लेनी चाहिए। जैसे की महिला हरी सब्जियों, रसदार फलों, अनार, सेब, गाजर, निम्बू, दही, बीन्स, दालें, आदि का सेवन कर सकती है। इनका सेवन करने से महिला के शरीर में वो सभी पोषक तत्व भरपूर रहते हैं जो महिला को इस परेशानी से बचे रहने में मदद करते हैं।

थोड़ा एक्टिव रहें

गर्भवती महिला को थोड़ा एक्टिव रहना चाहिए जैसे की दिन में थोड़ी देर चलना फिरना चाहिए, सारा दिन सोते नहीं रहना चाहिए, थोड़ी देर व्यायाम करना चाहिए, योगासन करना चाहिए, स्ट्रेचिंग करनी चाहिए, आदि। ऐसा करने से शरीर में ब्लड फ्लो अच्छे से होता है जिससे महिला को इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिलती है। लेकिन ध्यान रखें की जरुरत से ज्यादा भी शरीर को न थकाएं कहीं आपकी परेशानी कम होने की जगह बढ़ जाएँ।

मालिश

हाथों पैरों की गुनगुने तेल से रोजाना रात को सोने से पहले मसाज करें इससे नसों को आराम मिलेगा, ब्लड फ्लो अच्छे से होगा जिससे आपको सूजन की समस्या से राहत मिलेगी।

सिकाई

गर्म पानी में नमक डालकर पैरों की सिकाई करें हाथों की सिकाई करें। ऐसा करने से भी आपको राहत महसूस होगी। और आपको इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिलेगी।

पोजीशन का ध्यान रखें

सूजन की समस्या से बचाव के लिए उठते, बैठते सोते समय अपनी पोजीशन का ध्यान रखें। क्योंकि बहुत देर तक एक ही पोजीशन में रहने के कारण आपको यह दिक्कत हो सकती है। ऐसे में थोड़ी थोड़ी देर में अपनी पोजीशन बदलते रहें जिससे आपको इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सके।

नमक का सेवन

सूजन की समस्या से बचने के लिए प्रेगनेंसी के दौरान नमक का सेवन संतुलित मात्रा में ही करें। क्योंकि ज्यादा सेवन करने से आपकी परेशानी बढ़ सकती है लेकिन बहुत कम नमक का सेवन भी नहीं करें क्योंकि इससे भी आपकी परेशानी बढ़ सकती है। ऐसे में जितनी जरुरत है उतना ही नमक का सेवन करें।

कैफीन का सेवन

चाय, कॉफ़ी, चॉकलेट व् अन्य खाद्य पदार्थ जिनमे कैफीन की अधिकता होती है। उनका सेवन भी कम ही करें क्योंकि कैफीन का सेवन कम करने से आपको इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिलती है।

पैरों की चप्पल जूते का ध्यान रखें

कई बार गलत तरीके के चप्पल जूते पहनने के कारण भी महिला को सूजन की दिक्कत होती है। ऐसे में इन परेशानियों से बचे रहने के लिए महिला को आरामदायक कपडे पहनने के साथ आरामदायक चप्पल जूते भी पहनने चाहिए।

सूजन की समस्या अधिक होने पर डॉक्टर से कब मिलें?

यदि पैरों के साथ महिला को हाथों, मुँह पर सूजन अधिक दिखाई दें, सूजन के साथ दर्द भी महसूस हो, लालिमा नज़र आएं, खुजली महसूस हो, आदि। तो ऐसे किसी भी लक्षण के महसूस होने पर महिला को जल्द से जल्द डॉक्टर से मिलना चाहिए।

तो यह हैं प्रेगनेंसी के दौरान सूजन की समस्या होने के कारण व् इस परेशानी से बचे रहने के कुछ असरदार उपाय। तो यदि आप भी प्रेगनेंसी के दौरान इस परेशानी का सामना कर रही है तो आप भी इन टिप्स को ट्राई कर सकती है ताकि आपको इस परेशानी से बचे रहने में मदद मिल सके।

Swollen feet hand and mouth problem during pregnancy

कुछ बच्चों को गर्भ में ही हो जाती है दिल की बीमारी यह कारण होते हैं?

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गर्भावस्था के दौरान पेट में पल रहे बच्चे का विकास पूरी तरह से अपनी माँ पर ही निर्भर करता है। इसीलिए प्रेगनेंसी की शुरुआत से लेकर आखिर तक महिला को अपना ध्यान अच्छे से रखने की सलाह दी जाती है। ऐसे में यदि महिला किसी तरह की लापरवाही करती है, गलत खान पान का सेवन करती है या सेहत के प्रति थोड़ी भी लापरवाही बरतती है।

तो इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है और इसकी वजह से शिशु को जन्मदोष होने का खतरा रहता है साथ ही गर्भ में भी बच्चे को शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। आज इस आर्टिकल में हम आपको गर्भ में बच्चे को दिल से जुडी बीमारी क्यों हो जाती है इसके बारे में बताने जा रहे हैं।

कैसे पता चलता है की पेट में बच्चे को है दिल की बीमारी?

प्रेगनेंसी के समय जब अल्ट्रासॉउन्ड होता है तो महिला को शिशु के शारीरिक विकास व् अंगों के विकास के बारे में बताया जाता है। और शारीरिक अंगों में दिल का विकास सबसे पहले हो जाता है साथ ही शिशु के दिल की धड़कन भी सबसे पहले डॉक्टर द्वारा आपको सुनाई जाती है। उसके बाद जब शिशु के अंगों के विकास को जानने के लिए अल्ट्रासॉउन्ड करते हैं।

तो उस दौरान यदि शिशु के विकास में कोई भी कमी होती है तो उसके बारे में आपको बताया जाता है। इसके अलावा जब डॉक्टर बच्चे के दिल की धड़कन की जांच करते हैं उस दौरान भी यदि शिशु की धड़कन अच्छे से महसूस नहीं होती है तो भी डॉक्टर दिल के विकास के लिए कुछ टेस्ट करवाते हैं जिससे बच्चे के दिल के विकास की पूरी जानकारी मिलती है।

बच्चे को पेट में दिल की बीमारी होने के कारण

गर्भ में शिशु को दिल की बिमारी होने के कई कारण होते हैं और इस वजह के कारण शिशु के दिल तक ब्लड फ्लो भी अच्छे से नहीं हो पाता है। तो आइये अब जानते हैं की गर्भ में शिशु को दिल की बीमारी होने के क्या कारण होते हैं।

नशीले पदार्थों का सेवन

गर्भावस्था के समय महिला को नशीले पदार्थों जैसे की धूम्रपान, शराब, व् अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करने की सलाह दी जाती है साथ ही ऐसी जगह पर न जाने की सलाह भी दी जाती है जहां पर इन चीजों का सेवन हो रहा होता है। लेकिन यदि महिला इन चीजों का सेवन करती है या ऐसी जगह पर जाती है जहां लोग धूम्रपान कर रहे होते हैं।

तो इनका बुरा असर न केवल गर्भ में पल रहे बच्चे के शारीरिक व् मानसिक विकास पर पड़ता है बल्कि इससे शिशु के अंग भी अच्छे से विकसित नहीं हो पाते हैं। और कुछ बच्चे इसके कारण गर्भ में ही दिल से जुडी बीमारी का शिकार भी हो जाते हैं।

अनुवांशिक कारण

यदि आपके परिवार में आपको या अन्य किसी सदस्य को या फिर आपके पहले बच्चे को भी पैदा होने से पहले यह समस्या थी। तो भी आपको इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

दवाइयों का सेवन

प्रेगनेंसी के समय किसी गलत दवाई का सेवन, आपको होने वाली किसी बीमारी की दवाइयों के सेवन के साइड इफ़ेक्ट के कारण भी गर्भ में शिशु पर बुरा असर पड़ता है। जिसकी वजह से पेट में बच्चे को दिल से जुडी बीमारी होने का खतरा भी होता है।

वायरल इन्फेक्शन

प्रेगनेंसी की पहली तिमाही में दिल का विकास हो जाता है और यदि इस दौरान महिला को वायरल इन्फेक्शन या अन्य कोई इन्फेक्शन हो जाता है। तो इसका असर बच्चे के शुरूआती विकास पर पड़ सकता है। जिसकी वजह से आपके होने वाले शिशु को इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

डिप्रेशन

प्रेगनेंसी की शुरुआत से ही यदि कोई महिला डिप्रेशन का शिकार होती है तो इसकी वजह से भी गर्भ में शिशु का शुरूआती विकास प्रभावित हो सकता है। जिसके कारण बच्चे को गर्भ में ही दिल से जुडी बीमारी के होने का खतरा रहता है।

बच्चे के जन्म के बाद शिशु को दिल को बीमारी होने पर यह लक्षण होते हैं महसूस

यदि आपकी डिलीवरी हो गई है और आपके बच्चे को दिल की बीमारी है। तो आपके बच्चे में आपको कुछ लक्षण महसूस होते हैं जिन्हे आपको अनदेखा न करते हुए डॉक्टर से मिलना चाहिए। तो आइये अब जानते हैं की वो लक्षण कौन से हैं।

  • सांस लेने में दिक्कत।
  • जन्म के समय वजन में कमी।
  • बच्चे के होंठ, हाथ, पैर, नाख़ून, स्किन आदि में नीलापन होना।
  • शिशु का अच्छे से माँ का दूध नहीं पीना।
  • बच्चे का विकास धीमा होना आदि।

तो यह है गर्भ में शिशु को दिल की बीमारी होने के कारण, ऐसे में गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान की जाने वाली इन गलतियों से बचना चाहिए। ताकि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में कोई भी कमी नहीं आये। और गर्भ में शिशु का विकास अच्छे से हो सके। इसके अलावा प्रेग्नेंट महिला को अपना अच्छे से ध्यान रखना चाहिए ताकि माँ और बच्चे दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

ठण्ड में प्रेग्नेंट होने के फायदे

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कुछ लोगो को सर्दी का मौसम पसंद होता है तो कुछ लोगो को गर्मी पसंद होती है लेकिन ज्यादातर लोगो को सर्दी का मौसम ही पसंद होता है। क्योंकि इस मौसम में खान पान और घूमने फिरने का मज़ा ही अलग होता है। और यदि आप प्रेगनेंसी को लेकर प्लानिंग कर रही है तो सर्दी के मौसम में आप बच्चे की प्लानिंग कर सकती है।

क्योंकि सर्दी के मौसम में प्रेग्नेंट महिला को उतनी परेशानियां नहीं होती है जितनी की गर्मी के मौसम में महिला को होती है। साथ ही ठण्ड के मौसम में गर्भधारण करने के महिला को बहुत से और भी फायदे मिलते हैं। तो आइये अब इस आर्टिकल में हम आपको सर्दियों में कंसीव करने के बेहतरीन फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं।

पाचन तंत्र होता है मजबूत

प्रेगनेंसी के दौरान महिला को पाचन सम्बन्धी परेशानियों का होना आम बात होती है। और गर्मी के मौसम में खाने को हज़म करने में महिला को ज्यादा परेशानी होती है जबकि सर्दियों के मौसम में महिला भारी भोजन को भी आसानी से पचा सकती है। क्योंकि सर्दियों में पाचन तंत्र मजबूत होता है। ऐसे में महिला खान पान को अच्छे से एन्जॉय कर सकती है।

फल और सब्जियां होती है भरपूर

सर्दियों के मौसम में मार्किट में हरी सब्जियां, गाजर, मटर, गोभी, शकरकंदी, रंग बिरंगे फल जैसे की संतरे किन्नू आदि भरपूर मात्रा में मिलते हैं। साथ ही यह सब मौसमी भी होते हैं। और यह सभी पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं जो गर्भवती महिला के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं और बच्चे के विकास के लिए भी फायदेमंद होते हैं। जिससे माँ और बच्चा स्वस्थ रहते हैं ऐसे में सर्दियों के मौसम में कंसीव करने से महिला को ज्यादा हेल्दी रहने में मदद मिलती है। फलों और सब्जियों के साथ महिला अंडा, चिकन, ड्राई फ्रूट्स जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन भी भरपूर कर सकती है।

गर्मी के कारण होने वाली परेशानियों से मिलता है निजात

ठण्ड के मौसम में प्रेग्नेंट होने से महिला को गर्मियों के मौसम में होने वाली परेशानियों जैसे की गर्मी, पसीना, बदबू, थकान, आलस, जैसी परेशानियों से बचे रहने में भी मदद मिलती है। और ठण्ड के मौसम में गर्भवती महिला के शरीर के तापमान को भी सामान्य रहने में मदद मिलती है जिससे महिला को बहुत सी परेशानियों से निजात मिलता है।

विटामिन डी

गर्मी के मौसम में धूप में बैठना बहुत नुकसानदायक हो सकता है जिसकी वजह से महिला के शरीर में विटामिन डी की कमी हो सकती है जो माँ व् बच्चे दोनों के लिए नुकसानदायक होता है। जबकि सर्दियों में महिला धूप में बैठ सकती है जिससे माँ और बच्चे दोनों को विटामिन डी के भरपूर फायदे मिलते हैं।

आराम मिलता है भरपूर

सर्दियों के मौसम में महिला को आराम भी भरपूर मिलता है और महिला अच्छे से आराम कर भी पाती है। क्योंकि ठण्ड में रजाई या कम्बल की गर्माहट से महिला को आराम महसूस होता है जिससे महिला को रिलैक्स महसूस होता है।

बेबी बंप छुपा सकती है

बहुत सी प्रेग्नेंट महिलाएं पेट के बाहर निकलने के कारण थोड़ी शर्म महसूस कर सकती है। लेकिन सर्दी के मौसम में महिलाएं कपड़ों में आसानी से अपने को छुपा भी सकती है और उन्हें शर्म का सामना भी नहीं करना पड़ता है।

जल्दी निकलता है समय

सर्दियों के दिन छोटे ही होते हैं ऐसे में पूरा दिन कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता है जिससे महिला को काफी अच्छा महसूस हो सकता है।

तो यह हैं कुछ बेहतरीन फायदे जो ठण्ड के मौसम में गर्भधारण करने से प्रेग्नेंट महिला को मिलते हैं। इसीलिए यदि आप भी माँ बनने की प्लानिंग कर रही है तो आप भी ठण्ड के मौसम के इन फायदों को उठा सकती है।

Benefits of conceiving in winters

नौवें महीने में क्या-क्या खाने से बच्चेदानी का मुँह खुलता है?

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प्रैग्गनैंसी का नौवां महीना महिला के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होने के साथ साथ नाजुक भी होता है। क्योंकि इस दौरान बच्चे का विकास लगभग पूरा हो चूका होता है साथ ही बच्चा जन्म लेने की सही पोजीशन में आने की कोशिश भी करने लगता है। यानी की बच्चे के सिर नीचे की तरफ होने लगता है जिससे पेल्विक एरिया पर दबाव पड़ता है और बच्चेदानी का मुँह खुलने लगता है। जिससे महिला की डिलीवरी नोर्मल होने के चांस भी बढ़ जाते हैं।

लेकिन यदि बच्चे का सिर नीचे की तरफ नहीं होता है तो इससे सिजेरियन डिलीवरी होने के चांस बढ़ जाते हैं। ऐसे में यदि प्रेग्नेंट महिला चाहे तो नोर्मल डिलीवरी के चांस बढ़ा सकती है। और इसके लिए महिला को अपनी डाइट में कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए जिससे बच्चेदानी का मुँह खुलने में मदद मिलती है। तो आइये अब उन खाद्य पदार्थों के बारे में जानते हैं जो महिला के नोर्मल डिलीवरी होने के चांस बढ़ाने में मदद करते हैं।

खजूर

खजूर की तासीर गर्म होती है ऐसे में प्रेगनेंसी के नौवें महीने में यदि महिला एक गिलास दूध में पांच छह खजूर उबालकर खाती है और फिर उस दूध को पीती है। तो इससे महिला के सामान्य प्रसव होने के चांस बढ़ते हैं क्योंकि इससे संकुचन बढ़ता है जिससे बच्चे बच्चेदानी का मुँह धीरे धीरे खुलता है। महिला चाहे तो खजूर को बिना उबालें भी दूध के साथ उनका सेवन कर सकती है।

छुहारे

चार या पांच छुहारे दूध में उबालकर प्रेगनेंसी के नौवें महीने में लगातार खाने से भी महिला की नोर्मल डिलीवरी होने की सम्भावना को बढ़ाने में मदद मिलती है। क्योंकि छुहारों की तासीर गर्म होती है जिससे संकुचन को उत्तेजित करने में मदद मिलती है।

तिल के लड्डू

नौवें महीने में गर्भवती महिला को घी में तिल के लड्डू बनाकर भी खाने चाहिए। क्योंकि तिल की तासीर गर्म होती है जिससे प्रसव को उत्तेजित करने में मदद मिलती है। तिल से बने लड्डू को रोजाना सुबह एक गिलास गर्म दूध के साथ प्रेग्नेंट महिला को खाना चाहिए।

अजवाइन के लड्डू

प्रेगनेंसी के नौवें महीने में महिला चाहे तो अजवाइन के लड्डू भी खा सकती है क्योंकि अजवाइन की तासीर गर्म होती है। अजवाइन के लड्डू खाने से पेल्विक एरिया की मांसपेशियां मजबूत होती है। साथ ही इससे महिला की प्रसव पीड़ा की शुरुआत करने में भी मदद मिलती है। जिससे बच्चेदानी का मुँह खुलने लगता है। और इन लड्डू को आप सुबह खाली पेट एक गिलास दूध के साथ खाएं।

गुनगुना पानी

प्रेगनेंसी के नौवें महीने में जितना हो सके महिला को गुनगुना पानी ही पीना चाहिए। क्योंकि गुनगुना पानी पीने से मांसपेशियों का तनाव कम होता है। जिससे लेबर पेन को जल्दी शुरू करने में मदद मिलती है।

अदरक वाला दूध

एक गिलास दूध में अदरक का एक टुकड़ा अच्छे से उबाल लें और उसके बाद उस दूध का सेवन करें। और ऐसा प्रेगनेंसी के नौवें महीने में रोजाना करें। अदरक की तासीर भी गर्म होती है जो प्रसव को उत्तेजित करने में मदद करती है। इसके अलावा महिला चाय में डालकर, सब्जियों में डालकर भी अदरक का सेवन कर सकती है।

अंडा

अंडे का सेवन करने से भी महिला को प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में मदद मिलती है। क्योंकि अंडे की तासीर भी गर्म होती है ऐसे में प्रेग्नेंट महिला को प्रेगनेंसी के नौवें महीने में रोजाना दो से तीन उबले हुए अण्डों का सेवन जरूर करना चाहिए।

ड्राई फ्रूट्स

बादाम, अंजीर, अखरोट, किशमिश, मुनक्का आदि का सेवन भी प्रेगनेंसी के नौवें महीने में महिला को जरूर करना चाहिए। और भिगोकर नहीं बल्कि वैसे ही इनका सेवन करना चाहिए। यदि महिला ड्राई फ्रूट्स का सेवन करती है तो इससे भी महिला की प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में मदद मिलती है। क्योंकि ड्राई फ्रूट्स की तासीर भी गर्म होती है।

तो यह हैं कुछ खाद्य पदार्थ जिनका सेवन प्रेगनेंसी के नौवें महीने में करने से बच्चेदानी का मुँह खुलने में मदद मिलती है। जिससे महिला का प्रसव सामान्य होने के चांस बढ़ते हैं। इसके अलावा महिला को अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन अच्छे से करने के साथ अपना अच्छे से ध्यान भी रखना चाहिए। और किसी भी तरह की लापरवाही नहीं करनी चाहिए। क्योंकि आपके द्वारा बरती गई थोड़ी सी लापरवाही प्रसव में आने वाली मुश्किलों को बढ़ा सकती है।

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