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प्रेगनेंसी के तीसरा और सातवां महीना सबसे खास क्यों होता है?

गर्भावस्था के पूरे नौ महीने गर्भवती महिला रोजाना किसी न किसी नए अनुभव से गुजरती है। इसके अलावा महिला को पूरे नौ महीने बॉडी में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण बहुत सी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। और ऐसे में महिला स्वस्थ रहे और शिशु को गर्भ में कोई दिक्कत न हो और उसका विकास अच्छे तरीके से हो इसके लिए महिला को प्रेगनेंसी के दौरान अपना अच्छे से ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। प्रेगनेंसी के पहले दिन से लेकर डिलीवरी होने तक गर्भवती महिला को हर कदम पर महिला को अपना दुगुना ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन प्रेगनेंसी का कुछ समय ऐसा भी होता हैं जो गर्भवती महिला के लिए थोड़ा परेशानी भरा होने के साथ खतरे से भरा हुआ भी होता है। क्योंकि उन दिनों में थोड़ी सी भी लापरवाही गर्भवती महिला के साथ शिशु के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकती है। तो आइये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी के कौन से महीने गर्भवती महिला के लिए सबसे खास होते हैं।

प्रेगनेंसी का तीसरा महीना

गर्भवस्था का तीसरा महीना बहुत ही खास होता है इसके कई कारण होते हैं आइये इन कारणों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

शारीरिक परेशानियां: प्रेगनेंसी के पहले तीन महीने में बॉडी में हार्मोनल बदलाव भी बहुत तेजी से होते हैं और गर्भ में शिशु के अंगो का विकास भी तेजी से हो रहा होता है। ऐसे में महिला को बहुत सी शारीरिक व् मानसिक रूप से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। और इन परेशानियों के होने पर भी यदि गर्भवती महिला अपना अच्छे से ख्याल नहीं रखती है तो इसके कारण महिला को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों के बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है।

शिशु के अंगो का विकास: प्रेगनेंसी के तीसरे महीने में गर्भ में शिशु के अंग बन रहे होते हैं शिशु का शुरूआती विकास हो रहा होता है। ऐसे में महिला यदि किसी तरह की कोई गलती करती है तो ऐसा करने से शिशु के अंगो की बनावट में दिक्कत आ सकती है, जिसके कारण शिशु के विकलांग होने के चांस हो सकते हैं।

गर्भपात: साथ ही प्रेगनेंसी के तीसरा महीना महिला के लिए इसीलिए भी बहुत खास होता है क्योंकि इस समय में गर्भपात होने का खतरा भी सबसे अधिक होता है, ऐसे में इस महीने में महिला को भरपूर आराम करने के साथ किसी भी तरह की लापरवाही न करने की सलाह दी जाती है।

प्रेगनेंसी के सातवां महीना

गर्भावस्था का सातवां महीना भी बहुत खास होता है क्योंकि इस दौरान महिला को बहुत से नए बदलाव महसूस होते हैं, साथ ही गर्भ में शिशु के विकास में कोई समस्या न हो इसके लिए भी महिला को अच्छे से ध्यान रखना पड़ता है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी का सातवां महीना महिला के लिए खास क्यों होता है।

वजन: प्रेगनेंसी के सातवें महीने में महिला का वजन भी पहले की अपेक्षा बढ़ जाता है, और वजन बढ़ने के कारण महिला को बहुत सी परेशानियों का सामना (जैसे उठने बैठने सोने में दिक्कत आदि) भी करना पड़ सकता है। ऐसे में यदि गर्भवती महिला अपना अच्छे से ध्यान नहीं रखती है तो महिला को अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

समय पूर्व प्रसव: शिशु का विकास भी इस दौरान तेजी से हो रहा होता है, और गर्भ में शिशु की मूवमेंट भी अधिक हो सकती है। जिसके कारण महिला को हल्के फुल्के पेट में दर्द, पेल्विक एरिया की मांसपेशियों पर जोर पड़ना जैसी परेशानियां हो सकती है। और ऐसे में यदि महिला किसी भी तरह की लापरवाही करती है तो इसके कारण समय पूर्व प्रसव जैसी परेशानी का सामना महिला को करना पड़ सकता है। जिसका बुरा असर गर्भ में शिशु पर भी पड़ता है क्योंकि जन्म के समय शिशु को वजन में कमी जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

पेट सम्बंधित समस्या: वजन बढ़ने के कारण महिला की पाचन क्रिया धीमी पड़ सकती है जिसके कारण महिला को पेट सम्बंधित समस्या जैसे की कब्ज़ जैसी परेशानी का सामना अधिक करना पड़ सकता है।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से गर्भावस्था के तीसरे और सातवें महीने में महिला को अपना ज्यादा ध्यान रखने की जरुरत होती है ताकि गर्भ में पल रहे शिशु और महिला को इसके कारण किसी भी तरह की परेशानी न हो। और महिला और शिशु दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिल सके।

इन खानों को दोबारा कभी भी गर्म न करें!

Foods You Should Never Reheat

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ये बात तो हम सभी बहुत अच्छी तरह जानते है की जो स्वाद और मजा गरमा-गर्म खाने में आता है वो और किसी चीज में नहीं आता। क्योंकि इस समय खाना बिलकुल फ्रेश और ताजा होता है। जिसका स्वाद भी ताजा होता है। लेकिन हम में से बहुत से लोग खाने को खाने से पूर्व उसे दोबारा गर्म करते है। जो आपके खाने को तो गर्म करता है लेकिन उसके स्वाद और पोषक तत्वों को मार देता है।

जी हां, शायद आपको यकीन न हो लेकिन वास्तव में दोबारा गर्म किया गया खाना आपके स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदेह होता है। खाने को दोबारा गर्म करने से उसमे मौजूद सभी पौष्टिक तत्व समाप्त हो जाते है और बचे हुए तत्व शरीर में बीमारी का काम करते है। ऐसा सभी खाद्य पदार्थों में नहीं होता बल्कि कुछ गिने चुने खाद्य पदार्थ है जिन्हे दोबारा गर्म नहीं करना चाहिए।

वैसे तो अधिकतर घरों में रात के खाने को दिन में गर्म करके खा लिया जाता है लेकिन ये कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ है जिन्हे गर्म-गर्म ताजा खाना ही अच्छा होता है। परन्तु सभी को इन खाद्य पदार्थों के बारे में पता नही होता इसलिए आज हम आपको उन सभी खाद्य पदार्थों के बारे में बताने जा रहे है जिन्हे दोबारा गर्म करके खाना सेहत और स्वास्थ्य दोनों के लिए अच्छा नहीं।

इन खाद्य पदार्थों को दोबारा गर्म करने नहीं खाना चाहिए :-

1. मशरुम :

मशरुम आपके किसी भी खाने को एक नया जायका देने का काम करता है। और हम में से बहुत लोग इसे अगले दिन के लिए भी बचा कर रख लेते है, जबकि ये आपके द्वारा की गयी सबसे बड़ी गलती होती है। मशरुम में प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है। और इसे दोबारा गर्म करने पर इसका प्रोटीन समाप्त होकर दूसरा तत्व बन जाता है जो पेट और पाचन से सम्बंधित समस्यायों का कारण बनता है। इसके अतिरिक्त मशरुम को बार-बार दोबारा गर्म करके खाने से हृदय संबंधी समस्याएं भी हो सकती है।

2. चिकन :

हो सकता है इसका नाम सुनकर आपको थोड़ा बुरा लगे। क्योंकि अधिकतर लोग पके हुए चिकन को 2 से 3 दिन तक इस्तेमाल करते है। ये भी सच है की चिकन में प्रोटीन की अच्छा मात्रा पाई जाती है परंतु इसे दोबारा गर्म करके खाने पर यह पाचन सम्बन्धित परेशानियों का कारण बन सकता है। तो अगर आप स्वस्थ रहना चाहते है, तो पके हुए चिकन को रीहीट करके न खाएं।

3. पालक और Celery :खाद्य पदार्थों को दोबारा गर्म करने नहीं खाना चाहिए

पालक और celery दोनों का ही प्रयोग आमतौर पर सूप में किया जाता है। और कोई भी सूप को ठंडा पीना तो पसंद नहीं करेगा। पालक और celery में नाइट्रेट की अच्छी मात्रा पाई जाती है। और जब आप इसे दोबारा गर्म करते है तो इसमें मौजूद नाइट्रेट के गुण निट्रीट बन जाते है। यह निट्रीट शरीर के लिए बहुत हानिकारक होता है। इसीलिए जिन खाद्य पदार्थों में शलगम, चुकंदर और गाजर का इस्तेमाल किया जाता है उन्हें कभी दोबारा गर्म करके नहीं खाना चाहिए।

4. अंडे :egg-1

बहुत ही कम लोग ऐसे है जिन्हे अंडे पसंद नहीं। ब्रेकफास्ट हो, लंच हो या डिनर, उबले हुए या अपनी करी में कोई भी इनसे बोर नहीं होता। और ये तो हम सभी जानते है की अंडो में भी प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है, इसलिए लोग अपनी डाइट में इसे अवश्य सम्मिलित करते है। लेकिन अगर आप, अंडे से बने किसी भी खाद्य पदार्थ को दोबारा गर्म करते है तो इसमें मौजूद स्वास्थ्य वर्धक तत्व समाप्त हो जाते है जिसके बाद अगर आप इसका सेवन करेंगे तो ये केवल आपको पाचन संबंधी समस्याएं देगा। इसलिए कोई भी डिश बनायें उसे तुरंत खाकर खत्म कर दें।

5. चावल :खाद्य पदार्थों को दोबारा गर्म करने नहीं खाना चाहिए

लगभग सभी लोग चावल को खाने से पहले अपने माइक्रोवेव में दोबारा गर्म करते है, क्योंकि उनका मानना है की ठंडे चावल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते है। जबकि ये धारणा भी बिलकुल गलत है। चावलों को हमेशा तभी समाप्त कर देना चाहिए जब इन्हे बनाया गया हो। माना जाता है बिना पके चावलों में बैक्टीरियल spores पाए जाते है जो फ़ूड पोइज़निंग का कारण बनते है। लेकिन जब आप पके हुए चावलों को फ्रिज में नहीं रखते और इन्हे गर्म करके कहते है तो ये और अधिक नुकसानदेह हो जाता है। तो अगर आप अपने पके हुए चावलों को स्टोर करना चाहते है तो, उन्हें हमेशा फ्रिज में रखें।

6. आलू :

रूम टेम्परेचर पर आलुओं को स्टोर करना न केवल आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अपितु सामान्य तौर पर होने वाली फ़ूड पोइज़निंग का भी एक कारण है। जी हां, अगर आप रूम टेम्परेचर में रखें आलुओं को दोबारा गर्म करके कहते है तो ये बहुत हानिकारक होता है। इसलिए इसे दोबारा गर्म करके नहीं खाना चाहिए।

7. तेल :

अखरोट, अवोकेडो, अंगूर के बीज और Hazelnut आदि से बने तेल को यदि आप गर्म करके खाने में प्रयोग करते है तो इसका स्वाद और स्मेल काफी बदल जाती है। क्योंकि इन सभी तेलों को बहुत मद्दीआंच पर पकाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। तो अगर आपको किसी भी चीज को दोबारा गर्म करके खाने के बाद कोई समस्या होती है तो आप डॉक्टर से बात कर सकते है।

अगर कोई विशेष समस्या है तो आयुर्वेदिक औषधियों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

सफ़ेद पानी (White Discharge) आने के ये कारण हो सकते हैं

सफ़ेद पानी महिलाओ को होने वाली एक आम समस्या होती है, परतु इसका ज्यादा मात्रा में होना इन्फेक्शन या किसी रोग के होने का संकेत से सकता है, और ज्यादातर महिलायें ऐसी होती है जिन्हे ये भी नहीं पता होता है, सफ़ेद पानी का कितना आना सामान्य है, और कितना असामन्य होता है, और महिलाएं इस बारे में किसी से शेयर भी नहीं करती है, जो की गलत होता है, क्योंकि अधिक मात्रा में सफ़ेद पानी का आना आपके हरिर में कमजोरी ये फिर किसी रोग को आमंत्रित कर सकता है।

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जिस तरह मासिक धरम के दौरान महिलाओ के प्राइवेट पार्ट से रक्त का स्त्राव होता है, उसी प्रकार आपके प्राइवेट पार्ट से वाइट डिस्चार्ज भी होता रहता है, और पीरियड्स से पहले या बाद में इसका होना एक सामन्य प्रक्रिया होती है, अण्डोत्सर्ग के समय भी आपके प्राइवेट पार्ट से सफ़ेद पानी का स्त्राव होता है, ताकि अंडे को तैरकर जाने में मदद मिल सकें, सफ़ेद पानी का आना तो एक आम बात होती है, परन्तु जब ये स्त्राव गाढ़े नीले, हरे, या पीले रंग का होता है तो ये असामन्य होता है, इसके कारण आपको सफ़ेद पानी से जुड़े रोग की परेशानी का अनुभव हो सकता है, तो आइये जानते है की सफ़ेद पानी आने के कौन कौन से कारण होते है।

सफ़ेद पानी आने के लक्षण:-

  • प्राइवेट पार्ट में अधिक खुजली का होना।
  • कमर व् पेट के निचले हिस्से में दर्द का अनुभव होना।
  • प्राइवेट पार्ट से गंध का आना।
  • शरीर में कमजोरी महसूस होने लगती है।
  • सर दर्द व् कमजोरी का अहसास होने लगता है।

सफ़ेद पानी आने के कारण:-

इन्फेक्शन होने के कारण:-

जब भी आपको प्राइवेट पार्ट में इन्फेक्शन हो जाता है, तो इन्फेक्शन के समय बैक्टेरिया का जमाव होने के कारण आपको सफ़ेद पानी आने लगता है, और ऐसे में कई बार ये ज्यादा मात्रा में भी आ जाता है, इसके लिए जरुरी होता है की आप अपने प्राइवेट पार्ट की समस्या का समाधान करें।

बार बार गर्भपात होने के कारण:-

जिन महिलाओ का एक से ज्यादा बार गर्भपात हो जाता है, उन महिलाओ को सफ़ेद पानी की समस्या ज्यादा रहती है, ऐसे में आप चाहे तो अपने डॉक्टर से राय ले सकते है।

रोगग्रस्त पुरुष के साथ सम्बन्ध बनाने से:-

यदि आप किसी भी रोगग्रस्त व्यक्ति से संपर्क बनाती है, तो इसके कारण भी आपका प्राइवेट पार्ट से जुडी परेशानी हो जाती है, जिसके कारण जब भी आप उसके संपर्क में आती है, तो आपको उसके बाद सफ़ेद पानी की समस्या हो जाती है।

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प्राइवेट पार्ट की साफ़ सफाई न रखने से:-

जो महिलाएं अपने प्राइवेट पार्ट की साफ़ सफाई का ध्यान नहीं रखती है, उनके उस हिस्से में बैक्टेरिया का जमाव अधिक होने लगता है, जिसके कारण आपको इन्फेक्शन की समस्या बढ़ जाती है, और साथ ही आपको सफ़ेद पानी की समस्या से परेशानी होना पड़ सकता है, इसीलिए महिलाओ को हमेशा अपने प्राइवेट पार्ट की साफ़ सफाई का ध्यान रखना चाहिए ताकि वहां के ph लेवल को सही रखने में मदद मिल सकें।

अश्लील बातें करने से:-

वाइट डिस्चार्ज का एक कारण और भी होता है, जब भी आप अश्लील बातें करते है या अश्लील वीडियो देखते है, तो इसके कारण भी आपके शरीर में हॉर्मोन प्रभावित होते है, जिसके कारण भी आपको सफ़ेद पानी आने लगता है, परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कारण आपकी से* क्स पावर पर बुरा प्रभाव पड़ता है, और इसके कारण आपको अपनी शादीशुदा जिंदगी में दिक्कत का सामना भी करना पड़ सकता है।

उत्तेजित कल्पनाओ के बारे में विचार करने पर:-

जब आप मन में ही सम्बन्ध बनाने के बारे में या ओरल सम्बन्ध बनाने के बारे में सोचते है, और अपने दिमाग में केवल वही बातें सोचते रहते हैं, तो इसके कारण आपके से* क्स हॉर्मोन बहुत बहुत अधिक उत्तेजित हो जाते है, जिसके कारण आपको सफ़ेद पानी आने लगता है।

सफ़ेद पानी की समस्या से बचने के टिप्स:-

  • प्राइवेट पार्ट को बोरिक एसिड या फिर फिटकरी युक्त पानी से धोने पर आपको इस समस्या से राहत मिलती है।
  • पेशाब करने के बाद और सम्बन्ध बनाने के बाद अच्छे से अपने प्राइवेट पार्ट को साफ करें।
  • बार बार गर्भपात करवाने से बचें, और सम्बन्ध बनाते समय सुरक्षा का इस्तेमाल करें।
  • यदि आपको सफ़ेद पानी की समस्या है तो इसके लिए आपको अपने डॉक्टर से भी बात करनी चाहिए, ताकि ये समस्या ज्यादा न बढे।
  • समबन्ध बनाने के दौरान सुरक्षा का इस्तेमाल करें, ताकि रोगाणु आपके प्राइवेट पार्ट में प्रवेश न करें।

सफ़ेद पानी की समस्या से बचने के आयुर्वेदिक उपाय:-

  • चावल की मांड पीने से आपको सफ़ेद पानी की समस्या से बचने में मदद मिलती है।
  • अदरक को पानी में डाल कर पानी में अच्छे से उबाल लें, कुछ दिनों तक दिन में दो समय इस पानी को छान कर इसका सेवन करें आपको फायदा मिलेगा।
  • मैथी के कुछ दाने पानी में भिगो कर रख दें, और रात भर के लिए छोड़ दें, सुबह उठ कर इस पानी को छान कर नियमित इसका सेवन करें, आपको कुछ ही दिनों में इसका असर दिखाई देने लगेगा।
  • मैथी के लडू खाने से भी आपको सफ़ेद पानी की समस्या से राहत मिलती है।
  • थोड़ी सी हल्दी और थोड़ा सा लहसुन को बराबर मात्रा में पीस कर अपने प्राइवेट पार्ट पर लगाएं ऐसा करने से भी आपको इस समस्या से राहत मिलती है।
  • नियमित कच्चे टमाटर का सेवन करने से भी आपको इस समस्या से राहत मिलती है।
  • दिन में दो बार प्याज़ का रस और शहद मिलाकर इसका सेवन करने से भी आपको इस समस्या से राहत मिलने में मदद मिलती है।

तो ये कुछ कारण है जिनके कारण आपको सफ़ेद पानी की समस्या हो जाती है, और साथ ही कुछ उपाय भी है जिनका इस्तेमाल करके आप इस समस्या से राहत भी पा सकते है, इसके अलावा जब भी आपको ऐसा लगे की आपको आपको सफ़ेद पानी की समस्या ज्यादा हो रही है, तो बिना शर्म के आपको इस बारे में डॉक्टर से बात करनी चाहिए, ताकि आपको किसी बीमारी का सामना न करना पड़ें।

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प्रेगनेंसी में ज्यादा थकान होने के क्या कारण होते हैं?

गर्भावस्था एक ऐसा समय होता है जहां गर्भवती महिला को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। और उन्ही परेशानियों में से एक आम समस्या होती है गर्भवती महिला को थकान का अनुभव होना। प्रेगनेंसी की खासकर पहली और तीसरी तिमाही में महिलायें इससे ज्यादा परेशान रहती है। और इसमें घबराने की कोई बात नहीं होती है क्योंकि ज्यादातर प्रेग्नेंट महिलाओं को इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन क्या आप जानते हैं की प्रेगनेंसी में थकान होने का कोई एक कारण नहीं होता है। बल्कि ऐसे बहुत से कारण होते हैं जिनकी वजह से प्रेग्नेंट महिला को थकान का अनुभव हो सकता है। तो आइये अब विस्तार से जानते हैं की प्रेगनेंसी में थकान होने के क्या क्या कारण होते हैं।

हार्मोनल बदलाव

  • गर्भावस्था के दौरान बॉडी में लगातार हार्मोनल बदलाव होते रहते हैं।
  • और इन हॉर्मोन के बदलाव के कारण बॉडी में प्रोजेस्ट्रोन हॉर्मोन का स्तर बढ़ सकता है।
  • जिसके कारण प्रेग्नेंट महिला को थकान जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

पोषक तत्वों की कमी

  • यदि प्रेग्नेंट महिला अपने खान पान में किसी तरह की लापरवाही करती है या अपने आहार को सही मात्रा में नहीं लेती है।
  • तो इसके कारण प्रेग्नेंट महिला के शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।
  • जिसके कारण प्रेग्नेंट महिला को थकान जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

वजन बढ़ना

  • प्रेगनेंसी के दौरान वजन बढ़ना आम बात होती है।
  • और वजन बढ़ने के कारण किसी काम को करने या उठने बैठने में ही महिला को ज्यादा थकावट का अहसास हो सकता है।

ज्यादा काम करना है वजह

  • घर के काम प्रेग्नेंट महिला प्रेगनेंसी के दौरान कर सकती है।
  • लेकिन प्रेग्नेंट महिला को उतने ही काम करने चाहिए जिससे महिला को थकावट का अनुभव न हो।
  • क्योंकि यदि महिला जरुरत से ज्यादा काम प्रेगनेंसी के दौरान करती है।
  • तो इससे भी गर्भवती महिला को थकावट का अनुभव हो सकता है।

प्रेगनेंसी में ज्यादा थकान होने का कारण है मॉर्निंग सिकनेस

  • प्रेगनेंसी के दौरान जो महिलाएं मॉर्निंग सिकनेस की समस्या से ज्यादा परेशान रहती है।
  • उन महिलाओं को भी प्रेगनेंसी के दौरान थकान का अधिक अनुभव हो सकता है।

खून की कमी

  • प्रेगनेंसी के दौरान प्रेग्नेंट महिला को आयरन युक्त आहार का भरपूर मात्रा में सेवन करने की सलाह दी जाती है।
  • क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान खून की कमी न केवल प्रेग्नेंट महिला की दिक्कतों को बढ़ा सकती है बल्कि इसके कारण शिशु के विकास में भी कमी आ सकती है।
  • साथ ही प्रेग्नेंट महिला के शरीर में खून की कमी होने के कारण ही महिला को थकावट व कमजोरी की समस्या प्रेगनेंसी के दौरान हो सकती है।

प्रेगनेंसी में ज्यादा थकान होने का कारण है मानसिक रूप से परेशानी

  • कुछ प्रेग्नेंट महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान बॉडी में होने वाले बदलाव के कारण मानसिक रूप से तनाव में आ जाती है।
  • और प्रेग्नेंट महिला का मानसिक रूप से परेशान होना भी गर्भवती महिला की थकान का कारण हो सकता है।

शारीरिक समस्याएँ

  • यदि प्रेग्नेंट महिला किसी शारीरिक समस्या से पीड़ित होती है।
  • जैसे की प्रेग्नेंट महिला ब्लड प्रैशर, शुगर, थायरॉयड आदि से ग्रसित होती है।
  • तो इन सब परेशानियों के कारण भी महिला को प्रेगनेंसी के दौरान अधिक तनाव का अनुभव हो सकता है।

नींद में कमी

  • प्रेग्नेंट महिला को नींद भरपूर मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।
  • क्योंकि नींद भरपूर लेने से गर्भवती महिला को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।
  • लेकिन यदि किसी कारण यदि प्रेग्नेंट महिला नींद में लापरवाही करती है तो इसके कारण गर्भवती महिला को थकान जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

प्रेगनेंसी में थकान से निजात पाने के टिप्स

  • खान पान का अच्छे से ध्यान रखें ताकि बॉडी में पोषक तत्वों की कमी न हो, क्योंकि बॉडी में पोषक तत्वों की मात्रा भरपूर होने से थकान का अनुभव कम होने में मदद मिलती है।
  • अपनी दिनचर्या बनाएं हर काम को करने का एक समय बनाएं।
  • पानी का भरपूर मात्रा में सेवन करें ताकि बॉडी को ऊर्जा से भरपूर रहने में मदद मिल सके।
  • थोड़ी देर व्यायाम व योगासन भी जरूर करें ताकि बॉडी में ब्लड फ्लो को बेहतर तरीके से होने में मदद मिल सके।
  • थकान से निजात के लिए अपने दिमाग को रिलैक्स रखें।
  • नींद को भरपूर लें।

तो यह हैं प्रेगनेंसी में थकान होने के कारण व इस समस्या से बचने के कुछ आसान टिप्स। तो यदि आप भी प्रेग्नेंट हैं तो आपको भी थकान को दूर करने के लिए इन टिप्स का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। ताकि आपको प्रेगनेंसी के दौरान फ्रेश व एक्टिव रहने में मदद मिल सके।

प्रेग्नेंट महिला को फ़ोन अपने पेट पर क्यों नहीं रखना चाहिए?

मोबाइल फ़ोन आजकल सभी लोगो की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है। और इस लिस्ट में महिला, पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग सभी शामिल हैं। खाना खाना चाहे आज के समय लोग भूल जाते हैं लेकिन अपने फ़ोन को कभी नहीं भूलते हैं। लेकिन शायद वो यह नहीं जानते हैं की फ़ोन की लत किसी नशे की लत से कम नहीं है।

जैसे नशा करने से सेहत को नुकसान होता है वैसे ही फ़ोन का अधिक इस्तेमाल करने से भी सेहत को नुकसान होता है। आज इस आर्टिकल में हम गर्भवती महिला द्वारा फ़ोन का इस्तेमाल करने व् पेट पर गर्भवती महिला के फ़ोन रखकर सोने से गर्भ में शिशु को क्या-क्या नुकसान होते हैं। इस बारे में बात करने जा रहे हैं।

गर्भावस्था के दौरान फ़ोन

मोबाइल फ़ोन एक ऐसी सुविधा है जिसका सही इस्तेमाल किया जाये तो यह गर्भवती महिला के लिए फायदेमंद होता है। क्योंकि गर्भवती महिला प्रेगनेंसी से जुडी जानकारी के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन यदि महिला फ़ोन का इस्तेमाल बहुत ज्यादा करती है या फ़ोन को पेट पर रखकर सो जाती है तो यह परेशानी का कारण होता है।

और इसके कारण महिला की सेहत पर ही नहीं बल्कि गर्भ में शिशु का विकास भी प्रभावित होता है। जिसका असर प्रसव के बाद शिशु में देखने को मिलता है। तो आइये अब जानते हैं की प्रेगनेंसी में फ़ोन के अधिक इस्तेमाल के कारण और पेट पर फ़ोन रखने के कारण क्या नुकसान होते हैं।

प्रेगनेंसी में फ़ोन का अधिक इस्तेमाल करने के कारण होने वाले नुकसान

गर्भवती महिला यदि फ़ोन का अधिक इस्तेमाल करती है तो इसके कारण महिला की आंखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही इसके कारण गर्भ में शिशु का मानसिक विकास भी प्रभावित होता है। क्योंकि फ़ोन का इस्तेमाल करते समय कई बार महिला कुछ ऐसी चीजें देखती है (जैसे की डरावनी चीजें, एक्सीडेंट से सम्बंधित चीजें, आदि) जो की महिला को नहीं देखनी चाहिए। और इसका असर जन्म के बाद शिशु की हरकतों व् व्यवहार में देखने को मिलता है।

गर्भावस्था में पेट पर फ़ोन रखकर सोने के नुकसान

गर्भवती महिला यदि पेट पर फ़ोन रखकर सोती है या शिशु को संगीत सुनाने के लिए पेट पर फ़ोन रखती है। तो इसकी वजह से मोबाइल फ़ोन में से निकलने वाली rays गर्भ में शिशु तक पहुँचती हैं। जिसके कारण शिशु के मानसिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है। और शिशु की सोचने समझने की क्षमता में कमी आ सकती है। ऐसे में महिला जब भी फ़ोन का इस्तेमाल करें तो पेट के आस पास महिला को फ़ोन नहीं रखना चाहिए।

तो यह हैं कुछ हानिकारक प्रभाव जो फ़ोन का ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण गर्भवती महिला व् बच्चे पर पड़ते हैं। ऐसे में गर्भवस्था के दौरान महिला को फोन का ज्यादा इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। यदि किसी से फ़ोन पर बात भी करनी हो तो फ़ोन को स्पीकर पर करके या हैंड फ्री का इस्तेमाल करके फ़ोन का इस्तेमाल करना चाहिए।

Why should not a pregnant woman keep the phone on her stomach

बेबी सबसे ज्यादा एक्टिव किस महीने में रहता है गर्भ में

गर्भावस्था के दौरान शिशु को महसूस करना यह एक सबसे खास अहसास होता है। अक्सर महिलाओं को यह जानने की बहुत उत्सुकता होती है के उनके गर्भ में पल रहे शिशु की मूवमेंट्स कब शुरू होगी जिससे वह जाने सके के उनका शिशु कितना एक्टिव है। गर्भवती महिला उसी अहसास को जीने के लिए गर्भावस्था के सारे दर्द और समस्याओं की भुला देती है।

ज्यादातर महिलाओं के लिए बेबी को पहली बार महसूस करना बहुत ही अनोखा अनुभव होता है। वैसे तो बेबी की मूवमेंट्स गर्भावस्था के दूसरे महीने के अंत में शुरू हो जाती है। पर यह मूवमेंट्स माँ को महसूस नहीं होती क्योंकि इस समय भ्रूण का साइज बहुत छोटा होता है। गर्भावस्था के छटे महीने से आपको अपने शिशु की मूवमेंट्स बहुत आराम से अनुभव होंगी। छटे महीने से गर्भवती महिला को अनुभव होगा के उनका बेबी उन्हें कई बार लात मारता है।

छटे माह का अनुभव

जैसे जैसे गर्भावस्था का समय निकलता जाता है वैसे वैसे भ्रूण का विकास होता है और वो दिन दूर चले जाते है जब आप अपने शिशु की  हलचल महसूस नहीं कर सकते। छटे माह की शुरुआत से बेबी की छोटी छोटी मूवमेंट्स अनुभव होने लगती है। कुछ महिलाओं को यह मूवमेंट्स छटे माह के शुरुआत में न अनुभव को इस माह के अंत में महसूस होती है। एक अध्ययन के अनुसार गर्भावस्था के छटे माह में शिशु 10 से 11 इंच लम्बा हो जाता है, इतने लम्बे शिशु की हलचल को आप आसानी से अनुभव कर सकते है। और यह मूवमेंट्स दिन में कई बार होती है।

जब शुरू शुरू में शिशु की हलचल शुरू होती है तो माँ उसे महसूस नहीं कर पाती लेकिन अब जब आप गर्भावस्था के छटे महीने पर पहुंच चुके है तो इस समय में आप अपने शिशु की हरकत को आराम से अनुभव कर सकेंगे। कभी कभी शिशु की यह हरकत एक तेज लात के रूप में आपको लगेगी और कभी आपको पेट पर खुश खिचांव सा महसूस होगा। जैसे जैसे दिन बीतेंगे वैसे वैसे गर्भवती महिला को अहसास होगा के दिन के कुछ ख़ास समय में शिशु ज्यादा एक्टिव है जैसे कभी महिला बैठी है तो, कुछ खाने के बाद या फिर महिला खुद कुछ एक्टीव हो कर काम कर रही है तब।

स्वागत करे इस हलचल का

हो सकता है जब गर्भ में शिशु कुछ मूवमेंट्स करता हो तो महिला के लिए असहनीय या आरामदायक ना हो। पर जब गर्भ में शिशु एक्टिव हो कर घूमता है तो इसका मतलब वह पूरी तरह स्वस्थ है। एक रिसर्च के अनुसार गर्भ में शिशु की हरकत को महसूस करने से माँ और शिशु का रिश्ता मजबूत बनता है।

मूवमेंट्स को गिनिए

ऊपर बताई गई सभी बाते छटे माह के सन्दर्भ में थी पर सातवां महीना शुरू होते ही बेबी की मूवमेंट्स गिनने के लिए तैयार हो जाइये। इस महीने में शिशु सबसे ज्यादा एक्टिव होता है। इसीलिए इस समय में बेबी की हलचल भी सबसे ज्यादा महसूस होती है। डॉक्टरों के अनुसार भी सातवें महीने में हर दो घंटे में कम से कम 10 मूवमेंट्स होनी चाहिए। इसीलिए यह एक बेहतर समय होता है जब माँ अपने शिशु के साथ एक बेहतर रिश्ता बना सकती है, अपने शिशु की हर हलचल को अनुभव करके। एक रिसर्च में अनुसार अगर इस समय में शिशु की मूवमेंट्स महसूस ना हो या फिर शिशु की हलचल घटने लगे तो वह खतरे की निशानी होती है। इसीलिए अपने शिशु की हर मूवमेंट को काउंट करे और अगर मूवमेंट कम लगे तो तुरंत अपने डॉक्टर से बाद करे।

शिशु की हलचल का फिर से धीमा होना

प्रेगनेंसी के दौरान सातवें महीने में शिशु की हलचल सबसे ज्यादा अनुभव होती है पर आपको यह जानकार हैरानी होगी की आठवें और नौवें महीने में शिशु की हलचल धीमी पड़ती जाती है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि अब शिशु पहले से और बड़ा हो चूका होता है और गर्भाशय में शिशु को कम जगह मिलती है जिस कारण उसे घूमने में और मूवमेंट्स करने में मुश्किल होने लगती है। पर फिर भी एक ही जगह पर रहकर शिशु की कुछ न कुछ मूवमेंट्स जरूर होंगी।

सातवें महीने की तरह हर दो घंटे में 10 मूवमेंट्स तो नहीं होंगी पर हर बार कुछ न कुछ खाने के बाद शिशु की हलचल जरूर महसूस होंगी। इस समय में भी शिशु की हर मूवमेंट्स का ध्यान रखना जरुरी होता है। क्योंकि इस समय में शिशु के पास कम जगह होती जिसके कारण उसकी मूवमेंट्स कम हो जाती है लेकिन फिर भी शिशु हलचल करने की कोशिश तो करता ही रहता है इन्ही कोशिशों में कई बार उसे कोई परेशानी भी हो सकती है। शिशु पूरी तरीके से स्वस्थ यह खाने के बाद शिशु की हलचल पर ही निर्भर करता है। अगर कुछ खाने के बाद भी आप अपने शिशु की मूवमेंट्स महसूस नहीं कर पा रहे है तो अपने डॉक्टर से जरूर सलाह लें।

शिशु को गर्भ में कब दिक्कत होती है और महिला को क्या करना चाहिए?

प्रेगनेंसी के दौरान गर्भ में शिशु का विकास पूरी तरह से अपनी माँ पर ही निर्भर करता है ऐसे में जितना अच्छे से प्रेग्नेंट महिला अपना ध्यान रखती है उतना ही माँ व् बच्चे दोनों को फिट रहने में मदद मिलती है। लेकिन कई बार ऐसा होता है की गर्भ में शिशु दिक्कत महसूस करता है। ऐसे में शिशु को कोई दिक्कत न हो इसका ख्याल भी महिला को ही रखना पड़ता है। तो आइये आज इस आर्टिकल में हम आपको बताने जा रहे हैं की गर्भ में शिशु कब दिक्कत महसूस करता है। और महिला को इसके लिए क्या क्या करना चाहिए।

शिशु को गर्भ में कब होती है दिक्कत

वैसे तो माँ के गर्भ में शिशु बिल्कुल सेफ होता है लेकिन कई बार गर्भ में शिशु दिक्कत महसूस करने लगता है। तो आइये जानते हैं कब होती है माँ के पेट में शिशु को दिक्कत।

पेट पर दबाव पड़ने पर

किसी भी कारण यदि प्रेग्नेंट महिला के पेट पर दबाव पड़ता है जैसे की झुककर काम करने पर, पेट के बल काम करने पर, सम्बन्ध बनाने पर, उल्टा सोने पर, आदि। तो जैसे ही पेट पर दबाव ज्यादा होता है तो इसके कारण गर्भ में बच्चा दिक्कत महसूस करता है।

ज्यादा तेज आवाज़ होने पर

बच्चे का शारीरिक विकास बढ़ने के साथ बच्चे के अंगो का विकास भी अच्छे से होना शुरू हो जाता है। ऐसे में जब गर्भ में बच्चा कोई तेज आवाज़ सुनता है तो उसे सुनकर घबरा जाता है। जिसके कारण गर्भ में शिशु डर कर तेजी से हलचल करना शुरू कर देता है और दिक्कत महसूस करता है।

जब महिला तनाव में होती है

ऐसा माना जाता है की जब माँ खुश होती है तो पेट में बच्चा भी खुश रहता है लेकिन जब माँ परेशान होती है तो गर्भ में बच्चा भी परेशान होता है। ऐसे में प्रेग्नेंट महिला यदि तनाव लेती है तो इसका बुरा असर गर्भ में बच्चे पर भी पड़ता है। और गर्भ में बच्चा परेशानी का अनुभव करता है।

बच्चे का विकास सही न होने पर

प्रेगनेंसी के दौरान यदि महिला अपने खान पान, अपनी हेल्थ का अच्छे से ध्यान रखती है तो इससे शिशु का विकास भी अच्छे से होता है। लेकिन यदि महिला अपनी हेल्थ के प्रति किसी भी तरह की लापरवाही करती है तो इसके कारण गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में आती है और गर्भ में शिशु को दिक्कत होती है।

ज्यादा टाइट कपड़े पहनने पर

गर्भवती महिला को प्रेगनेंसी के दौरान अपने साइज से थोड़े खुले, सूती व् आरामदायक कपडे पहनने की सलाह दी जाती है। लेकिन यदि महिला ज्यादा टाइट कपडे पहनती है तो इसके कारण महिला को परेशानी होने के साथ पेट पर दबाव भी बढ़ता है। और जब महिला के पेट पर दबाव पड़ता है तो इसके कारण गर्भ में शिशु को दिक्कत महसूस होती है।

प्रेगनेंसी के आखिरी दिनों में

गर्भावस्था के आखिरी दिनों में शिशु का विकास अच्छे से हो चूका होता है ऐसे में गर्भ में शिशु को घूमने के लिए उतनी जगह नहीं मिल पाती है। जिसके कारण शिशु गर्भ में असहज महसूस कर सकता है। साथ ही शिशु उस दौरान अपने जन्म लेने की सही पोजीशन में आने की कोशिश करता रहता है।

गर्भ में शिशु को होने वाली दिक्कत से बचाने के टिप्स

  • महिला को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे महिला के पेट पर दबाव पड़े।
  • पेट के बल नहीं सोएं।
  • ज्यादा तेज आवाज़ में गाने नहीं सुनें या ऐसी किसी जगह पर नहीं जाएँ जहां तेज आवाज़ हो।
  • प्रेगनेंसी के आखिरी महीने में अपना अच्छे से ध्यान रखें।
  • तनाव नहीं लें खुश रहें।
  • अपने पहनावें का ध्यान रखें
  • खान पान का अच्छे से ध्यान रखें ताकि गर्भ में शिशु को पोषक तत्व भरपूर मिल सकें और शिशु के विकास में किसी भी तरह की कमी न आये।
  • प्रेगनेंसी के आखिरी महीने में सम्बन्ध बनाने से बचे क्योंकि इसके कारण गर्भ में शिशु परेशानी का अनुभव करता है।

तो यह हैं कुछ कारण जिनकी वजह से गर्भ में शिशु को दिक्कत हो सकती है। ऐसे में गर्भ में शिशु को कोई दिक्कत न हो इसके लिए गर्भवती महिला को अपना अच्छे से ध्यान रखना चाहिए। साथ ही यदि आपको कोई भी परेशानी हो तो इसे अनदेखा नहीं करें क्योंकि कई बार छोटी सी लापरवाही माँ के साथ बच्चे पर भी बुरा असर डाल सकती है।

When does the baby have problems in the womb and what should the pregnant woman do

प्रेगनेंसी में दही खाने के फायदे और नुकसान

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प्रेगनेंसी के दौरान हर गर्भवती महिला चाहती है की गर्भ में पल रहा शिशु स्वस्थ रहे और उसका बेहतर विकास हो सके। साथ ही प्रेगनेंसी के दौरान आने वाली परेशानियां भी कम हो जाएँ, और इसके लिए सबसे जरुरी होता है महिला का खान पान, क्योंकि पौष्टिक तत्वों से भरे आहार का सेवन करने से गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों को फायदा मिलता है। तो आइये आज हम आपको प्रेगनेंसी के दौरान दही का सेवन करने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं और कौन से नुकसान होते हैं इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

प्रेगनेंसी के दौरान दही का सेवन करने के फायदे

गर्भावस्था में दही का सेवन गर्भ में पल रहे शिशु और गर्भवती महिला दोनों के लिए फायदेमंद होता है। इसके सेवन से प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली परेशानियों के साथ शिशु के विकास में भी मदद मिलती है। तो आइये अब विस्तार से जानते है प्रेगनेंसी में दही खाने से कौन कौन से फायदे मिलते हैं।

तनाव से राहत

हार्मोनल बदलाव की वजह से शरीर में हो रही परेशानियों के कारण प्रेगनेंसी के दौरान कई महिलाओं को बेचैनी व् तनाव महसूस होना आम बात होती है। और तनाव के कारण महिला की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं, ऐसे में दही का सेवन करने से मस्तिष्क को आराम मिलता है जिससे आपको तनाव, बेचैनी से राहत मिलती है।

प्रोटीन होता है भरपूर

दही में प्रोटीन की मात्रा भरपूर होती है जो की महिला के शरीर में ऊर्जा को भरपूर रखने के साथ शिशु की मांसपेशियों के बेहतर विकास में भी मदद करती है। और इससे महिला को स्वस्थ रहने के साथ शिशु की ग्रोथ भी बेहतर होती है। और प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली कमजोरी की समस्या से राहत पाने में भी मदद मिलती है।

ब्लड प्रैशर रहता है नियंत्रित

प्रेगनेंसी के समय बहुत सी महिलाओं को ब्लड प्रैशर से जुडी समस्या का सामना करना पड़ता है। लेकिन गर्भावस्था में दही का सेवन महिला को ब्लड प्रैशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जिससे महिला और शिशु दोनों को स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।

पाचन क्रिया बेहतर होती है

कब्ज़, गैस, एसिडिटी जैसी परेशानी का होना प्रेगनेंसी के दौरान आम बात होती है। और इससे पाचन क्रिया भी बुरी तरह प्रभावित होती है। ऐसे में प्रेगनेंसी के दौरान दही का सेवन करने से
पाचन क्रिया को बेहतर तरीके से काम करने में मदद मिलती है।

स्किन को देती है पोषण

प्रेगनेंसी के दौरान शरीर में रहे हार्मोनल बदलाव का असर स्किन पर भी देखने को मिलता है, जिसके कारण स्किन सूखी पड़ने लगती है, या दाग धब्बो की समस्या हो जाती है। ऐसे में प्रेगनेंसी के दौरान दही का सेवन करने से स्किन को हाइड्रेट रहने में मदद मिलती है, और दाग धब्बो जैसी परेशानी से भी आराम मिलता है।

इम्युनिटी बढ़ती है

दही में मौजूद बैक्टेरिया किसी भी तरह के संकरण से गर्भवती महिला शिशु को बचाने में मदद करता है क्योंकि इसके सेवन से गर्भवती महिला की इम्युनिटी को बढ़ाने में मदद मिलती है।

न्यूट्रिएंट्स को करता है अवशोषित

दही में मौजूद बैक्टेरिया बॉडी में न्यूट्रिएंट्स को अवशोषित करने की क्षमता को बढ़ाता है। जिससे गर्भवती महिला के शरीर को फिट रहने के साथ शिशु तक भरपूर पोषक तत्वों को पहुंचाने में मदद मिलती है।

शिशु की हड्डियों के विकास के लिए

गर्भ में शिशु का विकास बेहतर तरीके से हो उसकी हड्डियां मजबूत हो इसके लिए कैल्शियम की मात्रा बॉडी में भरपूर होनी चाहिए। और दही में कैल्शियम भरपूर मात्रा में होता है, इसीलिए शिशु की हड्डियों के बेहतर विकास के लिए महिला को दही का सेवन जरूर करना चाहिए।

प्रेगनेंसी में दही खाने के नुकसान

प्रेगनेंसी के दौरान रात के समय दही नहीं खानी चाहिए क्योंकि इसके कारण आपको परेशानी हो सकती है साथ ही यदि दही खाने से आपको एलर्जी आदि की समस्या हो जाती है तो भी गर्भवती महिला को दही खाने से परहेज करना चाहिए।

तो यह हैं कुछ फायदे और नुकसान जो गर्भवती महिला को दही का सेवन करने से मिलते हैं। तो प्रेगनेंसी के दौरान शिशु के बेहतर विकास और स्वस्थ रहने के लिए गर्भवती महिला को दही को अपने आहार में जरूर शामिल करना चाहिए।

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गर्भावस्था में दही खाने के क्या फायदे होते हैं? प्रेग्नेंसी में दही खाना जरुरी है?

सत्तू का शरबत पीने के क्या फायदे होते हैं?

गर्मियों के मौसम में शरीर को अधिक से अधिक पानी की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति के लिए हम लोग पानी, हेल्थ ड्रिंक, सॉफ्ट ड्रिंक, फलों का रस और अन्य तरीकों से करते है। परन्तु ये सभी काफी महंगे तरीके होते है। गर्मियों के दिनों में घर से भले ही आप 2 बोटल पानी लेकर चलें लेकिन रास्ते भर में वे दोनों बोतल का पानी या तो खत्म हो जाती है या गर्म हो जाता है। ऐसे में आपको मजबूरन बाहर से पानी या कोल्ड ड्रिंक खरीदकर पीनी पड़ती है जो आपकी सेहत को तो नुकसान पहुंचाती ही है साथ-साथ आपकी जेब पर भी असर डालती है।

लेकिन क्या आप जानते है की इन सभी तरीकों के अलावा भी एक चीज है जिसका इस्तेमाल गर्मियों की प्यास बुझाने के लिए किया जा सकता है। हम बात कर रहे है चने के सत्तू की जिसे आम भाषा में सत्तू कहा जाता है। गर्मियों में इसका इस्तेमाल एक हेल्थ ड्रिंक के रूप में किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होता है। काले चने को भूनकर उससे तैयार किये गए आटे को ही चने का सत्तू कहा जाता है। इसमें फाइबर और कार्बोहायड्रेट की अच्छी मात्रा पाई जाती है। सत्तू से बना शरबत स्वास्थ्य और शरीर के लिए बहुत लाभकारी होता है। परंतु सभी को इसके फायदों के बारे में पता नहीं होता इसलिए यहाँ हम आपको चने के सत्तू के फायदे बता रहे है जिन्हें जानकर आप भी इस शरबत के फैन हो जाएंगे।

गर्मियों में चने के सत्तू का शरबत पीने के फायदे :-सत्तू का शरबत

1. पाचन ठीक रखे :

चने में फाइबर की अच्छी मात्रा पाई जाती है और इसे पीसने के बाद बनाए जाने वाले सत्तू में भी उतनी ही मात्रा पाई जाती है। गर्मियों के मौसम में इसे पीना बहुत ही लाभकारी होता है। गर्म, मसालेदार और ऑयली खाने की वजह से अक्सर लोगों को अपच की समस्या हो जाती है। चने का सत्तू पीकर इस समस्या को बड़ी ही आसानी से दूर किया जा सकता है। इसमें मौजूद फाइबर खाने को पचाने की प्रक्रिया को तेज करके पाचन को दुरुस्त रखने में मदद करते है।

2. मोटापे के लिए :

सत्तू में वे सभी जरुरी तत्व पाए जाते है जो सम्पूर्ण आहार के लिए जरूरी होते है। चने के सत्तू को खाने या पीने से लम्बे समय तक व्यक्ति को भूख नहीं लगती और उसका पेट भरा रहता है। जिससे आसानी से वजन को कम किया जा सकता है। बहुत से लोग डाइटिंग के चलते घंटो तक भूखें रहते है जिससे वजन तो कम हो जाता है लेकिन अधिक समय तक भूखे रहने की वजह से उनकी सेहत पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। जबकि चने का सत्तू न केवल आपकी भूख को शांत करने का काम करता है बल्कि आपके शरीर की पोषक तत्वों की जरूरतों को भी पूरा करता है।

3. एनर्जी का स्त्रोत्र :

चने के सत्तू में बहुत से मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस पाया जाता है जो शरीर को इंस्टेंट एनर्जी देने का कम करता है। विशेषकर तब जब इसमें नींबू और नमक मिलाकर पीया जाए। सत्तू में और भी कई गुण पाए जाते है जो शरीर की थकान मिटाकर एनर्जी देने में मदद करता है।

4. पेट को ठंडा रखे :pet me gas

सत्तू की तासीर ठंडी होती है जिसकी वजह से गर्मियों में इसका सेवन करना लाभकारी होता है। इसमें मौजूद गुण गर्मियों में चलने वाली ले से बचाने में सहायक होते है। यह पेट को ठंडा रखने में भी मदद करता है जिससे पेट से संबंधी कई बीमारियाँ दूर हो जाती है। इसके सेवन से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है। इसका अधिकतर लाभ तभी होता है जब इसका सेवन खाली पेट किया जाए।

5. एनीमिया की समस्या :

शरीर में आयरन की कमी हो जाने पर एनीमिया की समस्या होती है और सत्तू इसे भी दूर करने की क्षमता रखता है। शरीर में आयरन की कमी होने पर रोजाना सत्तू में पानी मिलाकर पीने से काफी लाभ होता है। यह समस्या अधिकतर महिलाओं में प्रेगनेंसी के बाद होती है। ऐसे में सत्तू पीना लाभकारी होगा।

6. लिवर के लिए :

सत्तू में प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है जो लिवर को स्वस्थ रखने के लिए बहुत जरुरी होती है। सत्तू के केवल आधे कप में 10 ग्रा प्रोटीन, 178 कैलोरी और 3 ग्रा फैट होता है। खराब खाने, एल्कोहल की अधिक मात्रा का सेवन करने से सबसे अधिक प्रभाव लिवर पर पड़ता है जो भविष्य में कई गंभीर बिमारियों का कारण बनता है। ऐसे में यदि नियमित रूप से सत्तू का सेवन किया जाए तो लिवर और स्वास्थ्य दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है।

7. डायबिटीज की समस्या :सत्तू का शरबत पीने के क्या फायदे

सत्तू में मौजूद बीटा-ग्लूकेन शरीर में बढ़ते ग्लूकोस के अवशोषण को कम करता है जिसे ब्लड में शुगर का लेवल नियंत्रित रहता है। यदि मधुमेह के रोगी नियमित रूप से सत्तू का सेवन करें तो डायबिटीज को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। परन्तु उन्हें चीनी वाले सत्तू के शरबत का सेवन नहीं करना चाहिए।

तो, ये थे गर्मियों में चने के सत्तू के शरबत का सेवन करने के फायदे। जिन्हें जानकर आप भी इस फायदेमंद प्राकृतिक उत्पाद का सेवन करने के बारे में सोच रहे होंगें। तो इस बार गर्मियों में अपने पैसे कोल्ड ड्रिंक और packaged जूस में बर्बाद करने के लिए सत्तू में खर्च करें और खुद को बिमारियों से बचाएं।

कैसा होना चाहिए एक गर्भवती महिला का रोजाना का रूटीन?

गर्भावस्था के दौरान एक महिला को बहुत से बदलावों से गुजरना पड़ता है। गर्भवती महिला को अपनी बहुत सी आदते भी बदलनी पड़ती है। एक सेहतमंद गर्भावस्था के लिए जरुरी है के हम एक सहीं दिनचर्या को फॉलो करें। प्रेगनेंसी में अच्छे दिनचर्या को अपनाने से गर्भवती महिला और शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास भी पूर्ण रूप से होता है।

अपने शिशु की देखभाल के लिए जरुरी है के गर्भावस्था के शुरूआती दिनों में ही आप अपनी आदतों में बदलाव लाये। इस लेख में हम आपको बतायेंगे की गर्भवती महिला की रोजाना रूटीन कैसी होनी चाहिए?

हाइड्रेट रहें

हमे यह मानना होगा की अक्सर हम अपने पानी पीने का ध्यान ही नहीं रखते है। हम अपने रोजाना के कामो में इतने व्यस्त होते है की जब हम प्यासे होते है तब भी हम पानी को आसानी से भूल जाते है। और हाइड्रेशन हमारे शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है, खासतौर पर तब जब हम प्रेग्नेंट होते है या फिर नन्हें शिशु को स्तनपान करवाते हो।

हमारी डेली रूटीन में सबसे पहली आदत यही बदलनी है के हमे अच्छी मात्रा में पानी का सेवन करना है। एक गर्भवती महिला को रोजाना 8 से 10 ग्लास पानी या लगभग 2 लीटर पानी पीना ही है।

प्रेगनेंसी में आपके टेस्टबड्स बहुत जल्दी बदल जाते है ऐसे में आप सादे पानी से बोर भी हो सकती है। पर इसका मतलब ये नहीं की आप पानी ना पिए, बल्कि आप अपना दिमाग लगाए की आपको कैसे पानी का ज्यादा सेवन करना है। जैसे की आप अपने पानी में हर्ब्स, फ्रूट्स और फ्लेवर भी मिला सकती है। आप चाहें तो फलों का रस, सब्जियों का रस, हर्बल चाय, नारियल पानी आदि ले सकती है। क्योंकि हाइड्रेट करने का मतलब यह नहीं की सादा पानी पीना है बल्कि तरल मात्रा का सेवन कर पानी की कमी को दूर करना है। प्रेगनेंसी को दौरान किसे कितना पानी पीना चाहिए यह गर्भवती महिला के वेट पर निर्भर करता है। इसीलिए अपने पानी के लक्ष्य को निर्धारित करने के लिए अपने डॉक्टरों से जरूर सलाह लें।

व्यायाम या योगा

स्वस्थ और एक्टिव रहने के लिए एक्सरसाइज सभी के लिए जरुरी होती है। परन्तु गर्भावस्था में योगा आपके और आपके बच्चे के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है। पर ध्यान रखिये प्रेगनेंसी में हैवी एक्सरसाइज ना करके कुछ छोटे छोटे व्यायाम या फिर योग करनी चाहिए। योगा करने से डिलीवरी के समय आने वाले कम्प्लीकेशन का रिस्क कम हो जाता है।

रोजाना हल्के व्यायाम और योग करने से आप हैल्थी वेट गेन करेंगे। आपकी यह आदत प्रेगनेंसी के दौरान आपका ब्लड प्रेशर कण्ट्रोल में रखेगी। इसके अतिरिक्त योगा आपके मूड़ को भी अच्छा रखेगी। हल्के व्यायाम में सुबह की सैर, थोड़ी बहुत स्विमिंग और एंटीनेटल योगा क्लासेस भी आप ज्वाइन कर सकते है।

संतुलित भोजन

गर्भावस्था के दौरान अक्सर सभी कहते है के हमे एक के लिए नहीं बल्कि दो के लिए खाना है एक अपने लिए और दूसरा अपने शिशु के लिए। परन्तु दो के लिए खाने का मतलब भोजन की डबल क्वान्टिटीय से नहीं बल्कि डबल पोषक तत्वों से होता है। प्रेगनेंसी में हमारे खाने की बहुत सी आदते बदल भी जाती है जैसे की जो हमे पहले अच्छा नहीं लगता जरुरी नहीं वो आज भी अच्छा ना लगे। और जो चीज खाने में बहुत पसंद है वो अब भी बहुत मजेदार लगे।

भोजन की एक साथ ज्यादा मात्रा ना खाकर, थोड़ी थोड़ी मात्रा में कम से कम 5 बार खाना चाहिए। छोटी छोटी मील में जूस, ताजे फल आदि को भी गिना जा सकता है। अपने खाने में ज्यादा से ज्यादा वैरायटी रखें ताकि भरपूर पोषक तत्व मिल सकें।

मैदे से बनी चीजे जैसे पास्ता या ब्रेड को भोजन कम सेकम शामिल करें। चावलों को भी दो या तीन दिन में एक बार खाये। दाले, बिन्स, हरी सब्जियां आदि का ज्यादा सेवन करें। इनसे आपको भरपूर मात्रा में फाइबर मिलेगा।

कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन के लिए दूध और दूध से बनी चीजों का अच्छे से सेवन करें। जिन महिलाओं को दूध से एलर्जी हो या दूध ना पचता है वह सोया मिल्क का उपयोग कर सकती है। भीगे हुए बादाम को भी अपनी डाइट में जरूर शामिल करें। इसके आलावा भोजन में सलाद को भी नियमित रूप से शामिल करें।

सेहतमंद नींद

आपकी नींदे शिशु के आने के बाद तो वैसे भी उड़ने ही वाली है। फिर भी अगर आप चाहते है अगर आपके बच्चे में नींद से जुडी अच्छे आदते हो वो आदतें आपको अभी से अपनानी होगी। डॉक्टरों के अनुसार भी प्रेगनेंसी में आठ घंटे की नींद बहुत जरुरी है।

दिन में भी एक छोटी सी नींद की झपकी आपके एनर्जी लेवल को पुरे दिन के लिए बरकरार रखेगी।

इन सभी आदतों के आलावा जो भी अच्छी आदते आप अपने शिशु में देखना चाहते है उन्हें आप अभी से अपनाये। वह सब चीजे आपको ख़ुशी भी पहुँचायेगा साथ ही आपको भविष्य के लिए भी तैयार करेगा।